Imam Muhammad al-Baqir की मुकम्मल ज़िंदगी

Imam Muhammad al-Baqir की मुकम्मल ज़िंदगी

नाम, नसब और लक़ब

पूरा नाम: मुहम्मद बिन अली बिन हुसैन बिन अली बिन अबी तालिबؑ
आप पाँचवें इमाम हैं।

वालिद: Imam Ali Zayn al-Abidin

वालिदा: फ़ातिमा बिन्ते इमाम हसनؑ

दादा: Imam Husayn ibn Ali

नाना: Imam Hasan ibn Ali


इस तरह आप इमाम हसनؑ और इमाम हुसैनؑ दोनों की नस्ल से थे।

“बाक़िर” क्यों कहा गया?

“बाक़िर” का मतलब है:
इल्म को चीरकर उसके राज़ खोल देने वाला।

रसूलुल्लाह ﷺ ने आपके बारे में पहले ही खबर दी थी। मशहूर रिवायत के मुताबिक सहाबी Jabir ibn Abd Allah को नबी ﷺ ने फरमाया था कि तुम मेरी औलाद में एक बच्चे से मिलोगे जिसका नाम मुहम्मद होगा, वह इल्म को खूब खोलेगा; उसे मेरा सलाम कहना।




पैदाइश

आपकी विलादत:

1 रजब 57 हिजरी (कुछ रिवायतों में 3 सफर)

जगह: Medina


आपका बचपन इबादत, इल्म और अहलेबैतؑ के नूरानी माहौल में गुज़रा।




वाक़े-ए-कर्बला में मौजूदगी

जब वाक़े-ए-Battle of Karbala हुआ तब आपकी उम्र लगभग 3–4 साल थी। आप कर्बला में मौजूद थे और अहलेबैतؑ पर हुए ज़ुल्म अपनी आँखों से देखे।

आपने:

इमाम हुसैनؑ की शहादत के बाद का मंजर देखा

ख़ेमों को जलाया जाना देखा

कैद-ओ-बंदी का सफर देखा

Kufa और Damascus के दरबारों का दौर देखा


यह तमाम मंज़रात आपकी शख्सियत पर गहरा असर छोड़ गए।




इमामत

वालिद Imam Ali Zayn al-Abidin की शहादत के बाद 95 हिजरी में आप इमाम बने।

आपकी इमामत लगभग 19 साल रही।

यह दौर:

बनी उमय्या की सियासी कमज़ोरी

अंदरूनी बगावतों

इल्मी बहसों

फ़िक़्ही इख़्तिलाफ़ात


का दौर था। आपने इसी माहौल में इल्म-ए-अहलेबैतؑ को फैलाया।




इल्म और दीन की ख़िदमत

इमाम बाक़िरؑ को इस्लामी उलूम का बहुत बड़ा मुजद्दिद माना जाता है। आपने:

तफ़्सीर

फ़िक़्ह

हदीस

अख़लाक़

तौहीद

इमामत


पर गहरी तालीम दी।

कई बड़े उलमा और मुहद्दिसीन ने आपसे इल्म हासिल किया।

मशहूर शागिर्द

Jabir ibn Yazid al-Jufi

Zurarah ibn Ayan

Muhammad ibn Muslim


आपके फरज़ंद Ja’far al-Sadiq ने भी आपसे इल्म हासिल किया और आगे चलकर बहुत बड़ा इल्मी स्कूल कायम किया।




आपकी सीरत और अख़लाक़

1. इबादत

आप बहुत बड़े आबिद थे। रातों को लंबी नमाज़ें पढ़ते और अल्लाह से गिरया करते।

2. सब्र

कर्बला के बाद के हालात में आपने सब्र और हिकमत से दीन को बचाया।

3. इल्म

लोग दूर-दूर से मसाइल पूछने आते थे।

4. फ़क़ीरों से मोहब्बत

ग़रीबों की मदद करते, छुपकर सदक़ा देते।




हुक्मरानों के साथ रवैया

उस दौर के उमय्यद हुक्मरानों में:

Abd al-Malik ibn Marwan

Al-Walid I

Hisham ibn Abd al-Malik


जैसे लोग शामिल थे।

हिशाम बिन अब्दुल मलिक खास तौर पर अहलेबैतؑ से दुश्मनी रखता था। उसने इमाम बाक़िरؑ को परेशान किया, मगर आपकी इल्मी हैसियत इतनी बुलंद थी कि दुश्मन भी असर लिए बिना न रह सके।

मशहूर अक़वाल

इल्म के बारे में

> “इल्म हासिल करो, क्योंकि इल्म सीखना नेक़ी है।”



अख़लाक़ के बारे में

> “सबसे कामिल इंसान वह है जिसका अख़लाक़ सबसे बेहतर हो।”



ज़ुल्म के बारे में

> “ज़ालिम की मदद करना ज़ुल्म में शरीक होना है।”



शहादत

आपको ज़हर दिया गया। मशहूर कौल के मुताबिक:

7 ज़िलहिज्जा 114 हिजरी

उम्र: लगभग 57 साल


आपकी शहादत Hisham ibn Abd al-Malik के दौर में हुई।

मज़ार: Jannat al-Baqi

जहाँ दूसरे कई अहलेबैतؑ भी दफ़्न हैं।


आपकी विरासत

Imam Muhammad al-Baqir ने:

इस्लामी इल्म को दोबारा ज़िंदा किया

अहलेबैतؑ की तालीमात को महफ़ूज़ किया

फ़िक़्ह-ए-जाफ़रिया की बुनियाद मज़बूत की

आने वाली नस्लों को इल्म और अख़लाक़ का रास्ता दिखाया


आपकी ज़िंदगी सब्र, इल्म, इबादत और हिकमत का बेहतरीन नमूना है।

Imam Muhammad al-Baqir (a.s.) was 3 years old when he stood on the plains of Karbala and watched his grandfather Imam al-Husayn (a.s.) be martyred along with most of his male relatives.

He survived extreme thirst, hunger and brutal imprisonment of Yazid. He grew up under regimes that surveilled him, restricted him, and did everything in their power to limit his influence.

He outlasted all of them.

By the time of his martyrdom at 57, he had revived Islamic jurisprudence, preserved thousands of hadith, opened up Quranic tafsir as a living science, and produced over 460 scholars who spread his teachings across Kufa, Basra, Mecca and Syria.

He was the only Imam descended from both Imam al-Hasan and Imam al-Husayn (a.s.). He was likely the first to systematically teach and establish Shia beliefs as an intellectual tradition.

Poisoned in 114 AH on the orders of the Umayyad caliph Hisham ibn Abd al-Malik, yet his knowledge was already everywhere. Unstoppable.

Saying of Imam al Baqir (a) are medicine for the the heart.  He says,

“Do not look at how small a sin is, look at Whom you have disobeyed.”

and,

“Whoever angers you, do not let him also take your reason from you.”

Keeping us grounded in logic, accountability, and self control. May Allah give us tofeeq to gain his marifah and benefit from it in this world and the next.

Join me in sending durood o salam to him as we commemorated his martyrdom anniversary yesterday on 7th Dhul al Hajjah.

Awliyā loves to meet Allah

“Indeed, the friends (awliyā’) of Allah — there shall be no fear upon them, nor shall they grieve.
Those who believed and were mindful of Allah.
For them are glad tidings in the life of this world and in the Hereafter. There is no changing the words of Allah. That is the supreme success.”
— Qur’an 10:62–64

Different Visions One Creator.

■ Different Visions One Creator.

Every eye was designed for a different world,
a different purpose, and a different way of perceiving creation.

The eagle sees from miles away.
The cat sees in the darkness.
The mantis shrimp perceives colors beyond human imagination.

And yet the human eye was given something greater than sight alone: the ability to reflect, contemplate, and recognize the signs of Allāh.

The Qur’ān does not merely call us to look
it calls us to see.

“Vision cannot encompass Him, but He encompasses all vision.” (Qur’ān 6:103)

Behind every pupil is a hidden testimony of Divine Wisdom.

Different forms… one Creator.
Different visions… one Lord.

SubhanAllāh the One who fashioned every eye also fashioned every reality those eyes behold.

“And on the earth are signs for those of certainty, and within yourselves, will you not then see?” Qur’ān (51:20–21)

And Almighty Allāh knows best.

Picture credit: Omer Can Kul

अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट  2 पार्ट 77

कुरैश के दूत

इसके बाद हुलैस बिन अलक़मा नामी बनू कनाना के एक आदमी ने कहा, मुझे इनके पास जाने दो।

लोगों ने कहा, जाओ, जब वह आया, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सहाबा से फ़रमाया, यह फ़्लां आदमी है। यह ऐसी क़ौम से ताल्लुक रखता है, जो कुरबानी के जानवरों का बहुत आदर करती है। इसलिए जानवरों को खड़ा कर दो।

सहाबा ने जानवरों को खड़ा कर दिया और खुद भी लब्बैक पुकारते हुए उसका स्वागत किया।

उस व्यक्ति ने यह स्थिति देखी, तो कहा, सुबहानल्लाह ! इन लोगों को बैतुल्लाह से रोकना कदापि मुनासिब नहीं और वहीं से अपने साथियों के पास वापस पलट गया और बोला, मैंने कुरबानी के जानवर देखे हैं, जिनके गलों में क़लादे (बन्धन) हैं और जिनकी कोहानें चिरी हुई हैं। इसलिए मैं मुनासिब नहीं समझता कि उन्हें बैतुल्लाह से रोका जाए। इस पर कुरैश और उस व्यक्ति में कुछ ऐसी बातें हुईं कि वह ताव में आ गया।

इस मौक़े पर उर्व: बिन मसऊद सक़फ़ी ने हस्तक्षेप किया और बोला, उस व्यक्ति (मुहम्मद सल्ल०) ने तुम्हारे सामने एक अच्छा प्रस्ताव रखा है, इसलिए उसे कुबूल कर लो और मुझे उनके पास जाने दो ।

लोगों ने कहा, जाओ ।

चुनांचे वह आपके पास हाज़िर हुआ और बातें शुरू कीं। नबी सल्ल० ने उससे भी वही बात कही जो बुदैल से कही थी ।

इस पर उर्व: ने कहा, ऐ मुहम्मद ! यह बताइए कि अगर आपने किसी क़ौम का सफ़ाया भी कर दिया तो क्या अपने आपसे पहले किसी अरब के बारे में सुना है कि उसने अपनी क़ौम का सफ़ाया कर दिया हो और अगर दूसरी, स्थिति हुई, तो ख़ुदा की क़सम ! मैं ऐसे चेहरे और ऐसे गुंडे लोगों को देख रहा हूं जो इसी क़ाबिल हैं कि आपको छोड़कर भाग जाएं ।

इस पर हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने कहा, लात के गुप्तांग का लटकता हुआ चमड़ा चूस । हम हुजूर सल्ल० को छोड़कर भागेंगे ?

उर्व: ने कहा, यह कौन है ?

लोगों ने कहा, अबूबक्र हैं ।

इस पर हज़रत अबूबक्र रज़ि० को सम्बोधित करके कहा, देखो, उस ज्ञात की क़सम ! जिसके हाथ में मेरी जान है, अगर ऐसी बात न होती कि तुमने मुझ पर एक एहसान किया था और मैंने उसका बदला नहीं दिया है, तो मैं यक़ीनन तुम्हारी इस बात का जवाब देता ।

इसके बाद उर्व: फिर नबी सल्ल० से बातें करने लगा। वह जब बातें करता, तो आपकी दाढ़ी पकड़ लेता। मुग़ीरह बिन शोबा रज़ि० नबी सल्ल० के पास ही खड़े थे, हाथ में तलवार थी और सर पर खूद ।

उर्व: जब नबी सल्ल० की दाढ़ी पर हाथ बढ़ाता तो वह तलवार के मुठ से उसके हाथ पर मारते और कहते कि अपना हाथ नबी सल्ल० की दाढ़ी से परे रख । आखिर उर्व: ने अपना सर उठाया और बोला, यह कौन है ?

लोगों ने कहा, मुग़ीरह बिन शोबा हैं। इस पर उसने कहा, ओ बद- अह्द ! क्या मैं तेरी बद-अहदी के सिलसिले में दौड़-धूप नहीं कर रहा हूं ?

घटना इस तरह घटी थी कि अज्ञानता-काल में हज़रत मुग़ीरह कुछ लोगों के साथ थे, फिर उन्हें क़त्ल करके उनका माल ले भागे थे और आकर मुसलमान हो गए थे। इस पर नबी सल्ल० ने फ़रमाया था कि मैं इस्लाम तो कुबूल कर लेता हूं, • लेकिन माल से मेरा कोई ताल्लुक़ नहीं। (इस मामले में उर्व: के दौड़-धूप की वजह यह थी कि हज़रत मुग़ीरह रज़ि० उसके भतीजे थे।

इसके बाद उर्व: नबी सल्ल० के साथ सहाबा किराम के गहरे ताल्लुक़ और

उनकी श्रद्धा को देखने लगे। फिर अपने साथियों के पास वापस आया और बोला, ऐ क़ौम ! ख़ुदा की क़सम ! मैं कैंसर व किसरा और नजाशी जैसे बादशाहों के पास जा चुका हूं। ख़ुदा की कसम ! मैंने किसी बादशाह को नहीं देखा कि उसके साथी उसका इतना आदर करते हों, जितनी मुहम्मद के साथी मुहम्मद का आदर करते हैं। ख़ुदा की क़सम ! वह खंखार भी थूकते थे तो किसी न किसी आदमी के हाथ पर पड़ता था और वह व्यक्ति उसे अपने चेहरे और जिस्म पर मल लेता था और जब वह कोई हुक्म देते थे तो उसे पूरा करने के लिए सब दौड़ पड़ते थे और जब वुज़ू करते थे तो मालूम होता था कि उनके वुज़ू के पानी के लिए लोग लड़ पड़ेंगे? और जब कोई बात बोलते थे, तो सब अपनी आवाजें पस्त कर लेते थे और अति आदर की वजह से उन्हें भरपूर नज़र से न देखते थे और उन्होंने तुम पर एक अच्छा प्रस्ताव पेश किया है, इसलिए उसे मान लो ।
वही है जिसने उनके हाथ तुमसे रोके

जब कुरैश के जोशीले और लड़ने-भिड़ने वाले नवजवानों ने देखा कि उनके बड़े लोग समझौता करना चाहते हैं, तो उन्होंने समझौते में रुकावट डालने का प्रोग्राम बनाया और यह तै किया कि रात में यहां से निकलकर चुपके से मुसलमानों के कैम्प में घुस जाएं और ऐसा हंगामा मचाएं कि लड़ाई की आग भड़क उठे

फिर उन्होंने इस प्रोग्राम को लागू करने के लिए अमली क़दम भी उठया । चुनांचे रात के अंधेरे में सत्तर या अस्सी नवजवानों ने जबले तनअम से उतरकर मुसलमानों के कैम्प में चुपके से घुसने की कोशिश की, लेकिन इस्लामी पहरेदारों के कमांडर मुहम्मद बिन मरलमा ने इन सबको गिरफ़्तार कर लिया, फिर नबी सल्ल० ने समझौते के लिए इन सबको माफ़ करते हुए आज़ाद कर दिया। इसी के बारे में अल्लाह का यह इर्शाद आया—-

‘वही है, जिसने बले मक्का में उनके हाथ तुमसे रोके और तुम्हारे हाथ उनसे रोके, इसके बाद कि तुमको उन पर क़ाबू दे चुका था।’ दे (48:24)

हज़रत उस्मान रज़ि० दूत बनाकर भेजे गए

अब अल्लाह के रसूल सल्ल० ने सोचा कि एक दूत रवाना फ़रमाएं, जो कुरैश के सामने सविस्तार आपके ताज़ा सफ़र के उद्देश्य को स्पष्ट कर दे। इस काम के लिए आपने हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ि० को बुलाया, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए विवशता दिखाई कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अगर मुझे

कष्ट दिया गया तो मक्का में बनी काब का एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं जो मेरे समर्थन में बिगड़ सकता हो। आप हज़रत उस्मान बिन अफ़्फ़ान को भेज दें। उनका कुंबा-क़बीला मक्का में ही है। वह आपका पैग़ाम अच्छी तरह पहुंचा देंगे ।

आपने हज़रत उस्मान रजि० को बुलाया और कुरैश के पास रवानगी का हुक्म देते हुए फ़रमाया, इन्हें बतला दो कि हम लड़ने नहीं आए हैं, उमरा करने आए हैं। इन्हें इस्लाम की दावत भी दो। आपने हज़रत उस्मान को यह हुक्म भी दिया कि वह मक्का में ईमान वाले मर्दों और औरतों के पास जाकर उन्हें विजय की शुभ-सूचना सुना दें और यह बतला दें कि अल्लाह अब अपने दीन को मक्का में जाहिर व ग़ालिब करने वाला है, यहां तक कि ईमान की वजह से किसी को यहां छिपे रहने की ज़रूरत न होगी।

हज़रत उस्मान रज़ि० आपका पैग़ाम लेकर रवाना हुए। बलदह नामी जगह पर क़ुरैश के पास से गुज़रे, तो उन्होंने पूछा, कहां का इरादा है ?

फ़रमाया, मुझे अल्लाह के रसूल सल्ल० ने यह और यह पैग़ाम देकर भेजा है। हज़रत उस्मान रज़ि० की शहादत की अफ़वाह और बैअते रिज़वान

क़ुरैश ने कहा, हमने आपकी बात सुन ली। आप अपने काम पर जाइए। इधर सईद बिन आस ने उठकर हज़रत उस्मान को धन्यवाद दिया और अपने घोड़े पर ज़ीन कसकर आपको सवार किया और साथ बिठाकर अपनी पनाह में मक्का ले गया। वहां जाकर हज़रत उस्मान रज़ि० कुरैश के सरदारों को अल्लाह के रसूल सल्ल० का सन्देश सुनाया। इससे छूटे तो कुरैश ने कहा कि आप बैतुल्लाह का तवाफ़ कर लें, मगर आपने इसे ठुकरा दिया और यह गवारा न किया कि अल्लाह के रसूल सल्ल० के तवाफ़ करने से पहले खुद तवाफ़ कर लें ।