
डाक्टर इलाही बख्श के शिष्यता की घटना
श्रीमान् मौलवी हिसामुद्दीन अहमद साहब फजली रईस सरादा जिला मेरठ लिखते हैं कि इलाही बख्श साहब १८९२ में बाराबंकी में डाक्टर थे। उन्होंने अपने शिष्य होने की घटना जो मुझसे बताया वह इस प्रकार है । डाक्टर इलाही बख्श पूज्य साहब को एक शरीयत के विपरीत चलने वाले फकीर मानते थे। उनके भाई पूज्य हाजी साहब से शिष्य होना चाहते थे । डाक्टर के रोकने के पश्चात् भी उनके भाई शिष्य हो गये और देवा शरीफ से लौटते समय हाजी साहब ने एक कागज प्रदान किया जिस पर कुरान की आयत लिखी हुई थी। इस आयत में मृत्यु का वर्णन था डाक्टर का ब्यान है कि जब मेरे भाई की मृत्यु हो गई तो मुझे स्वयं हाजी साहब पर अकीदा (ईमान) हो गया ।
फ़ज़ल अलीशाह डिप्टी कलेक्टर के शिष्य होने की घटना
फ़ज़ल अली साहब डिप्टी कलेक्टर बड़े हास्य स्वभाव के मनुष्य थे। अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव के कारण पीरीमुरीदी ( गुरू-शिष्य सम्बन्ध ) का परिहास किया करते थे। मिर्जा कासिम जान से उनका बड़ा मेल था । जब भी गुरू-शिष्य सम्बन्ध की कोई बात सुनते हंसी में उड़ा दिया करते थे। मिर्जा कासिम जान केवल इतना ही कहकर रह जाते कि यदि यही विचार है तो पूज्य हाजी बाबा के सम्मुख चले जाओ। एक बार अजीजुद्दीन साहब के साथ फ़ज़ल अली भी देवा शरीफ आये, हाजी साहब ने दोनों से हाथ मिलाया और दोनों की पीठ पर घूंसे लगाये। अजीजुद्दीन साहब तो अपनी कोठी को चले गये किन्तु फ़ज़ल अली साहब की दशा विचित्र हो गई। भाव विभोर हो हम लोगों से कहने लगे कि हमको शिष्य करा दो। हमारे घर वालों को भी शीघ्र लाकर हाजी बाबा की गुलामी में डाल दो। उनके अनुरोध पर हम लोगों ने महामना हाजी बाबा की सेवा में प्रार्थना किया कि फज़ल अली साहब शिष्य होना चाहते हैं और प्रीतिभोज का निमन्त्रण भी देते हैं। हुजूर वारिस पाक ९ बजे दिन को फ़ज़ल अली साहब के मकान पर विद्यमान थे और सर्वप्रथम महिलायें शिष्य हुईं और सभी नौकर चाकरों को चेला बनवा लेने के पश्चात् डिप्टी कलेक्टर
से मिले। पूज्य हाजी बाबा ने हाजी अवघट शाह से पूछा ‘कौन है ?’ उन्होंने अर्ज किया कि सैय्यद अब्दुल गनी के पुत्र सैय्यद मोहिउद्दीन हैं। फिर पूछा गया ‘क्यों आये हैं ?’ लोगों ने कहा परीक्षा देकर आये हैं। यह सुनकर हाजी बाबा ने कहा ‘पास हो गये।’ फिर कहा गया कि अभी परीक्षा देकर आये हैं। आपने कहा ‘तुम क्या जानो ? यह पास हो गये। अतः वह पास हुए। जब सैय्यद मोहिउद्दीन ने तीसरी बार हुजूर का दर्शन किया तो हुजूर ने पुनः कहा ‘अभी तो और पढ़ोगे।’ अतः ये बी० ए० करके इंग्लैण्ड गये और बैरिस्टर की डिग्री लेकर भारत वापस लौटे। पाश्चात्य शिक्षा और सभ्यता के होते हुए भी हुजूर वारिस पाक का प्रेम आपके हृदय में भरा हुआ था। यह चमत्कार पूज्य हाजी वारिस पाक का था कि जिसके ऊपर आपकी दृष्टि पड़ जाती थी वह अपनी कामना अवश्य पूरी करता था और सरकार वारिस पाक को हो जाता था ।
शेख़ हुसेन अली साहब का शिष्य होना
शेख़ हुसेन अली साहब नवाब वारसी अपने शिष्य बनने की घटना स्वयं लिखते हैं कि एक बार मैं अपना मकान बनवा रहा था। मकान पूरा होने के लगभग था। संयोग से पानी बरसा और मकान का कुछ भाग गिर गया। मैंने याचना किया कि ऐ शाह हज़ात अब्दुर्रज़्ज़ाक बाँसवी रह० ! आप दुआ करें कि मेरा मकान बन जाये। मैं सो गया। मेरा पुत्र जो अभी चार वर्ष का था रोगग्रस्त हो गया। रात को मैंने स्वप्न में देखा कि पूज्य हाजी साहब कहते है कि हुसेन जाओ फुलवारी में खीरा लगा है तोड़ लाओ। मैं गया तो देखा कि खीरा टूटा पड़ा है। लौटकर मैंने कहा कि खीरा टूटा पड़ा है और खाने के योग्य नहीं है। हुजूर ने कहा ‘जाने दो ख़ुदा इसका बदला देगा और खीरा उसकी दवा होगा।’ प्रातः वह पुत्र मर गया परन्तु मुझे कोई दुःख नहीं हुआ। एक वर्ष पश्चात् पुनः पुत्र हुआ उसका नाम वाजिद अली रखा। चार वर्ष पश्चात् इस लड़के को भी वही रोग हुआ। बाराबंकी, फैजाबाद इत्यादि स्थानों पर इस लड़के वाजिद अली का इलाज कराया किन्तु कुछ भी लाभ नहीं हुआ। मैं रौना से गदिया लाया जहाँ वाजिद अंली की ननिहाल है। तब तक एक औरत खीरा बेचती हुई वहाँ आई और महिलाओं ने खीरे खरीदे। संयोग से कुछ बीज और खीरे के अंश पलंग पर पड़े रह गये। उस रोगी बच्चे ने कुछ बीज उठाकर मुँह में रख लिया। मैंने इस क्रिया को देखा किन्तु कुछ लजाने के कारण मैंने कुछ नहीं कहा। उस समय से बच्चे का कै और दस्त दोनों बन्द हो गया और बहुत प्रसन्नचित्त दिखाई देने लगा। मेरी पत्नी ने मुझसे कहा कि बताओ बच्चा कैसे अच्छा
हुआ ? मैंने कहा कि जब आप बातों में संलग्न थीं ये खीरे के बीज खा गया और तब से इसका रोग दूर हो गया है। मेरी पत्नी ने कहा कि क्या तुमको याद नहीं वह स्वप्न ? हाजी साहब ने कहा था कि खीरा बच्चे की दवा होगी। तब मुझे याद आया । उसी समय दो खीरे मंगाकर खिलाना आरम्भ किया। लड़का स्वस्थ हो गया। कुछ दिनों पश्चात् फिर वाजिद अली बीमार हुआ और फिर खीरा खिलाया गया तो वह रोग मुक्त हो गया।
संयोग से एक दिन शेख हुसेन अली ने यह कहा कि अल्लाह की कसम यदि हाजी साहब नबाबगंज में मिल जायें तो बिना शिष्य हुए खाना नहीं खाऊंगा। आगे चलकर मैं बड़ा दुःखी हुआ। पश्चाताप करने लगा कि हमने ऐसे महान और आदर युक्त संत की परीक्षा लेने की बात क्यों कह डाली? मेरे लिए स्वप्न की बात क्या कम थी ? नवाबगंज में एक दुकान से कुछ कपड़े खरीद रहा था तब तक देखता हूँ हाजी साहब पालकी पर सवार चले जा रहे हैं। मैंने दौड़ कर सलाम और बन्दगी किया । हुजूर ने पालकी रोकवा दी और कहा ‘क्यों दिल एक है ?’ मैंने आग्रह किया मुझे चेला वना लें। आपने फिर कहा ‘दिल से एक हैं।’ मैं लजाया हुआ खड़ा रहा कि हुज़ूर पाक ने कहा ‘तुम्हारी कुछ सजा होनी चाहिये। अच्छा जाओ! गदिया से मनसब अली को अपने साथ लेकर सतरख आओ।’ मैंने प्रार्थना किया कि मैंने कसम खाया है कि जब तक शिष्य नहीं हो लूँगा खाना नहीं खाऊंगा। हुज़ूर ने कहा ‘सतरख में खाना ।’ आदेश की पूर्ति हेतु गदिया से शेख मनसब अली को अपने साथ लेकर 4 बजे सन्ध्या सतरख उपस्थित हुआ। पूज्य हाजी बाबा ने मुझको देखते ही खाना मंगवाया और रखवा कर कहा ‘अब खान सामने हैं। धैर्य रहेगा। आओ शिष्य हो जाओ।’ जब मैं शिष्य होने के लिये समीप पहुँचा। आप ने फिर वही शब्द दुहराया ‘दिल से एक हैं।’ मैंने क्षमा याचना किया। हुजूर ने कहा ‘हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। वह मुरीद (शिष्य) क्या जो पीर ( गुरू) को जाँच कर मुरीद (चेला) न हो, वह गुरू क्या जो समय पर काम न आये ? ऐसा पीर वह कष्ट है जो दुखदाई है।’ शिष्य हो जाने के पश्चात् कहा गया कि अब हमारे सामने भोजन करो। यह आपकी उत्तम आन्तरिक शक्ति है जो निकट और दूर समान देखे ।
मुस्तकीम हकीम महमूद शाह साहब का शिष्य होना
अली फतेहपुरी लिखते हैं कि मुस्तकीम शाह के पूर्वज काबुल से हिन्दुस्तान आकर अवध के नवाब के यहाँ नौकरी कर लिये थे। फतेहपुर, जिला बाराबंकी में निवास करते थे। ये लोग इतने नये आने वाले थे कि उर्दू न बोल पाते थे और न समझ पाते थे । हुजूर वारिस पाक जब फतेहपुर आते तो अपने नियमानुसार एक भिश्ती (पानी ढ़ोने वाले) के यहां रहते थे। यद्यपि उस समय मुस्तकीम शाह साहिबा के यहाँ परिवार से कोई भी सरकार वारिस पाक का शिष्य नहीं हुआ था। चूंकि हुजूर की दृष्टि में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनों समान था। कोई बात छुपी न थी, निकट दूर सभी आपके लिये बराबर था। अतः अपने प्रेमियों को अच्छी तरह प्रारम्भ से ही जानते पहचानते थे। सरकार वारिस पाक बिना परिचय ही मुस्तकीम शाह साहिबा के घर पधारे और मुस्तकीम शाह साहिबा के निकट जाकर बैठे। उसी समय, उनके पिता ने जो कन्धारी थे एक अपरिचित आदमी को अपने घर में बैठा देखकर क्रोध में आ गये और तलवार लेकर इस निमित चले कि दोनों की गर्दनें उड़ा दें किन्तु कुछ विचारों के अधीन खड़े हो गये और सोचा जब यह आदमी नीचे उतरे तब इसकी गर्दन उड़ा दूं । हुजूर वारिस पाक उनके सामने से चले गये किन्तु वह चुप खड़े रहे। उनको अपने कर्तव्य का ज्ञान ही नहीं रहा । कई बार आने जाने के पश्चात् पूरे घर वाले हुजूर वारिस पाक के अनुरागी हो गये और उस परिवार का प्रत्येक’ व्यक्ति आपका शिष्य हो गया।

