





*शहादत-ए-इमाम हुसैन के बाद का मंज़र*😭😭😭
*जब नबी-ए-अकरम के नवासे। जिगरगोशा-ए-बतूल*,
*सय्यदुश्शुहदा हजरत इमाम हुसैन ने राह-ए-हक़ में अपनी जान क़ुर्बान कर दी, तो करबला की तपती हुई रेत पर एक ऐसा सन्नाटा तारी हो गया, जिसे अल्फ़ाज़ में बयान करना आसान नहीं*
*जिस मैदान में कुछ लम्हे पहले तक “अल्लाहु अकबर” की सदाएँ और तलवारों की झंकार गूँज रही थीं, अब वहीं रसूलअल्लाह के नवासे का ख़ून-ए-मुबारक रेत को सुर्ख़ कर चुका था। आसमान ग़मज़दा था, ज़मीन मातमज़दा थी और फ़िज़ा पर एक अजीब कैफ़ियत तारी थी*
*रिवायतों के मुताबिक़, इमाम हुसैन की शहादत के बाद फ़ौज-ए-यज़ीद के कुछ अफ़राद ने आपका सर-ए-अनवर तन-ए-मुबारक से जुदा किया। इसके बाद मैदान-ए-करबला में मौजूद दूसरे शहीदान-ए-वफ़ा के सर भी उनके जिस्मों से अलग किए गए ताकि उन्हें Kufa के हाकिम इब्न ज़ियाद और फिर दमिश्क में “यज़ीद लानती” के दरबार में पेश किया जा सके*
*इसके बाद इब्न सअद के लश्कर ने अहले-बैत के ख़ैमों का रुख़ किया। अब वहाँ कोई जंग करने वाला न था। सिर्फ़ घराना ए रसूल की बेटियाँ, बेटियों की बेटियाँ, मासूम बच्चे और बीमारी की वजह से बिस्तर पर पड़े ज़ैनुल आबेदीन मौजूद थे*।
*रिवायतों में आता है कि ख़ैमों में दाख़िल होकर सामान लूट लिया गया। औरतों की चादरें, गहने, बर्तन, यहाँ तक कि बच्चों का मामूली सामान भी नहीं छोड़ा गया। कई तारीखी स्रोतों में यह भी दर्ज है कि ख़ैमों में आग लगा दी गई, जिससे मासूम बच्चे और पर्दानशीन ख़वातीन जलते हुए ख़ैमों से इधर-उधर भागने पर मजबूर हो गईं*
*उस वक़्त बीबी ज़ैनब (सलामुल्लाही अलैहा) एक तरफ़ जलते हुए ख़ैमों से बच्चों को बचा रही थीं, दूसरी तरफ़ बीमार भाई की अमानत ज़ैनुल आबिदीन की हिफ़ाज़त कर रही थीं। हर तरफ़ अफ़रा-तफ़री, चीख़ें और ग़म का समंदर था*
*जब आफ़्ताब ग़ुरूब हुआ तो करबला पर ऐसी शाम उतरी जिसे तारीख़ ने “शाम-ए-ग़रीबाँ” के नाम से याद रखा। एक तरफ़ रेत पर पड़े शहीदों के बे-कफ़न जिस्म, दूसरी तरफ़ जले हुए ख़ैमे, सहमे हुए यतीम बच्चे और ग़म से निढाल अहले-बैत। यही वह रात थी जहाँ से अहले-बैत की क़ैद, मुसीबत और सब्र का नया सफ़र शुरू हुआ*।
*(रेफ़रेंस)*
*~Tarikh al-Tabari*
*~Al-Bidaya wa al-Nihaya*
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