इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम👇👇
जो कर्बला में इस दर्जा बीमार थे कि उनको यह खबर तक नहीं हुई कि कब ६ महीने के मासूम अली असगर की गर्दन पर तीर लगा
कब शबीहे रसूल अली अकबर के सीने में बरछी लगी
कब फुफी जैनब के दोनों नौ निहाल आैनो मोहम्मद मारे गए
कब भाई क़ासिम की लाश को पामाल कर दिया गया
कब चचा अब्बास शाने कटा कर दरिया के किनारे सो गए
कब बाबा हुसैन को पसे गर्दन ज़बाह कर दिया गया
बीमार को होश तब आया जब खेमे जल चुके थे
फातिमा का चमन लूट चुका था
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इमाम से अगर मदीने में कोई पूछा करता था कि आप पर सबसे ज़्यादा मसाईब कहां पड़े
तो इमाम कहा करते थे
अश शाम
अश शाम
अश शाम
वह तीन शाम कौन सी शाम थीं जिनको याद करके बीमारेे कर्बला सारी ज़िन्दगी रोते रहे
वह तीन शाम थीं
बाज़ारे शाम
दरबारेे शाम
ज़िन्दाने शाम
बादे कतले हुसैन उमर बिन साद ने तमाम नबी ज़ादियों , सैदानियों को कैदी बना लिया
बीमार इमाम के गले में कांटों दार तौक इतना कसकर बांधा गया था कि सांस लेने से ही गले से ख़ून टपकने लगता था
पैरों में वज़न दार बेड़ियां डाल दी गई थीं
और पूरे जिस्म को ज़ंजीरों से जकड कर ऊंट की नंगी पीठ पर बिठा दिया गया था
असीर बनाने के बाद कर्बला से शाम के सफर में जब ऊंट चलता था तो इमाम के जिस्म से ज़ंजीरें रगड़ती थीं
जिससे इमाम के जिस्म से ख़ून के साथ साथ जिस्म का गोश्त तक ख़तम हो चुका था
ज़ालिम लोग शहीदों के सरों को हर वक़्त सैदानियों के आस पास रखा करते थे
औरतों , बच्चों को पूरे सफर में नेजे और भाले , तलवारें दिखा दिखा कर डराया करते थे
और बार बार मेरे नेजे की नोक चुभाया करते थे
और हम असीरों के सामने ऊंची आवाज़ में ढोल बजाए जाते थे
मेरे बाबा , भाई और चचा के सरों को असीर बीबियों के दरमियान रख कर हंसा करते थे
मेरे बाबा , चचा , और भाइयों के सरों के साथ खेलते थे
ज़मीन पर पटखा करते थे
और घोड़ों की टापों से रौंदा करते थे
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पहली शाम बाज़ारेे शाम
यह वह जगह थी जहां शाम की औरतें हम असीरों पर अपनी अपनी छतों से खौलता पानी और आग के शोले बरसा रहे थे
सुबह से शाम तक हम कैदियों को शाम की गली कूचों में फिराया जाता था
और यह ऐलान किया जाता था कि ए लोगों यह कैदी उनकी औलाद हैं जिनके बाप दादा ने तुम्हारे बाप दादा को जंगे बदर और उहद में मारा था
आज इनसे बदला ले लो
उस दौरान मेरी मां बहने बे पर्दा थीं
सारी बीबियों को एक ही रस्सी में बांध कर रखा था
रस्सी इतनी तंग थी के क़दम क़दम पर मेरी बहिन सकीना का गला घुट रहा था
और मेरी फूफी अम्मा जैनब झुक झुक कर चल रही थीं
मुझे और मेरी मां बहनों को शाम के बाज़ार में नंगे पैर घंटों तक खड़ा रखा गया
और शामियों को बुलाकर हमारा तमाशा बनाया गया
जब मैं शाम को एक गली से गुजर रहा था तो किसी ने मेरे सर पर आग का शोला फेंका
मेरे हाथ पड़े गर्दन बंधे थे मैं चिल्लाता रहा
बाबा मेरा सर जल गया
चचा अब्बास मेरी मदद को आइए
भैया अकबर मेरी मदद कीजिए
हमें उस बाज़ार में खड़ा किया गया जहां ग़ुलाम और कनीज़ें बेची जाती थीं
२ __ ज़िंदाने शाम
यह एक ऐसा कैद खाना था जिसकी छत नहीं थी
दिन की धूप और रात की ओस ने हम सब को कभी सोने ना दिया
मेरी बहिन सकीना हर वक़्त अपने बाबा को याद करके रोया करती थी
जो खाना आता था वह बहुत कम होता था
कभी किसी का पेट ना भर सका
भूख और ज़ख्मों की शिद्दत से ताब ना लाकर मेरी बहिन सकीना ने कैद खाने में दम तो दिया
जिसको मैंने जले हुए खून भरे कुर्ते के साथ वहीं दफ़न किया
३ ___ दरबारेे शाम
यह वह जगह थी जहां मुझे हर रोज़ बुलाया जाता था और मेरी पीठ पर इतने कोड़े मारे जाते थे कि मेरे जिस्म से खून टपकने लगता था
मुझे इससे भी ज़्यादा तकलीफ तब हुई जब मेरी फूफी जैनब को दरबार में बुलाकर उनका नाम लेकर पुकारा जाता था
यह मंज़र मेरी रूह को तकलीफ पहुंचाने वाला वह अहसास था जिसको मैं कभी भूल ना सका
यह थीं वा तीन शाम जिसको याद कर करके बीमार इमाम जब तक ज़िंदा रहे रोते ही रहे
जब कभी इमाम मदीने की गली से गुजरते थे तो अगर किसी कसाब की दुकान पर जबह होने वाले जानवर को देखते थे तो उससे पूछा करते थे कि ए भाई क्या तूने इस जानवर को पानी पिला दिया है
तो वह कहता था हां आका पानी पिला दिया
तो इमाम कहते थे मेरे बाबा को कर्बला में प्यासा ज़बह किया गया
इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम ने फरमाया
मेरा सलाम हो उस कैदी पर जिसका गोश्त ज़ंजीरें खा गई
हाय मेरा बीमार इमाम
क्या बेकसी थी
क्या बेबसी थी
क्या मजबूरी थी
गम और ज़ुल्म के वह पहाड़ टूटे कि इमाम उनको याद करके हमेशा रोते रहे
और रो रो कर 25 मोहर्रम को इस दुनिया से रुखसत हुए
अहलेबैत अलै. के कातिलों पर लानतें
इसके बाद भी जो लोग माविया के चाहने वाले हैं उनपर और उनकी औलादों पर लानत

