अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा करना) अंबियाए किराम का ख़ुसूसी शिआर

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अलहम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, वस्सलातु वस्सलामु अला नबिय्यिल करीम व अला अलिहि व अस्हाबिहि अजमईन

अल्लाह पर तवक्कुल (भरोसा करनाअंबियाए किराम का ख़ुसूसी शिआर

अल्लाह तआला पर तवक्कुल यानि भरोसा करना अंबियाए किराम के तरीक़े के साथ अल्लाह तआला का हुक्म भी है। क़ुरआन व हदीस में तवक्कुल अललल्लाह का बार-बार हुक्म दिया गया है। सिर्फ़ क़ुरआने करीम में सात मर्तबा “वअलल्लाहि फल्यतवक्कल्लि मुतवक्किलून’’ फ़रमाकर मोमिनों को सिर्फ़ अल्लाह पर तवक्कुल करने की ताकीद की गयी है, यानि हुक्मे ख़ुदावन्दी है कि अल्लाह पर ईमान लाने वालों को सिर्फ़ अल्लाह ही की ज़ात पर भरोसा करना चाहिए…..आईये सबसे क़ब्ल तवक्कुल के माअना समझें। तवक्कुल के लफ़ज़ी माअना किसी मामले में किसी ज़ात पर एतमाद करने के हैं, यानि अपनी आज़जी का इज़हार और दूसरे पर एतमाद और भरोसा करना तवक्कुल कहलाता है। शरई इस्तलाह में तवक्कुल का मतलबइस यक़ीन के साथ असबाब इख़्तियार करना कि दुनियावी व उखरवी तमाम मामलात में नफ़ा व नुक़सान का मालिक सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह तआला की ज़ात है। उसके हुक्म के बग़ैर कोई पत्ता दरख़्त से नहीं गिर सकता। हर छोटी बड़ी चीज़ अपने वुजूद और बक़ा के लिए अल्लाह की मोहताज है। ग़र्ज़ कि ख़ालिक़े कायनात की ज़ात बारी पर मुकम्मल एतमाद करके दुनियावी असबाब इख़्तियार करना तवक्कुल अललल्लाह है। अगर कोई शख़्स बीमार हो जाये तो उसे मर्ज़ से शिफ़ायाबी के लिए दवा का इस्तेमाल तो करना है लेकिन इस यक़ीन के साथ कि जब तक अल्लाह तआला शिफ़ा नहीं देगा दवा असर नहीं कर सकती। यानि दुनियावी असबाब को इख़्तियार करना तवक्कुल के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अल्लाह तआला का निज़ाम यही है कि बंदा दुनियावी असबाब इख़्तियार करके काम की अन्ज़ामदही के लिए अल्लाह तआला की ज़ात पर पूरा भरोसा करे, यानि यह यक़ीन रखे कि जब तक हुक्मे खुदावंदी नहीं होगा असबाब इख़्तियार करने के बावजूद शिफ़ा नहीं मिल सकती।

हज़रत अनस बिन मालिक रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि एक शख़्स ने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा: क्या ऊंटनी को बांध कर तवक्कुल करूं या बग़ैर बांधे? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: बांधों और अल्लाह पर भरोसा करो। (तिर्मिज़ी) हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़िअल्लाहु अन्हुमा फ़रमाते हैं कि अहले यमन बग़ैर साज़ व सामान के हज करने के लिए आते और कहते कि हम अल्लाह पर तवक्कुल करते हैं। लेकिन जब मक्का मुकर्रमा पहुंचते तो लोगों से सवाल करना शुरू कर देते। चुनांचे अल्लाह तआला ने क़ुरआन की आयत (सूरह अलबक़रा 197) नाज़िल फ़रमायी: हज के सफ़र में ज़ादे राह साथ ले जाया करो। (सही बुख़ारी)

जो भी असबाब मुहय्या हों उन्हें इस यक़ीन के साथ इख़्तियार करना चाहिए कि करने वाली ज़ात सिर्फ़ अल्लाह तआला की है। हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम ने जब अपनी तवील बीमारी के बाद अल्लाह तआला से शिफ़ायाबी के लिए दुआ फ़रमायी तो अल्लाह तआला ने हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया कि वह अपने पैर को ज़मीन पर मारें। अब ग़ौर करने की बात है कि क्या एक शख़्स का ज़मीन पर पैर मारना उसकी बीसियों साल की बीमारी की शिफ़ायाबी का इलाज है? नहीं। लेकिन उन्होंने ने अल्लाह के हुक्म से यह कमज़ोर सबब इख़्तियार कियाजिसके ज़रिए अल्लाह तआला ने अपनी क़ुदरत से उनके ज़मीन पर पैर मारने से पानी का ऐसा चश्मा जारी कर दिया जिससे गुस्ल करने पर हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम की बीसियों साल की बदन की मुतअद्दद बीमारियाँ ख़त्म हो गयीं। हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के इस वाक़ये की तफ़सीलात के लिए सूरह अलअंबिया आयत 83व 84 और सूरह साद आयत 41 से 44 की तफ़सीर का मुतालआ करें। हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम के इस वाक़ये से हमें मुतअद्दद सबक़ मिले, दो अहम सबक़ यह हैं। पहला सबक़ यह है कि अल्लाह तआला अपने इरादे से भी हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को शिफ़ा दे सकते थे मगर दुनिया के दारुल असबाब होने की वजह से हज़रत अय्यूब अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया कि वह कुछ हरकत करें यानि कम अज़ कम अपने पैर को ज़मीन पर मारें। दूसरा सबक़ यह है कि जो भी असबाब मुहय्या हों उनको इस यक़ीन के साथ इख़्तियार करना चाहिए कि अल्लाह तआला की क़ुदरत और हुक्म से कमज़ोर असबाब के बावजूद किसी बड़ी से बड़ी चीज़ का भी वजूद हो सकता है।

हज़रत मरियम अलैहस्सलाम ने जब अल्लाह के हुक्म से बग़ैर बाप के हज़रत ईसा को जना तो उनके लिए हुक्मे खुदावंदी हुआ कि खजूर के तने को हिलायें यानि हरकत दें, उससे जब पकी हुई ताज़ा ख़जूरें झड़ें तो उनको खायें। अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत से हज़रत मरियम अलैहस्सलाम को बग़ैर किसी सबब के भी खजूर खिला सकते थे लेकिन दुनिया के दारुल असबाब होने की वजह से हुक्म हुआ कि खजूर के तने को अपनी तरफ़ हिलाओ। चुनांचे हज़रत मरियम अलैहस्सलाम ने हुक्मे खुदावंदी की तामील में खजूर के तने को हरकत दी। खजूर का तना इतना मज़बूत होता है कि चंद ताक़तवर मर्द हज़रात भी उसे आसानी से नहीं हिला सकते हैं,लेकिन सिन्फे नाज़ुक ने इस कमज़ोर सबब को इख़्तियार किया तो अल्लाह तआला ने अपने हुक्म से सूखे हुए खजूर के दरख्त से हज़रत मरियम अलैहस्सलाम के लिए ताज़ा ख़जूरें यानि गिज़ा का इन्तेज़ाम कर दिया। इस वाक़ये से मालूम हुआ कि जो भी असबाब मुहय्या हों अल्लाह पर तवक्कुल करके उन्हें इख़्तियार करना चाहिए।

असबाब तो हमें इख़्तियार करने चाहिएं लेकिन हमारा भरोसा अल्लाह की ज़ात पर होना चाहिए कि वह असबाब के बग़ैर भी चीज़ को वजूद में ला सकता है और असबाब की मौजूदगी के बावजूद उसके हुक्म के बग़ैर कोई भी चीज़ वजूद में नहीं आ सकती। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को जलती हुई आग में डाला गया, जलाने के सारे असबाब मौजूद थे, मगर हुक्मे खुदावंदी हुआ कि आग हज़रत इब्राहिम के लिए सलामती बन जाये तो आग ने उन्हें कुछ भी नुक़सान नहीं पहुंचायाबल्कि वह आग जो दूसरों को जला देती हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिए ठंडी और सलामती बन गयी। इसी तरह हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की गर्दन पर ताक़त के साथ तेज़ छुरी चलायी गई, मगर छुरी भी काटने में अल्लाह के हुक्म की मोहताज होती है, अल्लाह ने उस छुरी को हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की गर्दन को ना काटने का हुक्म दे दिया था, लिहाज़ा काटने के असबाब की मौजूदगी के बावजूद छुरी हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की गर्दन नहीं काट सकी।

असबाब व जराये व वसाइल का इस्तेमाल करना मनशये शरीअत और हुक्मे इलाही है। हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने असबाब व वसाइल को इख़्तियार भी फ़रमाया और उसका हुक्म भी दिया ख़्वाह लड़ाई हो या कारोबार। हर काम में हस्बे इस्तताअत असबाब का इख़्तियार करना ज़रूरी है, लिहाज़ा जायज़ व हलाल तरीक़े पर असबाब व वसाइल इख्तियार करनाफिर अल्लाह की ज़ात पर कामिल यक़ीन करना तवक्कुल अललल्लाह की रूह है। अगर तवक्कुल अललल्लाह का मतलब यह होता कि सिर्फ़ अल्लाह की मदद व नुसरत पर यक़ीन करके बैठ जायें तो सबसे पहले क़यामत तक आने वाले इन्सानों व जिनों के नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम इस पर अमल करते, हालांकि आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ऐसा नहीं किया और ना क़ुरआने करीम में अल्लाह तआला ने ऐसा कोई हुक्म दिया बल्कि दुश्मनों के मुक़ाबले के लिए पहले पूरी तैयारी करने की ताकीद फ़रमायी।

जैसा कि अर्ज़ किया गया कि क़ुरआने करीम में अल्लाह पर तवक्कुल यानि भरोसा करने की बार-बार ताकीद की गयी है। इख़्तिसार के मद्देनज़र यहां सिर्फ़ चंद आयात का तर्जुमा पेश कर रहा हूँ। “तुम उस ज़ात पर भरोसा करो जो ज़िन्दा है, जिसे कभी मौत नहीं आयेगी’’ (सूरह अलफ़ुरक़ान 58) “जब तुम किसी काम के करने का अज़्म कर लो तो अल्लाह पर भरोसा करो’’ (सूरह आले इमरान 159) “जो अल्लाह पर भरोसा करता है अल्लाह उसके लिए काफ़ी हो जाता है’’ (सूरह अत्तलाक़ 3) “बेशक ईमान वाले वहीं हैं जब उनके सामने अल्लाह का ज़िक्र किया जाये तो उनके दिल नर्म पड़ जाते हैं और जब उन पर उसकी आयात की तिलावत की जाती है तो वह आयात उनके ईमान मे इज़ाफा कर देती हैं और वह अपने रब ही पर भरोसा करते हैं’’ (सूरह अन्फ़ाल3)

हमारे नबी ने भी मुताअद्दद मर्तबा अल्लाह पर तवक्कुल करने की तालीम दी है, फ़िलहाल सिर्फ़ एक हदीस पेश है: हज़रत उमर रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: अगर तुम अल्लाह पर तवक्कुल करते जैसे तवक्कुल का हक़ होता है तो अल्लाह तआला तुम को इस तरह रिज़्क़ इनायत फ़रमाते जैसा कि परिन्दों को देता है कि सुबह सवेरे खाली पेट निकलते और शाम को पेट भर कर वापस लौटते हैं। (तिर्मिज़ी) मुशाहिदा है कि परिंदों को भी रिज़्क़ हासिल करने के लिए अपने घोंसलों से निकलना पड़ता है, लेकिन रिज़्क़ देने वाली ज़ात सिर्फ़ और सिर्फ़ अल्लाह ही की है।

जब कुफ़्फ़ारे मक्का उहद की जंग से वापस चले गये तो रास्ते में उन्हें पछतावा हुआ कि हम जंग में ग़ालिब आ जाने के बावजूद ख़्वाह मख़्वाह वापस आ गये, अगर कुछ और ज़ोर लगाते तो तमाम मुसलमानों का ख़ात्मा हो सकता था। इस ख़्याल की वजह से उन्होंने मदीना मुनव्वरा की तरफ़ लौटने का इरादा किया। दूसरी तरफ़ हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उनके इरादा से बाख़बर होकर उहद के नुक़सानात की तलाफ़ी के लिए जंगे उहद के अगले दिन सुबह सवेरे सहाबा में यह एलाना फ़रमाया कि हम दुश्मन के तआकु़बमें जायेंगेऔर जो लोग जंगे उहद में शरीक थे सिर्फ़ वह हमारे साथ चलें। सहाबए किराम जंग की वजह से जख़्मी और बहुत ज़्यादा थके हुए थे, लेकिन उन्होंने आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दावत पर लब्बैक कहा। हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने सहाबा के साथ मदीना मुनव्वरा से हमराउल असद के मक़ाम पर पहुंचे तो क़बीला ख़ुज़ाआ के एक शख़्स ने मुसलमानों के हौंसले का ख़ुद मुशाहिदा किया। बाद में उस शख़्स की मुलाक़ात कुफ़्फ़ारे मक्का के सरदार अबू सुफियान से हुई तो उसने मुसलमानों के हौसले के मुताअल्लिक़ बताया और मक्का मुकर्रमा वापस जाने का मशवरा दिया। उससे कुफ़्फ़ारे पर रोबतारी हुआ और वह वापस मक्का मुकर्रमा चले गये, मगर अबू सुफ़ियान ने एक शख़्स के ज़रिये मुसलमानों के लश्कर में यह ख़बर (झूठी)पहुंचा दी कि अबू सूफियान बहुत बड़ा लश्कर जमा कर चुका है और वह मुसलमानों का ख़ात्मा करने के लिए उन पर हमला करने वाला है। इस पर सहाबए किराम डरने के बज़ाये बोल उठेहस्बुनल्लाहु व नेमल वकील हमारे लिए अल्लाह काफ़ी है और वह बेहतरीन कारसाज़ है। (सूरह आले इमरान 173) यही तवक्कुल है।

हज़रत जाबिर रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि हम एक ग़ज़वे में हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ थे। जब हम एक घने सायेदार दरख़्त के पास आये तो उस दरख़्त को हमने रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के लिए छोड़ दिया। मुशरिकीन में से एक शख़्स आया और हुज़ूरे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की दरख़्त से लटकी हुई तलवार उसने ले ली और सूत कर कहने लगा: क्या तुम मुझसे डरते हो? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: नहीं। उसने कहा कि तुम्हें मुझसे कौन बचायेगा? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कहा: अल्लाह। इस पर तलवार उसके हाथ से गिर पड़ी। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने वह तलवार पकड़कर फ़रमाया: तुम्हें मुझसे कौन बचायेगा? उसने कहा तुम बेहतर तलवार पकड़ने वाले बन जाओ। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: क्या तू ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर्ररसूलुल्लाह की गवाही देता है? उसने कहा नहीं, लेकिन मैं आपसे यह अहद करता हूँ कि ना मैं आपसे लडूँगा और ना मैं उन लोगों का साथ दूंगा जो आपसे लड़ते हैं। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उसका रास्ता छोड़ दिया। वह शख़्स अपने साथियो के पास गया और कहने लगा मैं ऐसे शख़्स के पास से आया हूँ जो लोगों में सबसे बेहतर है। (मुसनद अहमद, यह वाक़या अलफाज़ के फ़र्क़ के साथ बुख़ारी व मुस्लिम में भी मौजूद है) ख़लीफ़ए अव्वल हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़िअल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं कि मैंने मुशरिकीन के क़दम देखे जब कि हम ग़ार(सौर) में थे। वह हमारे सरों के ऊपर खड़े थे। मैंने कहा: ऐ अल्लाह के रसूल! अगर इनमें से कोई अपने क़दमों की निचली जानिब देखे तो वह हमें देख ले। आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया: ऐ अबू बक्र! तेराउन दो के मुताअल्लिक़ क्या गुमान है कि अल्लाह जिनका तीसरा है। (बुख़ारी व मुस्लिम)

तवक्कुल अललल्लाह के हुसूल के लिए एक दुआ: हज़रत अनस रज़िअल्लाहु अन्हु से रिवायत है कि हुजू़रे अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: जो शख़्स घर से निकलते वक़्त यह दुआ पढ़े:“बिस्मिल्लाहि तवक्कलतु अलल्लाहि वला हउला वला क़ुव्वता इल्ला बिल्लाह, मैं अल्लाह का नाम लेकर घर से निकलता हूँ और अल्लाह पर भरोसा करता हूँऔर ना किसी भी काम की क़ुदरत मयस्सर आ सकती है ना क़ुव्वत मगर अल्लाह तआला की मदद से’’ तो उसके कह दिया जाता है तूने हिदायत पाई, तेरी किफ़ालत कर दी गयी, तुझे हर शर से बचा दिया गया और शैतान उससे दूर हट जाता है। (अबू दाऊद, तिर्मिज़ी)

Wo Mu’aziz They Zamane Me Musalman Hokar

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Wo Mu’aziz They Zamane Me
Musalman Ho kar,

Aur Tum Khwar Ho chuke hai
Tareek-e-QURAN Ho kar.

– Dr. Allama Iqbal

# Wajahat: Sahaba ko Allah ne uruj ata kiya Kyunki Nabi  (صلى الله عليه و آله وسلم) ki Mohabbat ki aur
unohne Qurano Ahele Bait aur Sunnat ko thaam liya.
.
aur aaj hum dardar ki thokre mehaz is liye kha rahe,
kyunki humne issWo-Muaziz-They-Zamane-Me-Musalman-Hokar Hidayat ko Nazar’andaz kar diya ,..

Allah Se Kare Door To Taalim Bhi Fitna: Dr. Allama Iqbal

Allah se Kare Door wo Talim bhi Fitna,
Imlaq bhi, Aulad bhi Jagir bhi Fitna.

Nahaq ke liye Uthey to Shamsheer bhi Fitna,
Shamsheer hi kya Nara-e-Taqbeer bhi Fitna.

– Dr. Allama Iqbal

✦ Wajahat:

Allah Se Door Karne Wali Tamam Cheeze Insan ke liye Fitna Hai, Chahe wo Gairjaruri Talim hi Kyu Na ho, Imlaq yani Khandani Rusuk hi kyu na ho ,. aur Chahe wo Aulaad hi ya jaydad hi kyu Na ho,

*Thik Usi Tarah Nahaq yaani Gairjaruri baat par Uthne Wali Shmsheer Yani Talwar bhi Fitna hai ,. aur Sirf Talwar hi Nahi balki Masoom Gairmuslimo ko Daraane ke liye Lagaya hua “Allhu Akbar” ka Nara bhi Fitna hai,..

♥ Allah Rabbul Izzat hum Sabhi ko Deen ki Sahi Samajh ata farmaye ! Ameen ,..Allah-se-Kare-Door-wo-Taalim-bhi-Fitna

Did You Know About the Possible Contact Between the Islamic World and the Vikings?

During the Islamic Golden Age, from the 8th century to the 13th century, the Abbasid Caliphate established one of the largest empires in history. This empire had contact with different cultures around the world, such as the Indians and Chinese in the east, and the Byzantines in the west, which led to the establishment of trade networks between Asia, Africa and Europe. But did you know that there might have been some contact between the Islamic world and the Vikings? Information about their relationship has been found in Arabic written sources and through the discovery of Arabic artefacts in Scandinavia.

The Moorish poet and diplomate al-Gazal is one of the few Arabs who gave a description of what must be nowadays Scandinavia. The fourth Emir of Cordoba, Abd al-Rahman II, sent al-Gazal to the king of the ‘Majus’. ‘Majus’ is another word for fireworshipers and in this instance the Vikings. Even though it is not clear why he was sent there, al-Gazal reports about an island or peninsula which might be the court of King Horik I, the King of the Danes.

Al-Tartushi has also reported about the Vikings around 970. In one of his accounts about his travels he describes “Schleswig”, i.e. Hedeby, an important Viking Age trading settlement. He talks about the people and their town: “Schleswig is a very large town situated at the Ocean. Within there are sources of fresh water. The people there adore Sirius, except for few, who are Christian. They have a church there.” 

More Arab writers who mentioned the Vikings in their works are Ibn Khoradadbeh and Ibn Fadlan. Ibn Khoradadbeh refers in 844 to the Vikings as Rus and describes them as merchants of slaves, fur and swords. Ibn Fadlan’s describes the Rus as ‘perfect physical specimens, tall as date palms, blond and ruddy’.

Silver hoard found in Sweden

The Arabic or oriental artifacts found in Scandinavia are very diverse. Bronze vessels, Cufic coins, costumes and costume accessories, as well as glass vessels, beads, balances and weights found mostly in Sweden are proof of contact with the Arab world. But the most important physical evidence of contact between the Vikings and the Islamic world is the ring found in a grave of a woman near Birka. The ring is made of silver alloy and colored glass with an inscription in Cufic Arabic. The inscription is translated as “for/to Allah”. Even though the woman in the grave was wearing traditional Scandinavian clothing, it is not possible to identify her ethnicity or religion.

Two bronze bottles with Arabic inscription from Hagebyhöga

It is surely not the question if there was interaction between the Islamic World and the Vikings, it is just not clear if their relationship was purely for trade or if some of them converted to Islam. However, this is another proof of how huge and impressive the Abassid Caliphate must have been.

‘बैत अल हिक्म’ था दुनिया के लिए विज्ञान का एक महत्वपूर्ण गढ़, जो सभी धर्मों के लिए बौद्धिक मंच का केंद्र बना

‘बैत अल हिक्म’ था दुनिया के लिए विज्ञान का एक महत्वपूर्ण गढ़, जो सभी धर्मों के लिए बौद्धिक मंच का केंद्र बना

8वीं शताब्दी में, एक लाइब्रेरी और अनुवाद संस्थान, बैतूल हीक्मा, या अंग्रेजी में हाउस ऑफ विस्डम के रूप में निर्मित था जो बगदाद की अब्बासी राजधानी की ताज में से एक था। बगदाद के शुरुआती विकास को बड़े पैमाने पर खलीफा हरुन अल रशीद को श्रेय दिया जाता है। अपने कार्यकाल के तहत, बगदाद में एक ऐसा कोर्स शुरू किया गया जो दुनिया के बौद्धिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में स्थापित हुआ । 500 वर्षों तक बगदाद दुनिया भर के विद्वानों में चित्रकारी, विभिन्न अकादमिक गतिविधियों का मेजबान रहा। सामूहिक चेतना पर हारून का प्रभाव इतना मजबूत था कि कई महान लेखकों ने उनका उल्लेख किया है। आयरिश मैन जेम्स जॉयस के ग्राउंडब्रैकिंग उपन्यास, ‘उलिसिस’, में खलीफा हारून अल राशिद के इस सपने का उल्लेख किया गया है, जबकि एक अन्य आयरिश मैन, डब्ल्यू बी यॉट्स ने The Gift of Harun Rashid, नामक एक कविता लिखी। एक और प्रसिद्ध कवि, अल्फ्रेड टेनीसन ने “अरबी नाइट्स के रिकॉलेक्शंस” नामक एक कविता लिखी, जिसमें लगभग हर स्टांजा “of good Haroun Alraschid” वाक्यांश के साथ समाप्त होता है। उनका नाम चार्ल्स डिकेंस के उपन्यासों में से एक है, साथ ही रोल्ड डाहल के बीएफजी में भी मौजूद है।

बैतूल हीक्मा का विकास

हारून के बेटे अल-मामुन ने भौतिक और बौद्धिक दोनों घरों को विस्तारित किया, ज्ञान के विभिन्न शाखाओं के अध्ययन के लिए केंद्र से इसके विकास की निगरानी की। इस महान केंद्र में स्थित विभिन्न परंपराओं के बौद्धिक थे, जिनमें वैज्ञानिक, अनुवादक, दार्शनिक, लेखकों और शास्त्री शामिल थे, लेकिन इतनी ही सीमित नहीं थी। सदन के भीतर में मुस्लिमों ने अरिस्टोटल और हिप्पोक्रेट्स जैसे महान दार्शनिकों के कार्यों तक पहुंच के साथ दुनिया को उपहार दिया। उस समय मुस्लिम दुनिया के काम के बिना, बहुत सी ग्रीक परंपरा हमेशा के लिए खो गई हो सकती थी। ग्रीक एकमात्र ऐसी भाषा नहीं थी जिसे अरबी के अलावा सदन में बोली जाती थी। फारसी, अरामाईक, हिब्रू, सिरिएक, भारतीय और लैटिन सभी भाषाएँ यहाँ मौजूद थे। दुनिया भर से ईसाई और यहूदी यहाँ आए, जहां उन्हें ज्ञान के अपने प्रयास में उनका स्वागत किया गया।

ज्ञान की विभिन्न शाखाएँ 
ज्ञान पर सदन (बैतूल हीक्मा) का ध्यान दर्शन और धर्मशास्त्र से आगे चला गया। इस बौद्धिक केंद्र में कुछ अन्य शखाओं को भी फोकस किया गया जैसे आध्यात्मिक विज्ञान, धार्मिक विज्ञान, बीजगणित, चिकित्सा, भौतिकी, जीवविज्ञान, रसायन शास्त्र, त्रिकोणमिति और खगोल विज्ञान आदि अध्ययन का केंद्र स्थान बना. मुसलमानों ने चीन के अभियानों के माध्यम से पेपर बनाने की कला सीखने के बाद, बगदाद इस प्रक्रिया को व्यवस्थित करने, किताबों के उत्पादन केंद्रों में से एक बन गया ताकि पुस्तकों को और अधिक सुलभ बनाया जा सके।

सदन के हिस्से के रूप में स्थापित खगोल विज्ञान वेधशाला ने खगोलविदों को ब्रह्मांड का पालन करने और भारतीयों, ग्रीक और फारसियों के विरोधाभासी खगोल विज्ञान केंद्रित ग्रंथों की सटीकता का आकलन करने की अनुमति दी। यह परियोजना खगोल विज्ञान से परे चली गई, क्योंकि कुछ इतिहासकारों ने दावा किया है कि यह पहले राज्य प्रायोजित बड़े पैमाने पर विज्ञान प्रयास का प्रतिनिधित्व करता है; जिनेवा में बड़े हैड्रॉन कोलाइडर जैसी परियोजनाओं के लिए एक अग्रदूत है ।

ग्रेट विद्वान और उनके महान कार्य

स्वाभाविक रूप से, सदन कई महान विद्वानों का अकादमिक निवास बन गया था। जाफर मुहम्मद इब्न मुसा इब्न शकीर को इस विचार का पता लगाने वाला पहला विद्वान माना जाता है कि हमारे आस-पास के दिव्य निकायों, जैसे चंद्रमा और ग्रह, भौतिकी के समान कानूनों के अधीन थे क्योंकि हम धरती पर हैं। उनकी पुस्तक, एस्ट्रल मोशन एंड द फोर्स ऑफ आकर्षण, इसमें भौतिक बल की विचारधाराएं शामिल थीं जो बाद में न्यूटन और गुरुत्वाकर्षण के सार्वभौमिक कानून द्वारा पूरी तरह से विकसित की गई।

“अरबों के दार्शनिक”, महान अल-किंदी, सदन का एक और उल्लेखनीय निवासी था। अरिस्टोटल के कार्यों का अनुवाद, और इस्लामी धर्मशास्त्र के साथ उन्हें विकसित करने, अल किंदी ने दर्शन और धर्मशास्त्र के मामलों पर बहस शुरू की जो उनकी मृत्यु के बाद सदियों तक जारी रहा। अल-ख्वारिज़ीमी, प्रतिष्ठित गणितज्ञ, सदन के महान लोगों में से एक थे। अल किंदी के साथ, उन्होंने अरबों और बाकी दुनिया को हिंदू दशमलव संख्याओं में पेश किया जो आज हम उपयोग करते हैं (1,2,3,4 …)। उनकी पुस्तक, किताब अल-जेब्र (द बुक ऑफ कॉम्प्लेशन) ने दुनिया को बीजगणित (अल-जेब्र से) शब्द दिया, साथ ही साथ समीकरणों को सुलझाने के कुछ नियमों को भी प्रस्तुत किया।

एक सिरिएक ईसाई हुनैन इब्न इशाक ने महत्वपूर्ण ग्रंथों के अनुवाद में भी एक केंद्रीय भूमिका निभाई। कहा जाता है कि ग्रीक कार्यों के उनके अनुवाद इस्लामी दवा के क्षेत्र के विकास में मदद किया है। माना जाता है कि अनुवाद करने के बाद, उन्होंने स्वयं की 36 किताबें लिखी हैं, जिनमें से 21 दवाओं के क्षेत्र में केंद्रित हैं। उनकी पुस्तक, दस ग्रंथों पर ओप्थाल्मोलॉजी, ने आंख की शारीरिक रचना, साथ ही इस अंग की बीमारियों, इन बीमारियों के लक्षणों और उनके उपचारों का वर्णन किया है। इस्लामी इतिहास की इस अवधि में अनुवादित और लिखे गए चिकित्सा ग्रंथों ने सदियों से यूरोप में चिकित्सा अभ्यास को प्रभावित करने के लिए प्रेरित किया, कुछ ग्रंथ 17 वीं शताब्दी में मुद्दों पर संदर्भ के रूप में अपनी स्थिति बनाए रखते थे।

एक सुंदर युग का अंत

बौद्धिक प्रयास की शक्ति के लिए सुंदर नियम 1258 में बगदाद के मंगोल आक्रमण के साथ दुर्घटनाग्रस्त हो गया। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि शहर को तबाह कर दिया गया था क्योंकि 90,000 पुरुष, महिलाएं और बच्चों की हत्या कर दी गई थी। सदन और पौराणिक कथाओं में से कुछ भी नहीं रहा, टिग्रीस नदी किताबों के स्याही से काला हो गया, जो उसके पानी में नष्ट हो गईं, और उन लोगों के खून से लाल हो गई।

बैतूल हीक्मा से सबक
758 साल बाद भी हमारा धर्म बौद्धिक विचारों का पर्याय बन गया है. यह भी याद रखना उचित है कि बगदाद में 500 साल के रूप में उज्ज्वल थे, यह किसी भी तरह का अपवाद नहीं है। मुसलमानों ने 7 शताब्दियों तक अंडलुशिया में ज्ञान के विकास को भी देखा। आज भी मुस्लिम विचारक सभी प्रकार के वैज्ञानिक प्रयासों में जुड़े हुए हैं, चाहे वह “मुस्लिम दुनिया” हो या उसके बाहर। यह भी याद रखना जरुरी है कि जब हम अपने सर्वश्रेष्ठ काल में थे, चाहे यह बगदाद में हो या दमिश्क, कॉर्डोबा या ग्रेनाडा में हम दोनों जगहों में सुरक्षा और खुलेपन की भावना के साथ संचालित हुए। सुरक्षा के साथ उन्हें भरोसेमंद मानने के बिना भी विचारों के साथ जुड़ने की इजाजत दी, उन्हें पूरी तरह से उनकी अकादमिक योग्यता पर निर्णय लेने की बजाय उन्हें समर्थन देने के आधार पर निर्णय लिया। ज्ञान का हमारा पीछा केवल धर्मशास्त्र या दर्शन तक ही सीमित नहीं था; हम उस समय के विज्ञान की सभी शाखाओं से जुड़े थे। हमारी खुलेपन ने सीखने के लिए हमारे बौद्धिक केंद्रों ने दुनिया के सभी कोनों, ईसाई, यहूदी और अन्यथा से विचारकों और विद्वानों को अनुमति दी। यह सभी लोगों और धर्मों के लिए फायदेमंद साबित हुआ; इस सद्भाव के सबक ने ज्ञान के विकास के लिए सभी धर्मों के लिए अनुमति दी जिसने दुनिया को एक बड़ा, अधिक मेहमाननवाज, अधिक रोशनी वाला जगह बना दिया।