ज़कात की तीन किस्में हैं।

अस्हाब-ए-तरीक़त और मशाइख़-ए-किबार ने लिखा है कि ज़कात की तीन किस्में हैं।

अव्वल: ज़कात-ए-शरीअ’त

दोउम:ज़कात-ए-तरीक़त

सेउम: ज़कात-ए-हक़ीक़त

ज़कात-ए-शरीअ’त ये है कि अगर चालीस दिरम पास हों तो उन में से पाँच दिरम राह-ए-ख़ुदा में दे दे

और ज़कात-ए-तरीक़त ये है कि चालीस में से पाँच दिरम अपने पास रखे और बाक़ी कुल राह-ए-हक़ में दे दे

और ज़कात-ए-हक़ीक़त ये है कि चालीस में से पाँच भी अपने लिए ना रखे और सब उस की राह में ख़र्च कर दे। इसलिए कि दरवेशी ख़ुद-फ़रोशी है।

इसी सिलसिले में ये हिकायत इरशाद फ़रमाई कि मैं ने शैख़ शहाबुद्दीन सुहरवर्दी को देखा है और कुछ दिन उनकी ख़िदमत में भी रहा हूँ। एक दिन उन की ख़ानक़ाह में क़रीबन एक हज़ार दीनार बतौर-ए-फ़ुतूह आए। उन्होंने सब के सब राह-ए-मौला में लुटा दिए और शाम तक एक पैसा भी अपने लिए ना रखा और फ़रमाया कि अगर मैं इस में से कुछ अपने लिए रख लेता तो दरवेश ना रहता बल्कि दरवेश-ए-माल-दार का लक़ब पाता।

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