नहर ए फुरात


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!!नहरफुरात!!
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♥️हजरत इमाम हुसैन (रजी अल्लाहु तआला अन्हु) ने मैदान—-ए—-करबला मे नहरे फुरात के किनारे अपने खेमे गाड़े थे, मगर मुहर्रम के सातवीं तारिख को इब्ने सअद की फौज ने जो 82 हजार की तदाद मे थी, नहरे फुरात को घेर लिया और हजरत इमाम को पानी लेने से रोक दिया, इस फौज मे अकसर वही लोग थे जो अली और हुसैन की मुहब्बत का दावा करते थे, जिन्होंने हजरत इमाम को खत लिखकर खुद ही बुलाया था और अब खुद ही उनका पानी भी बंद कर दिया, इब्ने सअद ने हजरत इमाम से कहा की वह अपने खेमे नहर के किनारे से उखाड़ ले,
*हजरत अब्बास ने इस मौके पे फरमाया की ऐसा नही हो सकता, मगर हजरत इमाम हुसैन (रजी अल्लाहु तआला अन्हु) ने फरमाया :- “की भाई अब्बास! जाने दो तुम बहरे करम (करम के समुन्दर) हो यह कतरा—-ए—-नाचीज है।, इनसे झगड़ना फिजुल है अपना खेमा यही नही तो नहर से दुर ही सही,
*चुनांचे : हजरत इमाम ने अपना खेमा वहां से उखाड़ने के हुक्म दिये…!!

(तनकीहुश—शहादतैन, सफा-96, )

♥️सबक : साकी-ए-कौसर (कौसर के पिलाने वाले) सलल्लल्लाहु अलैही वसल्लम के नवासे और उनके अहले बैअत पर पानी बंद कर देना यजीदीयों की इंतेहाई शकावत (संगदिली) और हजरत इमाम का बकमाले सब्र व शुक्र वहां से खेमा उखाड़ लेना आपकी इंतिहाई बुलंद हौसला व बहादुरी का सबुत था, यह भी मालुम हुआ की यह सब शकी जिन्होंने हजरत पर पानी बंद किया था और जो पहले अपनी झुठी मुहब्बत का एलान करते थे दरअसल यह सब के सब अपनी अदावत व शकावत को छुपाये हुए थे…!!

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