आदम बनाम अहलेबैत

॥ आदम बनाम अहलेबैत ॥

भला वो शख़्स हुज़ूर की आल से #हसद क्यों न करे जो हुज़ूर का उम्मती होने पर इतराता फिरता हो?

क्या इब्लीस ने #आदम अलैहिस्सलाम के ख़लीफतुल्लाह होने पर हसद नहीं किया था? जब्कि इब्लीस अल्लाह का #मुक़र्रब होने पर इतराता फिरता था!!

तो कौन है तुम में जो #अल्लाह के आदम को सज्दा करने के हुक्म (मवद्दत ए अहलेबैत पर) सर ए इताअ़त ख़म कर दे?

और कौन इब्लीस (दुश्मन ए अहलेबैत) बनकर आदम (अहलेबैत) की #तौहीन करे इस गुमान में कि वो (आमाल के ऐतबार से) आदम (अहलेबैत) से अफज़ल है?

ऐ बनी आदम!
क्या अल्लाह ने हुक्म नहीं दिया है कि #शैतान की राह पर न चलना?
और क्या इब्लीस वो नहीं जिसपर अल्लाह का #गज़ब हुआ ?

और क्या आदम वो नहीं जिनपर अल्लाह का #इनाम हुआ?

तो क्या तुम अपनी #नमाज़ की हर रकात में अल्लाह से हमकलाम होकर नहीं कहते हो कि हमें उन लोगों की राह चला जिनपर तेरा #इनआम हुआ, उन लोगों की राह नहीं जिनपर तेरा गज़ब हुआ और न गुमराहों की राह पर?

ऐ #ईमान वालों आदम खता भी करें तो भी #ख़लीफा ए खुदा हैं, वो अपनी बंदगी से ख़लीफा नहीं बने ना अपनी मरज़ी से बल्कि अल्लाह ने उन्हें ऐसा बनाया और नवाज़ा।
और मलायका को उनके आगे सज्दे का हुक्म दिया हालांकि #मलायका नूरी थे और आदम खाकी मगर एक #निस्बत के अल्लाह ने उन्हें अपने हाथों से बनाया और उनमें अपनी #रूह फूंकी और वो अफज़ल और मुक़द्दस ठहरे।

तो तुम्हें क्या हुआ है कि #अहलेबैत से हसद करते हो बुग़्ज़ ओ अदावत रखते हो?
क्या कोई अपनी मर्जी से आले मुहम्मद बन सकता है?
क्या हुज़ूर अज़ खुद किसी को अपनी आल बना सकते हैं?
हरगिज़ नहीं!

यह #अम्र ए इलाही है, वो खुद अपने खास बंदों को आले मुहम्मद बनाता है उन्हें तैय्यब ओ #ताहिर बनाता है और जिन्हें सरवर ए कायनात ने पाक किया उन्हें हुक्म देता है इन आले मुहम्मद से #मवद्दत का।

कुछ समझे?

सारा किस्सा वही दोहराया जा रहा है!
अब जिसे मलायका के मिस्ल होना है खामोशी से अल्लाह के हुक्म पर आदम को #सज्दा करे बिना यह सोचे समझे कि वो क्या है और जिसे सज्दा कराया जा रहा है वो क्या है!

और जिसे #इब्लीस बनना है बनता फिरे अल्लाह बे नियाज़ है!

अगर किसी #मुल्ला मुहद्दिस के पास जवाब हो कि इब्लीस ने कौन से ज़रूरियात ए #दीन का इंकार किया जो #काफिर हुआ तो ले आये!
अल्लाह की नाफ़रमानी के सिवा कोई जवाब नहीं मिलेगा।

तो डरो ऐ आले मुहम्मद से हसद करने वाले पढ़े लिखे #जाहिल लोगों !
तुम में से कोई भी #मोमिन नहीं बचेगा जबतक मवद्दत ए #अहलेबैत के हुक्म पर सर ए #इताअ़त खम ना कर ले।

इल्ला माशा अल्लाह

اللھم صل وسلم و بارک علٰی سیدنا محمد و علٰی آل سیدنا محمد

– सैय्यद मुहम्मद अलवी अल-हुसैनी

Ḳhẉāb kitne qism ke hote haiṅ?

*Ḳhẉāb kitne qism ke hote haiṅ?*

“Ḥaz̤rat Abū Hurayrah raḍiya Allāhu ‘anhu se riwāyat hai Ḥuz̤ūr Nabīye Akram ṣallá Allāhu ‘alayhi wa-Ālihi wa-sallam ne farmāyā: jab qurbe qiyāmat kā zamānah qarīb hogā to qarīb hai keh Musalmān ke ḳhẉāb jhūt̥e hoṅ aur tum meṅ se sachche ḳhẉāb wālā tum meṅ sab se ziyādah sach bolne wālā hai, aur Musalmān kā ḳhẉāb nubūwat ke paiṅtālīs ajzā’ meṅ se ek juz’ hai. Aur ḳhẉāb tīn qism ke hote haiṅ: ek ṣāleḥ ḳhẉāb hotā hai jo keh Allāhu Taʻālá kī ṭaraf se bashārat hotā hai, aur ġham-gīn-o pareshān kar dene wālā ḳhẉāb Shayṭān kī ṭaraf se hotā hai. Aur ek ḳhẉāb insān ke apne ḳhayālāt hote haiṅ (jo woh din bhar sochtā răhtā hai.) Lehāz̲ā jab tum meṅ se ko’ī nā-pasandīdah bāt dekhe to use chāhiye keh ut̥h khar̥ā ho aur namāz par̥he aur woh ḳhẉāb kisī se bayān bhī nah kare. Aur Āp ṣallá Allāhu ‘alayhi wa-Ālihi wa-sallam yeh bhī farmāte the keh mujhe (ḳhẉāb meṅ) qaid pasand hai aur ṭauq ko meṅ pasand nahīṅ kartā (kyūṅ-keh) qaid Dīn par s̲ābit-qadamī (kī ʻalāmat) hai.”
Imām Tirmid̲h̲ī ne in alfāẓ kā iz̤āfah bayān kiyā: “aur Āp ṣallá Allāhu ‘alayhi wa-Ālihi wa-sallam yeh bhī farmāte the: jis ne (ḳhẉāb meṅ) mujhe dekhā us ne ḥaqīqatan mujhe hī dekhā kyūṅ-keh Shayṭān merā ham-shakl nahīṅ ban saktā. Aur Āp ṣallá Allāhu ‘alayhi wa-Ālihi wa-sallam yeh bhī farmāte: apnā ḳhẉāb kisī ʻĀlim yā apne kisī ḳhair-ḳhẉāh ke siwā kisī aur ke sāmne bayān nah kiyā karo.”

[Muslim fī al-Ṣaḥīḥ, 4/1773, raqam: 2263,
Tirmid̲h̲ī fī al-Sunan, 4/537, 541, raqam: 2280, 2291]


हुज़ूर की अली के मुहिब्ब के लिए दुआ और दुश्मन के लिए बद्दुआ

हुज़ूर की अली के मुहिब्ब के लिए दुआ और दुश्मन के लिए बद्दुआ

पहली हदीस

रावीयान ए हदीस, इस्हाक़ बिन इब्राहीम, अन्- नज़र बिन शुमैल, अब्दुल जलील बिन अतिय्यह, अब्दुल्लाह बिन बुरैदह ।

हज़रत बुरैदह रजिअल्लाहु अन्हो से रिवायत है कि मैं, हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ तमाम लोगों से ज्यादा बुग्ज़ रखता था, हत्ता की मैंने, कुरैश के एक आदमी से दोस्ती की तो उसकी बुनियाद भी बुग्ज़ ए अली पर थी। उसने मेरी तरफ़ एक सवारी भेजी तो मैंने मुसाहिबत भी बुग्ज़ ए अली पर की। रावी बयान करता है कि हमें कुछ क़ैदी हाथ लगे तो हमने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की ख़िदमत में लिखा की आप हमारी तरफ़ कोई आदमी भेजें, जिसे हम खुम्स दे दें तो आप सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने हज़रत अली अलैहिस्सलाम को हमारी तरफ़ भेजा और कैदियों में एक बहुत अच्छी खिदमतगार लड़की थी। जब आपने खुम्स लगाया तो वो लड़की खुम्स में आ गई । आपने फिर खुम्स लगाया तो वो हज़रत मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के अहलेबैत अलैहिस्सलाम के हिस्से में आ गई और फिर खुम्स लगाया तो वो आल ए अली अलैहिस्सलाम के हिस्से में आ गई।

हमने पूछा कि, “ये क्या है?”, तो हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया, “तुम देखते नहीं, पहले ये कैदी खुम्स में आई, फिर अहलेबैत अलैहिस्सलाम के हिस्से में आई, फिर मेरे आल के हिस्से में आई।”, ये सुनकर हमारे लश्कर के अमीर ने रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को एक ख़त लिखा, जिसमें मौला अली अलैहिस्सलाम की शिकायत थी और मेरे हाथ लेकर भेजा। रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम की ख़िदमत में पहुँचकर मैंने वो ख़त पढ़ना शुरू किया और अपने अमीर की बात की तस्दीक़ की कि हाँ वो सच्चा है, हाँ वो सच्चा है।

रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने मुझे दोनों हाथों से पकड़ा और पूछा, “ऐ बुरैदह! क्या तुम अली से बुग्ज़ रखते हो?”, मैंने कहा, “हाँ, मैं रखता हूँ।”, ये सुनकर रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने फरमाया, “अगर अली से बुग्ज़ हैं तो बुग्ज़ ना रखो और अगर अली से मुहब्बत करते हो तो और भी ज्यादा मुहब्बत करो (यानी मवद्दत करो), मैं अल्लाह रब उल इज्जत की कसम खाकर कहता हूँ, जिसके कब्जा ए कुदरत में मेरी जान है, खुम्स में से अली और आल ए अली का हिस्सा उस ख़िदमतगार लड़की से कहीं ज्यादा है। “

इसके बाद रावी कहते हैं कि मुझे इस वाक्ये के बाद, अल्लाह और रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही वसल्लम के अलावा कोई इतना महबूब नहीं है, जितने अली अलैहिस्सलाम हैं।



दूसरी हदीस

रावीयान ए हदीस, अल्-हुसैन बिन हुरैस (अल्- मरवाज़ी), अल्-फल बिन मूसा, अल्अ’मश, अबु इस्हाक

हज़रत सईद बिन वहाब रज़िअल्लाहु अन्हो कहते हैं कि हज़रत अली करम’ अल्लाहु वज्हुल करीम ने एक मैदान में फरमाया कि, “उस शख्स को अल्लाह तआला का वास्ता देकरख़साइस ए अली

पूछता हूँ, जिसने ग़दीर ए खुम पर रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को ये फरमाते हुए सुना कि, अल्लाह तआला और उसका रसूल, मोमिनों का वली है और जिसका मैं वली हूँ उसका ये (मौला अली) वली है। जो इससे मुहब्बत रखता है, उससे मुहब्बत रख और इससे दुश्मनी रखता है, उससे दुश्मनी रख और जो इसकी नुसरत करता है उसकी नुसरत फरमा।”

रावी कहते हैं कि सईद ने कहा, मेरे पहलू से छह आदमी उठे। ज़ैद बिन यसी भी कहते हैं कि मेरे पास से छह आदमी उठे।

ठीक ऐसी ही एक रिवायत और मिलती है, जिसमें इस्राईल, अबु इस्हाक़, अम्र सो मुर्र की रिवायत से ऊपर वाली हदीस ही बयान की जाती है लेकिन आख़िर में एक बात और जुड़ी है कि, “जो अली से मुहब्बत करे, उससे मुहब्बत रखो और जो अली से बुग्ज़ ओ दुश्मनी रखे, उससे दुश्मनी रखो। “



तीसरी हदीस

रावीयान ए हदीस, अली बिन मुहम्मद बिन अली, ख़लफ़ बिन तमीम, इस्राईल

अबु इस्हाक़ ने अम्र सो मुर्र से बयान किया है, वो कहते हैं कि, मैं मैदान में, हज़रत अली अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में हाज़िर हुआ, जो मुहम्मद सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम के अस्हाब को अल्लाह तआला का वास्ता दे रहे थे कि आप लोगों में किस-किस ने ग़दीर ए ख़ुम के रोज़, रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम को ये फरमाते हुए सुना कि, “जिसका मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं। ऐ अल्लाह! जो इससे मुहब्बत रखे, तू भी उससे मुहब्बत रख, जो इससे दुश्मनी रखे, तू भी उसे दुश्मन रख, जो इसे महबूब रखे तू भी उसे महबूब रख, जो इससे बुग्ज़ रखे, तू भी उससे बुग्ज़ रख और जो भी इसकी नुसरत करे, तू भी उसकी नुसरत फरमा, मोमिन और काफ़िर के दरमियान इम्तियाज़ पैदा कर दे।”



चौथी हदीस

रावीयान ए हदीस, अबु कुर’एब (कुरैब), मुहम्मद इब्नुल आला अल्-कूफी, अबु मुआविया, अल्-अ’मश, अदिय बिन साबित।

हज़रत ज़िर्र बिन हुबेश(हुबैश), हज़रत अली करम अल्लाहु वज्हुल करीम से बयान करते हैं कि आपने फरमाया, “उस खुदा की कसम, जिसने जन्नत को पैदा किया और रूह को ख़ल्क किया, की रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने मेरे लिए ताकीद फरमाई है कि मुझसे सिर्फ़ वो ही मुहब्बत करेगा जो मोमिन है और वो ही बुग्ज़ रखेगा जो मुनाफिक़ है।

वासिल बिन अब्दुल आला अल्-कूफी, वकी, अल्-अ मश, अदिय बिन साबित, हज़रत जिर बिन हुबेश, हज़रत अली अलैहिस्सलाम से रिवायत करते हैं कि, आपने फरमाया कि मुझे, हुज़ूर रिसालत म’आब सल्लललाहु अलैहे व आलिही व सल्लम ने वसीयत फरमाई है कि, “मोमिन मुझसे मुहब्बत रखेगा और मुनाफ़िक़ मुझसे बुग्ज़ रखेगा।”

युसुफ़ बिन ईसा, अल्-फल बिन मूसा, अल्-अ’ मश, अदिय, ज़िर्र से बयान करते हैं कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम ने फरमाया कि रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहे व आलिही सल्लम ने मेरे लिए ताकीद फरमाई है कि तुझसे मोमिन मुहब्बत रखेगा और मुनाफिक बुग्ज़ रखेगा।