Month: October 2023
Zikr e Huzoor Ghous-e-Azam (R.A) Ke Fazail wa Karamat
The Miracles of the Nabi Pakﷺ – part 23

An army which walks on the water:
Imâm al-Baihaqâ related on the authority of alA’mash who said: “We reached The Tigris river (at the battle of al-Madâ’in) and the Persians were on the opposite bank of the river. A Muslim man said: “In the name of Allâh”, and he entered the water with his horse, which started to run over the water. The rest of the army then said: “In the name of Allâh” and broke into the water like him, and here they were all running (with their horses) and walking over the water. The Persians then looked at them and said: “Crazy people! Crazy people!” and they fled. The Muslims then started to see if they had missed anything, and it was only a cup, which had been hung by the saddle of one of the warriors. Then they started to divide the war booty (which the enemy had left behind) between themselves.
Miracles related to the cure of disease:
The Prophet cures the boy who is suffering from epilepsy (due to being touched by the Shaitân):
Imâm Ahmad narrated on the authority of Ya’lî Ibn Murrah who said: “A woman came to the Prophet with a son of hers who was suffering from epilepsy (due to being touched by the Shaitân). The Messenger of Allâh said to him: “Get out you – enemy of Allâh- I am the Messenger of Allâh “. Thereupon the boy was cured, and the woman gave the Messenger of Allâh two sheep, some cheese and some butter as a present. The Prophet took the cheese and the butter, and one of the two sheep, and gave her the other “
मिश्कत ए हक़्क़ानिया जीवनी वारिस पाक-45

बाबू वारिस अली खाँ साहब महान रईस जगदीशपुर की शिष्यता की घटना
इस प्रकार ये घटना भी लोक-परलोक और लोकान्तर से सम्बन्धित है। श्री बाबू वारिस अली ब्यान करते हैं कि अपनी शिष्यत्व से एक वर्ष पूर्व मैंने सरकार वारिस पाक को स्वप्न में देखा। आपने दो चित्र प्रदान किया। एक मिस्टर आरनाल्ड प्रोफेसर विश्वविद्यालय, अलीगढ़ और दूसरा चित्र अल्लामा (महान पंडित) शिब्ली नोमानी का था। इसके पूर्व कभी हमने इन लोगों को नहीं देखा था। एक वर्ष पश्चात् मैं देवा शरीफ पहुंचा। स्वप्न में जो रूप सरकार वारिस पाक का देखा था और जिस रूप में बैठा हुआ पाया था ठीक उसी रूप में बैठा हुआ पाया। कोई अन्तर नहीं था। स्वप्न के पांच वर्ष पश्चात् अल्लामा शिब्ली रह० को देखा । देखते ही स्वप्न चित्र द्वारा पहचान लिया और चौदह वर्ष पर इंग्लैण्ड में मिस्टर आरनाल्ड से भेंट हुई और मैंने देखते ही पूर्व परिचित सा जान लिया।
मौलवी मुहम्मद सरफराज वारसी की शिष्य होने की घटना
मौलवी मुहम्मद सरफराज खाँ साहब निवासी शिकोहाबाद पूर्व मैनेजर दरगाह अजमेर शरीफ के पिता अकबर खाँ की मृत्यु के पश्चात् इनकी आयु ग्यारह वर्ष थी। इनके चाचा सूबेदार वजीर खां ने इनके पालन पोषण का भार ग्रहण किया। उक्त मौलवी साहब एक ऐतिहासिक परिवार के स्मृति चिन्ह हैं जो खालिद बिन वलीद की औलाद में हैं। इनका परिवार आदरणीय और सम्मानित था। अपने शिष्य होने की घटना वह स्वयं लिखते हैं जो निम्नानुसार है :
मेरे आदरणीय पिता अबकर खाँ साहब घर पर रहकर गृहस्थी संभालते थे और मेरे चाचा महोदय छावनी पूना में सूबेदार थे। चाचा महोदय एक सदा सोहाग नाम सन्त के चेले थे किन्तु उनके चेला बनने का रहस्य किसी को ज्ञात नहीं था कि पेन्शन लेकर घर आने पर उनका नियम यह था कि दो-दो, चार-चार दिन तक एक
कमरे में बन्द रहते थे और इस प्रकार महीने में दो-तीन बार एकान्त में तपस्या करते आवश्यकताओं के लिए भी बाहर नहीं निकलते थे। जब
थे। खाने-पीने तथा अन्य एकान्त तापस (मोत्तफिक) होकर बाहर आते उनकी आँखों में लालिमा और मुख पर विचित्र चमक होती थी। उनकी कोई सन्तान नहीं थी। जिस दिन मेरे पिता की मृत्यु हुई मेरे चचा प्रेम विह्वल हो उठे और बोले मेरे प्यारे भाई मुझे क्या मालूम था कि तुम मुझसे पहले चले जाओगे वरना अपनी आयु का एक वर्ष तुम्हीं को दे देता। अभिप्राय यह कि एक वर्ष बाद ही आपने भी शरीर त्याग दिया। नजा की हालत (अर्द्धचेतन अवस्था) में मुझे बुलाया और छाती से लगा लिया तथा इतनी जोर से भींचा कि मेरी छाती में कष्ट होने लगा। ऐसा जान पड़ता था कि गर्म लोहे की शलाखें मेरे सीने में डाल दी गयी हैं। तत्पश्चात् मेरे चचा ने इस तरह कहा ‘खैर (भला) वारिस तेरा वारिस है।’ यह कहते मुझे छोड़ दिया। उस समय मुझे बेहोशी आ गयी और मेरी माता मुझे संभालने लगीं। जब तक मैं होश में आया तब तक मेरे चचा चल बसे थे। उनके अन्तिम संस्कार में सब लग गये। इधर पन्द्रह दिन तक मेरी छाती में कष्ट बना रहा और हृदय में जलन थी। धीरे-धीरे इस दशा में सुधार आने लगा। किन्तु हृदय कि गर्मी कम नहीं होती थी। मेरे मित्रों ने मुझे राय दिया कि मैं शाह अहमद मियाँ साहब का चेला बन जाऊँ। मैंने इस विकल्प को मान लिया किन्तु सात वर्ष बर्मा में रहने के पश्चात् जब देश लौटा तो अहमद मियाँ स्वर्ग सिधार चुके थे। मैंने फिर सोचा मौलाना फजलुर्रहमान साहब की सेवा में चलूं किन्तु घरेलू कामों से फुरसत न मिली और छुट्टी पूरी कर देही कागजात (इलाके के कागज पत्र) में संलग्न हो गया। बरेली में शाह निजामुद्दीन साहब रह० की सेवा में रहा किन्तु वहाँ भी मेरे भाग्य का कुछ नहीं था। उसी जमाने में मैंने मौलाना फजलुर्रहमान साहब के स्वर्गवास होने का समाचार सुना। मुझे बहुत दुःख हुआ। जिला बरेली से बन्दोबस्त के कागजात का मुहकमा (विभाग) स्थानान्तरित होकर मैनपुरी चला आया। यहाँ जो मकान मैंने किराये पर लिया वह शाह मुहम्मद आरिफ रह० के दरवाजे पर था। सन्ध्या को मस्जिद गया और आरिफ साहब की कदमबोसी (चरण स्पर्श) किया। उस समय वह लगभग सौ वर्ष उम्र के पूरे कर रहे थे। एक दिन एकान्त में उन्होंने मुझसे कहा कि मेरे पास कुछ छोटी सी पूंजी है। मैं चाहता हूँ तुम्हारे सुपुर्द कर दूँ। मैंने कहा कि यह बोझ मुझसे न उठेगा। पूज्य हाफिज साहब भी स्वर्ग सिधारे। फिर मैंने अवकाश लिया, घर पर छुट्टी समाप्त कर १४ जनवरी १९०२ ई. को घोड़ा गाड़ी द्वारा अपने परिवार सहित शिकोहाबाद से 9 बजे रात्रि कोचला। मेरे पास उस समय आभूषण इत्यादि लेकर कुल पांच हजार की सामाग्री थी। मौजा बिहार मल से निकलकर सुनसान मैदान में गाड़ी चलने लगी। कुछ पूर्व ही से मैं सो रहा था। शिकोहाबाद से 12 मील की दूरी पर चालीस डाकुओं ने गाड़ी घेर लिया और गाड़ी के यात्रियों को लूटने लगे। निद्रा भंग हुई तो मैंने देखा डाकुओं का आक्रमण मुझ पर भी आरम्भ हो रहा था। उस समय मैंने देखा कि एक सफेद दाढ़ी वाले महात्मा डाकुओं को मेरे निकट आने से रोकते थे। उनकी सहायता देखकर मेरा साहस बढ़ा और मैं डाकुओं का सामना करने लगा। अन्ततः मेरे हाथों चार डाकू मारे गये और बहुत से घायल हुए। चार लाशों को छोड़ शेष घायल लोगों को ढ़ो ले गये। इस वीरता पर गवर्नमेन्ट द्वारा बन्दूक इत्यादि पुरस्कार भी प्राप्त हुए। एक बार दौरे के सम्बन्ध में मुझे शिकोहाबाद जाने का अवसर प्राप्त हुआ। रेसालंदार के बाग में कैम्प पड़ा था। एक आदमी द्वारा ज्ञात हुआ कि पूज्य हाजी साहब इटावा से मलावली जाने वाले हैं। ठाकुर पंचम साहब सिंह के यहाँ भी जायेंगे। यह सुनकर मेरे मन में शिष्य होने का विचार उत्पन्न हुआ। उसी समय मैंने सवारी के प्रबन्ध के लिये एक रईस को पत्र लिखा और इसी विचार में मगन लगभग दस बजे रात में मैं सो गया। मेरे डेरे में घड़ों में पानी रखा था और एक मिट्टी के बर्तन में मुँह तक भरी चीनी भी थी। दो चपरासी और दो मेरे निजी सेवक सोये हुए थे और चौकीदारों का पहरा था।
रात के अन्तिम भाग में मैंने स्वप्न देखा। देखता हूँ कि पूज्य हाजी साहब तीन आदमियों के साथ पधारे हैं। देखते ही मैं आदर सम्मान हेतु खड़ा हो गया। मेरे पूछने पर किसी ने बताया कि ये हाजी वारिस पाक हैं। आगे बढ़ कर मैंने सलाम किया और कदम चूमा। पूज्य हाजी साहब ने मुझे गले लगा लिया और कहा ‘तुम क्यों इतनी ज़हमत (कष्ट) उठाते हो? मैं स्वयं आया हूँ। क्या चाहते हो? मैंने प्रार्थना किया कि मैं गुलामी में आना चाहता हूँ। हुजूर ने जवाब में कहा ‘तुम आदि से ही हमारे शिष्य हो चुके हो। तुम्हारे बड़े बाप ने हमारे सुपुर्द कर दिया है। इत्मीनान (विश्वास) रखों।’ मैंने पुनः आग्रह किया कि स्वामी मुझे शिष्य कर लीजिये। हुजूर ने मेरा हाथ थाम कर कहा ‘तुम शिष्य हो चुके हो।’ मेरे यह कहने पर कि शिष्य करते समय शर्बत पिलाया जाता है। आपने मुस्कुराते हुए आदेश दिया ‘बेनज़ीर शाह, अच्छा प्याला में पानी लाओ।’ अतः बेनज़ीर शाह कटोरे में पानी लाये। जो शक्कर की हाँडी मेज पर रखी थी। हुजूर ने उसमें से दो मुठ्ठी चीनी कटोरे में डालकर मेज पर से एक पेन्सिल उठाया और पेन्सिल से शक्कर घोलकर शर्बत बनाया। एक घूँट स्वयं पीकर शर्बत मुझे पीने को दिया और कहा पीलो। कटोरे कोप्रथम सिर पर रखा और पी लिया। हुजूर ने ख़ुदा हाफिज कहा और यह भी कहा अब तुम्हारे आने की जरूरत नहीं है और आप चले गये।
निद्रा भंग हुई और आँखें खुली, मेरा हृदय धड़क रहा था। सोचने लगा कि बात क्या है ? ये सभी लेगा क्या हुए? होंठो पर ज़बान फेरा तो मिठास मिल रही थी तथा होठ चिपक रहे थे। लालटेन जल रही थी। मैं घबराया हुआ अपने आदमियों को जगाया। शक्कर की हाँडी देखा तो निकाली गयी चीनी का चिन्ह दिखाई दे रहा था। मेरे सेवकों ने कहा कि बड़ी अच्छी सुगन्ध कहाँ से आ रही है ? मानों सम्पूर्ण कमरा महक रहा था। मौलवी सरफराज साहब की शिष्यता अपने ढंग की निराली है । जो कुछ स्वप्न में देखा था स्वप्न के पश्चात् भी दिखाई दे रहा था। आरम्भ से तो मुहम्मद सरफराज को हाजी बाबा के जीवन से कोई सम्बन्ध और न कोई जानकारी थी । एक फकीर का कथन ‘खैर वारिस तेरा वारिस है।’ कम उम्र के कारण भूल चुका था। मुहम्मद सरफराज साहब ने १४ वर्ष की आयु में एक बार देखा था। उनका विचार समयानुसार शिष्यता हेतु परिवर्तनशील रहा। किन्तु पूज्य हाजी वारिस बाबा उनकी प्रत्येक मुसीबतों में सहायक रहे। डाकुओं के आक्रमण के समय बचाने में उपस्थित थे। स्वयं आकर शिष्य बनाये। तब कहीं जाकर मुहम्मद सरफराज साहब के समझ में अपने चचा का वाक्य वारिस तेरा वारिस हैं, समझ में आया ।
हुजूर वारिस पाक के शिष्य बनाने की वृत्त इतनी फैली हुई है कि जिसकी सीमा का कोई ओर नहीं हैं। असिमित संख्या में लोग आपके शिष्य हुए हैं। कोई देश, प्रदेश अथवा स्थान ऐसा नहीं पाया जायेगा जहां आपके नाम लेवा न मिलें। आपके शिष्य करने की विधि भी अलौकिक और लौकिक दोनों प्रकार की रही हैं। आपका व्यक्तित्व, यश, दान, उपदान और दया-कृपा का एक उत्तम आदर्श रहा है। आप ने संसार को एक नया जीवन दान किया है और विश्व में एक नई आत्मा का संचार किया है। जिस प्रकार इस्लाम धर्म के अनुयायियों को शिष्य किया है उसी प्रकार अन्य धर्मों के लोग भी आप द्वारा लाभान्वित हुए हैं और विलक्षण अध्यात्मवाद का दर्शन कर आपको स्वीकारा है। जो आपको एक नज़र देख लेता अथवा जिस पर आप की दृष्टि पड़ जाती वह प्रेम रंग में रन्जित हो जाता था।
Rays from the life of Imam Hasan bin Ali (AlaihisSalam)-part 8

His Generosity
Maybe the most eminent of Imam Hasan’s [a] attributes is his generosity. He believed that money was only a means to clothe the naked, help the destitute, pay the debts of the indebted, or satisfy the hungry. Once, he was asked: “We do not see you disappoint a beggar. Why?”
He replied:
I am “I am asking Allah for His favours, and I love to be near Him. I ashamed, as I am myself in need of Allah, to repulse a beggar. Allah got me used to a habit; to shower me with His bounties, and I get Him used to me showering His bounties on the people. I fear that should I stop my habit, He may stop His habit.”
Following are examples of his unlimited generosity:
An Arab desert-dweller once asked for help. In response Imam said: “Give him what is in the safe.” In it there was ten thousand Dirhams. “Sir,” the Bedouin said, “won’t you allow me to reveal my need and praise you?”
Imam’s reply was something like this:
“We are people whose bounties are flowing. In them hopes and wishes dwell. Our souls give out before we are asked in fear of the disgrace of the one who asks. Should the sea know how much we give who asks us, it will shrink, after its flooding, in shame.”
The grandson of the Holy Prophet [s] bought an orchard from the Ansars (the supporters of the Holy Prophet [s] in Madina), at the price of 400,000 Dirhams. Then he got word that they lost their wealth. He gave them the orchard back with no charge.
These are only a few insights into Imam Hasan’s [a] generous acts. Such good deeds had the greatest effect in personifying his high Islamic ethics.[15]
Now we are able to form a clear idea of the ingredients of the character of Imam Hasan [a]. It was the top example of the Muslim character ever witnessed by this planet after the prophets [a]. This was the character of the Ahlul Bayt [a] generally and all of them shared the same character and personality.
[15] For details see: Tawfeeq Abu-Alam, Ahlul Bayt, and other books on the life of the Prophet [s].

