हजरत ईमाम हसन बिन अली (अ.स.) बयान करते हैं कि हुजूर सल्लाहो अलैहे वाआलिही-वसल्लम ने फरमाया”हम एहलेबैत की मुहब्बत को लाज़िम पकड़ो, बस बेशक वह शख्स
जो इस हाल में अल्लाह से मिला कि वह हमें मुहब्बत करता था.
तो वह हमारी शफाअत के सदके में जन्नत में दाखिल होगा
और उस ज़ात की कसम जिसके कब्जा-ए-कुदरत में मेरी
जान है किसी शख्स को उसका अमल फाएदा नहीं देगा
मगर हमारे हक की मारेफत के सबब
(तबरानी-फी-मजनउ-ल-औसत. 02/380, रकम-2230)
नोट- इस हदीस-ए-पाक में एहलेबैत से मुहब्बत करने की हिदायत दी जा रही है, और
इससे यह भी पता चलता है कि आमाल किसी के भी हो उसको काम न आएँगे
(मसालन – नमाज़, रोज़ा, हज, जकात, सदाकात) बगैर मुहब्बते रसूल-ओ-आले
रसूल सल्लाहो अलैहे-वा-आलिही-वसल्लम के।
Month: May 2020
Hadeeth Sunan e dailami hadeeth no 1384

Allahu akbar
Psychological Experience to understand Anger
Reaction of Anger | غصہ کا خطرناک ردعمل
Hadith and view on टखनों का ढ़का होना
जो अज़ार टखनों के नीचे है वो जहन्नम में है_*
*📕 बुखारी,जिल्द 7,हदीस 678*
*📕 अत्तरगीब वत्तर्हीब,जिल्द 3,सफह 88*
*📕 सुनन कुबरा,जिल्द 2,सफह 244*
*_अल्लाह उस पर रहमत की नज़र नहीं फरमायेगा जो अपने कपड़ो को लटकाता है_*
*📕 बुखारी,जिल्द 7,हदीस 679*
*_एक शख्स नमाज़ पढ़ रहा था जिसकी अज़ार टखनों से नीचे थी तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने उसको बुलाया और फरमाया कि जाकर फिर से वुज़ू कर और नमाज़ पढ़ कि तेरी नमाज़ नहीं हुई_*
*📕 अबू दाऊद,जिल्द 1,सफह 100*
*_यहां हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का मकसद सिर्फ उसको तम्बीह करना था वरना नमाज़ इस सूरत में भी हो जाती है,जैसा कि दूसरी हदीसे पाक में है कि_*
*_जब हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने ये फरमाया कि जिसकी अज़ार टखनों के नीचे है तो वो जहन्नम में है तो हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु अर्ज़ करते हैं कि या रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम अगर मैं अपनी तहबन्द का खास ख्याल ना रखूं तो अक्सर वो टखनों के नीचे ही रहती है तो हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि ऐ अबू बक्र तुम उनमें से नहीं हो जो तकब्बुर से ऐसा करते हैं_*
*📕 बुखारी,जिल्द 7,हदीस 675*
*📕 इब्ने अबी शैबा,जिल्द 8,सफह 199*
*मतलब साफ है कि जो घमंड की वजह से ऐसा करेगा तो ये नाजायज़ है वरना मकरूह,अब यहां एक मसला ये समझ लीजिये कि नमाज़ में टखना खोलने के लिए कुछ लोग पैंट मोड़कर नमाज़ पढ़ते हैं उनका ये फेअल हरगिज़ जायज़ नहीं जैसा कि हदीसे पाक में आता है कि*
*_हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि हमें ये हुक्म दिया गया है कि नमाज़ में अपने कपड़ो को ना समेटें_*
*📕 मुस्लिम,जिल्द 4,हदीस 993*
*_कपड़ो को मोड़ना इसको कहते हैं खिलाफे मोताद यानि कि कपड़ा जिस फैशन पर सिला गया है उसी तौर पर रखकर नमाज़ पढ़ी जाए कि अगर उसमे कुछ भी बदलाव किया तो नमाज़ मकरूहे तहरीमी होगी,गोया टखना खोलने के लिए पैंट मोड़ना ऐसा ही है जैसा कि कोई बारिश की चंद बूंदों से बचने के लिए किसी परनाले के नीचे खड़ा हो जाए कि पहले तो शायद कुछ ही हिस्सा भीगता पर अब तो पूरी तरह भीग गया,मतलब ये कि टखना खुला रखना सुन्नत ज़रूर है और हर वक़्त खुला रखना सुन्नत है ना कि खाली नमाज़ में और इसी तरह नमाज़ पढ़ना मकरूहे तंज़ीही यानि कराहत है मगर नमाज़ हो गई लेकिन अगर टखने को खोलने की गर्ज़ से कपड़े को मोड़ लिया तो ये मकरूहे तहरीमी यानि नाजायज़ है कि अब नमाज़ को दोहराना वाजिब है,फिर ये मोड़ना चाहे पैंट की मोहरी हो या शर्ट की आस्तीन दोनों का एक ही हुक्म है और ये हुक्म सिर्फ मर्दों के लिये है वरना औरतों के लिये यही हुक्म है कि वो अपनी अज़ार टखनों से 1 बालिश्त या 2 बालिश्त बढाकर ही रखें ताकि सतर खुलने का कोई अमकान ना रहे_*

