Ek Jogi


हज़रत बाबा फ़रीद की ख़ानक़ाह में जोगी भी आते थे।हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया रहमतुल्लाहि अ’लैह महबूब-ए-इलाही ने एक दिन अपनी मज्लिस में बयान किया कि-

एक-बार मैं हज़रत बाबा फ़रीद रहमतुल्लाहि अ’लैह की ख़िदमत में हाज़िर था कि एक जोगी आया।मैंने उस से पूछा तुम्हारा मसलक क्या है और तुम्हारे यहाँ अस्ल मक़्सूद क्या है? उसने कहा

“हमारे शास्त्रों में लिखा है कि मनुष्य की आत्मा के दो छत्र हैं। पहला छत्र सर से नाफ़ तक और दूसरा नाफ़ से पैरों तक।हमारी कोशिश ये होती है कि ऊपर के भाग में सत् गुण और पुण्य की भावनाएं रहें और नीचे के छत्र में ब्रह्मचर्य, पवित्रता और पाकी रहे।”

हज़रत निज़ामुद्दीन ने फ़रमाया कि मुझे उस जोगी की ये बातें बहुत पसंद आईं।हज़रत बाबा फ़रीद रहमतुल्लाहि अ’लैह अपने मुरीदों और अ’कीदत-मंदों को ताकीद करते थे कि दुश्मनों के साथ भी नेकी का सुलूक करना चाहिए।फ़वाएदुल-फ़वाएद में हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के मल्फ़ूज़ात-ए-मुबारक हैं।

“मैं जब शैख़ुल इस्लाम फ़रीदुद्दीन रहमतुल्लाहि अ’लैह की ख़िदमत में पहुँचा और उनसे बैअ’त की तो आपने चंद मर्तबा फ़रमाया कि दुश्मनों को ख़ुश करना चाहिए।और हक़-दारों का हक़ अदा कर के उन्हें राज़ी करने पर बहुत ज़ोर दिया।मुझे याद आया कि मुझ पर बीस जीतल का क़र्ज़ा वाजिब है और एक शख़्स से मैंने पढ़ने को एक किताब ली थी उसे वापस करना है मगर वो किताब मेरे पास से खो गई थी।मैंने दिल में तय कर लिया कि दिल्ली पहुँच कर सबसे पहले उन दोनों हक़-दारों के हुक़ूक़ अदा करूँगा।जब अजोधन से दिल्ली आया तो जिस बज़ाज़ के बीस जीतल देने थे उसके पास गया और उस से कहा मुझे तुम्हारे बीस जीतल देना है मगर मेरे पास ब-यक-वक़्त इतनी रक़म नहीं हो सकती इसलिए सिर्फ़ दस जीतल लाया हूँ।ये तुम लो और मैं वा’दा करता हूँ कि बाक़ी दस जीतल भी जल्द ही अदा कर दूँगा।उसने मेरी बातें सुनकर कहा अच्छा।तुम शैख़ फ़रीद के पास से आ रहे हो? जाओ बाक़ी रक़म मैंने मुआ’फ़ की।उसी तरह जब मैं उस शख़्स के पास गया जिसकी एक किताब मुझ से खो गई थी। मैं ने उससे कहा कि कहीं से नक़ल कराकर तुम्हें दे दूँगा तो उसने भी यही कहा कि जिस मुक़द्दस ख़ानक़ाह से तुम आ रहे हो उसकी तासीर ही ऐसी होती है।“वो किताब मुझे बख़्श दी।”

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