अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 82



ग़ज़वा ज़ातुर्रिक़ाअ (सन् 07 हि०)

जब अल्लाह के रसूल सल्ल० अहज़ाब के तीन बाजुओं में से दो मज़बूत बाज़ुओं को तोड़कर फ़ारिग़ हो गए, तो तीसरे बाज़ू की ओर तवज्जोह का भरपूर मौक़ा मिल गया। तीसरा बाज़ू वे बहू थे, जो नज्द के रेगिस्तान में रहते थे और रह-रहकर लूटमार की कार्रवाइयां करते रहते थे ।

चूंकि ये बहू किसी आबादी या शहर के रहने वाले न थे और उनका निवास मकानों और क़िलों के अन्दर न था, इसलिए मक्का वालों और ख़ैबर के रहने वालों के मुक़ाबले में इन पर पूरी तरह क़ाबू पा लेना और इनके शर व फ़साद की आग पूरे तौर पर बुझा देना बहुत कठिन था, इसलिए इनके हक़ में आतंकित करने वाली सज़ा भरी कार्रवाइयां ही फ़ायदेमंद हो सकती थीं ।

चुनांचे इन बहुओं पर रौब व दबदबा क़ायम करने की ग़रज़ से और दूसरों के मुताबिक़ मदीने के चारों ओर छापा मारने के इरादे से जमा होने वाले बहुओं को बिखेर देने की ग़रज से-नबी सल्ल० ने सज़ा देने वाला हमला फ़रमाया, जो ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ के नाम से मशहूर है।

ग़ज़वा की तारीख लिखने वालों ने आमतौर से इस ग़ज़वे का उल्लेख 04 हि० में किया है। लेकिन इमाम बुखारी ने इसका ज़माना सन् 07 हि० बताया है। चूंकि इस ग़ज़वे में हज़रत अबू मूसा अशअरी और हज़रत अबू हुरैरह रज़ि० ने शिर्कत की थी, इसलिए यह इस बात की दलील है कि यह ग़ज़वा खैबर के बाद पेश आया था। (महीना शायद रबीउल अव्वल का था), क्योंकि अबू हुरैरह रज़ि० उस वक़्त मदीना पहुंचकर मुसलमान हुए थे, जब अल्लाह के रसूल सल्ल० ख़ैबर के लिए मदीना से जा चुके थे।

फिर हज़रत अबू हुरैरह रजि० मुसलमान होकर सीधे नबी सल्ल० की सेवा में ख़ैबर पहुंचे और जब पहुंचे तो ख़ैबर जीता जा चुका था ।

इसी तरह हज़रत अबू मूसा अशअरी हब्श से उस वक़्त नबी सल्ल० की खिदमत में पहुंचे थे जब ख़ैबर जीता जा चुका था, इसलिए ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ में इन दोनों सहाबियों की शिर्कत इस बात की दलील है कि यह ग़ज़वा ख़बर के बाद ही किसी वक़्त पेश आया था।

सीरत लिखने वालों ने इस ग़ज़वा के बारे में जो कुछ लिखा है, उसका सार

यह है कि नबी सल्ल० ने क़बीला अनमार या बनू ग़तफ़ान की दो शाखाओं बनी सालबा और बनी मुहारिब के जमा होने की खबर सुनकर मदीना का इन्तिज़ाम हज़रत अबूज़र या हज़रत उस्मान बिन अफ्फान के हवाले किया और झट चार सौ या सात सौ सहाबा किराम को साथ लेकर नज्द के इलाक़े का रुख किया। फिर मदीने से दो दिन की दूरी पर नख्ल नामी जगह पहुंचकर बनू ग़तफ़ान की एक टुकड़ी का सामना हुआ, लेकिन लड़ाई नहीं हुई। अलबत्ता आपने इस मौक़े पर लड़ाई की हालत वाली नमाज़ (सलाते खौफ़) पढ़ाई। बुखारी की एक रिवायत में यह है कि नमाज़ की इंक़ामत कही गई और आपने एक गिरोह को दो रक्अत नमाज़ पढ़ाई । यों अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की चार रक्अतें हुईं और क़ौम की दो रक्अतें हुईं। 1 T

सहीह बुखारी में हज़रत अबू मूसा अशअरी रजि० से रिवायत है कि हम लोग अल्लाह के रसूल सल्ल० के साथ निकले। हम छः आदमी थे और एक ही ऊंट था, जिस पर बारी-बारी सवार होते थे। इससे हमारे क़दम छलनी हो गए। मेरे भी दोनों पांव घायल हो गए और नाखून झड़ गया। चुनानंचे हम लोग अपने पांवों पर चीथड़े लपेटे रहते थे। इसलिए उसका नाम जातुर्रिक्राअ (चीथड़ों वाला) पड़ गया, क्योंकि हमने उस ग़ज़वे में अपने पांवों पर चीथड़े और पट्टियां बांध और लपेट रखी थीं 12

और सहीह बुखारी ही में हज़रत जाबिर रज़ि० से यह रिवायत है कि हम लोग ज़ातुर्रिकाअ में नबी सल्ल० के साथ थे। (चलन यह था कि जब हम किसी छायादार पेड़ पर पहुंचते तो उसे नबी सल्ल० के लिए छोड़ देते थे


(एक बार) नबी सल्ल० ने पड़ाव डाला और लोग पेड़ की छाया लेने के लिए इधर-उधर कांटेदार पेड़ों के बीच बिखर गए। रसूलुल्लाह सल्ल० भी एक पेड़ के नीचे उतरे और उसी पेड़ से तलवार लटका कर (सो गए)।

हज़रत जाबिर फ़रमाते हैं कि हमें बस एक नींद आई थी कि इतने में एक मुश्रिक ने आकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की तलवार सौंत ली और बोला, तुम मुझसे डरते हो ?

आपने फ़रमाया, नहीं ।

उसने कहा, तब तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा ?

1. सहीह बुखारी 1/407, 408, 2/593, 2. सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ 2/592, सहीह मुस्लिम, बाब ग़ज़वा ज़ातुर्रिकाअ 2/118


आपने फ़रमाया, अल्लाह !

हज़रत जाबिर रजि० कहते हैं कि हमें अचानक रसूलुल्लाह सल्ल० पुकार रहे थे। हम पहुंचे तो देखा एक बहू (आराबी) आपके पास बैठा है। आपने फ़रमाया, मैं सोया था और इसने मेरी तलवार सौंत ली। इतने में मैं जाग गया और सौंती हुई तलवार उसके हाथ में थी। इसने मुझसे कहा, तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा ?

मैंने कहा, अल्लाह ! तो अब यह वही आदमी बैठा हुआ है। फिर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उसे सज़ा न दी।

अबू अवाना की रिवायत में इतना और मिलता है कि (जब आपने उसके सवाल के जवाब में अल्लाह कहा, तो) तलवार उसके हाथ से गिर पड़ी। फिर वह तलवार अल्लाह के रसूल सल्ल०ने उठा ली और फ़रमाया, अब तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा ?

उसने कहा, आप अच्छे पकड़ने वाले होइए (यानी एहसान कीजिए)

आपने फ़रमाया, तुम गवाही देते हो कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मैं अल्लाह का रसूल हूं ।

उसने कहा, मैं आपसे अहद करता हूं कि आपसे लड़ाई नहीं करूंगा और न आपसे लड़ाई करने वालों का साथ दूंगा।

हज़रत जाबिर रज़ि० का बयान है कि इसके बाद आपने उसकी राह छोड़ दी और उसने अपनी क़ौम में जाकर कहा, मैं तुम्हारे यहां सबसे अच्छे इंसान के पास से आ रहा हूं। 1

सहीह बुखारी की रिवायत में जिसे मुसद्दिद ने अबू अवाना से और उन्होंने अबू बिश से रिवायत किया है, बताया जाता है कि उस आदमी का नाम गौस बिन हारिस था । 2

इब्ने हजर कहते हैं कि वाक़दी के नज़दीक इस घटना के विस्तार में यह बयान किया गया है कि उस बहू (आराबी) का नाम दासूर था और उसने इस्लाम कुबूल कर लिया था, लेकिन वाक़दी के कलाम से ज़ाहिर में मालूम होता है कि ये अलग-अलग दो घटनाएं थीं, जो दो अलग-अलग ग़ज़वों में घटी थीं। (वल्लाहु आलम)

1. मुख्तसरुस्सीरः लेख : शेख अब्दुल्लाह नज्दी, पृ० 264, साथ ही देखिए फ़हुल बारी 7/416 2. सहीह बुखारी 2/593

3. फत्हुल बारी 7/428

इस ग़ज़वे से वापसी में सहाबा किराम ने एक मुश्कि औरत को गिरफ़्तार कर लिया। इस पर उसके शौहर ने नज्ज्र मानी कि वह मुहम्मद के साथियों के अन्दर एक खून बहाकर रहेगा। चुनांचे वह रात के वक़्त आया। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने दुश्मन से मुसलमानों की हिफ़ाज़त के लिए दो आदमियों यानी इबाद बिन बिन और अम्मार बिन यासिर रजि० को पहरे पर लगा रखा था।

जिस वक़्त वह आया, हज़रत इबाद खड़े नमाज पढ़ रहे थे। उसने इसी हालत में उनको तीर मारा। उन्होंने नमाज़ तोड़े बग़ैर तीर निकालकर झटक दिया। उसने दूसरा और तीसरा तीर मारा, लेकिन उन्होंने नमाज़ न तोड़ी और सलाम फेरकर ही फ़ारिग हुए। फिर अपने साथी को जगाया।

साथी ने (हालात जानकर) कहा, सुब्हानल्लाह ! आपने मुझे जगा क्यों न दिया ?

उन्होंने कहा, मैं एक सूरः पढ़ रहा था। गवारा न हुआ कि उसे काट दूं। संगदिल आराब को आतंकित और भयभीत करने में इस ग़ज़वे का बड़ा असर रहा। हम इस ग़ज़वे के बाद पेश आने वाली सराया पर नज़र डालते हैं तो देखते हैं कि ग़तफ़ान के इन क़बीलों ने इस ग़ज़वे के बाद सर उठाने की जुर्रात न की, बल्कि ढीले पड़ते-पड़ते ढह गए और आखिर में इस्लाम कुबूल कर लिया, यहां तक कि इन बहुओं के कई क़बीले हमको फ़त्हे मक्का और ग़ज़वा हुनैन में मुसलमानों के साथ नज़र आते हैं और उन्हें ग़ज़वा हुनैन के माले ग़नीमत में से हिस्सा दिया जाता है। फिर फ़हे मक्का से वापसी के बाद इनके पास सदक़ा वसूल करने के लिए इस्लामी हुकूमत के कर्मचारी भेजे जाते हैं और वे बाक़ायदा अपने सदके वसूल करते हैं।

ग़रज़ इस रणनीति से वे तीनों बाज़ू टूट गए जो खंदक़ की लड़ाई में मदीने पर हमलावर हुए थे और इसकी वजह से पूरे इलाक़े में सुख-शान्ति का दौर-दौरा हो गया।

इसके बाद कुछ क़बीलों ने कुछ इलाक़ों में जो हंगामे किए, उस पर मुसलमानों ने बड़ी आसानी से क़ाबू पा लिया, बल्कि इसी ग़ज़वे के बाद बड़े-बड़े शहरों और देशों पर विजय पाने का रास्ता हमवार करना शुरू कर दिया, क्योंकि इस ग़ज़वे के बाद देश के भीतर हालात पूरी तरह इस्लाम और मुसलमानों के लिए साज़गार हो चुके थे ।

1. ज़ादुल मआद 2/112, इस ग़ज़वे की विस्तृत जानकारी के लिए देखिए इब्ने हिशाम, 2/203-209, ज़ादुल मआद 2/110, 111-112, फत्हुल बारी 7/417-428

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