अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 79 पार्ट 1



बादशाहों और सरदारों के नाम पत्र

सन् 06 हि० के अन्त में जब अल्लाह के रसूल सल्ल० हुदैबिया से तशरीफ़ लाए, तो आपने अलग-अलग बादशाहों के नाम पत्र लिखकर उन्हें इस्लाम की दावत दी।

आपने इन पत्रों के लिखने का इरादा फ़रमाया तो आपसे कहा गया कि बादशाह उसी शक्ल में पत्र स्वीकार करेंगे जब उन पर मुहर लगी हो, इसलिए नबी सल्ल० ने चांदी की अंगूठी बनवाई जिस पर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम लिखा हुआ था । यह लिखावट तीन लाइनों में थी। मुहम्मद एक लाइन में, रसूल एक लाइन में और अल्लाह एक लाइन में, ऊपर नीचे तीन लाइनें । 1

फिर आपने जानकारी रखने वाले अनुभवी सहाबा रज़ि० को क़ासिद (दूत) के रूप में चुना और उन्हें बादशाहों के पास पत्र देकर रवाना फ़रमाया ।

अल्लामा मंसूरपुरी ने पूरे विश्वास के साथ लिखा है कि आपने ये दूत अपने ख़ैबर कूच करने से कुछ दिन पहले पहली मुहर्रम सन् 07 हि० को भेजे थे। आगे की पंक्तियों में ये पत्र और उनके कुछ प्रभावों को लिखा जा रहा है।

1. नजाशी शाह हब्श के नाम पत्र

इस नजाशी का नाम अस्हमा बिन अबजर था। नबी सल्ल० ने उसके नाम जो पत्र लिखा उसे अम्र बिन उमैया जुमरी के हाथों सन् 06 हि० के आखिर या सन् 07 हि० के शुरू में रवाना फ़रमाया-

तबरी ने इस पत्र का उल्लेख किया है, लेकिन उसे ग़ौर से देखने से अन्दाज़ा होता है कि यह वह पत्र नहीं है, जिसे रसूलुल्लाह सल्ल० ने हुदैबिया समझौते के बाद लिखा था, बल्कि शायद यह उस पत्र का हिस्सा है जिसे आपने मक्की दौर में हज़रत जाफ़र को उनकी हब्शा की हिजरत के वक़्त दिया था, क्योंकि पत्र के अन्त में उन मुहाजिरों का उल्लेख इन शब्दों में किया गया है-

‘मैंने तुम्हारे पास अपने चचेरे भाई जाफ़र को मुसलमानों की एक जमाअत के साथ भेजा है। जब वे तुम्हारे पास पहुंचें तो उन्हें अपने पसा ठहराना और जब न अपनाना । J

1. सहीह बुखारी 2/872-873 2. रहमतुल लिल आलमीन 1/171

बैहक़ी ने इब्ने अब्बास रज़ि० से एक और पत्र का लिखा जाना नक़ल किया है, जिसे नबी सल्ल० ने नजाशी के पास रवाना किया था। उसका अनुवाद यह है-

‘यह पत्र है मुहम्मद नबी की ओर से नजाशी असहम शाह हब्श के नाम

उस पत्र का अनुवाद इस तरह है-

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मुहम्मद रसूलुल्लाह की ओर से महान नजाशी हब्शा के नाम

उस व्यक्ति पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे। इसके बाद मैं तुम्हारी ओर अल्लाह का गुणगान करता हूं, जिसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, जो कुद्दूस (अति पवित्र) और सलाम (सुख-शान्ति वाला) है, अम्न देनेवाला, रक्षक और निगरां है और मैं गवाही देता हूं कि ईसा बिन मरयम अल्लाह की रूह हैं हूं और उसका कलिमा हैं । अल्लाह ने उन्हें पाकीज़ा, और पाकदामन मरयम बतूल की तरफ़ डाल दिया और उसकी रूह और फूंक से मरयम ईसा के लिए गर्भवती हुईं। जैसे अल्लाह ने आदम को अपने हाथ से पैदा किया। मैं एक अल्लाह की ओर और उसकी इताअत पर एक दूसरे की मदद की ओर दावत देता हूं और

1. दलाइलुन्नुबूवः, बैहक़ी 2/308, मुस्तदरक हाकिम 2/623


हूं उस पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे और अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए। मैं गवाही देता हूं कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लाइक नहीं, उसने न कोई बीवी अपनाई, न लड़का (और मैं इसकी भी गवाही देता हूं कि) मुहम्मद उसके बन्दे और रसूल हैं और मैं तुम्हें इस्लाम की दावत देता हूं, क्योंकि मैं उसका रसूल हूं, इसलिए इस्लाम लाओ, सलामत रहोगे। ‘ऐ अहले किताब ! एक ऐसी बात की तरफ़ आओ जो हमारे और तुम्हारे दर्मियान बराबर है कि हम अल्लाह के सिवा किसी और की इबादत न करें, उसके साथ किसी को शरीक न ठहराएं और हममें से कोई किसी को रब न बनाए। पस अगर वे मुंह मोड़ें तो कह दो कि गवाह रहो, हम मुसलमान हैं।’ अगर तुमने (यह दावत) कुबूल न की तो तुम पर अपनी क़ौम के नसारा का गुनाह है। “

डा० हमीदुल्लाह साहब (पेरिस) ने एक और पत्र को नक़ल किया है जो निकट अतीत में मिला है और सिर्फ़ एक शब्द के अन्तर के साथ यही पत्र अल्लामा इब्ने क़य्यिम की पुस्तक ‘ज़ादुल मआद’ में भी मौजूद है। डाक्टर साहब ने उस पत्र की जांच-पड़ताल में बड़ी मेहनत की है, आज की जांच-पद्धति का फ़ायदा उठाया है और उस पत्र का फोटो भी पुस्तक में छाप दिया है।

इस बात की ओर (बुलाता हूं) कि तुम मेरी पैरवी करो और जो कुछ मेरे पास आया है, उस पर ईमान लाओ, क्योंकि अल्लाह का रसूल हूं और मैं तुम्हें और तुम्हारी फ़ौज को अल्लाह की ओर बुलाता हूं और मैंने तब्लीग़ और नसीहत कर दी, इसलिए मेरी नसीहत कुबूल करो और उस व्यक्ति पर सलाम जो हिदायत की पैरवी करे।”

डाक्टर हमीदुल्लाह साहब ने बड़े विश्वास के साथ कहा है कि यही वह पत्र है जिसे अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हुदैबिया के बाद नजाशी के पास रवाना फ़रमाया था, जहां तक इस पत्र की प्रामाणिकता का प्रश्न है, तो दलीलों पर नज़र डालने के बाद उसके सही होने में कोई सन्देह नहीं रहता, लेकिन इस बात की कोई दलील नहीं है कि नबी सल्ल० ने हुदैबिया के बाद यही पत्र भेजा था, बल्कि बैहक़ी ने जो पत्र इब्ने अब्बास रज़ि० की रिवायत से नक़ल किया है, उसकी शैली उन पत्रों से ज़्यादा मिलती-जुलती है, जिन्हें नबी सल्ल० ने हुदैबिया के बाद ईसाई बादशाहों और सरदारों के पास रवाना फ़रमाया था, क्योंकि जिस तरह आपने इन पत्रों से आयत ‘या अहलल-किताब तआला इला कलिमतिन सवाइम बैनना.. नक़ल किया था, उसी तरह बैहक़ी के नक़ल किए हुए इस पत्र में यह आयत लिखी हुई है। इसके अलावा इस पत्र में स्पष्ट रूप से असहमा का नाम भी मौजूद है, जबकि डा० हमीदुल्लाह साहब के नक़ल किए हुए पत्र में किसी का नाम नहीं है, इसलिए मेरा विचार है कि डाक्टर साहब का नक़ल किया हुआ वास्तव में वह पत्र है जिसे अल्लाह के रसूल सल्ल० ने अस्हमा के देहान्त के बाद उसके उत्तराधिकारी के नाम लिखा था और शायद यही वजह है कि इसमें कोई नाम नहीं लिखा है।

इस क्रम की मेरे पास कोई दलील नहीं है, बल्कि इसकी बुनियाद केवल वे अन्दरूनी गवाहियां हैं जो इन पत्रों में मिल जाती हैं, अलबत्ता डाक्टर हमीदुल्लाह साहब पर ताज्जुब है कि उन्होंने इब्ने अब्बास रज़ि० की रिवायत से बैहक़ी के नक़ल किए हुए पूरे पत्र को पूरे विश्वास के साथ नबी सल्ल० का वह पत्र कहा है जो आपने अस्हमा की मृत्यु के बाद उसके उत्तराधिकारी के नाम लिखा था। हालांकि इस पत्र में स्पष्ट रूप से अस्हमा का नाम मौजूद है। (ज्ञान तो अल्लाह का है)2

1. देखिए रसूले अकरम सल्ल० की सियासी ज़िंदगी, लेख, डा० हमीदुल्लाह साहब पृ० 108, 109, 122, 123, 124, 125 ‘जादुल मआद’ में अन्तिम वाक्य ‘वस्सलामु अला मनित्तबअिल’ के बजाए ‘अस्लिम अन-त’ है, देखिए जादुल मआद 3/60 2. देखिए डा० हमीदुल्लाह साहब की किताब ‘हुज़ूरे अक्रम की सियासी जिंदगी’, पृ० 108-114, 121-131
अर-रहीकुल मख़्तूम

बहरहाल जब अम्र बिन उमैया जुमरी रज़ियल्लाहु अन्हु ने नबी सल्ल० का पत्र नजाशी के हवाले किया, तो नजाशी ने उसे लेकर आंख पर रखा और तख्त से धरती पर उतर आया और हज़रत जाफ़र बिन अबी तालिब के हाथ पर इस्लाम क़ुबूल किया और नबी सल्ल के पास इस बारे में पत्र लिखा, जो यह है— बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

मुहम्मद रसूलुल्लाह की खिदमत में नजाशी असहमा की ओर से

ऐ अल्लाह नबी आप पर अल्लाह की ओर से सलाम और उसकी रहमत और बरकत हो, वह अल्लाह जिसके सिवा कोई इबादत के लाइक़ नहीं। इसके बाद-

ऐ अल्लाह के रसूल ! मुझे आपका मान्य पत्र मिला। जिसमें आपने ईसा का मामले का ज़िक्र किया है, आसमान व ज़मीन के ख़ुदा क़ी क़सम ! आपने जो कुछ लिखा है, हज़रत ईसा उससे एक तिनका ज़्यादा न थे। वह वैसे हैं जैसे आपने ज़िक्र फ़रमाया है। फिर जो कुछ हमारे पास भेजा है, हमने उसे जाना, और आपके चचेरे भाई और आपके सहाबा की मेहमानदारी की और मैं गवाही देता हूं कि आप अल्लाह के सच्चे और पक्के रसूल हैं और मैंने आपसे बैअत की और आपके चचेरे भाई से बैअत की और उनके हाथ पर अल्लाह रब्बुल आलमीन के लिए इस्लाम कुबूल किया ।2

नबी सल्ल० ने नजाशी से यह भी कहा था कि वह हज़रत जाफ़र और हब्शा के दूसरे मुहाजिरों को रवाना कर दे। चुनांचे उसने हज़रत अम्र बिन उमैया जुमरी के साथ दो नावों में उनकी रवानगी का इन्तिज़ाम कर दिया। एक नाव के सवार जिसमें हज़रत जाफ़र और हज़रत अबू मूसा अशअरी और कुछ दूसरे सहाबा रज़ि० थे, सीधे ख़ैबर पहुंचकर नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर हुए और दूसरी नाव के सवार जिनमें ज़्यादातर बाल-बच्चे थे, सीधे मदीना पहुंचे । 3

उसी नजाशी ने तबूक की लड़ाई के बाद रजब सन् 09 हि० में वफ़ात पाई। नबी सल्ल० ने उसकी वफ़ात ही के दिन सहाबा किराम रज़ि० को उसके मरने की सूचना दी और उस पर ग़ायबाना नमाज़े जनाज़ा पढ़ी।

उसकी वफ़ात के बाद दूसरा बादशाह उसका उत्तराधिकारी होकर राज-

1. हज़रत ईसा के बारे में ये वाक्य डा० हमीदुल्लाह साहब की इस राय की ताईद करते हैं कि उनका लिखा खत असहमा के नाम था ।

जादुल मआद 3/61

इब्ने हिशाम 2/359 वग़ैरह

सिंहासन पर बैठा, तो नबी सल्ल० ने उसके पास भी एक खत भेजा, लेकिन यह न मालूम हो सका कि उसने इस्लाम कुबूल किया या नहीं।’


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