Aftab e Ashraf 7



आपके मोतक़िद और मुरीदआपके मानने वालों मोतक़िद और मुरीदों की तायदाद बहुत वसीह है जो सुल्तानपुर, रायबरेली, प्रतापगढ़ के ज़िलों में फैली हुई है जिनमें लौहर, नियावां, छटई का पुरवा, रसूलपुर, बादल का पुरवा, भाईं, मीरा मऊ, सेमरह, मख़दूमपुर, इमली गाँव, लाल खां का पुरवा, बहादुरपुर, बाज़गढ़, पूरबगाँव, बसावन का पुरवा, कोलारा, लालगंज, लमुहवा, पुरह मुरई, हुसैनपुर, मौहना, बैरीइतलवा, क़ाबिले ज़िक्र है! इसके अलावा लखनऊ, कानपूर, इलाहाबाद, मुम्बई, कलकत्ता वगैरह में भी आपके मुरीदीन हैं!



गैर मुस्लिमों को आपसे अक़ीदत- आपने सिर्फ मुसलमानों ही को अपने सिलसिले से नहीं जोड़ा बल्कि गैर मुस्लिमों को भी हल्काए बगोशे इस्लाम किया! आपके अक़ीदतमंदों में अच्छी खासी तायदाद गैर मुस्लिमों की थी जो आपके झूठे खाने को अपने लिए तबर्रुख़ और प्रषाद समझते थे और आपके ख़िदमत को अपनी ख़ुशकिस्मती का ज़रिया मानते थे!



उलेमाएकिराम को आपसे अक़ीदतआपके अक़ीदतमंदों में सिर्फ़ आम लोग ही नहीं बल्कि कुर्बोजवार के ज़्यादा तर उलेमाएकिराम भी शामिल थे जो हद दर्जा आपका एहतराम करते थे और जिन्हें आपसे वालेहाना मुहब्बत और अक़ीदत थी! मशहूर है कि हज़रत हबीबुर्रहमान साहब रईस ए उड़ीसा जब भी सुल्तानपुर तशरीफ़ लाते तो आपकी ख़िदमत में ज़रूर हाज़री देते थे! साहिबे किताब मजजूबे कामिल नक़्ल फ़रमाते हैं कि अशरफ अहमद उर्फ़ मन्नू भाई बयान करते थे कि एक बार हज़रत मुजाहिदे मिल्लत साहब क़िब्ला सुल्तानपुर तशरीफ़ लायें, उस वक़्त हज़रत मेरे मकान पर तशरीफ़ फरमा थें! हज़रत मुजाहिदे मिल्लत साहब मेरे घर तशरीफ़ लायें और सलाम मसनून के बाद आपकी दस्तबोसी और क़दमबोसी फ़रमाया और आपका पैर दबाने लगें!

शेर मुहम्मद साहब मौज़ा लौहर बयान फ़रमाते थे कि एक मर्तबा जामिया अरबिया सुल्तानपुर का जलसा था मैं जलसा सुनने पट
गया था! जलसे में उस्ताजुल उलेमा हुजूर अब्दुल अज़ीज़ साहब भी जलवा अफ़रोज़ थे! हज़रत उस वक़्त जामिया अरबिया से मिले हुए क़ब्रस्तान में तशरीफ़ फरमा थें! हुजूर हाफ़िज़ ए मिल्लत हज़रत के पास तशरीफ़ लायें और हज़रत को सलाम किया हज़रत ने सलाम का जवाब दिया उसके बाद हुजूर हाफ़िज़ ए मिल्लत ने आगे बढ़कर आपकी दस्तबोसी फ़रमाई और चले गये।

शेर मुहम्मद ख़ान साहब मौज़ा लौहार ने बयान किया है कि मैं हज़रत के साथ जामिया अरबिया सुल्तानपुर के जलसे में गया जो जामिया अरबिया सुल्तानपुर का पहला जलसा था! इसी जलसे में जामिया अरबिया का संग बुनियाद रखा गया! हज़रत स्टेज के सामने जलसे के बिलकुल आख़री सिरे पर कम्बल पर तशरीफ़ फरमा थें! प्रोफेसर अब्दुल कय्यूम और अल्लामा निज़ामी साहब की तक़रीरें हुई! आख़िर में हुजूर मुहद्दिसे आज़म स्टेज पर तशरीफ़ लाएं लेकिन कुर्सी ए ख़िताबत पर बैठने से पहले आपने ऐलान किया की हमारे ख़ानदान के एक मजजूब ए कामिल इस जलसे में मौजूद हैं जब तक वो स्टेज पर ए नहीं आएंगे मैं ख़िताबत नहीं करूँगा! वहां मौजूद सभी लोग इधर उधर देखने लगें यहाँ तक की सब की निगाह आप पर जम गयी! मौलाना सलीम साहब ने मुझसे कहा की हज़रत को स्टेज पर ले कर आओ! मैंने हज़रत से स्टेज पर चलने को कहा लेकिन हज़रत ने झिड़क दिया! फिर मौलाना सलीम साहब ख़ुद आएं आप को लेने के लिए लेकिन आप अपने जगह से हिले नहीं ये देख कर अल्लामा निज़ामी साहब भी आएं और हज़रत से स्टेज पर चलने की दरख्वास्त की लेकिन हज़रत फिर भी अपनी जगह से ना उठे! बिलआख़िर हुजूर मुहद्दिसे आज़म रहमतउल्लाह अलैह आपके पास आने के लिए स्टेज से उतर पढ़ें! जब आपने ये देखा तो फ़ौरन आप उठ खड़े हुएं और मुहद्दिसे आज़म रहमतउल्लाह अलैह की ख़िदमत में तशरीफ़ लाएं! जैसे ही आप क़रीब पहुँचें हज़रत मुहद्दिसे आज़म ने आपको अपने कलेजे से लगा लिया और आपको स्टेज पर ले गये! हज़रत थोड़ी देर स्टेज पर बैठे फिर अपनी जगह कम्बल पर आकर बैठ गये!

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