Plant Stress  


Turns leaves yellow.

1400 years ago people didn’t know that water affects the color of leaves. Today we know that too much water or too little water can turn leaves yellow.

Leaf yellowing is often one of the first symptoms of plant stress. If the stress causing condition is not alleviated, yellow leaves may turn brown. A prolonged period of environmental stress causes overall stunting and poor growth. Noticing the pattern and progression of symptoms will help to diagnose the cause of the problem…

Plants wilt and leaves curl when roots are unable to supply sufficient moisture to the stems and leaves. Wilting for short periods of time does not harm plants. Sometimes a plant wilts on a hot day because moisture is evaporating from the leaves faster than the roots can supply it. If there is ample soil moisture, the plant will absorb water in the evening to firm up the stems and leaves. Over a prolonged period, however, drought will cause serious damage, such as yellowing, leaf scorch, browning, or leaf drop and stunted growth. Extended periods of drought also inhibit flower formation. Severe heat and water stress when a plant is in bloom may cause scorching or browning of flower buds and blossoms. Plants vary in their ability to tolerate drought and some may die suddenly after extended periods of drought.

Excess Water
Problems with excess water can result from poorly drained soil or overwatering. Excess water reduces oxygen in the soil, which damages fine roots and renders the plant unable to take up water. Plants exposed to excess moisture show the same symptoms as plants under drought stress. The primary symptom of excess moisture is wilting or yellowing of lower and inner leaves. If excess water continues, plants may show other drought symptoms, such as scorch, leaf drop, and/ or plant death.

University Of Maryland, Leaf Yellowing – Environmental Stress, 2019Water is related to the yellowing of leaves. This was known recently, however this was portrayed in the Quran 1400 years before it was discovered.

[Quran 39:21] Have you not considered how Allah sends down water from the sky, then He makes it flow into underground wells, then He produces with it plants of various colors, then they wither and you see them yellowing, then He turns them into debris? Surely in this is a reminder for those with understanding.

Here water is related to the yellowing of leaves. Today we know that too much water or too little water can turn leaves yellow.

“Wind-burn” is when wind accelerates the evaporation of water from the leaves, mimicking drought.

Wind-burned leaves are often curved under and form “claws.” They can look like they’re droopy from overwatering, underwatering, or possible a nitrogen toxicity, but you know you’ve got wind-burn when the leaves in front of the fan are clawing, and leaves further away from the fan look fine.
GrowWeedEasy, Wind Burn, 2019

Wind can increase the evaporation of water in the leaves mimicking underwatering and causing the leaves to turn yellow. This was known recently, however this was portrayed in the Quran 1400 years before it was discovered.

[Quran 30:51] But if We send a wind, and they see it turning things yellow, they would continue thereafter to disbelieve.

Here wind is causing leaves to turn yellow. Today we know why, wind accelerates the evaporation of water causing the leaves to turn yellow.




1400 years ago nobody believed that there are organisms that are too small to be seen by the naked eye. Today we know this is false; bacteria is microscopic and spreads everywhere.

In 2016, a study by researchers at the University of Arizona set the germophobic world on fire with a report that said the average shoe sole is covered with 421,000 bacteria and that 90 percent of those bacteria transfer directly to a clean tile floor on first contact. A 2017 study on shoe bacteria by the University of Houston showed that more than 26 percent of shoes examined test positive for C. diff, a bacteria that causes a potentially deadly super diarrhea. That’s more than triple the amount typically found in kitchens and bathrooms.

Bacteria is microscopic and highly concentrated in shoes. Shoes transfer bacteria to clean tile floor on first contact. This was only known recently, however this was portrayed in the Quran 1400 years before it was discovered. God ordered Moses to take off his shoes.

[Quran 20:12] I am your Lord. Take off your shoes. You are in the sacred valley of Tuwa.

God ordered Moses to remove his shoes in order not to desecrate the place. Today we know why; shoes turned out to spread filthy bacteria.

सूफ़ी का शुक्र

शुक्र अल्लाह वलहम्दोलिल्लाह

ऐ मेरे रब!

मुझे अपनी मेहरबानी से

इस बात पर क़ायम रख कि

मैं तेरी उन नेअमतों का शुक्र अदा करता रहूं

जो तुने मुझ पर

और मेरे मां बाप को अता किए

और मैं ऐसे नेक काम करता रहूं

जिन से तु राज़ी रहे और

मुझे अपनी रहमत से

अपने ख़ास कुर्ब वाले

नेक बंदों में दाखिल फ़रमा।

(कुरान 27:19)

मक़ामे ‘यक़ीन’ के 9 उसूल होते हैं. 1.तौबा, 2.शुक्र, 3.सब्र, 4.रिजाअ (उम्मीद), 5.ख़ाफै़, 6.जुहद (परहेज़गारी) 7.तवक्कल (भरोसा) 8.रज़ा 9.मुहब्बत। ‘सूफ़ीयाना’ रिसाला.2 में आपने ‘तौबा’ के बारे में पढ़ा। इस बार हम ‘शुक्र’ के बारे में बयान कर रहे हैं।

खुदा ने कुरान में, शुक्र को ईमान के साथ मिलाकर ज़िक्र किया है। इनको छोड़ने पर वो नाराज़ होता है और ऐसे में हमें उसके अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। यानी खुदा का शुक्र अदा करना, ईमान के बराबर है।

अल्लाह तुम्हें अज़ाब देकर क्या करेगा, अगर तुम शुक्र अदा करो और ईमान रखो… (कुरान 4:147)

रब ही सारी कायनात का पैदा करनेवाला है। सारा निज़ाम उसी के हाथों में है। हमारा पैदा होना, खाना पीना, सोना जागना, सांसें लेना, जीना मरना, सब उसी की कुदरत का कमाल है। उसके इतने एहसान हम पर है कि हम सारे एहसान को पहचानने की भी कुदरत नहीं रखते। हम अगर कुछ कर सकते हैं तो वो है . शुक्र।

और अल्लाह ने तुम्हें तुम्हारी मांओं के पेट से बाहर निकाला, जब तुम बिल्कुल नासमझ थे और तुम को कान दिए, आंख दिए, दिल दिए ताकि तुम शक्र अदा करो। (कुरान 16:78)

शुक्र का ईनाम

तुम मेरा ज़िक्र किया करो मैं तुम्हारा ज़िक्र करुंगा

और मेरा शुक्र अदा किया करो

और मेरी नाशुक्री न करो। (कुरान 2:152)

यानी शुक्र से रब राज़ी होता है। और जब वो राज़ी हो जाए तो फिर आप जो चाहें वो आपका हो जाए। इससे ये बात निकलती है कि पहले जो मांगना हैं मांग लें और उसका शुक्र अदा कर दें, फिर तो मांग पूरी होना तय है।

शुक्र ही सच्‍ची राह है

कुरान में ‘(शैतान कहता है.) मैं उनको तेरी सीधी राह (से भटकाने) ज़रूर बैठूंगा।’ (कुरान 7:16) की तशरीह में ‘सीधा रास्ता’ का मतलब ‘राहे शुक्र’ है और ‘उनको’ से मुराद ‘शाकिर’ (शुक्र करनेवाला) है। अगर शुक्र, राहे खुदा तक नहीं ले जाती तो शैतान उस राह को काटने की धमकी नहीं देता और अगर शाकिर अल्लाह का महबूब नहीं होता तो शैतान उन्हें नहीं भटकाता और यूं नहीं कहता कि ‘और तु उनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार नहीं पाएगा।’(कुरान 7:17)

हज़रत उमरؓ ने हुज़ूरﷺ  से पूछा. हम क्या मांगें?, आपने फ़रमाया. ‘रब से ज़िक्र करनेवाली ज़ुबान और शुक्र करने वाला दिल मांगो।’

हज़रत मूसाؑ से खुदा ने फ़रमाया. ‘जब तुने पहचान लिया कि तमाम नेअमतें मेरी तरफ़ से हैं तो मैं तेरे इस शुक्र की वजह से तुझसे राज़ी हो गया।’

सूफ़ी का शुक्र

सूफ़ीयों का ये तरीका रहा है कि हर वक्त शुक्र अदा करते रहते हैं। जब आपस में मिलते हैं तो रब का शुक्र बयान करते हैं, जिससे सभी मिलनेवाले भी उस शुक्र में शामिल हो जाते हैं। बुजूर्गों की बारगाह में शुक्र ऐन इबादत है और शिकायत सरासर गुनाह है।

सारी कायनात एक ख़ज़ाना है और उसकी कुंजी खुदा के पास है। जैसे जैसे शुक्र बढ़ता जाएगा, वैसे वैसे ख़ज़ाने खुलते जाएंगे।

वही आसमानों और ज़मीन (सारी कायनात के ख़ज़ानों) की कुन्जियों का मालिक है,

(और) वो जिसे चाहे रिज़्क़ (व जो चाहे वो) अता करता है और (चाहे तो) रोक देता है,

बेशक वही सबकुछ जाननेवाला है। (कुरान 42:12)

अगर तुम शुक्र अदा करोगे तो मैं तुम पर नेमअतों की बारिश कर दूंगा… (कुरान 14:7)

थोड़ा होने पर भी शुक्र किया जाए और ये समझा जाए कि कम में भी खुदा की कोई हिकमत होगी, हमारा कोई भला छिपा होगा। और अगर रब ने देने से रोका है तो ज़रूर सहीं वक़्त में या बेहतर देने के लिए रोका है। तो यक़ीनन वो थोड़ा भी अब ज़्यादा हो गया। वो छोटी सी नेअमत भी अब बड़ी हो गई।

जितना ज्यादा शुक्र अदा करोगे, उतना ज्यादा नेअमतें अता की जाएगी। बहुत कम मिलने पर भी अगर ज्यादा शुक्र किया जाए तो वो ‘कम’ बदलकर ‘ज़्यादा’ हो जाएगा। एक ही नेअमत पर बार बार शुक्र किया जाए तो वो बढ़ती जाएगी।

शुक्र, दिल से अदा होना चाहिए। जो शुक्र दिल से अदा न हो, सिर्फ़ ऊपरी दिखावा बस हो, वो किसी काम का नहीं। बल्कि वो नुक़सान की वजह बनेगा।

दिल से अदा होने वाले शुक्र को कितना भी रोका जाए, वो आगे चलकर ज़ाहिर हो ही जाता है। आपके चलने फिरने से, बोलने से, कपड़ों से, रहन सहन से, यहां तक कि आपकी हर अदाओं से ये छलकने लगता है। और उस मक़ाम पर पहुंच जाता है, जहां ये झूमने पर मजबूर करने लगता है। शुक्र एक इबादत है, दिल से अदा किया जाए तो बातिनी इबादत और ज़ाहिर किया जाए तो ज़ाहिरी इबादत। और इस मुकाम पर शरीअ़त व तरीक़त मिल जाते हैं। यहां दिल रक़्स करने लगता है, आंखों में आंसू रक़्स करने लगते हैं, जिस्म के सारे रोएं अदब से खड़े होकर रक़्स करने लगते हैं। ये शुक्र ही तो है, जो बंदे को खुदा तक पहुंचाता है और खुदी से फ़ना करके खुदा से मिलाता है। सब कुछ खोकर, सब कुछ पाने को प्रेरित करता है।

हुज़ूरﷺ  सारी रात नमाज़ में खड़े रहे, यहां तक कि उनके पांव में सूजन आ गई। इस पर सहाबियों ने पूछा. हुज़ूरﷺ  आप मासूम हैं। आपसे कभी कोई गुनाह हुआ ही नहीं और न होगा। तो फिर ऐसा करने की क्या ज़रूरत है। इस पर हुज़ूरﷺ  ने फ़रमाया. तो क्या मैं अपने रब का शुक्र भी अदा न करूं। (बुखारी)


नाशुक्री, अज़ाब की सबसे बड़ी वजह है। नाशुक्रे, न दुनिया में कामयाब और न आख़िरत में। हर तरह की परेशानियों और नाकामयाबी की वजह नाशुक्री है। ये तीन तरह की होती है.

1.शुक्र अदा नहीं करना, नाशुक्री है। अल्लाह को नाशुक्रे गुनाहगार पसंद नहीं।(कुरान 2:276)

2.शुक्र अदा करने में कंजूसी करना भी नाशुक्री है। इससे नेअमतें कम होती जाती है और आख़िरकार ख़त्म होती जाती है। और हम बड़े नाशुक्रों के सिवा किसी को सज़ा नहीं देते। (कुरान 34:17)

3.शुक्र अदा नहीं करना, बल्कि शिकायत करना, सबसे बड़ी नाशुक्री है। एक सूफ़ी कहते हैं. आमतौर पर ये देखा गया है कि लोग दुआ मांगते हैं और जब वो पूरी होती है, तो शुक्र अदा करने के बजाए शिकायत करने लगते हैं। क्योंकि तब तक उनकी मांगें और बढ़ जाया करती है। इस तरह की नाशुक्री पर अल्लाह सख़्त नाराज़ होता है और दी हुई नेअमतें भी छिन ली जाती है।

…और जो शख़्स अल्लाह की नेअमत को अपने पास आ जाने के बाद बदल डाले तो बेशक अल्लाह सख़्त अज़ाब देने वाला है। (कुरान 2:211)

इश्क़ की इमारत


लेकिन सच्ची मुहब्बत हदों से भी गुज़र जाती है और इसी के सहारे ये काम शुरू करने का इरादा किया गया। तुर्कों ने अपनी सल्तनत के अलावा सारी दुनिया में इस इरादे का ऐलान किया। ये भी ऐलान किया गया कि इस तामीर व तौसीअ से संबंधित कारीगर की हमें ज़रूरत है। ये सुनना था कि हिन्दुस्तान, अफगानिस्तान, चीन, ईरान, इराक़, शाम, मिस्र, यूनान, अफ्रीका वगैरह से और दुनिया के कोने कोने से अपने अपने काम में माहिर लोगों ने कुस्तुनतुनिया की तरफ़ रूख करना शुरू कर दिया। उधर कुस्तुनतुनिया में शहर के बाहर एक बहुत बड़ी बस्ती बसाई गई उन कारीगरों और उनके घरवालों के लिए। और उनके खाने पीने रहने का बंदोबस्त किया गया।

इस काम का पहला हिस्सा था अपने वक़्त के सबसे बेहतर कारीगरों की तलाश। इस तलाश ने, एक नए शहर को बसा दिया था, जिसमें तकरीबन 15 साल लग गए। अब दूसरा हिस्सा ये था कि हर कारीगर हाफि़ज़े कुरान भी हो। इस काम के लिए उन माहिर कारीगरों को कहा गया कि अपने बच्चे या शागिर्द को अपनी तरह माहिर बनाए। हुकूमत ने उन बच्चों के हाफि़ज़े (कुरान को बिना देखे याद करने) का इंतेज़ाम किया। साथ ही उन बच्चों की जिस्मानी कुवत व सवारी की तरबियत भी दी गई। इसके लिए 25 साल का वक्त मुक़र्रर किया गया।

इतने सब्र, मेहनत, मुहब्बत और हैरत का ये बिल्कुल अनोखा कारनामा इतिहास की नई इबारत लिख रहा था। इन 25 सालों के बाद तकरीबन 500 माहिर कारीगरों की एक नई और ख़ालिस नस्ल तैयार हुई। ये तीस से चालीस साल के नेक व सलीकेमंद नौजवान सिर्फ कारीगर ही नहीं थे, बल्कि आशिके रसूल भी थे और इतना सब करने की वजह सिर्फ ये थी कि हुज़ूरﷺ  की बारगाह में किसी तरह की बेअदबी न हो।

एक तरफ इन हुनरमंद कारीगरों को तैयार किया जा रहा था, तो वहीं दूसरी तरफ इमारत की तामीर की प्लानिंग की जा रही थी। उसके लिए ज़रूरी सामान इकट्ठ किए जा रहे थे। इस प्लानिंग को राज़ रखा गया, यहां तक कि आज भी नहीं मालूम कि हुज़ूरﷺ  की बारगाह में इस्तेमाल हुआ पत्थर कहां से लाया गया था। लकड़ियां भी अनछुए जंगलों से लायी गयी और बीस साल तक मौसमी मार से गुज़ारा गया। रंगों के मामले में भी मज़बूत और खालिस रंगों को लिया गया। कांच, कलम के लिए बारीकी से काम किया गया। ख़त्ताती (केलीग्राफी) के लिए नील व यमुना नदी के किनारे पेड़ उगाए गए। इसी तरह हर काम की तैयारी बड़े करीने से की गई।

सारे सामान व सारे लोगों के साथ, समंदर व रेगिस्तान से होते हुए मदीना शरीफ़ पहुंचा गया। मदीना की सरहदों से बाहर तकरीबन 12 मील पहले, कारीगरी और रहने के लिए एक नई बस्ती पहले से ही तैयार कर ली गई थी। अब यहां ये सवाल उठता है कि जब मदीना में काम करना है तो इतनी दूर नई बस्ती बसाने क्या ज़रूरत थी। सीधे मदीना पहंचकर काम शुरू कर दिया जाता। लेकिन यहां फिर मुहब्बत काम कर रही थी। इतनी बड़ी इमारत तैयार होनी थी, जिसके वास्ते हज़ारों पत्थर काटे जाते तराशे जाते, मचान बनाए जाते, इसके अलावा भी बहुत से ऐसे काम होते जिससे शोर शराबा होता। लेकिन मुहब्बत को ये मन्जूर नहीं था। उसका ये ख़्याल था जिन फि़ज़ाओं में हुज़ूरﷺ  हैं, वहां अमनो अमान क़ायम रहे। वहां की हवाओं में जो सुकून है वो कायम रहे।

हर वो काम जिसमें ज़रा भी आवाज़ होती, तो उसे शहर के बाहर किया जाता। पत्थर अगर थोड़ा छोटा या बड़ा हो जाता, तो उसे वापस 12 मील दूर ले जाया जाता और उसे ठीक करके लाया जाता। मचान छोटी बड़ी हुई तो उसे वापस लाकर, ठीक करके ले जाया गया। यहां ये ख्याल रहे कि ये कोई मशीनी दौर नहीं था कि झट से गए झट से आ गए। एक छोटे से काम के लिए आने जाने में, कई दिन भी लग जाते थे।

सारे कारीगरों को अपने अपने हुनर और प्लानिंग के तहत काम की आज़ादी थी। लेकिन दो बातें उन पर ज़रूरी कर दी गई थी. पहली हुज़ूरﷺ  की बारगाह में हमेशा पाक व बावज़ू रहे और दूसरी हर वक़्त कुरान की तिलावत करते रहे। मुहब्बत की ऐसी मिसाल न कहीं सुनी है, न सुन सकेंगे।

इस तरह खुदा के कलाम को पढ़ते हुए कारीगरी के पूरे पंद्रह साल मस्जिदे नबवी की तामीर होती रही और एक सुब्ह इमारत के मुकम्मल होने का ऐलान किया गया। ये इमारत कैसी है, क्या है, कहां ले जाती है, इस पर कई किताबें लिखी जा सकती है। यहां सिर्फ इतना कह सकते हैं कि मुहब्बत और कुरबानी की ये इमारत, इस दुनिया में होते हुए भी इस दुनिया की नहीं है। खुद को कायम रख कर देखें तो ये कहीं और है, खुद से बाहर जाकर देखें तो ये कहीं और है, हम कुछ और हैं।

मुहब्बत मानीए अल्फ़ाज़ में लाई नहीं जाती।

ये वो इबादत है, जो समझी जाती है, समझाई नहीं जाती।