कर्बला के 31वें शहीद हज़रते बशीर इब्ने उमर-अल-कन्दी

कर्बला के 31वें शहीद हज़रते बशीर इब्ने उमर-अल-कन्दी

आप का पूरा नाम बशीर इब्ने उमर इब्ने अहदोस अल-हज़रमी अलं-कन्दी था। आप हज़रमौत के रहने वाले थे और आप का शुमार कबीला-ऐ-कुन्दा में होता था। आप ताबई और बड़ी फ्ज़ीलतों के मालिक थे। आप का और आपके लड़को का ज़िक्र अक्सर तारीख़ी जंगों में आता है। आप करबला में इमाम हुसैन की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ थे। आप के हमराह आप के एक लड़के मोहम्मद नामी थे। सुबहे आशूर आगाज ही पर आपको इत्तेला मिली कि आप के एक लड़के उमर नामी हुकूमते रै की सरहद पर गिरफ़्तार हो गये हैं आप ने जब ये सुना तो कहा। खुदाया ! मैं अपने लड़के को तुझसे लूँगा ये मुझको गवारा नहीं हो सकता कि मैं ज़िन्दा रहूँ और मेरा लड़का गिरफ़्तार रहे।

हज़रत इमाम हुसैन अ० ने उनका ये कलाम सुन लिया फ्रमाया ऐ बशर ! मैं तुम्हे इजाज़त देता हूँ कि तुम जाकर अपने लड़के को रिहा कराओ। बशर ने जवाब दिया, “आका-ओ-मौला ! मुझे शेर और भेड़िये खा लें अगर में आपको इन दुश्मनों में छोड़कर चला जाऊँ।” हज़रत ने फ्रमाया, “अच्छा पाँच बरदे यमानी जिन की कीमत एक हज़ार अशरफी है अपने बेटे मोहम्मद को दे कर यहाँ से रवाना कर दो आपने इस के बाद पाँचों यमनी चादरे उनको अता फरमाई मुर्भरखीन का इस पर इत्तेफाक है यौमे आशूरा हमला-ए-अव्वल आप ने भी शहादत पाई।

कर्बला के 32वें शहीद हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने अरवाह अल-ग़फ़्फ़ारी

कर्बला के 32वें शहीद हज़रते अब्दुल्लाह इब्ने अरवाह अल-ग़फ़्फ़ारी

आप का शुमार कूड़े के शोरफा में था। आप निहायत शुजा और बहादुर थे। आपके दादा जनाबे हवाक असहाब अमीरूल मोमिनीन में थे और बड़ी इज़्ज़त के मालिक थे। वह जंगे जमल, सिफ्फीन और महरबान में हज़रत अली अ० के साथ हो कर लड़े थे।

अब्दुल्लाह इमाम हुसैन अलै० से आकर मिले थे। और आख़िरे हयात तक इमाम हुसैन अ० के साथ रहे आप को जब इमाम हुसैन अ० की शहादत का यकीन हो गया तो आप की ख़िदमत में हाज़िर हो कर अर्ज परवाज़ हो गए, मौला मरने की इजाज़त दीजिये ताकि हम आप के सामने कुर्बान हो कर सुर्ख-रू हो जायें और लड़ने के लिये निकलना ही चाहते थे कि जंगे मगलूबा हो गई और सब के साथ आप भी शहीद हो गये।

कर्बला के 33वें हज़रते बुरैर इब्ने हज़ीर-अल-हमदानी

कर्बला के 33वें हज़रते बुरैर इब्ने हज़ीर-अल-हमदानी

अ आप का पूरा नाम बुरैर इब्ने हज़ीर-अल-हमदानी मशरकी था। आपका कबीला हमदान की शाख बनू मशरिक की एक अज़ीम शख़्सियत थे। आप काफी उम्र रसीदा और ताबई होने के साथ आबिद-व-ज़ाहिद, कारी-ए-कुरआन बल्कि उसताद-अल-ए-कुरआ थे। आप का शुमार अमीरूल मोमिनीन के असहाब और शुराफाऐ कूफा में था। आपने कूफा से मक्का जा कर इमाम हुसैन अ० के हमराही और मईअत इख़्तेयार की थी आप ने इमाम हुसैन अलै० और उनके अहलेबैत अ०की जैसी ख़िदमत की है उस की मिसाल नज़र नहीं आती। शबे आशूर पानी की जद्दो जेहद में आप ने जो कारनामा किया है वो सफहाते तारीख में सोने के हर्फ से लिखने के काबिल है। मैं आपके शबे आशूर वाले कारनामे को अपनी किताब ‘ज़िक्र-अल-अब्बास” के सफा न० 196 से नक़्ल करता हूँ।

अहलेबैते रसूल इस्लाम अ० पर सातवीं से पानी बन्द है। सई आब की हर सबील गैर मुफीद साबित – हो चुकी है। तग-ओ-दू की गई कुऐं खोदे गये मगर पानी दस्तयाब न हो सका। आशूर की रात आ गई है प्यासों की आँखों में मौत का नक्शा नज़र आ रहा है इज़्तेराबे अहलेबैत की कोई हद नही। हज़रते सकीना बिन्तुल हुसैन अ० फ्रमाती हैं नवीं मोहरम का दिन गुज़रने 1 के बाद जब रात आई तो पानी की नायाबी ने हम लोंगो नको क्रीब-ब-हलाकत पहुँचा दिया। खुश्क बरतनों – और मश्कीज़ों की तरह हमारी ज़बान और लब खुश्क हो गये और ऐसी हालत पैदा हो गई जो बरदाश्त न हो सकी बिल आख़िर मैं और बच्चों समेत अपनी फुफी जैनब की ख़िदमत में हाज़िर हुई ताकि उन्हें अपनी हालत से आगाह करके पानी की ख़्वाहिश करूँ शायद वह कोई सबील पैदा कर सकें मैंने उन्हें अपने खेमे में पाया वह आगोशे मोहब्बत में मेरे भाई अली असगर को लिये हुई थीं और उनकी हालत ये थी कि कभी खड़ी होतीं और कभी बैठ जातीं और मेरा भाई उनकी आगोश में तड़पता था। जिस तरह छोटी मछली पानी में तड़पती है और वह तड़पते भी हैं और चिल्लाते भी और मेरी फुफी उन्हे तसल्ली देते हुऐ फरमाती हैं मेरे बरादर ज़ादे सब्र करो और साथ ही साथ ये भी फ्रमाती हैं “व अना लक-ल-सब” और तुझे सब्र क्योकर आ सकता है जब कि तेरी यह हालत है ऐ बेटा क्या करूँ इस बात से सख़्त तकलीफ है कि मैं तेरी हालत देखती हूँ और तेरा ब्यान सुनती हूँ और कुछ नही कर सकती। जनाबे सकीना फ्रमाती हैं कि जब मैंने फुफी जान का बयान सुना और अली असगर की हालत देखी तो मैं भी रोने लगी फुफी अम्मा ने पूछा कौन है “सकीना’ ? मैंने अर्ज़ की ‘हाँ फुफी जान मैं हूँ, उन्होंने ने पूछा ‘क्यों रो रही हो ? मैंने ये ख़्याल करते हुये कि मैंने अपनी प्यास का जिक्र किया तो वह और परेशान हो जायेंगी। मैंने कहा ऐ फुफी जान ! अगर आप अन्सार के अयाल के पास किसी को भेंजे तो तो शायद कुछ पानी कहीं से दस्तयाब हो जाये। यह सुनकर हज़रते जैनब स० ने मेरे भाई को आगोश में उठा लिया और खुद मेरी दीगर फुफियों के खेमे में गई लेविन कहीं पानी की सबील नज़र न आई फिर जब वह पापिस होकर बाज़ फ़र्ज़न्दाने इमाम हुसैन अ० के स्नेगें में पहुँची तो आपके साथ और बहुत से छोटे-छाते नच्चे भी हो गये और सबको ये उम्मीद हो गई श्री कि हज़रते जैनब कहीं से पानी की सबील निकाल लेगीं। गरज़ यह कि आख़िर में मेरी फुफी जैनब ने असहाब के खेमों में पानी का पता लगाया मगर मायूसी रही जब पानी मिलने से न-उम्मीदी हुई तो अपने खेमे में पलट आई। अब आप के पास तक़रीबन बीस लड़के-लड़कियाँ जमा हो गये थे जो सब के सब हद से ज़्यादा प्यासे थे।

हज़रत सकीना फ़रमाती हैं कि हम सब अतफाले हुसैनी खेमें में रो पीट रहे थे कि नागाह हमारे खेमों की तरफ बुरैर हमदानी गुज़रे उन्होने जब हमारी हालत का मुताल्लेआ किया तो बे-सख्ता रोने लगे और सर पर ख़ाक ड़ालते हुये दीगर असहाब से मिले और उन से कहा कि बड़े अफसोस की वात है कि हमारे हाथों में तलवार होने के बावजूद खानदाने रिसालत के बच्चे प्यास से मर रहे हैं। मेरे दोस्तों ! अगर हम उन्हें सेराब न कर सकें और वो प्यास से मर जायें तो इस से बेहतर है कि हम लोग मौत की आगोश में चले जायें मेरी राय ये है कि हम लोग उन बच्चों के हाथ पकड़ ले और नहर पर चलें और उन्हे सेराब करने की सई करे।

यह सुन कर यहिया माज़नी बोले मेरे ख़्याल में बच्चों का ले जाना दुरूस्त नहीं क्योंकि दुश्मन हमला करेगें अगर इस हमले में खुदा न ख़्वास्ता कोई बच्चा शहीद हो गया तो हम इस का सबब क्रार पायेगें बेहतर ये है कि मश्कीज़ा ले लें और नहर पर चल कर पानी हासिल करें पानी दस्तेयाब होने पर उन बच्चों को सेराब करें। जनाबे यहिया माज़नी की राय सब ने पसन्द की और चार असहाब मशकीज़ा लेकर है नहरे फुरात की तरफ रवाना हो गये जिन के काऐद बुरैर हमदानी थे। यह लोग फुरात के क्रीब पहुँचे ब मुहाफेज़ीने नहर ने उन की आमद महसूस की पूछा “मन हुवला-ए-अल-कौम” ये कौन लोग हैं यानी तुम कौन हो और क्यों आये हो ? क्या गरज़ है ? फ्रमाया पानी पीने और पानी ले जाने के लिये आयें है उसने अर्ज किया कि ठहरो मैं अपने सरदार से दरयाफ्त कर लूँ अगर इजाज़त मिलेगी तो पानी ले जाने का इमकान होगा वरना न-मुमकिन है। एक शख़्स मुहाज़ीने नहर के सरदार इसहाक बिन जसवः के पास गया वह जनाबे बुरैर का रिश्तेदार था और कहा, बुरैर पानी पीने और पानी क्यामे हुसैनी तक ले जाने के लिये आये हैं उसने कहा पानी पीने के लिये रास्ता दे दो जितना जी चाहें – पी लें लेकिन ले जाने की इजाज़त नहीं। इजाज़त मिली पानी में उतरे पानी की ठण्डक ने दिल पिघला दिया बुरैर ने पानी पिये बगैर अपने साथियों से कहा, मश्कीज़ा जल्दी भरो और चल खड़े हो क्यों कि फर्ज़न्दाने न रसूल के दिल प्यास से पिघले जा रहे हैं।

न बुरैर की आवाज़ एक दुश्मन ने सुन ली और व पुकार कर कहा, तुम्हें पानी पीने की इजाज़त दी गई है तुम पानी ले नहीं जा सकते। मैं फौरन इसहाक को द ब-ख़बर करता हूँ लेकिन यह भी सुन लो अगर उसने वेब-पासे क्राबत फुरात से पानी ले जाने की इजाज़त भी दे नदी तो मैं पानी न ले जाने दूगाँ।

बुरैर ने अपना लहजा कमाले सियासत की बिना पर नर्म करके उसे गिरफ़्तार करना चाहा मगर वह गिरफ्त में न आया और उसने इसहाक को ख़बर कर दी इसहाक ने हुक्म दिया कि पानी ले जाने से रोको अगर न मानें तो गिरफ़्तार कर लो। गिरफ्तार कर के मेरे पास ले आओ। वह आया उसने मश्कीजे, खाली करने का मुतालबा किया हज़रते बुरैर ने फरमाया खुदा की कसम पानी बहाने से अपना खून बहाना बेहतर समझता हूँ मैंने एक कतरा भी पानी न पिया हमारी पूरी ग़रज़ ख़यामे हुसैनी तक पानी पहुँचाना है। जब तक दम में दम है हमारे मश्कीज़ों को कोई नज़र भर कर भी नही देख सकता।

उन लोगो के इरादे मालूम करने के बाद दुश्मनों ने चारो तरफ से घेर लिया। उन हुसैनी बहादुरों ने मश्कीज़े ज़मीन पर रखे और उसके इर्द गिर्द घुटने टेक कर खड़े हो गये। तीर बारानी का हुक्म हुआ और तीर बरसने लगे एक बहादुर ने मश्कीज़ा उठा कर कन्धे पर रख लिया और चाहा कि जल्दी से निकल कर ता-ब-खयामगाह पहुँच जाऐं इतने में एक तीर कन्धे पर आकर लगा तसमा कट गया और खून जारी हो गया और कदम तक पहुँचा उसने बड़ी खुशी के साथ कहा ख़ुदा का लाख लाख शुक्र है जिसने मेरी गर्दन को मश्कीज़े के लिये सिपर बनाया यानी मेरी गर्दन छिदी तो छिदी मश्कीज़ा तो बच गया। अभी तक उन बहादुरों की तलवारें न्याम में थी। मगर हज़रते बुरैर अब समझ चुके हैं कि ये पानी रोकने में अपनी सारी कोशिश खत्म कर देगें अब तमामे हुज्जत के लिये कहा, कि देखो फर्ज़न्दाने रसूल प्यासे हैं और उन के अतफाल व औरतें भी प्यासी हैं हमे पानी ले जाने दो। उन लोगो ने जवाब दिया, हुसैन और उन के बच्चों के लिये हम ने फुरात का पानी हराम कर दिया है ये न-मुमकिन है कि तुम पानी ले जा सको। बुरैर ने कहा, देखो हमारी तलवारें अभी तक नियाम में सो रही हैं उन्हें बेदारी का मौका न दो वरना बड़ी खूँ-रेंज़ी होगी।

दुश्मन पानी रोकने में मुबालिगा कर रहे हैं और ये पानी ले जाने पर इसरार। बात बढ़ी आवाज़ बुलन्द हुई इमाम हुसैन अलै० के गोश गुज़ार हुई आप ने इरशाद फ्रमाया “अल हकवाबेही” है अब्बास कुछ लोगों को लेकर बुरैर की कुमुक में जल्द पहुँचो वह दुश्मनों में घिर गये हैं हज़रते अब्बास चन्द अस्हाब को लेकर बुरैर की मद्द को चले और उनके हमराह बाज़ मुहाफेज़ीन खेमें भी हो लिये उमर इब्ने हज्जाज ने जब देखा तो उसने लश्करियों को हुक्म दिया कि अगर चे रात है लेकिन तीर बरानी शुरू कर दो हुक्म पाते ही दुश्मन ने तीरो की बारिश शुरू कर दी। बुरैर ने बढ़ कर एक मश्कीज़ा उठा लिया और अपने साथियों से कहा कि तुम मेरे इर्द-गिर्द जमा हो जाओ ताकि तीर मश्कीज़े तक न पहुँच सके और पानी बहने से बच जाऐ। बुरैर मश्क लिये हुऐ अपने साथियों के दरमियान में और साथी इर्द-गिर्द हैं जिस कदर तीर आते हैं ये बहादुर अपने सीनों पर लेते हैं मश्कीज़े तक किसी तीर की रसाई नहीं होने देते बुरैर हमदानी के सात तीर लग चुके हैं लेकिन मश्कीज़ा अभी तक महफूज़ है। कज़ारा एक तीर बड़ी तेज़ी के साथ उड़ता हुआ आया और एक बहादुर के सीने पर लगा और लोग घबरा गये और यह समझे कि तीर मश्कीज़े पर लग गया है हज़रते बुरैर से पूछा, कि ज़रा बताओ तो सही कि ये तीर कहाँ लगा ? बुरैर ने कमाले अकीदत से जवाब दिया कि मश्कीज़ा बच गया। अल्हमदो-लिल्लाह ! यह तीर मेरी गर्दन पर लगा है अल-गरज़ कुमुक पहुँच गई दुश्मनों के दिल छूट गये। ये हज़रात दुश्मनों को हटा कर बुरैर वगैरह को हमराह ले आये।

हज़रत बुरैर मश्कीज़ा लिये हुऐ खेमे के करीब पहुँचे और पुकार कर कहा ऐ रसूले अकरम के छोटे-छोटे बच्चों आओ पानी आ गया ब-खुशी पियो। बच्चों मे शोर मच गया एक दूसरे को पुकारने लगे आओ ! बुरैर पानी लायें हैं तमाम बच्चे दौड़ पड़े और उन्होंने अपने को मश्कीज़े पर गिरा दिया मश्कीज़े को कोई आँखों से कोई रूखसार से कोई पहलू से लगाने लगा मश्कीज़े पर दबाव पड़ा और इस का दहाना-ऐ-बन्द उलट गया और सारे का सारा पानी बच्चों के सामने ज़मीन पर बह गया बच्चे एक दूसरे का मुहँ तकने लगे और सब ने मिलकर आवाज़ दी बुरैर ! पानी बह गया।

बुरैर इस आवाज़ को सुनते ही मुहँ पीटने लगे और बड़ी मायूसी और ज़बरदस्त अफ़सोस के साथ रो-कर कहा, हाए किस अर्क रेज़ी से पानी दस्तेयाब हुआ था मगर अफ़सोस पैग़म्बरे इस्लाम की औलादें सेराब न हो सकीं।

गरज़ यह कि पानी ज़मीन पर बह गया और छोटे-छोटे बच्चे कमाले तश्नगी की वजह से उस तर ज़मीन पर गिरने लगे हज़रते अब्बास ने उस हथ आफ्रीन वाक्ये को अपनी नज़रो से देखा और बेताब होकर निहायत मायूसी के आलम में कफे अफ़सोस मलने लगे। (माएतीन सफा 316-323)।

शबे आशूर के बाद सुबह आशूर आपने ज़बरदस्त नबर्द आज़माई की बुढ़ापे के बावजूद आप ने ऐसी जंग की कि दुश्मनों के दाँत खट्टे हो गये। आप जिस पर भी हमला करते थे उसे फना के घाट उतार देते थे सब से पहले आप से जिसने मुकाबला किया वह यज़ीद इब्ने मअक्ल था आपने उसे चन्द वारों में फना कर दिया इसी तरह आपने तीस दुश्मनों को फना के घाट उतार दिया आख़िर में रज़ी इब्ने मनकूज़ सामने आया आप ने उसे ज़मीन पर दे मारा आर उस के सीने पर सवार हो गये इतने में कअब इब्ने अज़वी ने आप की पुश्ते मुबारक पर तीर का गहरा वार किया आप ने गुस्से में आकर रजी जिसके सीने पर सवार थे उस की दॉतो से नाक काट ली। कअब का नैजा जनाबे बुरैर की पुश्त मै रह गया इस के बाद कअब ने नजा और तलवार से कई वार करकै जनाब बुरर को सख्त जख्मी कर दिया और बिल आखिर आप को वहीर इब्ने औरा-अल-जबी ने शहीद कर डाला। शहादत के वक़्त आप ने हज़रते इमामे हुसैन अलै० को आवाज़ दी और आप उनकी लाश पर पहुँचे और आप ने निहायत दर्द भरे लहजे में फरमाया “अन कुरेर मिन अबादिल्लाह-हिस्सालेहीन” हाय बुरैर हमसे जुदा हो गये जो खुदा के बेहतरीन बन्दों में से एक थे।

📝72 तारे, अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 34वें शहीद हज़रते वहब इब्ने अब्दुल्लाह-अल-क़लबी

कर्बला के 34वें शहीद हज़रते वहब इब्ने अब्दुल्लाह-अल-क़लबी

आप का नाम वहब इब्ने अब्दुल्लाह इब्ने हवाब कलबी था। आप बनी क़ल्ब के एक फर्द थे। हुस्नो जमाल में नज़ीर न रखते थे। आप खुश किरदार और खुश अतवार भी थे और आप ने करबला के मैदान में दिलेरी के साथ दरजऐ शहादत हासिल किया है। हम आप के वाक्याते शहादत को किताब के ज़रिये ज़िक्र-अल-अब्बास से नक़्ल करते हैं।

करबला की हौलनाक जंग में हुसैनी बहादुर निहायत दिलेरी से जान दे दे कर शरफे शहादत हासिल कर रहे थे। यहाँ तक कि जनाबे वहब बिन अब्दुल्लाह अल-कलबी की बारी आई। यह हुसैनी बहादुर पहले नसरानी था और अपनी बीवी और वालिद समैत इमाम हुसैन अलै० के हाथों पर मुसलमान हुआ था। आज जब कि यह इमाम हुसैन अ० पर फिदा होने के लिये आमादा हो रहे हैं उनकी वालेदा हमराह हैं। माँ ने दिल बढ़ाने के लिये वहब से कहा, बेटा आज फर्ज़न्दाने रसूल पर कुरबान हो कर रूहे रसूल मक़बूल स० को खुश कर दो। बहादुर बेटे ने कहा, मादरे गिरामी आप घबरायें नहीं इन्शाअल्लाह पैसा ही होगा।

अल-गरज़ आप इमाम हुसैन अलै० से रूख़सत होके रवाना हुऐ और रजज़ पढ़ते हुऐ दुश्मनों पर हमालावर हुऐ आप ने कमाले जोश व शुजाअत में जमाअत की जमाअत को कत्ल कर डाला इस के बाद अपनी माँ “क़मरी” और बीवी की तरफ वापिस आये। माँ से पूछा मादरे गिरामी आप खुश हो गईं माँ ने जवाब दिया मैं उस वक़्त तक खुश न होऊगीं जब तक फर्ज़न्दाने रसूल के सामने तुम्हें ख़ाको खून में गल्ताँ न देखूँ। ये सुन कर बीवी ने कहा, ऐ वहब मुझे अपने बारे में क्यों सताते हो और अब क्या करना चाहते हो ? माँ पुंकारी “या बनी ल तकबिल कौलहा” बेटा बीवी की मोहब्बत में न आ जाना खुदारा जल्द यहाँ से रूख़्सत होकर फर्ज़न्दे रसूल पर अपनी जान कुर्बान कर दो वहब ने जवाब दिया मादरे गिरामी ऐसा ही होगा। मैं मौके की नज़ाकत को जानता और पहचानता हूँ। मुझे इमाम हुसैन का इज़्तेराब और हज़रते अब्बास जैसे बहादुर की परेशानी दिखाई दे रही है भला क्योंकर मुम्किन है कि मैं ऐसी हालत में में ज़रा भी कोताही करूँ। इस के बाद जनाबे वहब मैदाने जंग की तरफ वापिस चले गये और कुछ अशआर पढते हुऐ हमलावर हरे यहाँ तक कि आपने अनीस 19 ब-कौले 12 सवार और 12 प्यादे क़त्ल किये इसी दौरान में आप के दो हाथ कट गये। उनकी ये हालत देखकर उनकी बीवी को जोश आ गया और वह एक चोबे खेमा लेकर मैदान की तरफ दौड़ीं और अपने शौहर को पुकार कर कहा खुदा तेरी मदद करे। हाँ फर्ज़न्दे रसूल के लिऐ जाँ दे दे और सुन इसके लिये मैं अब भी आमादा हूँ। यह देख कर वहब अपनी बीवी की तरफ इसलिये फौरन आये कि उन्हें खेमे तक पहुँचा दें उस मुखद्दरः ने उन – का दामन थाम लिया और कहा मैं तेरे साथ मौत की – आगोश में सोऊँगी। फिर इमाम हुसैन अलै० ने उसे हुक्म दिया कि वह खेमों में वापिस चली जाए। चुनांचे वह – वापिस चली गई उसके बाद वहब मशगूले कारज़ार हो गये। और काफी देर तक नबर्दआज़माई के बाद दरजा-ऐ-शहादत पर फाऐज़ हुऐ वहब के ज़मीन पर गिरते ही उनकी बीवी ने दौड़ कर उन का सर अपनी आगोश में उठा लिया उन के चेहरे से गर्दा गुबार और सर व आँख से खून साफ करने लगीं इतने में शिर्मे लई के हुक्म से उसके गुलाम रूस्तम लई ने उस मोमिना के सर पर गुर्जे आहनी मारा और यह बेचारी भी शहीद हो गई। मोअर्ररखीन का कहना है कि “वही अब्बल अमरात कत्लतः फी असकर-अल-हुसैन” यह पहली औरत है जो लश्करे हुसैन में कत्ल की गई। एक रिवायत में है जब वहब ज़मीन प्र गिरे तो उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया। यानि उनकी लाश पर कब्ज़ा करके सर काट लिया गया। उसके बाद उस सर को खेमा-ऐ-हुसैनी की तरफ फेंक दिया और माँ ने उस सर को उठा लिया बोसे दिये और दुश्मन ने की तरफ फेंक कर कहा, हम जो चीज़ राहे मौला मे देते हैं उसे वापिस नहीं लेते। कहते हैं कि वहब का फेंका हुआ सर एक दुश्मन के लगा और वह हलाक हो गया।

फिर माँ चोबे खेमा लेकर निकली और दुश्मनों को कत्ल कर के ब-हुक्मे इमाम हुसैन खेमे में वापिस चली गई। दमा सकेबा सफा 331 तारिखे कामिल तुफाने बुका शोला 13 तबा ईरान 1314 हिजरी।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम

कर्बला के 35वें शहीद हज़रते अदहम इब्ने अमीतुल अब्दी

कर्बला के 35वें शहीद हज़रते अदहम इब्ने अमीतुल अब्दी

आप बसरा के रहने वाले थे। आपने कूफ़े में सुकूनत इख़्तेयार कर ली थी आप निहायत मोतमिद किस्म के शिया थे। मारिया कृबतीया के मकान में जहाँ शिया जमा हुआ करते थे और बाहमी मशविरे हुआ करते थे। वहाँ यह भी पाबन्दी से जाते और मशवरे से लोंगो को आगाह करते थे। एक दिन यज़ीद बिन सबीत ने कहा कि मैं अनक्रीब इमाम हुसैन की इमदाद के लिये मक्का-ऐ-मोअज्ज़मा जाऊँगा यह सुन कर आप ने भी इज़हारे ख़्याल किया और कहा, बेशक जाना चाहिये, और सुनो ! मैं भी तुम्हारे हमराह चलूँगा चुनान्चे यह हज़रात कूफ़े से रवाना होकर मक्का-ऐ-मोअज़्ज़मा पहुँचे और इमाम हुसैन अ० के हमराह ही करबला आये। उन्होने कमाले दिलेरी से यौमे आशूरा जाने अज़ीज़ इमाम हुसैन अ० पर कुर्बान कर दी।

📝72 तारे अल्लामा नजमुल हसन करारवी सा0 मरहूम