Hadith Hazrat Umar Wo Jinhe RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ne Allah (تبارک وتعالی) Se Maanga

Ummul Momineen Hazrat Aaishah Siddiqa (سلام الله علیها) Se Rivayat Hai RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ne Dua Farmayi, “Aye ALLAH Islam Ko Umar Ibn Khattab Ke Zariye Se Quwwat De”

Reference :
Sunan Ibn Majah Volume:01, Page: 65 ,Kitab al Mukaddam, Hadees No:110


Hazrat Abdullah Ibn Abbas (عليهم السلام) Se Rivayat Hai RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم) Ne Dua Farmayi , Aye ALLAH Islam Ko Faukiyat De Abu Jahl bin Hisham Ya Umar ibn Al Khattab Ke Zariye Se.

Pass Agle Roz Ye Huwa Ke Hazrat Umar Ibn Khattab RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم) Ke Pass Aaye Aur Islam Qubuul Kar Liya

Reference :

Jamai Tirmizi Volume:03, Page: 363, Kitab ul Manakib, Baab : RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم) Ki Dua Se Umar RadiAllahu Ta’ala Anhu Ka Islaam Laana, Hadees No : 4047, English No : 3683

Jamai Tirmizi Volume:03, Page :362, Kitabul Manakib, Baab : RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم) Ki Dua Se Umar RadiAllahu Ta’ala Anhu Ka Islaam Laana, Hadees No: 4045, English No : 3681


Hazrat Abdullah Bin Abbas (عليهم السلام) Se Rivayat Hai Jiss Waqt Hazrat Umar (رضي الله عنه) Musharraf Ba Islam Huwe, Hazrat Jibareel e Amin (علیہ السلام) Haazir e Khidmat Huwe Aur Arz Kiya Ya RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم) Yaqeenan Umar (رضي الله عنه) Ke Islam Qubuul Karne Par Ahle Aasmaan Ne Khushiyaan Manayi.

References :

Sunan Ibne Majah, Volume: 01, Page : 41, Kitabus Sunnah, Baab Fazail Umar (رضي الله عنه) Hadees No : 108


Subhan Allah ❤️

Hazrat Umar Wo Jinhe RasoolAllah (صلى الله عليه وآله وسلم)‎ Ne Allah (تبارک وتعالی) Se Maanga

Murad e Rasool Dua e Rasool

26 Dhul Hijjah Yaum e Shahadat Hazrat Umar Al Farooq (RadiAllahu Ta’ala Anhu)

न्याज़ व फ़ातिहा

हज़रत इमाम रद़िअल्लाहु तआ़ला अन्हु और जो लोग उनके साथ शहीद किए गये उनको सवाब पहुंचाने के लिए

सदक़ा व ख़ैरात किया जाये

गरीबों मिस्किनों को या दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्ते दारों वग़ैरह को शरबत या खिचड़े या मलीदे वगै़रा कोई भी जाइज़ खाने पीने की चीज़ खिलाई या पिलाई जाये,

और उसके साथ आयाते कुरआनिया की तिलावत कर दी जाये तो और भी बेहतर है इस सब को उ़र्फ़ में नियाज़ फ़ातिहा कहते हैं।

यह सब बिला शक जाइज़ और सवाब का काम है, और बुजुर्गों से इज़हारे अ़क़ीदत व मुहब्बत और उन्हें याद रखने का अच्छा त़रीका है लेकिन इस बारे में चन्द बातों का ध्यान रखना जरूरी है –

(1). न्याज़ व फ़ातिहा किसी भी हलाल और जाइज़ खाने पीने की चीज़ पर हो सकती है उसके लिए शरबत खिचड़े और मलीदे को ज़रूरी ख्याल करना जिहालत है अलबत्ता इन चीजों पर फ़ातिहा दिलाने में भी कोई हर्ज़ नहीं है, अगर कोई इन मज़कूरा चीजों पर फ़ातिहा दिलाता है तो वह कुछ बुरा नहीं करता, हां जो उन्हें ज़रूरी ख्याल करता है उनके एलावा किसी और खाने पीने की चीज़ पर मुहर्रम में फ़ातिहा सही नहीं मानता वह ज़रूर जाहिल है।

(2). न्याज़ फ़ातिहा में शेख़ी खो़री नहीं होनी चाहिए और न खाने पीने की चीज़ों में एक दूसरे से मुकाबिला बल्कि जो कुछ भी हो और जितना भी हो सब सिर्फ अल्लाह वालों के ज़रिए अल्लाह तआ़ला की नज़दीकी और उसका कुर्ब और रज़ा हासिल करने के लिए हो और अल्लाह के नेक बन्दों से मुहब्बत इस लिए की जाती है कि उन से
मुहब्बत करने और उनके नाम पर खाने खिलाने और उन की रुहों को अच्छे कामों का सवाब पहुंचाने से अल्लाह राज़ी हो, और अल्लाह को राज़ी करना ही हर मुसलमान की ज़िन्दगी का असली मक़सद है।

(3). न्याज़ फ़ातिहा बुजुर्गों की हो या बड़े बुढ़ों की उस के तौर तरीके जो मुसलमानों में राइज हैं जाइज़ और अच्छे काम हैं फ़र्ज और वाजिब यानी शरअन लाजिम व ज़रूरी तो नहीं अगर कोई करता है तो अच्छा करता है और नहीं करता है तब भी गुनाहगार नहीं, हां कभी भी और बिल्कुल न करना महरूमी है, न्याज़ व फ़ातिहा को न करने वाला गुनाहगार नहीं है, हां इस से रोकने और मना करने वाला ज़रूर गुमराह व बदमज़हब है और बुजुर्गों के नाम से जलने वाला है।

(4). न्याज व फ़ातिहा के लिए बाल बच्चों को तंग करने की या किसी को परेशान करने की या खुद परेशान होने की या उन कामों के लिए क़र्ज़ा लेने की या गरीबों मजदूरों से चन्दे करने की कोई ज़रूरत नहीं, जैसा और जितना मौका हो उतना करे और कुछ भी न हो तो खाली कुरआन या कलमा_ए_त़य्यबा या दुरूदशरीफ़ वग़ैरह का ज़िक्र करके या नफिल नमाज़ या रोज़े रख कर सवाब पहुंचा दिया जाये तो यह काफ़ी है, और मुकम्मल न्याज़ और पुरी फ़ातिहा है, जिस में कोई कभी यानी शरअ़न ख़ामी नहीं है, खुदा_ए_तआ़ला ने इस्लाम के ज़रिए बन्दों पर उनकी ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं डाला ज़कात हो या स़दका_ए_फ़ित्र और कुरबानी सिर्फ उन्हीं पर फ़र्ज व वाजिब हैं जो साहिबे निसाब यानी शरअ़न मालदार हों, हज़ भी उसी पर फ़र्ज किया गया जिस के बस की बात हो, अ़क़ीक़ा व वलीमा उन्हीं के लिए सुन्नत हैं जिनका मौका हो जब कि यह काम फ़र्ज व वाजिब या सुन्नत हैं, और न्याज व फ़ातिहा उ़र्स वग़ैरह तो सिर्फ बिदआ़ते ह़सना यानी सिर्फ अच्छे और मुस्तहब काम हैं, फर्ज व वाजिब नहीं हैं यानी शरअ़न लाजिम व ज़रूरी तो नहीं हैं, फिर न्याज व फ़ातिहा के लिए क़र्ज़ लेने, परेशान होने और बाल बच्चों को तंग करने की क्या जरूरत है, बल्कि हलाल कमाई से अपने बच्चों की परवरिश करना बजाते खुद एक बड़ा कारे ख़ैर, सवाब का काम है।

ख़ुलासा यह कि उ़र्स, न्याज व फ़ातिहा वग़ैरह बुजुर्गों की यादगारें मनाने की जो लोग मुख़ालिफ़त करते हैं वह गलती पर हैं और जो लोग सिर्फ उन कामों को ही इस्लाम समझे हुये हैं और शरअ़न उन्हें लाजिम व ज़रूरी ख्याल करते हैं वह भी बड़ी भूल में हैं ।

(5). न्याज व फ़ातिहा की हो या कोई और खाने पीने की चीज़ उसको लुटाना, भीड़ में फेंकना कि उनकी बे अदबी हो पैरों के नीचे आये या नाली वग़ैरह गन्दी जगहों पर गिरे एक ग़लत तरीका है, जिस से बचना ज़रूरी है, जैसा कि मुहर्रम के दिनों में कुछ लोग पूड़ी, गुलगुले या बिस्किट वग़ैरह छतों से फ़ेंकते और लुटाते हैं यह ना मुनासिब हरकतें हैं।