
कर्बला के 41वें शहीद हज़रते सईद इब्ने अब्दुल्लाह अल-हनफी
आप कूफ़े के नामी गिरामी शियों में से थे। इबादत गुज़ारी में मुमताज़ और बहादुरों में नामवर थे। माविया के मरने के बाद अहले कूफा ने जो मोतमदीन के हमराह खुतूत इरसाल किये थे उन मोतमिद लोगो में जनाबे सईद भी थे इमाम हुसैन अलै० ने आख़री ख़त का जवाब जो इरसाल फरमाया था जिस में जनाबे मुस्लिम की रवानगी का हवाला था वो इन्हीं सईद के ज़रिये से था।
मुस्लिम इब्ने अकील के पहुँचने के बाद जिन लोगो ने हिमायती खुतबे पढ़े उनमें तीसरा नम्बर सईद का था। मुस्लिम इब्ने अकील की तरफ से इमाम हुसैन अ० की ख़िदमत में यही सईद ख़त लेकर गये थे और वहा पहुँच कर फिर इस ख़्याल से वापिस नही आये कि इमाम हुसैन अलै० के हमराह कूफ़े पहुँचेगे।
सुवह आशूर आपने जंग की और ज़ोहर के वक़्त की अज़ीम जंग में आपने कारे नुमाया किये ऐन जंग में नमाज़े ज़ोहर जमात के साथ पढ़ने में आपने बड़ी दिलेरी का सबूत दिया।
हालते नमाज़ में जब दुश्मनों ने इमाम हुसैन अ० पर जब तीर बरसाने शुरू किये तो जनाबे सईद इमामे हुसैन अलै० के सामने आकर खड़े हो गये और तीरो को अपने चेहरे, अपनी गरदन, अपने सीने और अपने पहलुओ पर रोकने लगे और इमाम हुसैन अलै० तक तीर पहुँचने नही दिया और इसी तरह तीर रोकते-रोकते शहीद हो गए इमाम हुसैन अलै० आप की शहादत से बहुत मुतास्सिर हुये।
📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम





