Aftab e Ashraf 15

आपकी तावीज़ात– आप अनपढ़ महज़ थे लेकिन बावजूद इसके ऐसी तावीज़ात लिखते थे कि बड़े बड़े हैरान रह जाते थे! आप बच्चों या ख़ादिमों के इसरार पर काग़ज़ क़लम मंगवाते और तावीज़ लिखते थे। जिससे बहुत ज़्यादा खुश हो जाते तो उस पर दस्तख़त । फ़रमाते थे और एक दायरह बनाते और फ़रमाते थे की मोहर लगा। दिया है! आपकी तावीज़ तिरयाख्न का काम करती थी!

आखरी सफ़र- नूर मुहम्मद उर्फ़ ननकू जोरई के पुरवा के साथ मौज़ा सिमरा वकील के घर से हज़रत मार्च १९७८ ईस्वीं में मुसाफ़िर ख़ाना तशरीफ़ लाएं! ये हज़रत का आखरी सफ़र था! यहाँ आपने मुहम्मद यूनुस के घर पर क़याम फ़रमाया! मुसाफ़िर ख़ाना में हज़रत के क़याम का ये पहला इत्तेफ़ाक़ था! मुसाफ़िर ख़ाना के लोगों ने हज़रत की ख़िदमत में कोई कमी नहीं छोड़ी और इन्तेहाई मुहब्बत और ख़ुलूस से पेश आएं! ख़ास तौर पर मुहम्मद यूनुस और उनकी बीवी बच्चों ने हज़रत की बड़ी ख़िदमत किया! यहाँ हज़रत ने ज़िन्दगी के आख़री अय्याम गुज़ारे और मुसलसल तीन महीने तशरीफ़ फरमा रहें! यहाँ के सभी लोग हज़रत के हल्काए इरादत में दाखिल हो गए! यहाँ भी हज़रत से लातायेदाद करामातें ज़ाहिर हुईं और बेशुमार। खल्के ख़ुदा फ़ैज़याब हुई!

मकबरह और बारहदरी की संग बुनियाद– हज़रत एक दिन आबादी से बाहर रेलवे स्टेशन के जुनूब में तशरीफ़ ले गये! आपको यहाँ जमीन का एक टुकड़ा पसंद आ गया! हज़रत ने यहाँ अपना मकबरह और उसके साथ बारह दरी तामीर कराने के लिए हुक्म दिया। ये ज़मीन एक नेक दिल ख़ातून ज़ौजा महबूब अली की थी । उनको जब ये मालूम हुआ की हज़रत को मेरी ज़मीन पसंद आई है तो वोह खुद हज़रत के पास आई और उस ज़मीन को हज़रत की नज़र पेश कर दिया! हज़रत को ज़मीन इस क़दर पसंद थी कि आप जब आबादी के अंदर तशरीफ़ लें जाते तो अपनी चारपाई आबादी के किनारे बिछवाकर उसी ज़मीन को देखते रहते और फ़रमातें इस पर अल्लाह की रहमत होगी! यहाँ नूर बरसेगा! मेरा गुम्बद तामीर होगा और गुम्बद पर कलश रखा जायेगा! कलश पर चाँद लगेगा और चाँद के ऊपर तारा होगा और जो शख्स उस पर कौड़ी मारेगा अल्लाह उसकी मुराद पूरी करेगा! जो हाजतमन्द अपनी हाजत लेकर आएगा उसकी हाजत पूरी होगी! मरीज़ के लिए इस जगह की मिट्टी अक्सीर होगी! देव जिन, आसेब सहेर, चुडैल भूत इस जगह से भागेंगे! हज़रत की ख्वाहिश थी की यहाँ जल्द अज़ जल्द मक़बरह बन जाए इस लिए फौरन चंदा किया गया जिससे कुछ ईंटें आईं और बुनियाद की खुदाई शुरू हो गयी जिसमें पाँच फावड़े हज़रत ने अपने दस्ते पाक से मारा और पाँच ईंटें रखी! बुनियाद भर दी गयी लेकिन आगे का काम सीमेंट न मिलने की वजह से रुक गया! मक़बरह और बारहदरी के तामीर के लिए चंदे की रसीद छपवाई गयीं! हज़रत मुसाफ़िर ख़ाना वालों से बार बार फ़रमाते रहें कि लाओ भैया कुछ लिखदें वरना छटई का पुरवा और माहे मऊ वाले झगड़ा करेंगे! यहाँ इन बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है कि हज़रत को अपने विसाल और उसके बाद के हालात भी मालूम थे। और इस से ये भी बात साफ़ हो जाती है कि हज़रत ने इस जगह को अपनी आखरी आरामगाह के तौर पर पसंद फ़रमाया था!

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