कर्बला के 36वें शहीद हज़रते उमय्या इब्ने सअद अल-ताई

कर्बला के 36वें शहीद हज़रते उमय्या इब्ने सअद अल-ताई

आप हजरात अमीरूल मोमिनीन के अरहावे खास में थे। आप को तावई होने का भी शरफ हासिल था। आप ने कूफ़े में सुकूनत इख़्तेयार कर रखी थी। जब आप को इल्म हुआ कि इमाम हुसेन अलै० करबला पहुँच गये हैं तो आपने कमाले उजलत के साथ अपने आपको करबला पहुँचाना ज़रूरी समझा चुनान्चे आप नवीं मोहर्रम से वारिदे करबला हो गये और यौमे आशूरा कमाले जज़्बऐ कुर्बानी के पेशे नज़र इमाम हुसैन अ० और इस्लाम पर कुर्बान हो गये।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 37वें शहीद हज़रते सअद इब्ने हनज़ला अल तमीमी

कर्बला के 37वें शहीद हज़रते सअद इब्ने हनज़ला अल तमीमी

खालिद इब्ने उमर की शहादत के बाद इब्ने हन्ज़ला तमीमी मैदाने जंग आये और मशगूले कारज़ार हो गये कातिल कितालन शदीदन, निहायत ही बे-जिगरी से ज़बरदस्त जंग की और वहुत से दुश्मनों को फना के घाट उतार कर बहरे मौत में खुद डूब गये।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 38वें शहीद हज़रते उमैर इब्ने अब्दुल्लाह अल-मदहजी

कर्बला के 38वें शहीद हज़रते उमैर इब्ने अब्दुल्लाह अल-मदहजी

जनाबे सईद इब्ने हनज़ला की शहादत के बाद जनाबे उमैर इब्ने अब्दुल्लाह अल-मदहजी मैदाने जंग में आये आपने कमाले बेजिगरी से जंग की। चारो तरफ से दुश्मनों ने आप पर हमले किये आप ने कसीर दुश्मनों को कत्ल किया बिल आखिर मुस्लिम सबानी और ‘अब्दुल्लाह जबली मलाऊन ल०’ ने आप को शहीद कर दिया।

कर्बला के 39वें शहीद हज़रते मुस्लिम बिन औसजा अल-असदी

कर्बला के 39वें शहीद हज़रते मुस्लिम बिन औसजा अल-असदी

आप का पूरा नाम व नसब ये है कि मुस्लिम इब्ने औसजा इब्ने सअलबः इब्ने दिदवीन इब्ने असद इब्ने हज़ीमिया अवू हजल असदी सअदी आप बड़े शरीफुन्नफ्स शरीफुल कौम थे इबादत और जुहद मे दर्जी-ऐ-कमाल पर फाऐज़ थे। आप को सहाबी-ए-रसूल होने का भी शरफ हासिल था। इस्लामी फुतूहात मे आप ने बड़े बड़े कारे नुमायाँ किए हैं। 24 हिजरी में फतहे आज़रबाईजान में हज़ीफा यमान के हमराह जो कारे नुमायाँ उन्होंने किया है वह तारीख़ में यादगार है।

इमाम हुसैन अ० को दावते कूफा देने वालों में आप का इस्मे गिरामी भी है। आप ने मुस्लिम इब्ने अकील की मग़बूलियत और बाद में उनके तहफ्फुज़ में कमाले खुर्मो एहतेयात का सबूत दिया। इब्ने ज़ियाद के कूफे आने के बाद जनाबे मुस्लिम इब्ने औसजा ने ही क़बाइले तमीम व हमदान कुन्दा दरबईः को साथ लेकर दारूल अमारा पर हमला किया था।

मुस्लिम इब्ने अकील और हानी इब्ने अरवाह की शहादत और शरीक इब्ने अऊर (जो पहले से अलील था) की वफात के बाद मुस्लिम इब्ने औसजा थोड़े अरसे रूपोश रहे फिर बाल-बच्चों समेत कूफ़े से पोशीदगी के साथ रवाना होकर करबला पहुँचे ।
नौ मोहरम की शाम को जब इमाम हुसैन अलै० ने खुतबे में फरमाया था कि ये लोग सिर्फ मेरा खून बहाना चाहते हैं ऐ मेरे असहाब-ओ-अइज्जा तुम अगर जाना चाहो तो यहाँ से चले जाओ। मैं तौके बैअत तुम्हारी गरदनों से हटा लेता हूँ। इस के जवाब में अईज्जा की तरफ से हजरते अब्बास और असहाब की जानिब से मुस्लिम इब्ने औसजा ने ही कहा था कि ये हो ही नहीं सकता हम अगर सारी उम्र मारे और जिलाये जायें तब भी आप ही के साथ रहे। आप की ख़िदमत में शहादत सआदते उज़मा है।

शबे आशूर जब ख़न्दक के गिर्द आँग जलाने पर शिघ्र ने ताना ज़नी की तो उस का मुँह तोड़ जवाब मुस्लिम इब्ने औसजा ने ही दिया था।

सुबहे आशूर जब लश्करे इब्ने सअद ने हमला-ए-गराँ किया था तो उस वक्त मुस्लिम इब्ने औसजा ने ऐसी तलवार चलाई और वो मारके किये कि किसी ने कभी ऐसा देखा न सुना था।

आप बड़ी बेजिगरी से लड़ रहे थे कि मुस्लिम इब्ने अब्दुल्लाह ज़ुबयानी और अब्दुल्लाह इब्ने ख़शकारः ने आप पर एक साथ हमला कर दिया मैदान गर्द से पुर था जब गर्द बैठी तो मुस्लिम इब्ने औसजा ख़ाको खून में लोटते देखे गये। इमाम हुसैन अलै० ने बढ़कर मुस्लिम की दिलजोई की और उन्हें दुआएँ दीं। आप की शहादत पर लोगों ने खुशी का इज़हार किया तो सबस इब्ने रबई ने जो अगर चे दुश्मन था बोला अफ़‌सोस तुम ऐसी शख़्सियत की शहादत पर खुशी का इज़हार कर रहे हो जिन के इस्लाम पर ऐहसानात हैं उन्होनें ने जंगे आज़रबाएजान में छः मुशरिकों को एक साथ कत्ल कर के दुश्मनों की कमर तोड़ दी थी।

आप की शहादत के बाद आप के फर्ज़न्द मैदान में आये और आप ने ज़बरदस्त नबर्द आज़माई की और आप तीस दुश्मनों को कत्ल कर के खुद भी शहीद हो गये।
📝 72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 40वें हिलाल इब्ने नाफेअ-अल-जबली

कर्बला के 40वें हिलाल इब्ने नाफेअ-अल-जबली

आप बड़े दीनदार शरीफ और बहादुर थे। आप की परवरिश हज़रत अली अलै० ने की थी। आप तीरअंदाज़ी में अपना नज़ीर न रखते थे, आप की आदत थी तीरों पर अपना नाम लिखवा लिया करते थे।

आपको आले मोहम्मद (स०) की खिदमत का बड़ा शौक था। शबे आशूर का मशहूर वाआ है कि इमाम हुसैन अलै० माका-ए-जंग देखने के लिये निकले थे, तो हिलाल ने आप को हमराही इख्तयार की थी। इमाम हुसैन अलै० ने मौकऐ जग के सिलासले में आप से मशविरा भी लिया था। आप के बारे में ओलमा ने लिखा है। “काना हाज़मन बसीरन विल सियासतः”। कि आप बहुत ही समझदार और सियासतदाँ थे। सुबह आशूर जव आप मैदाने जंग में जाने के लिये निकले तो आप की ज़ोज़ा ने मुज़ाहेमत की। आप ने कहा फर्ज़न्दे रसूल की खिदमत दुनिया व मा फोहा स बेहतर है।

मैदाने जग में पहुँचने के वाद आपने एसे हमले किये कि जिन्होंने बड़े-बड़े बहादुरो को फना के घाट उतार दिया। आप के तरकश में अस्सी तीर थे जिस से सत्तर दुश्मनों को कत्ल किया तीरों के ख़त्म हो जाने के बाद आप ने तलवार निकाली और ज़बरदस्त हमला करके तेंरह दुश्मनों को कत्ल कर दिया।

जब शिम्र ने देखा कि हिलाल काबू में नही आते तो चारो तरफ से हमला कर दिया यहाँ तक कि आपके बाजू शिकस्ता हो गये और आप गिरफ्तार करके शहीद कर दिये गये।