Aftab e Ashraf 8

अल्लामा हाश्मी मियां किछौछवी का बयानयहाँ ये लाज़मी है की कारीनकिराम के दिलचस्पी के लिए अल्लामा हाश्मी मियां अशरफ़ी किछौछवी का वो बयान भी लिखता चलूँ जो अपने मुताल्लिक़ उन्होंने किताब मजजूब ए कामिल में दर्ज करवाया है! जिसे किताब के मुसन्निफ़ सैय्यद मौसूफ़ अशरफ़ बसखारवी मरहूम मग़फूर ने कुछ इस तरह से पेश किया है

हाश्मी मिया फ़रमाते हैं कि अल्हम्दुलिल्लाह आज तो मुझे करोड़ो मुसलमान जानते हैं! एशिया और यूरोप के लोग भी सूरातन वाक़िफ़ हैं। मगर ये बात उस वक़्त की है जब ख़ानदान की अकसरियत मेरे बेऐतेदालियों के वजह से मेरे किसी रौशन मुस्तकबिल की उम्मीद से बिलकुल मायूस हो चुकी थी! वाळूआतन मेरा लड़कपन तूफ़ान ज़ियों से भरा पड़ा था! किसी स्कूल कॉलेज और मदरसा में दो साल से ज़्यादा नहीं रह पाता था! मकतब अशरफिया किछौछा शरीफ से हटाया गया तो मुहम्मद हसन इण्टर कॉलेज जौनपुर पहुँचा वहां से हटाया गया तो नेशनल हायर सेकण्डरी स्कूल बनारस पहुँचा वहां से हटाया गया तो हॉबर्ट त्रिलोक नाथ इण्टर कॉलेज माण्डा पहुँचा! वहाँ से मेरा ज़मीर कुछ ऐसा बेदार हुआ की मैंने दीनी तालीम हासिल करने का फैसला कर लिया! मदरसा जामिया नईमिया में ऐडमीशन हुआ वहाँ भी दो साल नहीं रुक पाया था कि मुझे जामिया अशरफिया मुबारकपुर ज़िला आज़मगढ़ जाना पड़ा! दो साल वहां भी चैन सुकून से ना गुज़र सका तक़दीर आज़माने के लिए जामिया अरबिया सुल्तानपुर पहुँचा! मैं उसे एक मदरसा समझ कर दाखिल हुआ किसे मालूम था की कोई नज़रे कीमियाअसर मेरे ज़िन्दगी की तमाम बेऐतेदालियों और कमजोरियों को एक बामक़सद सिम्त अता कर देगी! मेरे साथ मेरे भांजे मौलाना सैय्यद तनवीर अशरफ़ भी ज़ेरे ,
तालीम थे। एक दिन पूरे मदरसे में एक शोर उठा की हज़रत जलाल शाह तशरीफ़ लाएं हैं! तनवीर मियां पहले ही से वाक़िफ़ थे ये सुनते ही बेअख्तियार खड़े हो गयें! मैंने पूछा ये कौन बुजुर्ग हैं? तो उन्होंने कहा कि मामू ये मजजूबे कामिल हैं! हुजूर अशरफ रहमतउल्लाह अलैह के ये साहबज़ादे और जानशीन हैं! चलिए आप भी मुलाक़ात कीजिये! हम दोनों कमरे से निकल कर नीचे उतरें और हॉल में पहुँचे तो देखा एक मजमा लगा हुआ है! जलवत में खलवत का ये नज़ारा मेरे ज़िन्दगी का पहला वाक़आ था! मेरी निगाह हज़रत से हज़रत की निगाह मुझसे टकराई वोह मुस्कुराएं और आहिस्ता से अब्दुल शकूर से बोले की से हमारे घर का बच्चा है जिसे मैंने ख़ुद भी सुन लिया!

बगैर किसी तारुफ़ के एक ऐसी चीज़ को देख लेना जो मख़्फ़ीतरीन है यानी मेरी नसबी निस्बत से ज़ाहिरी ज़राये के बगैर वाकिफ़ हो जाना इनके बस्र का कमाल ना था इनके बसीरत का कमाल था!

मैं तालिबे इल्मी के दौर में मुक़र्रिर तस्लीम किये जाने लगा था! कोई जलसा छोटा बड़ा मदरसे या शहर का मेरे बगैर नहीं होता था! उस दिन भी मदरसा का सालाना जलसा था जिसमें मेरी तक़रीर रखी गयी थी! हज़रत के ख़ादिम अब्दुल शकूर ही से पता चला की हज़रत ने | गाँव छोड़ने से पहले ही फरमा दिया था की चलो जामिया अरबिया में हमारे खानदान का लड़का ही तक़रीर करेगा! मुझे याद है जब तक मेरी तक़रीर होती रही हज़रत पूरी ख़ुदाई से बेनियाज़ रहें! तक़रीर के बाद पूरी शफ़क़त से उन्होंने मुझसे एक बात फ़रमाई जो ख़ुदा और मेरे अलावा कोई दूसरा नहीं जानता था! इरशादेगिरामी समझने में जब मुझे ज़हमत हुई और उनकी आहिस्तगी और इशारा मेरे लिए दुशवारी का सबब रहा तो उन के ख़ादिम अब्दुल शकूर ने वज़ाहत करते हुए कहा की हज़रत कह रहे हैं की आप कुटिया चलें जाएँ और वहां के तालाब का पानी पी लें तो आपकी बीमारी ठीक हो जाएगी! मैं अपने आपको उस नज़र से ना बचा सका जिसने मेरे अन्दरूनखाना का सहीजायज़ा ले लिया! मैं साथ गया पानी पिया शिफा पाई। फैज़ सिमनानी उनके तालाब के शक्ल में मिला! अब तो ये आलम था कि जहाँ हज़रत वहाँ मेरी तक़रीर और जहाँ मेरी तक़रीर वहाँ हज़रत! के

एक मर्तबा रईस सुल्तानपुर जनाब असीर ख़ान साहब कारखाने के क़रीब जमील मिस्त्री के दुकान में हज़रत ने अज़ ख़ुद मेरे लिए एक नक्श लिखा फिर उसी नक्श पर गोल दायरा बनाया! अब तक वोह ख़ामोश थे लेकिन दस्तखत करने के बाद फ़रमाया तुम को हम मुक़र्रर का ताज बनाते हैं!
मैंने अब्दुल शकूर साहब से दस्तख़त और गोल दायरे के बारे में पूछा कि आज तक मैंने किसी को ऐसा नक्श बनाते हुए नहीं देखा मामला क्या है? अब्दुल शकूर भाई ने बताया की मजबूर होकर लिखने का अंदाज़ और है और मसरूर होकर लिखने का और है! उस दिन के बाद मैं नहीं जानता कि मुझे अपने लिए बेताज होने का एहसास कहीं पैदा हुआ!
एक दफा हज़रत किछौछा तशरीफ़ लाएं और हज़रत मख़दूम सिमनानी रहमतउल्लाह अलैह के बारगाह में हाज़िर हुएं! हाज़री के बाद मेरे ग़ैर मौजूदगी में घर तशरीफ़ लाएं! मेरे घर वालों को शदीद एहसास था की हाश्मी मियां होते तो हज़रत और मसरूर होते लेकिन हज़रत ने इस तरह से क़याम फ़रमाया जैसे वोह मेरे मुन्तज़िर हैं! वालेआतन बिला किसी प्रोग्राम के मैं तक़रीबन दो घण्टे बाद घर पहुँच जाता हूँ! हज़रत ने देख कर कलाम तो नहीं फ़रमाया लेकिन मुस्कुराएं! उनका मुस्कुराना आम मुस्कुराहटों से और कलाम आम कलामों से बहुत मुख़्तलिफ़ था! बहुत ही सादगी थी! सलाहियतों के साथ
आज मैं अपनी तमाम कामिल को सलाम करता हूँ!सरे. अक़ीदत ख़म करके अपने उस फैज़ बख़्श मोहसिन मजजूबे कामिल को सलाम करता हूँ!

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