रस्म-ए-मिक़राज़-रानी

पहले चिश्ती ख़ानक़ाहों में मुरीदों के बाल काटने की परंपरा थी जो हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के समय तक थी . राहत उल क़ुलूब में इस बात का ज़िक्र आता है. उस का उदाहरण हम आगे देखेंगे पहले निज़ामी बंसरी से यह वाक़या देखते हैं –

हरदेव ने ख़्वाजा सैयद मुहम्मद से पूछा – हज़रत ने उस दुकानदार के कुछ बाल काट दिए थे जब वह मुरीद बना था .
ख़्वाजा सैयद मुहम्मद ने फ़रमाया –
इसे मिक़राज़ रानी कहते हैं .वह लोग जिन्हें ख़िलाफ़त दी जाती है उनका सर मुंडवाया जाता है और जिन्हें बैत किया जाता है उनके कुछ बाल काटे जाते हैं .

इसका वर्णन राहत उल क़ुलूब में यूँ आता है –

रस्म-ए-मिक़राज़-रानी

क़ैंची चलाने के मुतअल्लिक़ मशाइख़ में इख़्तिलाफ़ है। बा’ज़ कहते हैं कि तकबीर पढ़ते वक़्त नफ़्स-ए-अम्मारा की तरफ़ मु-तवज्जिह हो और समझे कि आज इस से जंग करनी है। तीसरी तकबीर से फ़ारिग़ हो कर एक-बार कलिमा-ए-तौहीद और बीस दफ़अ’ दुरूद शरीफ़ और एक दफ़अ’ इस्तिग़फ़ार पढ़े। जब सब कुछ हो चुके तो एक बाल मुरीद की पेशानी से ले ले और कहे- बादशाहों के बादशाह ! तेरी दरगाह से भागा हुआ ग़ुलाम फिर तेरे हुज़ूर में आया है और चाहता है कि तेरी इबादत करे और जो कुछ मा-सिवा है उस से बेगाना हो जाए। उस के बा’द एक बाल पेशानी की दाएँ तरफ़ से और एक बाएँ तरफ़ से कतरे।

दूसरा गिरोह कहता है कि सिर्फ़ एक बाल पेशानी से ले ले ज़्यादा की ज़रूरत नहीं। हसन बसरी अमीरुल मोमिनीन अ’ली रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हैं कि एक ही बाल लेना बेहतर है। हज़रत अ’ली अहल-ए-सुफ़्फ़ा के ख़लीफ़ा हैं और ये हदीस उन की शान में आई है। अना मदी-नतुल इल्मि व अ’लीयुन बाबुहा।

इस के बा’द दुआ-गो ने अ’र्ज़ किया कि हुज़ूर ये क़ैंची चलाने की रस्म कहाँ से पैदा हुई ? फ़रमाया इब्रहीम अलैहिस-सलाम से (सलवातुल्लाहि अलैहि व अ’ला नबियीना) और उन्हें तल्क़ीन किया था जिबरईल अलैहिस-सलाम ने।

फिर इसी के मु-तअल्लिक़ इरशाद फ़रमाया। एक दिन हबीब अ’जमी और हसन बसरी दोनों बैठे हुए थे, कोई शख़्स आया और बोला कि मैं फुलाँ फुलाँ का मुरीद हूँ। आप ने पूछा, तुम्हारे पीर ने तुम्हें क्या ता’लीम दी है ? उस ने कहा मेरे पीर ने बाल तो कतरे थे बाक़ी ता’लीम वग़ैरा कुछ नहीं दी। दोनों बुज़ुर्गों ने चिल्ला कर कहा हु-व मुज़िल्लुन व ज़ाल्लुन या’नी वो ख़ुद भी गुमराह है और औरों को भी गुमराह करता है।

इस वाक़िए से मा’लूम हुआ कि पीर को चाहिए कि मुरीद करने से पहले मुरीद को जांच ले। इस के बाद शैख़ुल-इस्लाम (बाबा फ़रीद ) ने तमाम हाज़िरीन से ख़िताब किया कि शैख़ ऐसा होना चाहिए कि जब कोई उस के पास ब-नीयत-ए-इरादत आए तो नूर-ए-मारिफ़त की नज़र से इरादत-मन्द के सीने को सैक़ल करे ताकि उस में किसी क़िस्म की कुदूरत बाक़ी ना रहे और वो मानिंद आईने के रौशन हो जाए।अगर ये क़ुव्वत नहीं है तो मुरीद ना करे क्योंकि इस से बेचारे गुमराह को क्या होगा।

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