यह एक बिल्कुल साफ और ज़ाहिर सवाल है लेकिन हममें से कई लोगों के पास इसका साफ जवाब नहीं होता है। मेरा पहला जवाब खानदान मुसलमान है इसलिए के हमारा परिवार मुसलमान है उसके बाद असल सवाल ज्यों का त्यों लेकिन उसके जवाब ने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया जब उसने कहा अगर तुम्हारा परिवार हिन्दू या ईसाइ होता तो क्या तुम वही होते तो मेरा जवाब था के नहीं इस्लाम हक़ है। उसके बाद मुझे इस सवाल ने अपनी ज़िन्दगी के बारे में सोचने पर मज़बूर कर दिया और ज़िन्दगी की बुनियाद पर ही सवालिया निशान लगा दिया और मेरी ज़िन्दगी को बदल कर रख दिया।
उसने इस बात पर मुझे सोचने पर मज़बूर किया के मैं कैसे साबित करूँ कि इस्लाम हक़ है ना कि हम इस पर एक जज़बाती और अंधे तौर पर यक़ीन रखते है। हक़ीक़त यह है के अल्लाह سبحانه وتعال ने उन लोगों की तर्दीद (खण्डन) की है जो अपने बाप-दादाओं की अंधी तक़्लीद करते है और अपने अक़ीदे को बिना दलायल को इख्तियार करते है। अल्लाह سبحانه وتعال ने क़ुरआन मजीद में बयान फरमाया है :
وَمَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَإِنَّ الظَّنَّ لا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا
” और इस बात को कुछ भी नहीं जानते महज़ वहम व गुमान पर चलते हैं और बैशक़ वहम व गुमान हक़ का
मुतबादिल नहीं हो सकता।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन नजम – 28)مَا لَهُمْ بِهِ مِنْ عِلْمٍ إِلا اتِّبَاعَ الظَّنِّ وَمَا قَتَلُوهُ يَقِينًا
”उनको इल्मुल यक़ीन नहीं है और वोह नहीं करते मगर वहम व गुमान की पैरवी। और यक़ीनन उन्होंने (ईसा को) क़त्ल नहीं किया” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन्निसा – 157)
إِنْ هِيَ إِلا أَسْمَاءٌ سَمَّيْتُمُوهَا أَنْتُمْ وَآبَاؤُكُمْ مَا أَنْزَلَ اللَّهُ بِهَا مِنْ سُلْطَانٍ إِنْ يَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَمَا تَهْوَى الأنْفُسُ وَلَقَدْ جَاءَهُمْ مِنْ رَبِّهِمُ الْهُدَى
‘यह कुछ नहीं मगर सिर्फ वोह नाम है जो तुमने और तुम्हारे बाप-दादाओं ने खुद गढ़ लिये है, जिसके लिए अल्लाह سبحانه وتعال ने कोई दलील नहीं उतारी है। और वोह इत्तिबा नहीं करते मगर सिर्फ वहम व गुमान और ज़न की और अपनी नफ्स की। इसके बावजूद भी के उनके पास रहनुमाई आ गयी है उनके रब की तरफ से।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अन नजम- 23)
قُلْ هَلْ عِنْدَكُمْ مِنْ عِلْمٍ فَتُخْرِجُوهُ لَنَا إِنْ تَتَّبِعُونَ إِلا الظَّنَّ وَإِنْ أَنْتُمْ إِلا تَخْرُصُونَ
”क्या तुम्हारे पास ईल्म है जिसका तुम दावा करते हो ताके तुम दलील के तौर पर उसे ला सको? तुम नहीं चलते मगर सिर्फ वहम व गुमान।” (तर्जुमा मआनिए क़ुरआन, अल अनाम- 148)
दूसरे धर्मो के मानने वालों के पास निश्चित तौर पर अपने अक़ीदे (आस्था) को अक़्ली तौर पर सहीह साबित करने का कोई सबूत नहीं है, इसलिए वोह उनके धर्म पर ज़ज्बाती तौर पर या सिर्फ अंधी तक्लीद के तौर पर ईमान रखते है, हममें से कोई यह सोच सकता है के हम में बिना वाजे़ह दलील के भी ईमान हो सकता है। हाँलाकि जबकि हम ज़िन्दगी के आम मामलात में देखते है तो हम पाते है कि लोग छोटी-छोटी बातों में भी सोच विचार करते है जैसाकि उन्हें कार खरीदना हो, घर खरीदना हो, अगर उन्हें यूनिवर्सिटी का कोई कोर्स करना है या उनको कोई नोकरी या बिज़नेस करना हो, ऐसा कैसे हो सकता है के जब ज़िन्दगी के बारे में सबसे अहम सवाल का मामला आए जिससे हमें अपनी ज़िन्दगी का मक़सद पता लगता है तो हम यह कहते है के हमारे पास सिर्फ ईमान होना चाहिए जबकि हम पूरी तरह से उससे मुतमईन नहीं होते।
इसलिए यह बहुत अहम है के एक मुसलमान बिना किसी शक के अल्लाह سبحانه وتعال के वजूद पर, हज़रत मुहम्मद (صلى الله عليه وسلم) की रिसालत पर इमान लाये और यह की क़ुरआन अल्लाह سبحانه وتعال की आखरी किताब है, जो वह्यी के ज़रिए इन्सानों के लिये नाज़िल हुई है, और यह की अल्लाह سبحانه وتعال की तरफ से क़ुरआन एक आखरी किताब है जो ज़िन्दगी के दस्तूर के तौर पर तमाम इंसानो के पास भेजी गई है। इस्लाम दूसरे मज़हबों की तरह नहीं है क्योंकि इसमे ईल्मे यक़ीन यानी यकीनी दलील पाये जातें है जो दिल व दिमाग को मुतमईन करतें है।


