
Zikr e Hazrat Syed Jalaluddin Surkh-Posh Bukhari Rehmatullah alaih.



जंगल में एक हिरनी रहती थी। उसके दो बच्चे थे। एक बार वह
बाहर निकली तो किसी शिकारी ने जाल बिछा रखा था। बेखबर हिरनी उस जाल में फंस गई। जब उसने देखा कि मैं तो फंस गई हूं तो बड़ी परेशान हुई। उसकी खुश किस्मती देखिए कि उसी जंगल में हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि में वसल्लम तशरीफ़ लाते हुए उसे नज़र आये। जब उसने हुजूर रहमते आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा तो पुकारी या रसूलल्लाह! मुझ पर रहम फ़रमाईये हुजूर ने उसकी पुकार सुनी और उसके पास तशरीफ़ लाकर फ़रमायाः क्या हाजत है? वह बोली हुजूर! मैं इस आराबी के जाल में फंस गई हूं। मेरे दो छोटे-छोटे बच्चे हैं जो इस क़रीब के पहाड़ों में हैं। थोड़ी देर के लिये आप मेरी ज़मानत देकर इस जाल से मुझे आज़ाद करा दीजिये ताकि मैं आखरी बार एक मर्तबा बच्चों को दूध पिला आऊ। हुजूर! मैं दूध पिलाकर फिर यहीं वापस आ जाऊंगी। हुजूर ने फ़रमाया : अच्छा! जा मैं तुम्हारी ज़मानत देता हूं और तुम्हारी जगह यहीं ठहरता हूं। तू बच्चों को दूध पिला कर जल्दी वापस आ जा | चुनांचे हिरनी को आपने रिहा कर दिया और वहां खुद क्याम फरमा हो गये। आराबी जो मुसलमान न था, कहने लगा : अगर मेरा शिकार वापस न आया तो अच्छा न होगा । हुजूर ने फ़रमाया : तुम देखो तो सही कि हिरनी वापस आती है या नहीं? चुनांचे हिरनी बच्चों के पास पहुंची और बच्चों को दूध पिलाकर फ़ौरन वापस लौटी। आते ही हुजूर. के क़दमों पर सर डाल दिया। यह एजाज़ देखकर वह आराबी भी क़दमों पर गिर गया।
झुक गये सर हिरनी व काफ़िर के दोनों साथ-साथ मुस्तफ़ा ने उनके सर पर रख दिया रहमत का हाथ फिर बशारत उसको और इसको मिली सरकार से जाल से आजाद तू, और तू अज़ाबे नार से (शिफ़ा शरीफ जिल्द २, सफ ७६)
सबक : हमारे हुजूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम जानवरों तक के लिये रहमत हैं। जानवर भी हुजूर के हुक्म की तामील करते हैं। फिर जो इंसान होकर हुजूर का हुक्म न माने वह जानवरों से भी गया गुज़रा है या नहीं?

आपका विसाल– अब्दुल शकूर माहे मऊ से मुसाफ़िर ख़ाना मुहम्मद यूनुस के घर पर आएं और हज़रत को माहे मऊ ले जाना चाहा लेकिन आप किसी तरह तैयार नहीं हुएं! अब्दुल शकूर ने
कहा हुजूर माहे मऊ के उर्स की तारीख़ क़रीब हो गयी है! उर्स का । इन्तेज़ाम कैसे होगा, तो हज़रत बड़े पशो पेश के साथ तैयार हुएं! ४ जून १९७९ ईस्वी मुताबिक़ १३९९ हिजरी बरोज़ यक शम्बा को मुसाफ़िर खाना से माहे मऊ तशरीफ़ लाएं! दो शम्बा को हज़रत की मौजूदगी में लकड़ी चीरी गयी और कुछ दूसरे इंतेज़ाम किये गयें! मंगल की शब में अब्दुल शकूर से दरगाह किछौछा शरीफ़ और दरगाहु जायस में कुछ मज़ारात के बारे में पूछते रहें कि फलां की मज़ार कहाँ है. फ़लां की मज़ार कहाँ है अपने वालिदैन के मजार के बारे में भी पूछा, अब्दुल शकूर अपनी मालूमात के हिसाब से जवाब देते रहें! बुध को ११ बजे दिन तक ठीक थें ११ बजे के बाद तबियत कुछ ख़राब हो गयी लेकिन फिर संभल गयी! जुमेरात के दिन सुबह हाथ मुँह धुलाया गया! शरबत रूह अफ़ज़ा और दूध नोश फ़रमाया! अण्डा आया लेकिन आपने नहीं खाया और कुटी के पीछे चारपाई पर तशरीफ़ फरमा रहें! कभी उठकर टहलने लगतें कभी फिर लेट जातें! तक़रीबन आठ बजे दिन में कुटी के अंदर तशरीफ़ लाएं और चारपाई पर लेट गयें! ११ बजे || दिन में अचानक फिर तबियत खराब हो गयी और ऊपर का आधा जिस्म बहुत ज़्यादा गरम हो गया और बेचैनी शुरू हो गयी! अब्दुल शकूर से कभी तलवा कभी सर और कभी कमर दबवातें और कभी अपनी पुश्त सहेलवातें और फ़रमातें कहो हज़रत बास बास और खुद भी उसी लफ्ज़ को दोहरातें रहतें! डेढ़ बजे दो तीन चूंट पानी पिया और लेट गयें। थोड़ी देर के बाद यकायक उठे और सर सजदे में झुका दिया और ऐन हालते सजदा में ८ जून १९७९ ईस्वीं मुताबिक़ १३९९ हिजरी १ रजबुल मुरज्जब बउम्र ४३ साल ३ महीना बरोज़ नौचंदी जुमेरात बवक़्त २ बजे दिन अपनी जान जाने आफ़रीन के सुपुर्द कर दिया और इस तरह आसमाने वलायत का ये चमकता हुआ सितारा हमेशा हमेश के लिए हमारी आँखों से ओझल हो गया!
तज्हीज़ो तकफ़ीन– अब्दुल शकूर माहे मऊ चाहते थे कि हज़रत का मज़ार शरीफ़ कुटिया के बग़ल में बनवाया जाये! उधर मुसाफ़िर ख़ाना के लोग हज़रत के वसीयत के मुताबिक़ हज़रत के जसदे मुबारक को मुसाफ़िर खाना ले जाना चाहते थे! छटई के पुरवा के लोग चाहते थे की हज़रत की आखरी आरामगाह छटई के पुरवा में हो! इस मसले पर झगड़ा छिड़ गया और नौबत यहाँ तक आ गयी की
लाठी डण्डा निकल आया और आपके अकीदतमंदों में जबरदस्त कशीदगी फैल गयी! ८ घंटा इसी तरह बीत गया बिलआख़िर जनाब रियाजुल हसन साहब नियावां व जनाब अब्दुल सत्तार साहब छटई के पुरवा और हज़रत मौलाना मुहम्मद हनीफ़ साहब क़िब्ला मोहतमिम मदरसा सिराजुल उलूम निहालगढ़ और कुछ संजीदा लोगों ने हालात की नज़ाक़त देखकर बड़ी दानिशमंदी से काम लिया और आपके जसदे मुबारक को जायस ले चलने का फैसला किया! आप हज़रात ने सख्ती से लोगों से कहा की हज़रत के जसदे मुबारक को आपके आबाई वतन जायस ले जाया जायेगा और आपकी तज्हीज़ो तकफ़ीन अन्दरूने दरगाह हज़रत मख़दूम अशरफ़ जायस होगी और बाद हुज्जत तमाम इसी बात पर इत्तेफ़ाक़ हो गया! इस तरह हज़रत का जसदे अतहर आपके वतन जायस पहुँचा और आपके पुश्तैनी दौलतकदे पर रखा गया!
आखरी दीदार- आपका जसदे मुबारक जब आपके दौलत कदे पर पहुँचा तो आपके चाहने वालों में ये बात जंगल की आग के तरह फैल गयी! हर तरफ़ से जायस आने वालों की क़तार लग गयी! हर कोई आपके आखरी दीदार का मुश्ताक़ था! सुल्तानपुर रायबरेली प्रतापगढ़ के सारे मदारिस बंद कर दिए गये थें! जायस के तारीख में ये एक यादगार दिन था! हर तरफ़ एक कोहराम बपा था! मुस्लिम गैर मुस्लिम सभी पर क़यामत टूट पड़ी थी! बाद नमाज़ जुमा आपको गुस्ल दिया गया और कफ़न पहना कर आपके जसदे मुबारक को आखरी दीदार के लिए आपके घर के बाहर बंगला पर रख दिया गया।
जुलूसे जनाज़ा– बाद नमाज़े मग़रिब जुलूसे जनाज़ा जायस बंगला से दरगाह मखदूम अशरफ़ के तरफ़ रवाना हुआ! आलम ये था कि जनाज़े को कांधा देने के लिए लोग टूटे पड़ रहे थें! हिन्दू मुस्लिम रास्ते में अदबन खड़े थे और आगे बढ़ बढ़ कर जनाज़े को कांधा देते थे। आपके जनाज़े में मखलूके ख़ुदा इस कसरत से थी की तिल धरने की जगह ना थी। नमाज़े जनाज़ा- ईदगाह जायस पर हज़रत की नमाज़े जनाज़ा अदा की गयी! क़सीर लोग होने पर ईदगाह की जगह छोटी पड़ गयी जिसके सबब उलेमाकिराम ने दो बार नमाज़े जनाज़ा की जमात करने का फैसला किया! पहली बार नमाज़े जनाज़ा हज़रत मौलाना मुहम्मद हनीफ़ साहब निब्ला (मदरसा सिराजुल उलूम लतीफिया निहालगढ़) ने पढ़ाया! दूसरी बार नमाज़े जनाज़ा हज़रत मौलाना सैय्यद मक़सूद अशरफ़ जायसी साहब क़िब्ला ने पढ़ाई! अहले खानदान, मुरीदीन उलेमा व मशाइन के शिरकत में ९ जून सन | १९७९ ईस्वी मुताबिक़ ३ रजाबुल मुरज्जब सं १३९९ हिजरी शब शम्बा बवक्त १० बजे रात को अन्दरून दरगाह मख्दूम अशरफ़ जायस अपने वालिदे मोहतरम के पहलू में मदफ़्न हुएं!
आपके जनाज़े में गैर मुस्लिमों की शिरकत– आपके जनाज़े में गैर मुस्लिम अक़ीदतमंद भी कसीर तादाद में शिरकत के लिए आएं! किशन खतरी बाज़ार साहेबगंज मुसाफ़िर ख़ाना ज़िला सुल्तानपुर ने चालीस मीटर छालटीन कपड़े का एक थान हज़रत के कफ़न के लिए दिया! जमुना प्रसाद चूने वाले शहर सुल्तानपुर ने तीसरे दिन आपके फ़ातेहा में शैनील की खूबसूरत कामदार चादर आपके मज़ार मुबारक पर चढ़ाया! ये पहली चादर थी जो हज़रत के मज़ार पर चढ़ाई गयी।