
रसूल-ए-अकरम ﷺ ने उम्मत को ऐसी हिदायतें अता फ़रमाईं जो क़यामत तक आने वाले मुसलमानों के लिए रहनुमाई का ज़रिया हैं। उन्हीं में एक अहम हिदायत क़ुरआन और अहले-बैत से वाबस्ता रहने की है।
रसूल ﷺ ने फ़रमाया:
“मैं तुममें दो अज़ीम चीज़ें छोड़कर जा रहा हूँ—अल्लाह की किताब और अपने अहले-बैत। अगर तुम इन दोनों को मज़बूती से थामे रखोगे तो गुमराह नहीं होगे।”
अब ज़रा ठहरकर सोचिए…
जब सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) जैसी बरगुज़ीदा हस्तियों के लिए, जो आप ﷺ की सोहबत से मुनअवर थे, क़ुरआन और अहले-बैत दोनों को मज़बूती से थामना लाज़िम और ज़रूरी क़रार दिया गया, तो ज़रा सोचिए कि आज के पुरफ़ितना दौर में हम जैसी कमज़ोर उम्मत पर यह ज़िम्मेदारी कितनी ज़्यादा बढ़ जाती है!
सहाबा ने अपनी ज़िंदगी में इस हुक्म पर पूरी तरह अमल किया। उन्होंने क़ुरआन को अपनी ज़िंदगी का दस्तूर बनाया और नबी-ए-करीम ﷺ के अहले-बैत से मोहब्बत, एहतराम और अक़ीदत का वह हक़ अदा किया जो उनकी शान के मुताबिक था।
जब रसूल-ए-अकरम ﷺ ने क़ुरआन के साथ अपने अहले-बैत को उम्मत की रहनुमाई का ज़रिया बताया, तो फिर अहले-बैत की मोहब्बत, अदब और इताअत को महज़ एक फ़ज़ीलत या पसंद की चीज़ समझ लेना कैसे सही हो सकता है?
अहले-बैत से मोहब्बत कोई नया ख़याल नहीं। ये तो ख़ुद रसूल ﷺ की तालीम है।
जिस घराने को नबी ﷺ ने अपनी उम्मत के सामने इज़्ज़त और मोहब्बत का मुक़ाम दिया, उस घराने से जुड़ना, उनसे मोहब्बत करना और उनके नक़्श-ए-क़दम को अहमियत देना हर उस शख़्स के लिए ज़रूरी है जो रसूल ﷺ से सच्ची मोहब्बत का दावा करता है।
और अगर कोई यह सवाल करे कि सहाबा का अहले-बैत से क्या रिश्ता था?
तो जवाब साफ़ है:
सहाबा-ए-किराम रसूल ﷺ के जाँनिसार थे और अहले-बैत रसूल ﷺ का अपना घराना। इसलिए सहाबा के लिए भी अहले-बैत का अदब और मोहब्बत कोई मामूली मामला नहीं था।
सहाबा हों या बाद की उम्मत—रसूल ﷺ की हिदायत सबके लिए रहनुमा है।
बल्कि मोहब्बत का तक़ाज़ा तो ये है कि इंसान अपने आपको अहले-बैत की मोहब्बत में ग़ुलाम और ख़ादिम समझे। यहाँ “ग़ुलामी” से मुराद इज़्ज़त, मोहब्बत और इताअत की वो हालत है जिसमें इंसान अपने नफ़्स और अपनी पसंद को पीछे रखकर रसूल ﷺ के घराने से वफ़ादारी को अपने ईमान की ख़ूबसूरती समझता है।
हम अहले-बैत के मुक़ाबले में किसी को खड़ा नहीं करते।
न सहाबा की तौहीन मक़सद है, न किसी मुसलमान की दिल-आज़ारी।
हम तो बस ये पूछते हैं:
अगर रसूल ﷺ ने अपनी उम्मत को क़ुरआन के साथ अपने अहले-बैत से जुड़े रहने की हिदायत दी, तो आज हम अहले-बैत का ज़िक्र करने से क्यों घबराएँ?
क्यों उनकी फ़ज़ीलत बयान करने में हिचकिचाएँ?
क्यों उनके मसायब पर बात करने को फ़ितना समझें?
क्यों उनके नाम पर सलाम और दरूद भेजने वालों को सवालों के घेरे में खड़ा करें?
जिस नबी ﷺ ने अपनी उम्मत को अपने घराने की मोहब्बत की तरफ़ मुतवज्जेह किया, उस घराने की मोहब्बत को ज़िंदा रखना कोई फ़िर्क़ापरस्ती नहीं—बल्कि मोहब्बत-ए-रसूल ﷺ का एक अहम तक़ाज़ा है।
हमें ये भी समझना होगा कि अहले-बैत की मोहब्बत सिर्फ़ ज़बान का नारा नहीं।
ये अदब है।
ये वफ़ादारी है।
ये मोहब्बत है।
ये उनके ज़िक्र को ज़िंदा रखना है।
ये उनकी सीरत को समझना है।
ये उनके सब्र, इल्म, इबादत और क़ुर्बानियों से सबक़ लेना है।
क़ुरआन हाथ में हो और अहले-बैत की मोहब्बत दिल में हो—यही वो विरासत है जिसे रसूल ﷺ ने अपनी उम्मत तक पहुँचाया।
इसलिए अहले-बैत की मोहब्बत को किसी एक गिरोह की पहचान न बनाइए।
इसे मोहब्बत-ए-मुस्तफ़ा ﷺ का हिस्सा समझिए।
क्योंकि जो दिल रसूल ﷺ से मोहब्बत करता है, वो रसूल ﷺ के घराने की मोहब्बत को अपने लिए बोझ नहीं, बल्कि नसीब समझता है।
अहले-बैत हमारे लिए सिर्फ़ तारीख़ के किरदार नही वो मोहब्बत, अदब, सब्र, इल्म और क़ुर्बानी की रौशन मिसाल हैं।
और हमारा फ़र्ज़ है कि हम उनकी मोहब्बत को अपनी नस्लों तक पहुँचाएँ।
अहले-बैत का ज़िक्र रोकने से मोहब्बत ख़त्म नहीं होगी,
बल्कि हर दौर में कोई न कोई आशिक़-ए-अहले-बैत उठेगा और कहेगा:
हमारा सर झुक सकता है,
हमारी आवाज़ दबाई जा सकती है,
मगर अहले-बैत की मोहब्बत हमारे दिलों से नहीं निकाली जा सकती।
اللّٰهم صلِّ على محمدٍ وآلِ محمد ﷺ





