अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 79 पार्ट 2



2. मुक़ौक़िस, शाह मिस्र के नाम पत्र

नबी सल्ल० ने एक पत्र जुरैज बिन मत्ता’ के नाम भेजा, जिसका लक़ब (उपाधि) मुक़ौक़िस था और जो मिस्र और स्कन्दरिया का बादशाह था। पत्र इस प्रकार है-

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

अल्लाह के बन्दे और उसके रसूल मुहम्मद की ओर से मुक़ौकिस अज़ीम क़िब्त की ओर उस पर सलाम जो

हिदायत की पैरवी करे। इसके बाद- मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं, इस्लाम लाओ, सलामत रहोगे और इस्लाम लाओ, अल्लाह तुम्हें दोहरा अज्र देगा, लेकिन अगर तुमने मुंह मोड़ा तो तुम पर क़िब्त वालों का भी गुनाह होगा। ऐ क़िब्त वालो! एक ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हमारे और तुम्हारे दर्मियान बराबर है कि हम अल्लाह के सिवा किसी की इबादत करें और उसके साथ किसी चीज़ को न ठहराएं और हममें से कोई किसी को अल्लाह के बजाए रब न बनाए, पस अगर वे मुंह मोड़ें तो कहो कि गवाह रहो कि हम मुसलमान हैं। 3

इस पत्र को पहुंचाने के लिए हज़रत हातिब बिन अबी बलतआ को चुना गया। यह मुक़ौक़िस के दरबार में पहुंचे तो फ़रमाया, (इस ज़मीन पर) तुमसे पहले एक आदमी गुज़रा है जो अपने आपको सबसे बड़ा ‘रब’ समझता था । अल्लाह ने उसे आखिर व अव्वल के लिए सबक़ बना दिया। पहले तो उसके ज़रिए लोगों से बदला लिया, फिर खुद उसको बदले का निशाना बनाया, इसलिए

1. यह बात किसी क़दर सहीह मुस्लिम की रिवायत से ली जा सकती है जो हज़रत अनस रज़ि० से रिवायत की गई है। (2.99)

2. इस नाम का अल्लामा मंसूरपुरी ने रहमतुल लिल आलमीन 2/178 में उल्लेख किया है। डा० हमीदुल्लाह साहब ने उसका नाम बिन यामीन बताया है। देखिए रसूले अक्रम की सियासी ज़िंदगी, पृ० 141

3. ज़ादुल मआद, लेख, इब्ने क़य्यिम 3/61, निकट अतीत में यह पत्र मिला है। डाक्टर हमीदुल्लाह साहब ने इसका जो फोटो छापा है, उसमें और ज़ादुल मआद के लेख में केवल दो अक्षरों का अन्तर है। ज़ादुल मआद में है ‘अस्लिम तुस्लिम अस्लिम यूतिकल्लाहु’ (आखिर तक) और पत्र में फ़-अस्लिम तुस्लिम यूतिकल्लाहु। इसी तरह ज़ादुल मआद में है ‘इस्मु अस्लिल क़िब्त’ और पत्र में है ‘इस्मुल क़िब्ति’ देखिए रसूले अक्रम की सियासी ज़िंदगी पृ० 136/137

दूसरे से सबक़ लो, ऐसा न हो कि दूसरे तुमसे सबक़ लें।

मुक़ौक़िस ने कहा, हमारा एक दीन है, जिसे हम छोड़ नहीं सकते, जब तक कि उससे बेहतरीन दीन न मिल जाए।

हज़रत हातिव ने फ़रमाया, हम तुम्हें इस्लाम की दावत देते हैं, जिसे अल्लाह ने तमाम दीन के बदले में काफ़ी बना दिया है। देखो, इस नबी ने लोगों को (इस्लाम) की दावत दी तो उसके खिलाफ कुरैश सबसे ज्यादा सख्त साबित हुए। यहूदियों ने सबसे बढ़कर दुश्मनी की और ईसाई सबसे ज्यादा क़रीब हैं। मेरी ‘उम्र की क़समे ! जिस तरह हज़रत मूसा ने हज़रत ईसा के लिए भविष्यवाणी की थी, उसी तरह हज़रत ईसा ने मुहम्मद सल्ल० के लिए भविष्वाणी की है और हम तुम्हें कुरआन मजीद की दावत इसी तरह देते हैं, जैसे तुम तौरात वालों को इंजील की दावत देते हो। जो नबी जिस क़ौम को पा जाता है, वह क़ौम उसकी उम्मत हो जाती है और उस पर ज़रूरी हो जाता है कि वह उस नबी की पैरवी करे और उसकी बात माने और तुमने इस नबी का दौर पा लिया है और फिर तुम्हें दीने मसीह से रोकते नहीं हैं, बल्कि हम तो उसी का हुक्म देते हैं।

मुक़ौक़िस ने कहा, मैंने इस नबी के मामले पर विचार किया, तो मैंने पाया कि वह किसी नापसन्दीदा बात का हुक्म नहीं देते और किसी पसन्दीदा बात से मना नहीं करते। वह न गुमराह जादूगर हैं और न झूठे काहिन, बल्कि मैं देखता हूं कि उनके साथ नबूवत की यह निशानी है कि वह छिपे को निकालते और कानाफूसी की ख़बर देते हैं। मैं और आगे विचार करूंगा ।

मुक़ौक़िस ने नबी सल्ल० का पत्र लेकर (आदर के साथ) हाथी दांत की एक डिबिया में रख दिया और मुहर लगाकर अपनी एक लौंडी के हवाले कर दिया। फिर अरबी लिखने वाले एक कातिब (लिखने वाले) को बुलाकर रसूलुल्लाह सल्ल० की सेवा में नीचे का पत्र लिखवाया-

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मुहम्मद बिन अब्दुल्लाह के लिए मुक़ौक़िस अज़ीम क़िब्त की ओर से आप पर सलाम, इसके बाद-

मैंने आपका पत्र पढ़ा और उसमें आपकी ज़िक्र की हुई बात और दावत को समझा। मुझे मालूम है कि अभी एक नबी का आना बाक़ी है। मैं समझता था वह शाम (सीरिया) से ज़ाहिर होगा। मैंने आपके दूत का सम्मान किया और आपकी खिदमत में दो लौंडियां भेज रहा हूं। जिन्हें क़िब्तियों में बड़ा दर्जा मिला है और कपड़े भेज रहा हूं और आपकी सवारी के लिए एक खच्चर भी भेंट कर रहा हूं। और आप पर सलाम । हुआ
मुक़ौक्रिस ने इस पर कोई बढ़ोत्तरी नहीं की और इस्लाम नहीं लाया। दोनों लौडियां मारिया और सीरीन थीं। खच्चर का नाम दुलदुल था, जो हज़रत मुआविया के समय तक बाक़ी रहा।’

नबी सल्ल० ने मारिया को अपने पास रखा और उनके पेट से नबी सल्ल० के साहबज़ादे (सुपुत्र) इब्राहीम पैदा हुए और सीरीन को हज़रत हस्सान बिन, साबित अंसारी रज़ि० के हवाले कर दिया।

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