
मुंशी ज़हूर अली के शिष्य होने की घटना यह घटना उपर्युक्त घटना से मिलती जुलनी है। मुंशी ज़हूर अली बाजीदपुर सूबा बिहार के कुलीन परिवार के थे जो वारसी मत के एक फकीर हैं। वारसी होने पूर्व सैय्यद मोहिब अली शाह मुसाफिर कादिरी कलन्दर के शिष्य थे। वारसी होने की घटना स्वयं लिखते हैं। मैं सरहन में तहसीलदार था । ११ रबीउस्सानी सन् मेरी उम्र चालिस की से आगे बढ़ रही थी। प्रातः मैंने एक स्वप्न देखा कि मेरे पिता के गुरू और मेरे गुरू शाह मुसाफिर कादिरी कलन्दर दोनों साथ आये और मुझसे कहा यदि ख़ुदा के जवाँ मर्दों को देखना चाहते हो तो हाजी सैय्यद वारिस अली शाह जो देवा शरीफ से बाढ़ (बिहार) में आ रहे हैं, मेरे साथ चलो तो मैं तुमको उनकी सेवा में पहुंचा दूं। अतः मैं उनके साथ वारसी दरबार में गया। सरकार वारिस पाक ने अपने अंक में भर लिया और कहा ‘यह महबूब है और मुझ से है ।’ आँख खुल गई और मैं ग्यारहवीं का भोजन लोगों में बंटवाकर सरहन से चल पड़ा। रात में बाढ़ पहुंचा हुजूर जिस कमरे में थे उसका द्वार बन्द था। रहीम शाह साहब पुराने सेवक ने जाकर हज़रत हाजी साहब से कहा कि वह तहसीलदार जो रात अपने धर्म गुरू के साथ आये थे उपस्थित हैं। उसी समय कपाट खुला और मैं हुजूर के सम्मुख हुआ। आप अपने दाहिने हाथ की हथेली मेरे हाथ से मलते रहे। जब तक हुजूर बाढ़ में रहे मैं उनकी सेवा में उपस्थित रहा। इस घटना से कुछ दिन बाद जब सरकार वारिस पाक आरा में नसीरूद्दीन साहब वारसी सी० आई० ई० मंत्री भूपाल की कोठी में विद्यमान थे मुझको फकीरी वस्त्र प्रदान किया और फजीहत शाह नाम रखा। यही फ़जीहत शाह कलन्दर वारसी मशहूर हुए। इनकी फारसी भाषा की जानकारी अच्छी थी इनकी कविता फारसी में होती ।
हकीम सैय्यद अब्दुल आदशाह और फ़जीहत शाह साहब के वाक्यात से जाहिर है कि हुजूर वारिस पाक दूसरे पीरों (धर्म गुरूओं) के चेलों को शिष्य नहीं करते जब तक कि उनके पीर इजाज़त ने देते या स्वयं न कहते। इस प्रकार की बेहुत सी बीती बातें हैं कि उस जमाना के बुजूर्गों ने अपने चेलों को और अपने पुत्रों को हुजूर के शिष्य बनने हेतु भेजा।


