Aftab e Ashraf 4

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Hazrat Syed Jalal Ashraf  (رحمتہ اللہ علیہ)

आपकी पैदाइश और आपके वालिदैन– आपकी पैदाइश सन 1935 ईस्वी में बमुक़ाम मखदूमपुर उर्फ करीमनपुर जिला प्रतापगढ़ में हुई!

आपके वालिद मोहतरम का इस्मे गिरामी सैय्यद हुजूर अशरफ़ रहमतउल्लाह अलैह था जो आलिम बाअमल आबिदों ज़ाहिद शब ज़िन्दादार बुजुर्ग थे! आपने अपने वालिद हज़रत सैय्यद मुहम्मद अशरफ़ रहमतउल्लाह अलैह के ख़लीफ़ा और जानशीन होकर मसनदे सज्जादगी को आरास्ता किया!

आपकी वालिदा माजिदा का इस्म शरीफ़ हज़रत बीबी सैय्यदा जमीला खातून था जो निहायत आबिदा ज़ाहिदा शब ज़िन्दादार शौहरपरस्त निहायत सनी दरिया दिल ख़ातून थीं जिन्हें अपने वक्त की राबिया बसरिया कहा
जाए तो बेजान होगा! परदे का आलम ये था कि घर में काम करने वाली ख़ादिमाओं से भी पर्दा करती थीं कि कहीं वोह दूसरे घरों में जाकर आपका तजकिरा न करें। परहेज़गारी का तो ये आलम था कि घर में अकेली होतीं और बाहर कोई मुरीद या ख़ादिम हज़रत से मिलने के लिए आता और आवाज़ देता तो आप कभी नहीं बोलती थीं जिससे आने वाला खुद समझ था कि हज़रत घर में नहीं हैं और वोह लौट जाता! अल्लाह हु अकबर बेशक ऐसे ही नेक सालेह लोगों से ऐसी बरगुज़ीदा शख़्सियतें पैदा होतीं हैं!

आपकी रिहाईश- दरगाह मख़दूम अशरफ़ जायस पर
शाहान मुग़लिया की नज़रकरदह अराज़ियात व माफ़ियात थें। सन 1857 ईस्वी के ग़दर के बाद उनमें बहुत सारे मौज़ा निकल गयें और मदनी मोहल्ला शैख़ाना कज़्बा जायस हाजीपुर मख़दूमपुर उर्फ करीमनपुर बाक़ी रह गए थे! इन्ही में आपके दादा ने मौज़ा करीमनपुर में एक
मकान बनवाया और रिहाईश शुरू कर दी लेकिन आपकी असली गढ़ में
रिहाईशगाह और आपके आबाओ अजदाद का वतन जायस ज़िला अमेठी था जहाँ आज भी आपके ख़ानदान के लोग रहते हैं!

आपके बचपन के हालातआप मादरज़ाद मजजूब वली नाहिद | थे और जिसके आसार माँ के गोद से ज़ाहिर होने लगे थे! मशहूर है की हम्मद आपने नापाकी के हालत में कभी भी वालिदा माजिदा का दूध नहीं नसनदे पिया! आपका बचपन बड़ा मासूमाना अंदाज़ में गुज़रा! आप बच्चों में खेलते तो आपका पसन्दीदा खेल ये होता की बच्चों को जमा करते और य्यदा उनसे गुड़ मंगवाते और ख़ुद भी लाते कभी गुड़ आटा तेल वगैरा मंगवा दादार
कर बच्चों से खुरमा बनवाते और खुद भी शामिल होतें! खुरमा बनाने के वक़्त
बाद मिलाद पढ़ते सलातो सलाम पढ़तें फिर खुरमें पर फातेहा कर के नम तो बच्चों में तक़सीम करते थे! सारे बच्चे आपके पीछे पीछे चलतें और आपके थीं कि इशारों पर चलतें और आपका एहतेराम करते थे! एक दफ़ा आपने अपने आपके
घर में फ़रमाया कि आपा मर गयीं! घर के लोगों ने मना किया कि क्या
बक रहे हो ख़राब बात है आप ख़ामोश हो गयें! इत्तेफ़ाक़ से उसी दिन बाहर
हज़रत मौलाना सैय्यद अकमल अशरफ़ किछौछवी शाम को जायस नावाज़
तशरीफ़ लाएं और उनकी ज़बानी मालूम हुआ कि आपकी बड़ी हमशीरा जिनका अपद सैय्यद मंजूर अहमद किछौछवी से हुआ था इंतेक़ाल हो गया! इसी तरह एक दिन आपने अपनी सौतेली माँ के बारे में फ़रमाया जिनको आप बाजी कहते थे की बाजी आज क़ब्र में चली जाएँगी घर के लोगों ने आपको रोका कि ऐसा ना कहें! उस वक़्त आपकी वालिदा बिल्कुल तंदरुस्त थीं यकायक असर के वक़्त तबियत ख़राब हुई और मग़रिब से पहले ही उनका विसाल हो गया!

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