
मौला अली (अ०स०) ने मुआविया के ख़ानदान, उसकी मां हिंद और बनू उमय्या पर जो सख़्त तरीन रद्द फ़रमाया है, वह **नहजुल बलाग़ा के मकातीब (खतूत) में दर्ज है जिन्हें मैं यह पेश कर रहा हूं 🔥🔥
1. ख़ानदानी पस-मंज़र और “तुलक़ा” (आज़ाद किए गुलाम) होने पर रद्द
* **मक्तूब (ख़त) नंबर:** 28 (मुआविया के नाम)
* **इबारत:** मौला अली (अ०स०) ने फ़रमाया:
> “तूने दावा किया कि तू और तेरा ख़ानदान फ़ज़ायल में आगे हैं? तू तो उस बाप (अबू सुफ़ियान) और मां (हिंद) का बेटा है जो फ़त्हे-मक्का के दिन सिर्फ़ जान बचाने के लिए मुसलमान हुए थे, जिन्हें रसूलुल्लाह ﷺ ने अहसान जता कर आज़ाद किया था (तुलक़ा)। भला एक आज़ाद किए गए ग़ुलाम का बेटा, हिजरत करने वाले मुहाजिरीन के बराबर कैसे हो सकता है?”
2. शजरा-ए-बनू उमय्या और हिंद (जिगर ख़्वार) का ज़िक्र
* **मक्तूब (ख़त) नंबर:** 64
* **इबारत:** मुआविया को मुख़ातब करके फ़रमाया:
> “हमें तुमसे क्या निस्बत? हमारा ख़ानदान शजरा-ए-तैयबा (पाक दराख़्त) है और तुम्हारा ख़ानदान (बनू उमय्या) वही शजरा है जिसे क़ुरआन ने मलामत किया है। तू उस हिंद का बेटा है जिसने (उहुद की जंग में) मेरे चचा हमज़ा का जिगर चबाया था। तुम्हारी रग-रग में वही ख़ून दौड़ रहा है।”
3. जंग-ए-सिफ़्फ़ीन और हुकूमत के लालच पर रद्द
* **ख़ुत्बा नंबर:** 122 और 204
* **इबारत:** अपने साथियों के सामने मुआविया के निज़ाम को “मलूकियत” (शाही हुकूमत) और ज़ुल्म ठहराते हुए फ़रमाया:
> “मुआविया हिदायत के रास्ते पर नहीं है, वह उम्मत को गुमराह कर रहा है। वह दीन के नाम पर दुनिया कमा रहा है और उसकी बैअत इस्लाम पर नहीं बल्कि सरकशी और बग़ावत पर मबनी है।”
4. ख़िलाफ़त पर नाजायज़ दावे का मुंह-तोड़ जवाब
* **मक्तूब (ख़त) नंबर:** 10
* **इबारत:**
> “तू ख़िलाफ़त का तलबगार है? जबकि ना तू बद्री (जंग-ए-बदर का ग़ाज़ी) है, ना उहुदी है, और ना ही तूने ‘बैअत-ए-रिज़वान’ में हिस्सा लिया। तेरा दीन पर कोई हक़ नहीं, तू सिर्फ़ इक़्तेदार (पावर) का भूखा है और फ़ित्ना फैला रहा है।”

