
بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰی سَيِّدِنَا وَمَوْلَانَا مُحَمَّدٍ وَّعَلٰی اٰلِ سَيِّدِنَا وَمَوْلَانَا مُحَمَّدٍ وَّبَارِكْ وَسَلِّمْ
मसला-ए-अफ़ज़लियत का तहक़ीक़ी जायज़ा.👇
मसला-ए-अफ़ज़लियत पर ‘इज्मा’ (सर्वसम्मति) होने की बात बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि इज्मा का मुनकिर (इनकार करने वाला) काफ़िर हो जाता है और मुसलमान नहीं रहता।
अगर इस पर वाकई इज्मा हुआ होता, तो बाज़ सहाबा हज़रत अली को अफ़ज़ल (सबसे श्रेष्ठ) न कहते।
अहले सुन्नत की मोतबर (प्रामाणिक) किताबों से यह बात साबित है कि अफ़ज़लियत के मामले में सहाबा और ताबेईन के दरमियान अलग-अलग राय थी:
●कोई हज़रत अली को अफ़ज़ल मानता था।
●कोई अज़वाज़-ए-रसूल (नबी की पत्नियों) को अफ़ज़ल मानता था।
●कोई अल्लाह के रसूल की बेटी हज़रत फ़ातिमा को अफ़ज़ल कहता था।
इसलिए, अफ़ज़लियत के मसले पर ऐसा इज्मा होना जिससे इनकार करने वाला इस्लाम से बाहर हो जाए, साबित नहीं होता।
1.इज्मा की हक़ीक़त और मुनकिर का हुक्म.👇
यह बात सही है कि अगर किसी अक़ीदे पर ‘इज्मा-ए-क़तई’ (जिसका इनकार कुफ़्र हो) हो जाए, तो उसका मुनकिर दायरे-ए-इस्लाम से बाहर हो जाता है। लेकिन अफ़ज़लियत के मसले पर जो इज्मा नक़्ल किया जाता है, वह अक्सर ‘इज्मा-ए-सुक़ूती’ या ‘अक्सरियत की राय’ के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि हज़रत अली को अफ़ज़ल मानने वाले को अहले सुन्नत के उलेमा ‘काफ़िर’ नहीं कहते अगर ऐसा होता तो माज़अल्लाह उन सहाबा व ताबिएीन का क्या बनेगा जो मसला ए अफ़ज़लियत पर अलग अलग राय रखते थे.?
2.सहाबा और सलफ़ का इख़्तिलाफ़.👇
तारीख़ और हदीस की मोतबर किताबों (जैसे सियरु अलामिन्नुबला, अल-इस्तिआब) से यह साबित है कि बाज़ जलील-उल-क़द्र सहाबा और ताबिएीन हज़रत अली को अफ़ज़ल मानते थे।
हज़रत सलमान फ़ारसी, हज़रत अबू ज़र गिफ़ारी, और हज़रत मिक़दाद जैसे सहाबा से हज़रत अली की अफ़ज़लियत के क़ौल मिलते हैं।
इमाम मालिक के उस्ताद इमाम इब्ने शिहाब ज़ुहरी और कुछ कूफ़ी उलेमा भी हज़रत अली को अफ़ज़लियत देते थे।
3. हज़रत अली की अफ़ज़लियत पर दलीलें.👇
अगर हम हदीस की किताबों का मुताला करें, तो हज़रत अली की अफ़ज़लियत के हक़ में कई मज़बूत दलीलें मिलती हैं और आगे हम इस पर दलील ए सहीहा भी पेस करेंगे।
4.अफ़ज़लियत (हज़रत फ़ातिमा).👇
जैसा कि अफ़ज़लियत का एक रुख़ यह भी है कि हुज़ूर (ﷺ) के जिगर के टुकड़े यानी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा को तमाम औरतों, बल्कि बाज़ उलेमा के नज़दीक पूरी उम्मत से अफ़ज़ल माना गया है, क्योंकि वह ‘बदअतुल मुस्तफ़ा’ (नबी का हिस्सा) हैं।
हम अहले सुन्नत का यह अकीदा है कि अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ जो इमामा शरीफ़ पहना करते थे, उस इमामा शरीफ़ से अफ़ज़ल कोई नहीं है और हुज़ूर ﷺ के बाल मुबारक से भी अफ़ज़ल कोई नहीं है। तो क़ुरआन-ए-करीम में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि हज़रत अली, मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की जान हैं, उनकी नफ़्स हैं; तो रसूलुल्लाह ﷺ की जान (नफ़्स) से भला कौन अफ़ज़ल हो सकता है?”
आये कुरआने करीम की उस आयत को देखे जिसमे हजरत अली को रसूलुल्लाह ﷺ की जान (नफ़्स) करार दीया है.👇
कुरआने करीम की सुरत नं: 3 : आल इमरान – سورة آل عمران – आयत नं: 61 पर अल्लाह ﷻ फरमाता है:
فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَ أَبْنَاءَكُمْ وَ نِسَاءَنَا وَ نِسَاءَكُمْ وَ أَنْفُسَنَا وَ أَنْفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَلْ لَعْنَتَ اللهِ عَلَى الْكاذِبِينَ (٦١)
तरजूमा
फिर ऐ महबुब! जो तुमसे ईशा के बारे मे हुज्जत करे बाद इसके के तुम्हे इल्म आ चुका तो उनसे फरमा दो आओ हम बुलाए अपने बेटे और तुम्हारे बेटे और अपनी औरतें और तुम्हारी औरतें और अपनी जाने और तुम्हारी जाने, फिर मुबाहीला करें तो झूठो पर अल्लाह की लानत डालें
इस आयत जीम्न मे मुफ़स्सरीन ने लीखा है जो “अन,फुसना” यानि जान(नफ़्स) कहा गया है उससे मुराद हज़रत अली है
आये अब हम देखते है के इस आयत मुबाहीला के जिम्न मे मुफ़स्सरीन ने कीया लिखा है.👇
आयते मुबाहिला की शाने नुजूल के बारे में इमाम वाहिदी निशापुरी [वफात 468 हिजरी] ने ‘असबाब ए नुजूल ए कुरआन’ में सफा नं 97 पर लिखा है-
الشعبي كا قول ہے کہ ابناءنا سے مراد حسن اور حسین ہیں، ونساءنا سے مراد حضرت فاطمہ ہیں اور انفسنا سے مراد علی بن ابی طالب رضی اللہ عنہم ہیں۔
यानि ‘बेटों’ से मुराद हसन और हुसैन (रजि.) हैं, बेटियों से मुराद फातिमा (रजि.) हैं और नफ्स से मुराद अली बिन अबी तालिब (रजि.) हैं।
कुल कायनात मै बनू हाशिम सबसे अफजल है और बनू हाशिम मै रसूलल्लाह ﷺ अफज़ल.👇
कुरआन-ए-मजीद:
لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ – (अत-तौबा, 128)
तरजुमा: बेशक तशरीफ लाया है तुम्हारे पास एक रसूल ﷺ तुम्हीं में से।
(हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास रज़ि० फरमाते हैं कि: इस आयत में “अन्फुसिकुम” का लफ़्ज़ आला और उम्दा नसब से मुराद है। यानी रसूल ﷺ बनी-हाशिम से हैं जो कि अरबों का आला नसब है। (तफ़सीर-दुर्रे-मन्सूर, सूरह तौबा, आयत 128-129)
क़ौम में अल्लाह तआला की नज़रों में सबसे अफ़ज़ल क़ौम बनी-हाशिम है। (तफ़सीर-कुर्तुबी, सूरह तौबा, आयत 128)
जाबिर इब्न अब्दुल्लाह रज़ि० से मवी है कि अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद में इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद को मख़सूस फ़रमाया। इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में बनू कनाना को, बनू कनाना में कुरैश को, कुरैश में बनू हाशिम को और बनू हाशिम में रसूलुल्लाह ﷺ को मख़सूस फ़रमाया। (सहीह मुस्लिम, किताबुल फ़ज़ाइल, हदीस नं. 2276)
हज़रत इब्न अब्बास रज़ि० फरमाते हैं कि: अल्लाह तआला ने रसूल ﷺ के लिये “अल-मुजम्मल”, “अल-मुज़म्मल”, “अल-मुतवक्किल”, “अल-मुतहम्मल”, “अल-मुजतबा” और “रऊफ़-रहीम” नाम रखे। (दुर्रे-मन्सूर, सूरह तौबा, आयत 128-129)
और एक और क़ुरआनी आयत का मज़मून ये है कि आप ﷺ सब से ज़्यादा अर्फ़ और अफ़ज़ल हैं। (सहीह बुख़ारी, किताबुत तफ़सीर, जिल्द 2, सफ़ा 311)
Note
“अल्लाह तआला ने तमाम जहाँ में बनू हाशिम को चुना और बनू हाशिम में मोहम्मद ﷺ को चुना यानी अल्लाह ने भी अफ़ज़लियत का मयार (Standard) ख़ानदान ही को बनाया, अब हम उसी ख़ानदान को अफ़ज़ल कहें तो हम शिया केसे?”
हम अल्लाह तअला के मयार को ही मानेंगे कीसी दुनियादार की बात नही मानेंगे
निचोड़.👇
अहले सुन्नत के बड़े इमाम, जैसे इमाम अब्दुल क़ाहिर बग़दादी और इमाम इब्ने असीर, ने तस्लीम किया है कि शुरुआती दौर में इस मसले पर इख़्तिलाफ़ था। अगरचे बाद में जम्हूर (Majority) ने हज़रत अबू बक्र की अफ़ज़लियत पर इत्तिफ़ाक़ कर लिया, लेकिन हज़रत अली को अफ़ज़ल मानना तो सहाबा के दौर में ‘कुफ़्र’ ना था और ना ही आज इसे ‘इज्मा’ का मुनकिर कहकर खारिज किया जा सकता है।
यह एक इल्मी और तहक़ीक़ी मसला है जिसमें दोनों तरफ़ दलीलें मौजूद हैं।
अफजलियत ए अली अहले-सुन्नत की किताबों से
पोस्ट बहोत लंबि होने के कारण
इस.👇 लिंक पर क्लिक करे सारे हवाले दिए गए हे
https://drive.google.com/file/d/1VcxPTuG5-uQ1MNoaTZL_XwMYPIxuIcQX/view?usp=drivesdk


