Hadeeth Bukhari: 1403

🌷 ▫ *Hadees* ▫ 🌷
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🍁 Rasullulah ﷺ ne farmaaya: Jin logon ko Allah Ta’ala ne maal diya aur woh us ki Zakaat ada nahin karte, Qayaamat ke din un ka yeh maal ek bahot hi zahreele aur ganje saanp ki shakl mein saamne aayega uski aankhonke ke paas do siyah nukhte honge woh un ki gardan mein lipat jaayega aur un ke jabdon mein noch noch kar kahega. Main tumhaara jama kiya huwa maal hoon, main tumhaara khazaana hoon.
(Bukhari: 1403)
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Hadeeth तालीम व तस्नीफ़ की फ़ज़ीलत 1

*तालीम व तस्नीफ़ की फ़ज़ीलत

2️⃣ हदीस शरीफ़
हज़रत अनस रज़िअल्लाहू तआला अन्ह से मरवी है के रसूलल्लाह सल्लल्लाहू तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया👇

क्या तुम लोग जानते हो सबसे बड़ा सख़ी कौन है,
सहाबा ने अर्ज़ किया अल्लाह और उसके रसूल ज़्यादा जानने वाले हैं,
फ़रमाया अल्लाह सबसे बड़ा जव्वाद है,
फिर इंसान में सबसे ज़्यादा सख़ी में हूं, और मेरे बाद सबसे ज़्यादा सख़ी वो शख़्स है के जिसने इल्मे दीन हासिल किया तो उसको फैलाया वो अकेला अमीर होकर आएगा या जमाअत की हैसियत से,

📗मिश्कात शरीफ़, सफ़ह 37)

हज़रत फ़क़ीहे मिल्लत मुफ़्ती जलालुद्दीन अहमद अमजदी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं👇

इस हदीस शरीफ़ का मतलब ये है के दर्स व तदरीस या तस्नीफ़ व तालीफ़ से जो शख़्स इल्मे दीन फैलाएगा वो क़ियामत के दिन बड़ी शान व शौकत और जाहो हश्मत के साथ आएगा,

📘इल्म और उल्मा, सफ़ह 86–87)

3️⃣ हदीस शरीफ़,
हज़रत अबू दरदा रज़िअल्लाहू तआला अन्ह से रिवायत है के हुज़ूर अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया👇

अल्लाह तआला के नज़दीक क़ियामत के दिन बहुत बुरे दर्जा वाला वो आलिम होगा जिसके इल्म से फ़ायदा ना उठाया जाए,

📗मिश्कात शरीफ़, सफ़ह 37)

सुल्तान मुराद गाज़ी

(1)सुलेमान शाह* (बेटे) ⬇️ *(2)गाज़ी अल तुगरल (Ertgrule)* ⬇️ *(3)सुल्तान उस्मान गाजी* ⬇️ *(4)सुल्तान ओरहान गाज़ी* ⬇️ *(5)सुल्तान मुराद गाज़ी*

*सुल्तान मुराद गाज़ी जिनको मुराद अव्वल भी कहा जाता हे* *1362 में सुल्तान ओरहान गाज़ी के विसाल के बाद , तख्त पे सुल्तान मुराद गाज़ी बैठे, ओर अपने बैठते ही तुर्को की गाज़ा रिवायत को आगे बढ़ाया* *सुल्तान मुराद गाज़ी निहायत समझदार ओर बेहतरीन जंगजू थे_अपने अपने दौर में एक अज़ीम फ़ौज़ तय्यार की ओर यूरोप में इस्लाम के झंडे गाड़े* _1370 के करीब उस्मानियो ने गुलामो की ऐसी फ़ौज़ तय्यार करना शूरु की जिसने आगे 500 साल तक फ़ौज़ का सबसे ताकतवर हिस्सा रही._ *तारीख की एक अज़ीम जंग जिसमे 800 सो सिपाही ने 50 हजार के सलेबी लश्कर को मात दी ,इतिहास गवाह हे कि 800 ने 50 हजार को धूल चटाई थी , वो कारनामा सर-अंजाम सुल्तान मुराद गाज़ी की फ़ौज़ ने दिया था* _तुर्को की सेना के मुकाबले योरोपियन फ़ौज़ बोहोत जादा तकनीक से लैस ओर डिस्प्लेन वाली थी जबकि तुर्को में हौसला जस्बा तो था लेकिन उनकी फ़ौज़ में डीसीप्लेन नही था ,_ *सुल्तान मुराद गाजी ने इस कमी को दूर करने के लिए एक फ़ौज़ तय्यार की ,, ये फ़ौज़ मुसलमान नोजवानो को लेकर नही, बनाई ,बल्की ईसाई बच्चो को जो मुसलमान हुवे उन को शामिल किया* *इस लिए की तुर्क कबाइल लोग अपने अपने काबिले के जादा वफादार होते थे _ओर सुल्तान इस बात को अच्छी तरह समझते थे _की कभी भी कबिले की खातिर वो सल्तनत के खिलाफ जा सकते हे _और अपने कबिले की खातिर खबरे भी लीक कर सकते हे ,* *सुल्तान को ऐसे सिपाही चाहिए थे जो किसी भी लिहाज़ से बगावत ओर जासूसी ना कर सके ,,इस लिए सुल्तान ने एक अलग फ़ौज़ बनाई जो दुनिया की सबसे नायाब फौजो में से एक थी* *सुल्तान मुराद ने इस फ़ौज़ के लिए बलकान के ईसाई बच्चो को भर्ती करना शूरु किया_बलकान पे सल्तनत का कब्ज़ा था और यहा रहने वाले ईसाई पे ये लाज़िम था कि वो घर का एक बेटा सुल्तान की फ़ौज़ के लिए वक़्फ़ करे* _8 साल से 18 साल के बच्चों को बलकान से लिया जाता और उनको समुंदर के पार अनातोलिया में लाया जाता जहा उनको तुर्क ज़बान ओर कल्चर सिखाया जाता _ये इस्लाम कुबूल करते फिर इनकी 8 साल तक जबरदस्त जंगी तरबियत होती_ *जब पूरी तरह ये जंग के माहिर हो जाते तो इनको मुख्तलिफ सुबो का एक्सपर्ट बनाया जाता* _तिरन-दाज़ी -घोड़ सवारी वगेरह इनकी तनखाह पूरी फ़ौज़ में किसी भी दूसरे ओहदे से बेहतर होती थी_ *इस फ़ौज़ को जेनिस्सेरी (janissary) फ़ौज़ कहते थे जिसका मतलब है (नई फ़ौज़).ये इंतिहाई मुनज़्ज़म ओर बा-वक्कार फ़ौज़ थी ओर क्यों ना होती इसमें किसी बद-अहदी की कम से कम सजा सजाए मोत थी.* ___________

तसव्‍वुफ़ क्‍या है ?

तसवफ़ – तसव्‍वुफ़ क्‍या है ?

सूफ़ी, शरीअत के ज़ाहिरी अरकान के साथ साथ बातिनी अरकान भी अदा करते हैं। इस ज़ाहिरी और बातिनी शरीअत के मेल को ही तसव्वुफ़ कहते हैं।

यही पूरे तौर पर इस्लाम है, यही हुजूर ﷺ की मुकम्मल शरीअत है। क्योंकि इसमें दिखावा नहीं है, फरेब नहीं है। इसमें वो सच्चाई वो हक़ीक़त वो रूहानियत समाई हुई है जो हज़रत मुहम्मद ﷺ को रब से अता हुई, जो हर पैगम्बर अपने सीने में लिए हुए है।

इसी तसव्वुफ़ को सीना ब सीना, सिलसिला ब सिलसिला, सूफ़ी अपने मुरीदों को अता करते हैं। और रब से मिलाने का काम करते हैं। यहां हम उसी तसव्वुफ़ के बारे में बुजुर्गों के क़ौल का तज़किरा कर रहे हैं।

हज़रत दाता गंजबख़्श

रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं

दीने मुहम्मदी, दुनियाभर में सूफ़ीया किराम की बदौलत फैली। आज भी अगर इन्सान को सुकूने कल्ब चाहिए तो सूफ़ीयों की बारगाह में आना ही पड़ेगा। और ऐसा हो भी रहा है। लोग सूफ़ीयों की ख़ानक़ाहों में रब की तलाश कर रहे हैं और जो यहां नहीं आ पा रहे हैं, तो वो जुनैद बग़दादीؓ, इमाम ग़ज़ालीؓ, इब्ने अरबीؓ, मौलाना जलालुद्दीन रूमीؓ जैसे सूफ़ीयों की किताबों से फ़ायदा उठा रहे हैं।

तसव्वुफ़ के इस उरूजियत को देखकर, अक्सर लोग इस पर तरह तरह के झूठे मनगढ़ंत इल्ज़ामात भी लगाते हैं। यहां तक कहते हैं कि तसव्वुफ़ का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं है, क्योंकि हुज़ूरﷺ के ज़माने में ये लफ़्ज़ इस्तेमाल ही नहीं होता था। अगर सिर्फ़ इसी बिना पर, तसव्वुफ़ ग़ैर इस्लामी है, तो फिर कुरान का तर्जुमा व तफ़्सीरें, बुखारी शरीफ़, मुस्लिम शरीफ़, तिरमिजी शरीफ़ जैसी हदीसों की किताबें, फि़क़्ह, मानी व बयान सभी के सभी ग़ैर इस्लामी हैं, क्योंकि ये सब भी हुज़ूरﷺ के दौर में नहीं थी।

उस वक़्त सहाबी, दीन को फैलाने पर ही ज़ोर दे रहे थे। उन्हें किसी और काम की फुरसत नहीं थी। इस दौर के बाद सहाबी, ताबेईन व तबे ताबेईन, इन इल्मों की तरफ़ तवज्जह किए। जिन हज़रात ने कुरान के मानी व मतलब पर काम किया, वो मफु़स्सिरिन कहलाए और इस इल्म को इल्मे तफ़सीर कहा गया। जिन्होने हदीस पर काम किया वो मुहद्दिसीन कहलाए और इस इल्म को इल्मे हदीस कहा गया। जिन्होने इस्लामी कायदा कानून पर काम किया वो फुक़्हा कहलाए और इस इल्म को इल्मे फिक़्ह कहा गया। जिन्होने तज़्कीया ए नफ़्स व रूहानियत पर काम किया वो सूफ़ी कहलाए और इस इल्म को इल्मे तसव्वुफ़ कहा गया।

लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सहाबा किराम इल्म तफ़सीर, हदीस, फिक़्ह व तसव्वुफ़ से बेखबर थे। बल्कि ये कहा जाए कि वे इन सब इल्मों में माहिर थे तो गलत नहीं होगा। हां ये ज़रूर है कि उन्हें मफु़स्सिर या मुहद्दिस या फुक़्हा या सूफ़ी नाम से नहीं पुकारा जाता, लेकिन ये सारी ख़ासियत उनमें मौजूद थी। उस वक़्त हक़ीक़त थी, नाम न था, आज नाम है लेकिन हक़ीक़त बहुत कम है।

सूफ़ी लफ़्ज़ ‘सफ़ा’ से निकला है। और सफ़ा, इन्सानी सिफ़त नहीं है, क्योंकि इन्सान तो मिट्टी से बना है और उसे बिलआखि़र ख़त्म ही होना है। इसके उलट नफ़्स की अस्ल मिट्टी है, इसलिए वो इन्सान से नहीं छुटती। इसलिए नफ़्स का ख़ात्मा और सफ़ा का हासिल करना, बगैर मारफ़ते इलाही के मुमकिन नहीं। बगैर फ़नाहियत के ये हासिल नहीं होती। लेकिन इसके हासिल होने के बाद सफ़ा या नूरानियत, फि़तरत में बस जाती है।

(शरह कशफुल महजूब)