Hadith on Quran aur Ahle Bait…

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✅ Quran Aur Ahle Bait Ko Thamne Waala Gumraah Na Hoga

💟 “Aur Allah Ki Rassi Ko Mazbooti Se Thaam Lo Aapas Me Sab Milkar Aur Aapas Me Fatt (Bhikar) Na Jaana”
📓 (Surah Al Imraan Ayat 103)

✴ Is Ayat k Tahet Imam Zafar Sadiq Radi Allaho Anho Farmate Hain…

✴ “Hum Ahle Bait Hi Hublullah Hai”
📘 (As Sawaiqe Muharika Pg : 101)

➿ Hadees :
💟 “Huzoor Nabi E Karim ﷺ Ne Farmaya Mai Tumhare Darmiyan Do Chiz Chodta Hoon Jab Tak Inhe Na Chodoge Hargiz Gumraah Na Honge Ek Kitabullah Ek Meri Aal”

📚 References:
📘 (Imam Hakim Al Mustadraq Vol : 04, Pg : 72, Kitab Marifat E Sahaba, Hadees : 4634)
📘 (Imam As Sawaiqe Muharika Pg :145-146)

💠 Hazzatul wida me Yaum E Arfa k Din Nabi Kareem ﷺ Ne Hazaro Sahaba E Kiram K Saamne Apni Oontni (She Camel) Kaswa par Tashreef Hoke Khutba Padh Rahe The.

➿ Hadees :
💟 “Hazrat Jaabir bin Abdullah رضي الله عنه se Rivayat Hai Farmate Hai Maine RASOOL ALLAH ﷺ ko Hajj Me Arfaa K Din Dekha Jabki Aap Apni Oontni Kaswa Par Khutba Padh Rahe The, Maine Nabi Kareem ﷺ Ko Farmate Huwe Suna,

💟 AYE LOGO MAINE TUM ME WO CHEEZ CHODI HAI KI JAB TAK TUM UNKO THAME RAHOGE GUMRAAH NAA HOGE ALLAH KI KITAB AUR MERI ITRAT YAANI AHLE BAIT”

📚 References:
📘 (Jamai Tirmizi Vol :06, Pg : 435,Kitabul Manakib,Hadees : 3786 ‘Arabic No : 4155’)
📘 (Imam Tabrani Al Mujam Ul Awsat Vol : 05, Pg : 89, Hadees : 4757)
📘 (Imam Tabrani Al Mujam Ul Kabir Vol : 03, Pg :66, Hadees : 2680)
📘 (Ibn Kathir Tafseer Ibn Kathir Vol : 04, Pg : 114)

हज़रत इमाम जाफ़र – सादिक(रेहमतुल्लाह अलैही) और एक दहरिया मल्लाह….

♥खुदा की हस्ती के एक मुनकिर की जो मल्लाह था हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रजीअल्लाहो अन्ह से गुफ्तगू हुई, वो मल्लाह कहता था के खुदा कोई नहीं( मआज़ अल्लाह!) हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रजीअल्लाहो अन्ह ने उससे फ़रमया तुम जहाज़ रान हो,
ये तो बताओ कभी समुंद्री तूफान से भी तुम्हें साबिक़ा पड़ा? वो बोला हाँ! मुझे अच्छी तरह याद है के एक मर्तबा समुंद्र के सख्त तूफान में मेरा जहाज़ फंस गया था, हज़रत इमाम ने फ़रमाया फिर क्या हुआ?
वो बोला, मेरा जहाज़ गर्क हो गया और सब लोग जो उस पर सवार थे डूब कर हलाक हो गए,
आपने पूछा और तुम कैसे बच गए?
वो बोला मेरे हाथ जहाज़ का एक तख्ता आ गया, मैं उसके सहारे तेरता हुआ साहिल के कुछ करीब पहुँच गया मगर अभी साहिल दूर ही था के वो तख़्ता भी हाथ से छूट गया, फिर मैंने खुद ही कोशिश शुरू कर दी और हाथ पैर. मार कर किसी ना किसी तरह किनारे आ लगा,
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक रजी अल्लाहो अन्ह फरमाने लगे, लो अब सुनो!
जब तुम अपने जहाज़ पर सवार थे तो तुम्हें अपने जहाज़ पर ऐतमाद व भरोसा था के ये जहाज पार लगा देगा और जब वो डूब गया तो फिर तुम्हारा ऐतमाद व भरोसा उस तख्ले पर रहा जो इत्तेफाकन तुम्हारे हाथ लग गया था मगर जब वो भी तुम्हारे हाथ से छूट गया तो अब सोच कर बताओ के इस बेसहारा वक्त और बेचारगी के आलम में भी क्या तुम्हें ये उम्मीद थी के अब भी कोई बचाना चाहे तो मैं बच सकता हूँ?
वो बोला हाँ! ये उम्मीद तो थी,
हज़रत ने फ़रमाया मगर वो उम्मीद थी किससे के कौन बचा सकता है? अब वो दहरिया ख़ामोश हो गया और आपने फ़रमया खूब याद रखो उस बेचारगी के आलम में तुम्हें जिस ज़ात पर उम्मीद थी वही खुदा है और उसी ने तुम्हें बचा लिया था, मल्लाह ये सुन कर होश में आ गया और इस्लाम ले आया।

📚(तफ्सीर कबीर सफा 221 जिल्द 1)

एक अक्लमंद बुढ़िया …..

♥एक आलिम ने एक बुढ़िया को चर्खा कातते देख कर फरमाया के बुढ़िया! सारी उम्र चर्खा ही काता या कुछ अपने खुदा की भी पहचान की?
बुढ़िया ने जवाब दिया के बेटा सब कुछ इसी चर्खे में देख लिया, फ़रमाया! बड़ी बी! ये तो बताओ के खुदा मौजूद है या नहीं? बुढ़िया ने जवाब दिया के हाँ हर घड़ी और रात दिन हर वक्त खुदा मौजूद है,
आलिम ने फरमाया मगर इसकी दलील?
बुढ़िया बोली, दलील ये मेरा चर्खा, आलिम ने पूछा ये कैसे? वो बोली वो ऐसे के जब तक मैं इस चर्खे को चलाती रहती हूँ ये बराबर चलता रहता है
और जब मैं इसे छोड़ देती हूँ तब ये ठहर जाता है
तो जब इस छोटे से चर्खे को हर वक़्त चलाने वाले की ज़रूरत है तो ज़मीन व आसमान, चाँद सूरज के इतने बड़े चों को किस तरह चलाने वाले की ज़रूरत ना होगी?
पस जिस तरह ज़मीन व आसमान के चर्खे को एक चलाने वाला चाहिए जब तक वो चलाता रहेगा ये सब चर्खे चलते रहेंगे और जब वो छोड़ देगा तो ये ठहर जाएंगे मगर हम ने कभी ज़मीन ब आसमान, चाँद सूरज को ठहरे नहीं देखा तो जान लिया के उनका चलाने वाला हर घड़ी मौजूद है। मौलवी साहब ने सवाल किया, अच्छा ये बताओ के आसमान व ज़मीन का चर्खा चलाने वाला एक है या दो? बुढ़िया ने जवाब दिया के एक है और इस दावे की दलील भी यही मेरा चर्खा है क्यों के जब इस चर्खे को मैं अपनी मर्जी से एक तरफ को चलाती हूँ ये चर्खा मेरी मर्जी से एक ही तरफ़ को चलता है अगर कोई दूसरी चलाने वाली भी होती फिर या तो वो मेरी मददगार होकर मेरी मर्जी के मुताबिक चर्खा चलाती तब तो चर्खा की रफ्तार तेज़ हो जाती और इस चर्खे की रफ्तार में फर्क आकर नतीजा हासिल ना होता और अगर वो मेरी मर्जी के ख़िलाफ़ और मेरे चलाने की मुखालिफ जहेत पर चलाती तो ये चर्खा चलने से ठहर जाता या टूट जाता मगर ऐसा नहीं होता इस वजह से के कोई दूसरी चलाने वाली नहीं है इसी तरह आसमान व ज़मीन का चलाने वाला अगर कोई दूसरा होता तो जरूर आसमानी चर्खा की रफ्तार तेज़ होकर दिन रात के निज़ाम में फर्क आ जाता या चलने से ठहर जाता या टूट जाता जब ऐसा नहीं है तो जरूर आसमान व ज़मीन के चर्खे को चलाने वाला एक ही है।

जज़ल्लाहु ख़ैरा
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नमाज़ी के आगे से गुज़रना

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بِسْمِ اللّٰہِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِیۡمِ
नमाज़ी के आगे से किसी का गुज़रना नमाज़ को फ़ासिद नहीं करता चाहे गुज़रने वाला मर्द हो या औरत या कोई जानवर। लेकिन ध्यान रहे नमाज़ी के आगे से गुज़रना बहुत सख़्त गुनाह है।

इसके बारे में कुछ अहादीस यह हैं-

इसमें जो कुछ गुनाह है अगर गुज़रने वाला जानता तो चालीस तक खड़े रहने को गुज़रने से बेहतर जानता। रावी कहते हैं मैं नहीं जानता कि चालीस दिन कहे या चालीस महीने या चालीस बरस।
(सिहा सित्ता)

अगर कोई जानता कि अपने भाई के सामने नमाज़ में आड़े होकर गुज़रने में क्या है तो सौ बरस खड़ा रहना उस एक क़दम चलने से बेहतर समझता।
(इब्ने माजा)

नमाज़ी के सामने गुज़रने वाला अगर जानता उस पर क्या गुनाह है तो ज़मीन में धंस जाने को गुज़रने से बेहतर जानता।
(इमाम मालिक)

नमाज़ी के आगे से गुज़रने के बारे में ज़रूरी मसाइल

मैदान और बड़ी मस्जिद में नमाज़ी के क़दम से “मौज़ा-ए-सुजूद” तक गुज़रना नाजाइज़ है। मौज़ा-ए-सुजूद से मुराद यह है कि क़ियाम की हालत में सजदे की जगह की तरफ़ नज़र करे तो जितनी दूर तक निगाह फैले वह मौज़ा-ए-सुजूद है यानि सजदे की जगह है, उस के दरमियान से गुज़रना नाजाइज़ है।
मकान और छोटी मस्जिद में क़दम से दीवारे क़िब्ला तक कहीं से गुज़रना जाइज़ नहीं अगर “सुतरा” (कोई ऐसी चीज़ जिससे आड़ हो जाये) न हो।
कोई शख़्स ऊँचाई पर नमाज़ पढ़ रहा है उसके नीचे से गुज़रना भी जाइज़ नहीं जबकि गुज़रने वाले के बदन का कोई हिस्सा नमाज़ी के सामने हो छत या तख़्त पर नमाज़ पढ़ने वाले के आगे से गुज़रने का भी यही हुक्म है और अगर इन चीज़ों की इतनी ऊँचाई हो कि गुज़रने वाले के बदन के किसी हिस्से का सामना न हो तो हर्ज नहीं।
नमाज़ी के आगे अगर “सुतरा” हो यानि कोई ऐसी चीज़ जिससे आड़ हो जाये तो उसके आगे से गुज़रने में कोई हर्ज नहीं। “सुतरा” एक हाथ के बराबर ऊँचा और उंगली के बराबर मोटा हो और ज़्यादा से ज़्यादा तीन हाथ ऊँचा हो।
किसी ऐसी खुली जगह पर नमाज़ पढ़ें जहाँ से लोगों के गुज़रने का अंदेशा हो तो मुस्तहब है कि “सुतरा” गाड़ें और “सुतरा” नज़दीक होना चाहिये, और बिल्कुल नाक की सीध पर न हो बल्कि दाहिने या बायें भौं की सीध पर हो और दाहिने की सीध पर होना अफ़ज़ल है।
इमाम का “सुतरा” मुक़तदी के लिये भी “सुतरा” है उसको दूसरे “सुतरा” की ज़रूरत नहीं।
पेड़, जानवर और आदमी वग़ैरा का भी “सुतरा” हो सकता है कि इनके बाद गुज़रने में कुछ हर्ज नहीं मगर आदमी को उस हालत में “सुतरा” किया जाये जब उसकी पीठ नमाज़ी की तरफ़ हो। नमाज़ी की तरफ़ मुँह करना मना है।
नमाज़ी के सामने “सुतरा” नहीं और कोई शख़्स गुज़रना चाहता है तो नमाज़ी को उसे गुज़रने से रोकने की इजाज़त है। इसके लिये या तो “सुब्हानल्लाह” कहे या आवाज़ के साथ क़िरात करे या हाथ, सिर या आँख के इशारे से मना करे इस से ज़्यादा की इजाज़त नहीं। अगर कोई अमल-ए-कसीर हो गया तो नमाज़ ही टूट जाती है।
औरत के सामने से गुज़रे तो औरत तसफ़ीक़ से मना करे यानि दाहिने हाथ की उंगलियाँ बायें हाथ की पीठ पर मारे।
मस्जिदे हराम शरीफ़ में नमाज़ पढ़ता हो तो उस के आगे तवाफ़ करते हुये लोग गुज़र सकते हैं।
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15 सजाए ( Punishment )

15 सजाए ( Punishment )

अल्लाह ﷻ के नबी ﷺ फरमाते है
जो सुस्ती की वजह से नमाज छोड़ेगा , अल्लाह पाक उसे 15 सजाए देगा । छ दुनिया में , तीन मरते वक्त , तीन कब्र में और तीन कब्र से निकलते ( कयामत के ) वक्त

दुनिया मे मिलने वाली 6 सजाए

उसकी उम्र से बरकत खत्म कर दी जाएगी
उसके चेहरे से नेक बन्दों की निशानी मिटा दी जाएगी
अल्लाह तआला उसके किसी अमल का सवाब न देगा
उसकी कोई दुआ आस्मान तक न पहोंचेगी
नेक बन्दों की दुआ मे उसका कोइ हिस्सा न होगा
मख्लुक उससे नफरत करेगी

मरते वक्त मिलने वाली 3 सजाए

वोह जलील ( रुस्वा ) हो कर मरेगा
भुखा मरेगा*
प्यासा मरेगा अगर्चे सारी दुनिया के समन्दर उसे पिला दिए जाए फिर भी प्यास न बुझेगी

कब्र में मिलने वाली 3 सजाए

उसकी कब्र इतनी तंग हो जाएगी की उसकी पसलीया एक दुसरे मे दाखिल हो जाएगी
उसकी कब्र मे आग भर दी जाएगी फिर वो दीन रात अंगारों मे उलट पलट होता रहेगा
उस पर एक सांप मुसल्लत किया जाएगा जिसकी आंखे आग की , नाखुन लोहे के , अवाज बिजली की कडक की तरह होगी , जब भी वोह सांप उस मुर्दे को मारेगा वो मुर्दा 70 हाथ जमीन मे धंस जाएगा ओर कयामत तक ये अजाब होता रहेगा

कयामत की 3 सजाए

हिसाब की सख्ती
रब्बे कह्हार ﷻ की नाराजगी
जहन्नम मे दाखिला

📚( فیضانِ نماز ، صفحہ 426 ، 427 )

अल्लाह ﷻ हमे पंज गाना नमाज सहीह तज्वीद ( मखारीज ) के साथ ओर तमाम कवानीन व सुनन की रिआयत के साथ अदा करने की तौफीक दे