Hadith:Shane Syedah Fatima AlahisSalam Bazuban e Hazrat Umar Radiallahu anhoo.

“Hazrat Umar ibne Khattab Raziallahu Anhu bayan karte hain ke wo Sayyeda Fatima Salam Ullah Alaiha ke yahan gaye aur kaha: Ay Fatima! Khuda ki Qasam! Maine Aapke siwa kisi shakhs ko Rasoolullah SallAllahu ta’ala wa’ala aale hi Wasallam ke nazdeek Mehboobtar nahi dekha. Aur Khuda ki Qasam! Logon me se Mujhe bhi koi aur Aapse Zyada Mehboob nahi siwaye Aapke Baba (SallAllahu ta’ala wa’ala aale hi Sallam) ke.”

1. Hakim, al-Mustadrak (3:168 #4736)
2. Ibn Abi Shaybah, al -Musannaf (7:432 #37045)
3. Shaybani, al -Aahad wal -mathani (5:360 #2952)
4. Ahmad bin Hambal, Fadail-us-sahabah (1:364 #532)
5. Khatib Baghdadi, Tarikh Baghdad (4:401)
_

اللَّهُمَّ صَلِّ عَلَى سَيِّدِنَا مُحَمَّدٍ وَعَلَى آلِ سَيِّدِنَا مُحَمَّد

शैतान का थूक

शैतान का थूक

खुदा ने जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का पुतला मुबारक तैयार फमाया तो फ़रिश्ते हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के इस पुतला मुबारक की ज़्यारत करते थे। मगर शैतान हसद की आग में जल भुन गया। एक मर्तबा उस मरदूद ने बुग्ज़ व कीने में आकर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के पुतले मुबारक पर थूक दिया। यह थूक हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की नाफ मुबारक मकाम पर पड़ी। खुदा तआला ने जिब्रईल अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया कि इस जगह से उतनी मिट्टी निकालकर उस मिट्टी का कुत्ता बना दो।

चुनांचे उस शैतानी थूक से मिली मिट्टी का कुत्ता बना दिया गया। यह कुत्ता आदमी से मानूस इसलिये है कि मिट्टी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की है और पलीद (गंदा) इसलिये है कि थूक शैतान की है। रात को जागता इसलिये है कि हाथ इसे जिब्रईल के लगे हैं।

(रूहुल ब्यान जिल्द १, सफा ६८) सबकः शैतान के थूकने से हज़रत आदम अलैहिस्सलाम का कुछ नहीं बिगड़ा। बल्कि मकामे नाफ़ शिकम (पेट) के लिये वजहे जीनत बन गया। इसी तरह अल्लाह वालों की बारगाह में गुस्ताखी करने से उन अल्लाह वालों का कुछ नहीं बिगड़ता बल्कि उनकी शान और भी चमकती है। यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह वालों को हसद व नफ़रत की निगाह से देखना शैतानी काम है।

हज़रत आदम अलैहिस्सलाम और शैतान

खुदावंद करीम ने फ़रिश्तों में जब एलान फ़रमाया कि मैं ज़मीन पर अपना एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूं तो शैतान ने इसका बहुत बुरा माना । अपने जी ही जी में हसद की आग में जलने लगा।

चुनांचे जब खुदा ने हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को पैदा फ़रमाकर फ़रिश्तों को हुक्म दिया कि मेरे खलीफ़ा के आगे सज्दे में झुक जाओ तो सब सज्दे में झुक गये। मगर शैतान अकड़ा रहा और न झुका। खुदावंद करीम को उसका यह तकब्बुर पसंद न आया। उससे दरयाफ्त फ़रमाया कि ऐ इबलीस । मैंने जब अपने दस्ते कुदरत से बनाए हुए खलीफा के आगे सज्दा करने का हुक्म दिया तो तुमने क्यों न सज्दा किया? शैतान ने जवाब दियाः मैं आदम से अच्छा हूं। इसलिए कि मैं आग से बना हूं और वह मिट्टी से बना है। फिर मैं एक बशर को सज्दा क्यों करता?

खुदा तआला ने इसका यह तकब्बुर भरा जवाब सुना तो फ़रमाया
कहे:मरदूद! निकल जा मेरी बारगाहे रहमत से । जा तू क्यामत तक के लिये मरदूद व मलऊन है। (सूरः बकरः)

सबकः खुदा के रसूल और उसके मकबूलों की इज्जत व ताजीम करने व से खुदा खुश होता है और उनको अपनी मिस्ल बशर समझकर उनकी ताज़ीम से इंकार कर देना फेअले शैतानी है। एक पैगम्बरे खुदा को सबसे पहले तहकीरन (हकीर नज़र से) बशर कहने वाला शैतान है।

अबू रिहान अल-बेरूनी (973 ई० 1048 ई.)

inventor_warrior

अबू रिहान अल-बेरूनी (973 ई० 1048 ई.)

अल बेरूनी का पूरा नाम अबू रिहान मुहम्मद बिन अहमद अल बेरूनी है। उनका जन्म ईरान के नगर खवारज़म के निकट एक गाँव में हुआ। वह एक महान खगोल शास्त्री गुजरे हैं। उन्हें अपने जीवन में ही कीर्ति प्राप्त हुई।

उस समय ख़वारज़म पर अहमद बिन मुहम्मद अबू रिहान अल-बेरूनी बिन इराक़ी का शासन था। इस परिवार का संबंध राक़ से था इसलिए वह आल-ए-ईराक़ (ईराक़ के वंशज) कहलाते थे। अल-बेरूनी का चचेरा भाई ज्ञान और विद्या का पारखी था। इसलिए उसने अल-बेरूनी की शिक्षा और प्रशिक्षण का पूरा प्रबंध किया। यही कारण है कि अल-बेरूनी ने अपनी पुस्तकों में अपने चचेरे भाई का विवरण बड़े सम्मान के साथ किया है।

जब ख़वारज़मी का राज्य समाप्त हुआ तो अल-बेरूनी पलायन करके जरजान चले आए। वहाँ के शासक क़ाबूस ने आपका बड़ा सम्मान किया और अल-बेरूनी कई वर्ष जरजान में रहे। यहाँ अल-बेरूनी ने अपनी प्रथम पुस्तक ‘आसारुल वानिया’ लिखी। जब ख़वारज़म में स्थिति सामान्य हो गई तो वह वतन वापस आ गए। उस ज़माने में महान वैज्ञानिक और आयुर्विज्ञान शास्त्री बू-अली सीना ख़वारज़म आये हुए थे। दोनों महान व्यक्तियों की मुलाक़ात हुई और दोनों ने घण्टों विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श किया।

उसके बाद अल-बेरूनी अफ़ग़ानिस्तान चले गये। उस समय वहाँ ग़ज़नी परिवार का शासन था। अल-बेरूनी 1017 ई० में ग़ज़नी आये और 1019 ई. तक वहाँ रहे। ग़ज़नी के सुल्तान महमूद ने उनके लिए एक वैद्यशाला का निर्माण कराया जहाँ से अल-बेरूनी अंतरिक्ष का निरीक्षण करते।

दो साल बाद भारत में प्रचलित विद्याओं को सीखने भारत के कई नगरों में रहे। आपने पंजाब के प्रसिद्ध नगरों लाहौर, जेहलम, सियाल कोट और मुल्तान के अक्षांशों का पता लगाया। भारत में उन्होंने दस साल गुज़ारे और यहाँ की विद्याओं और भाषा को सीखा। इसके अलावा भारत के रीति रिवाजों, रहन-सहन और धर्मों के बारे में व्यापक जानकारी प्राप्त की। ग़ज़नी वापस जाकर उन्होंने भारत पर ‘किताबुल हिंद’ नाम की पुस्तक लिखी। उस जमाने के भारतीय इतिहास की यह सबसे अच्छी पुस्तक मानी जाती है।

– महमूद ग़ज़नवी के देहांत के पश्चात उसके पुत्र सुल्तान मसऊद ने सत्ता संभाली। वह भी अपने पिता की तरह अल-बेरूनी का बड़ा सम्मान करता था। उस ज़माने में अल-बेरूनी ने खगोल विद्या पर पुस्तक लिखी जिसका नाम ही उसने क़ानून-ए-मसऊदी रखा। अल-बेरूनी ने अपने जीवन काल में डेढ़ सौ से अधिक पुस्तकें और रिसाले लिखे। यह पुस्तकें गणित, खगोल, भौतिकी, इतिहास, भूगोल, संस्कृति, रसायन-शास्त्र और जीव-विज्ञान पर आधारित हैं।

विभिन्न विषयों पर इतनी पुस्तकें देखकर पता चलता है कि अल-बेरूनी अपने ज़माने के जीनीयस थे। वह संस्कृत भाषा के भी विद्वान थे।

अल-बेरूनी की पुस्तकें ‘आसारुल वाक़िया’ और ‘किताबुल हिंद’ का अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद हो चुका है। ‘क़ानून-ए-मसऊदी’ के कई भागों का अनुवाद भी किया जा चुका है।

लजिस्तान नगर में अल-बेरूनी का देहांत हुआ। –

*****

इब्नुल हैसम (Alhazen) (965 ई० 1040 ई०)

inventor_warrior

इब्नुल हैसम (Alhazen) (965 ई० 1040 ई०)

इब्नुल हैसम का पूरा नाम अबू अली-हसन बिन हुसैन हैसम है। इब्लुल हैसम को यूरोप में अल-हैज़न के नाम से जाना जाता है।

इब्जुल हैसम इब्नुल हैसम का जन्म बसरा में हुआ। वहीं उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और पढ़ाई के बाद एक सरकारी दफ़्तर में नौकरी करने लगे। दिनभर वह काम करते और छुट्टी के पश्चात गणित, खगोल शास्त्र, आयुर्विज्ञान और भौतिकी का अध्ययन करते।

इब्नुल हैसम को वैज्ञानिक शोधों में गहरी रुचि थी अत: उन्होंने कई वर्ष वैज्ञानिक शोधों में लगाए और अपने शोध का निचोड़ एक पुस्तक ‘किताबुल मनाज़िर’ के रूप में संसार के समक्ष प्रस्तुत किया। ।

प्रकाश का वर्णन करते हुए इब्नुल हैसम दो पिंडों का अन्तर बताते हैं। एक प्रज्वलित पिंड और दूसरा अप्रज्वलित पिंड। जो पिंड प्रकाश उत्पन्न करते हैं इनमें वह सूर्य, तारे और दीये का नाम लेते हैं। प्रकाश जब वस्तुओं पर पड़ता है तो वह तीन प्रकार की होती हैं, पारदर्शी, अर्द्धपारदर्शी और अपारदर्शी। उनके अनुसार वायु, जल और शीशा पारदर्शी हैं, बारीक कपड़ा अर्द्धपारदर्शी है, परन्तु मोटे धागों वाला कपड़ा प्रकाश को अवरुद्ध कर देता है। आज के युग में प्रकाश के दो नियम जो हर पुस्तक में दिये जाते हैं इनकी खोज का सेहरा इब्नुल हैसम के सर जाता है। इब्नुल हैसम प्रतिछाया से भी भली-भांति परिचित थे।

अपनी पुस्तक किताबुल मनाज़िर में इब्नुल हैसम ने आँख के विभिन्न भागों का विस्तार से वर्णन किया है। उन्होंने वृहणयन्त्र (Magnifying Glass) के बारे में शोध किये। इब्नुल हैसम ने उस युग में यह पता लगा

लिया था कि पिंड का भार स्वच्छ और मलिन वातावरण में भिन्न होता है। आपने पाँच सौ वर्ष पूर्व वातावरण भार का भी पता लगा लिया था। उन्हें वैज्ञानिक विधि (Scientific Method) का अगवा और प्रकाश विज्ञान (Optics) का पितामह कहा जाता है।

इजुल हैसम की पुस्तक पर यूरोप के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में चर्चा को गई है और इस पुस्तक का अनुवाद संसार की सभी बड़ी भाषाओं में हो चुका है। यूरोपीय विद्वान भी यह बात स्वीकार करते हैं कि इब्नुल हैसम अपने युग का सबसे महान भौतिकशास्त्री था। इनुल हैसम ने नील नदी के बहाव से सम्बंधित एक परियोजना बनाई। जिससे पूरे वर्ष कृषि के लिए पानी मिल सके। वह इस परियोजना को लागू करने के लिए मिस्र भी गये लेकिन उसे व्यवहारिकता में लाना मुश्किल था।

*****