अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 83

सन् 07 हि० के कुछ सराया (झड़पें)

इस ग़जवे से वापस आकर रसूलुल्लाह सल्ल० शव्वाल 07 हि० तक मदीना में ठहरे रहे और इस बीच बहुत से सराया (ऐसी टुकड़ियां जिसमें अल्लाह के रसूल सल्ल० शरीक नहीं होते थे) रवाना किए, कुछ का विवेचन यह है-

1. सरीया क़दीद (सफ़र या रबीउल अव्वल सन् 07 हि०)

यह सरीया ग़ालिब बिन अब्दुल्लाह लैसी की कमान में क़दीद की ओर क़बीला बनू मलूह को सज़ा देने के लिए रवाना किया गया। वजह यह थी कि बनू मलूह ने बिन बिन सुवैद के साथियों को क़त्ल कर दिया था और उसी का बदला लेने के लिए इस सरीया की रवानगी अमल में आई थी। इस सरीया ने रात में छापा मारकर बहुत से लोगों को क़त्ल कर दिया और जानवर हांक लाए। पीछे से दुश्मन ने एक बड़ी फ़ौज के साथ पीछा किया, लेकिन जब मुसलमानों के क़रीब पहुंचे, तो वर्षा होने लगी और एक बड़ी बाढ़ आ गई जो दोनों फ़रीक़ों के बीच में रोक बन गई। इस तरह मुसलमानों ने बाक़ी रास्ता भी सलामती के साथ तै कर लिया।

2. सरीया हिसमी (जुमादल आख़िर 07 हि०)

इसका ज़िक्र दुनिया के बादशाहों के पत्र के अध्याय में हो चुका है

3. सरीया तरबा (शाबान 07 हि०)

यह सरीया हज़रत उमर बिन खत्ताब रजि० के नेतृत्व में भेजा गया। उनके साथ तीस आदमी थे, जो रात में सफ़र करते और दिन में छिप जाते थे, लेकिन हवाज़िन को पता चल गया और वे निकल भागे। हज़रत उमर रज़ि० उनके इलाक़े में पहुंचे तो कोई भी न मिला और वह मदीना पलट आए।

4. सरीया अतराफ़ फ़िदक (शाबान सन् 07 हि०)

यह सरीया हज़रत बशीर बिन साद अंसारी रज़ि० के नेतृत्व में तीस आदमियों के साथ बनू मुर्रा को सज़ा देने के लिए रवाना किया गया। हज़रत बशीर ने उनके इलाक़े में पहुंचकर भेड़-बकरियां और जानवर हांक लिए और वापस हो गए। रात में दुश्मन ने आ लिया। मुसलमानों ने जमकर तीरंदाज़ी की, लेकिन आखिरकार बशीर और उनके साथियों के तीर ख़त्म हो गए, उनके हाथ खाली हो गए और उसके नतीजे में सबके सब क़त्ल कर दिए गए, सिर्फ़ बशीर ‘जिंदा बचे। उन्हें घायल हाथ में उठाकर फ़िदक लाया गया और वहीं यहूदियों के
पास ठहरे, यहां तक कि उनके घाव भर गए। इसके बाद वह मदीना आए। 5. सरीया मीफ़आ (रमज़ान 07 हि०)

यह सरीया हज़रत ग़ालिब बिन अब्दुल्लाह लैसी के नेतृत्व में बनू अवाल और बनू अब्द बिन सालबा को सज़ा देने के लिए भेजा गया और कहा जाता है कि क़बीला जुहैना की शाखा हरक़ात की सजा के लिए रवाना किया गया। मुसलमानों की तायदाद 130 थी। उन्होंने दुश्मन पर एक जुट होकर हमला किया और जिसने भी सर उठाया, उसे क़त्ल कर दिया, फिर पशु और भेड़-बकरियां हांक लाए।

इसी सरीया में हज़रत उसामा बिन जैद रजि० ने नुहैक बिन मरदास को ला इला-ह इल्लल्लाहु कहने के बावजूद क़त्ल कर दिया था और इस पर नबी सल्ल० ने गुस्से में फ़रमाया था कि तुमने उसका दिल चीरकर क्यों न मालूम कर लिया कि वह सच्चा था या झूठा ?

6. सरीया ख़ैबर, शव्वाल 07 हि०

इसी सरीया में तीस सवार थे और हज़रत अब्दुल्लाह बिन रुवाहा रज़ि० के नेतृत्व में भेजा गया था। वजह यह थी कि असीर या बशीर बिन ज़राम बनू ग़तफ़ान को मुसलमानों पर चढ़ाई करने के लिए जमा कर रहा था। मुसलमानों ने असीर को यह उम्मीद दिलाकर कि अल्लाह के रसूल सल्ल० उसे ख़ैबर का गवर्नर बना देंगे, उसके तीस साथियों सहित अपने साथ चलने पर तैयार कर लिया, लेकिन क़रक़रा न्यार पहुंचकर दोनों फ़रीक़ों में बदगुमानी पैदा हो गई, जिसके नतीजे में असीर और उसके तीस साथियों को जान से हाथ धोना पड़ा।

7. सरीया यमन व जबार (21 शव्वाल 07 हि०)

जबार बनू ग़तफ़ान और कहा जाता है कि बनू फ़ज़ारा और बनू अज़रा के इलाके का नाम है। यहां हज़रत बशीर बिन काब अंसारी रज़ि० को तीन सौ मुसलमानों के साथ रवाना किया गया। मक़सद था एक बड़े जत्थे को बिखेर देना, जो मदीने पर हमलावर होने के लिए जमा हो रहा था। मुसलमान रातों रात सफ़र करते और दिन में छिपे रहते थे

जब दुश्मन के हज़रत बशीर के आने की खबर हुई तो वह भाग खड़ा हुआ। हज़रत बशीर ने बहुत से जानवरों पर क़ब्ज़ा किया। दो आदमी भी क़ैद किए और जब इन दोनों को लेकर नबी सल्ल० की खिदमत में मदीना पहुंचे, तो दोनों ने इस्लाम कुबूल कर लिया।

8. सरीया ग़ाबा

इसे इमाम इब्ने कय्यिम ने उमरा क़ज़ा से पहले सन् 07 हि० के सराया में गिना है।

इसका सार यह है कि क़बीला जश्म बिन मुआविया का एक व्यक्ति बहुत से लोगों को साथ लेकर ग़ाबा आया। वह चाहता था कि बनू क़ैस को मुसलमानों से लड़ने के लिए जमा करे। नबी सल्ल० ने हज़रत अबू हदरद को सिर्फ़ दो आदमियों के साथ रवाना फ़रमाया कि उसकी ख़बर और उसका पता लेकर आएं। वह सूर्य डूबने के वक़्त उन लोगों के पास पहुंचे। अबू हदरद एक ओर छिप गए और उनके दोनों साथी दोनों ओर छिप गए। उन लोगों के चरवाहे ने देर कर दी, यहां तक कि शाम की स्याही जाती रहीं, चुनांचे उनका रईस तंहा उठा, जब अबू हदरद के पास से गुज़रा तो उन्होंने तीर मारा जो दिल पर जाकर बैठा और वह कुछ बोले बग़ैर जा गिरा। अबू हदरद ने सर काटा और तक्बीर कहते हुए लश्कर की ओर दौड़ लगाई। उनके दोनों साथियों ने भी तस्बीर करते दौड़ लगाई। दुश्मन भाग खड़ा हुआ और ये तीनों हज़रात बहुत से ऊंट ओर बकरियां हांक लाए । ‘ हुए

1. जादुल मआद 2/149, 150। इब्ने हिशाम 2/629, 630, इब्ने हिशाम के यहां इब्ने अब हदरद है। इन सराया का विस्तृत विवेचन रहमतुल लिल आलमीन 2/229, 230, 231, जादुल मआद 2/148, 149, 150, तलकीहुल फ़हम मय हाशिए पृ० 31 और मख़्तसरुस्सीरः, शेख अब्दुल्लाह नज्दी पृ० 322, 323, 324 में देखा जा सकता है।

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