
शाह बद्रुद्दीन साहब के शिष्य होने की घटना
आप सैय्यदना शाह शमसुद्दीन साहब कादरी चिश्ती साबरी रह० के सुपुत्र थे। शाह शमसुद्दीन साहब उस जमाने के विख्यात संतों और फकीरों में एक थे। अपने पीर के आदेश से बारह वर्ष तक भ्रमण करते रहे । हिन्दू सन्तों में भी बहुत दिनों तक रहे। भ्रमण के पश्चात् जब गुरू के सामने आये तो गुरूजी ने आदेश दिया कि पीराने पीर कलिया शरीफ में हाजिरी दो। बारह रबीउल अव्वल को बारह बजे रात्रि में जो बुजुर्ग मज़ार शरीफ पर मिलें उनके शिष्य हो जाओ। अतः हजरत शाह शमसुद्दीन ने ऐसा ही किया किन्तु उस बुजुर्ग ने बड़ी मुश्किल से बैय्यत लिया और सैय्यदना साबिर रह० के मज़ार की ओर संकेत कर कहा इनके सुपुर्द हो । उसी रात
सको
शाह शमसुद्दीन ने एक छन्द रचा जिसका प्रथम पद
.निछावर अपने मुर्शिद पर कि जिसने हमको दिखलाया। जमाले आरिजे जेबा अलाउद्दीन साबिर का ॥
जब शाह शमसुद्दीन साहब की अन्तिम बेला आई तो आपके सुपुत्र बदरूद्दीन साहब ने आप से बैय्यत करने का आग्रह किया। आपने कहा मेरे पास जो तुम्हारा हिस्सा है वह तो तुम को अवश्य मिलेगा किन्तु मैं तुमको शिष्य नहीं करूंगा। तुमको वसीयत (मरते समय जो किसी से करने को कहा जाता है ) तुम हजरत सैय्यद वारिस पाक के शिष्य बनो। यदि ऐसा तुमने नहीं किया तो क्यामत में तुम्हारा दामनगीर हूँगा। इस जमाने में उनके अतिरिक्त कोई फकीर नहीं है। हाँ! बुजुर्ग तो बहुत हैं और शाह साहब ने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। बदरूद्दीन साहब कहते हैं धीरे-धीरे यह बात मेरे ज़ेहन से निकल गई। मैंने एक स्वप्न देखा कोई कहता है तुम्हारे पिता बुला रहे हैं। पूरब की ओर बाग में हैं। मैं बाग में जाने लगा। मैंने देखा ठीक रास्ते में साँप है जिसका दोनों सिरा पथ के दोनों ओर ज़मीन में फंसा है। मैं साँप को हटाने लगा पर वह नहीं हटा। एक व्यक्ति ने मुझे चाकू दिया और कहा तुम इसको बीच से काटो तो यह हट जायेगा मैंने साँप काटकर हटा दिया और आगे बढ़ा। बाग के और मेरे बीच एक नदी बहती दिखाई दी। मैं नदी को पार करना चाहता था कि मेरे पिता की तपस्या – स्वर मुझे सुनाई पड़ रही थी। मैंने घबराकर आवाज़ दिया ‘मैं किस तरह नदी पार करूं कोई नाव बेड़ा कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा है।’ मेरे पिता ने कहा पूरब के रास्ते से आओगे तो मुझ तक पहुंचोगे। इतने में मेरी आँख खुल गयी। मैंने अपने मन में स्वप्न का अर्थ लगाया कि संकेत शिष्य बनने की ओर है और प्रस्थान कर देवा शरीफ पहुँचा। शिष्य हो गया। फिर शाह फ़जल हुसेन साहब वारसी गद्दीनशीन शाह वलायत की ख़ानकाह (कुटी) में विश्राम के लिये रूका | मेरे मन में यह शंका हुई कि हाजी साहब शिष्य करना नहीं जानते सबके सामने मुझको शिष्य किया है जबकि यह कार्य एकान्त में होता है। उसी समय मकान के सहन के चबूतरे पर बैठे हुए शाह फ़जल हुसेन साहब ने मुझको बुलाकर कहा कि तुमने फकीर कहाँ देखे हैं? तुम्हारे पिता अवश्य फकीर हैं जिन्होंने तुमको यहाँ भेजा है। क्या वह स्वप्न तुमको याद नहीं है ? यही विचार वह सर्प है और चाकू हमारी बातें हैं। मैंने अपने पिता की बातों का और सपने का अब तक किसी से वर्णन नहीं किया था। ये बातें सुनकर मेरे हर प्रकार के भ्रम मिट गये। मारे भय के मैं हाजी साहब के सामने नहीं गया। शाम को शाह फज़ल हुसेन साहब के पूछने पर मैंने कहा मारे भय के मैं सरकार में उपस्थित न हो सका। शाह फजल हुसेन साहब ने कहा कि वह कुछ न कहेंगे, जाओ। हमी लोग ओछे हैं जो कह देते हैं। वह तो अथाह सागर हैं। इसके बाद मैं सरकार में हाजिर हुआ। मुझको देखकर हुजूर मुस्कुराये और कहा ‘जाओ! बछरायूं में हमारे बहुत चेले हैं। हाल यह था कि उस समय बछरायूं में केवल दो शिष्य एक कादरी साहब दूसरे हाफिज़ अब्दुल मजीद साहब थे किन्तु इस कथन के पश्चात् दो सौ से अधिक चेले हो गये। फिर मुझे फकीरी वस्त्र देकर कहा ‘किसी से सवाल न करना चाहे दम निकल जाय और अपने पिता की समाधि पर रहना। यदि तुम यहाँ न आते तो वह क़यामत में तुम्हें पकड़े पकड़े फिरते।’ फिर उपस्थित गणं से कहा, ‘यह खानदानी फकीर हुये हैं, और इनका फकीरी नाम अवघट शाह रखा। अवघट शाह का पद हैघट घाटी घाट न अवघट जाने, न जाने कवनो राह कृपा भई गुरू वारिस की, जो हो गये अवघट शाह ॥

