*एतकाफ*
*🌟 اَلصَّــلٰوةُوَالسَّلَامُ عَلَيْكَ يَارَسُوْلَ اللّٰهﷺ*
*_🌴 एतिकाफ की किस्मे_*
🌹 एतिकाफ की तीन किस्मे है (1) ऐतिकाफे वाजिब, (2) ऐतिकाफे सुन्नत, (3) ऐतिकाफे नफ्ल।
*_💖 ऐतिकाफे वाजिब_*
👉 एतिकाफ की नज़र (यानी मन्नत) मानी यानी ज़बान से कहा “में अल्लाह के लिये फुला दिन या इतने दिन एतिकाफ करूँगा”। तो अब जितने भी दिन का कहा है उतने दिन का एतिकाफ करना वाजिब हो गया।
👉 ये बात खास कर याद रखिये की जब कभी किसी भी किस्म की मन्नत मानी जाए जस में ये शर्त है की मन्नत के अल्फ़ाज़ ज़बान से अदा किये जाए सिर्फ दिल ही दिल में मन्नत की निय्यत कर लेने से मन्नत सहीह नही होती।
*📚 (रद्दुल मुहतार, 3/430)*👉 मन्नत का एतिकाफ मर्द मस्जिद में करे और औरत मस्जिदे बैत में। इन में रोज़ा भी शर्त है। (औरत घर में जो जगह नमाज़ के लिये मखसुस कर ले उसे _मस्जिदे बैत_ कहते है)
*_🇨🇨 ऐतिकाफे सुन्नत_*
👉 रमज़ान के आखरी 10 दिन का एतिकाफ “सुन्नते मुअक्कदा अलल किफाया” है
*📚 (दुर्रे मुख्तार मअ रद्दुल मुहतार, 3/430)*👉 यानी पुरे शहर में किसी एक ने कर लिया तो सब की तरफ से अदा हो गया और अगर किसी एक ने भी न किया तो सभी मुजरिम हुए।
*📚 (बहारे शरीअत, 5/152)*👉 इस एतिकाफ में ये ज़रूरी है की रमज़ान की बीसवी तारीख को गुरुबे आफताब से पहले पहले मस्जिद के अंदर ब निय्यते एतिकाफ मौजूद हो और उनतीस के चाँद के बाद या तिस के गुरुबे आफताब के बाद मस्जिद से बहार निकले।
*📚 (बहारे शरीअत, 5/151)*👉 अगर 20 रमज़ान को गुरुबे आफताब के बाद मस्जिद में दाखिल हुए तो एतिकाफ की सुन्नते मुअककदा अदा न हुई बल्कि सूरज डूबने से पहले पहले मस्जिद में तो दाखिल हो चूके थे मगर निय्यत करना भूल गए थे यानी दिल में निय्यत ही नही थी (निय्यत दिल के इरादे को कहते है) तो इस सुरतमे भी एतिकाफ की सुन्नते मुअककदा अदा न हुई। अगर गुरुबे आफताब के बाद निय्यत की तो नफ्लि एतिकाफ हो गया।
👉 दिल में निय्यत कर लेना ही काफी है ज़बान से कहना शर्त नही। अलबत्ता दिल में निय्यत हाज़िर होना ज़रूरी है साथ ही ज़बान से भी कह लेना ज़्यादा बेहतर है।*_🌴 एतिकाफ की निय्यत इस तरह कीजिये_*
👉 में अल्लाह की रिज़ा के लिये रमज़ान के आखरी 10 दिन का सुन्नते एतिकाफ की निय्यत करता हु।
*📚 (फ़ज़ाइले रमज़ान, 343)*
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☆▬▬▬▬ஜ۩۞۩ஜ▬▬▬▬☆हज़रत उम्मुलमूमिनीन सैय्यदा आईशा सिद्दीक़ह रज़ियल्लाहु अन्हा से रिवायात है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम रमज़ान के आख़री अशरह का एतकाफ फरमाया करते।
(बुख़ारी शरीफ)हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा से मरवी है कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने मुअतकिफ़ (एतकाफ में बैठने वाले) के बारे में फरमाया:
वह गुनाहों से बाज़ रहता है, और नेकियों से उसे इस क़दर हिस्सा मिलता है जैसे उस ने तनाम नेकियां कीं।
(इब्ने माजा शरीफ)हज़रत इमामे हुसैन रज़ियल्लाहु अन्ह से रिवायत है कि हुज़ूर अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया:
जिस ने रमज़ान में दस दिनों का एतकाफ कर लिया तो ऐसा है जैसे दो हज और दो उमरे किये।
(बैहक़ी)*मसअलह*:- मस्जिद में अल्लाह के लिए नियत के साथ ठहरना एतकाफ है। और उस के लिए मुसलमान आकिल (यानी अक़्ल वाला) और जनाबत (नापाकी) से पाक होना शर्त है।
*मसअलह*:- सब से अफ़ज़ल मस्जिदे हरम शरीफ में एतकाफ है, फिर मस्जिदे नबवी में, फिर मस्जिदे अक़्सा में, फिर उस में जहां बड़ी जमाअत होती हो।
*मसअलह*:- औरत को मस्जिद में एतकाफ मकरूह है, बल्कि वह घर में ही एतकाफ करे। मगर उस जगह करे जो उस ने नमाज़ पढ़ने के लिए मुक़र्रर कर रखी है।
एअतिकाफ
और औरतों को हाथ ना लगाओ जब तुम मस्जिदों में एअतिकाफ से हो
📕 पारा 2,सूरह बक़र,आयत 187
*हदीस* – मोअतकिफ ना तो किसी मरीज़ की इयादत को जा सकता है ना जनाज़े में शामिल हो सकता है ना किसी औरत को छू सकता है और ना मस्जिद से बाहर निकल सकता है
📕 अबु दाऊद,जिल्द 2,सफह 492
*हदीस* – इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का क़ौल है कि हुज़ूर सल्लललाहु तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं जिसने रमज़ान में 10 दिनों का एअतिकाफ किया तो उसे 2 हज व 2 उमरे का सवाब मिलेगा
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 146
*मसअला* – मस्जिद में रब की रज़ा के लिए ठहरना एअतिकाफ कहलाता है इसकी 3 किस्में हैं
*1. वाजिब* – किसी ने मन्नत मानी कि मेरा ये काम होगा तो मैं 1 या 2 या 3 दिन का एअतिकाफ करूंगा तो उतने दिन का एअतिकाफ उस पर वाजिब होगा
*2. सुन्नते मुअक़्किदह* – रमज़ान में आखिर 10 रोज़ का यानि बीसवें रमज़ान को मग़रिब के वक़्त बा नियत एअतिकाफ मस्जिद में मौजूद हो,ये एअतिकाफ सुन्नते मुअक़्किदह अलल किफाया है यानि अगर पूरे मुहल्ले से 1 आदमी एअतिकाफ में बैठ जाये तो सबके लिए काफी है पर 1 भी नहीं बैठा तो सब गुनाहगार होंगे
*3. मुसतहब* – जब भी मस्जिद में दाखिल हों तो पढ़ लें ‘नवैतो सुन्नतल एअतिकाफ’ तो जब तक मस्जिद में रहेंगे एअतिकाफ का सवाब पायेंगे
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 147-148
*मसअला* – मर्द का मस्जिद में एअतिकाफ करना ज़रूरी है और अगर औरत एअतिकाफ में बैठना चाहे तो जिस जगह वो नमाज़ पढ़ती है वहां एअतिकाफ में बैठ सकती है
📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 129
*मसअला* – अगर औरत ने घर में नमाज़ के लिए जगह मुकर्रर नहीं की है तो एअतिकाफ में नहीं बैठ सकती हां ये कर सकती है कि जिस जगह एअतिकाफ में बैठना चाहे तो पहले उसी जगह को नमाज़ के लिए खास कर ले फिर एअतिकाफ में बैठे
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 147
*मसअला* – एअतिकाफ रमज़ान के लिए रोज़ा रखना शर्त है तो अगर रोज़ा नहीं रखा तो ये एअतिकाफ नफ्ल होगा सुन्नत नहीं
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 148
*मसअला* – मन्नत के एअतिकाफ के लिए भी रोज़ा रखना शर्त है अगर चे नियत करते वक़्त कहा भी हो कि ‘सिर्फ 1 महीने का एअतिकाफ करूंगा रोज़ा नहीं रखूंगा’ फिर भी रोज़ा रखना वाजिब है
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 148
*मसअला* – औरत ने एअतिकाफ की मन्नत मानी तो शौहर रोक सकता है अगर रोकता है तो औरत या तो तलाक़ के बाद या उसकी मौत के बाद मन्नत पूरी करे युंही शौहर ने इजाज़त दे दी फिर नहीं रोक सकता हां एक महीने की इजाज़त दी और औरत लगातार 1 महिना एअतिकाफ करना चाहती है तो भी रोक सकता है कि थोड़ा थोड़ा करके एक महीना पूरा करे और अगर किसी खास महीने का नाम लेकर इजाज़त दी तो अब नहीं रोक सकता
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 149
*मसअला* – अगर मोअतकिफ मस्जिद से बाहर निकला तो एअतिकाफ टूट जायेगा जिसकी क़ज़ा वाजिब होगी
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 150
*मसअला* – जिस तरह बिला उज़्रे शरई मर्द का मस्जिद से निकलना एअतिकाफ तोड़ देगा उसी तरह औरत का भी घर से बिला उज़्रे शरई निकलना एअतिकाफ को तोड़ देगा जिसकी क़ज़ा उस पर वाजिब होगी अगर चे भूल से ही निकले या सिर्फ 1 मिनट के लिए ही बाहर निकले
📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 132
*मसअला* – मोअतक़िफ के मस्जिद से बाहर निकलने के 2 उज़्र हैं
*1. हाजते शरई* – मसलन जिस मस्जिद में ये एअतिकाफ में है वहां जुमे की नमाज़ नहीं होती तो जुमा पढ़ने बाहर जा सकता है या अज़ान देने लिए मीनारे पर जाना है और रास्ता बाहर से है तो जा सकता है
*2. हाजते तबई* – मसलन पेशाब पखाना वुज़ू गुस्ल अगर खारिजे मस्जिद में इनका इंतेज़ाम नहीं है तो बाहर जा सकता है
📕 बहारे शरीअत,हिस्सा 5,सफह 150
*मसअला* – मोअतकिफ को फालतू बातों से परहेज़ ज़रूरी है हां अगर लोगों को दर्स देने के लिए महफिल करता है तो इजाज़त है
📕 दुर्रे मुख्तार,जिल्द 2,सफह 135
*मसअला* – मस्जिद में खाना पीना सिवाये मोअतकिफ के दूसरों को नाजायज़ है तो जो लोग मस्जिद में अफ्तार करते हैं उन्हें चाहिये कि एअतिकाफ की नीयत करके बैठे वरना गुनाहगार होंगे
📕 अलमलफूज़,हिस्सा 2,सफह 108
जारी रहेगा………..
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————————————–Aur aurton ko haath na lagao jab tum masjidon me etekaaf se ho
📕 Paara 2,surah baqar,aayat 187
*HADEES* – Motaqif na to kisi mareez ki iyadat ko ja sakta hai na janaze me shaamil ho sakta hai na hi masjid se baahar nikle aur na kisi aurat ko chhuye
📕 Abu daood,jild 2,safah 492
*HADEES* – Imaam husain raziyallahu taala anhu ka qaul hai ki huzoor sallallaho taala alaihi wasallam farmate hain ki jisne ramzan me 10 roz ka eteqaf kiya to use 2 hajj wa 2 umre ka sawab milega
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 146
*MASLA* – Masjid me rub ki raza ke liye thaharna eteqaf kahlata hai iski 3 kismein hain
*1. Wajib* – kisi ne mannat maani ki mera ye kaam ho jayega to main 1,2 ya 3 din ka eteqaf karunga to ab itne din ka eteqaf karna waajib hoga
*2. Sunnate muaqqidah* – ramzan me aakhir roz ka yaani beeswe ramzan ko magrib ke waqt ba niyat eteqaf masjid me maujood ho,ye eteqaf sunnate muaqqidah alal kifaya hai yaani agar poore muhalle se 1 aadmi baith jaaye to sabke liye kaafi hai aur agar ek bhi nahin baitha to sab gunahgar honge
*3. Mustahab* – jab bhi masjid me daakhil hon to padhen ‘nawaito sunnatal eteqaf’ ye mustahab hai ki jab tak masjid me rahenge eteqaf ka sawab paayenge
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 147-148
*MASLA* – Mard ke liye masjid me eteqaf karna zaruri hai aur agar aurat eteqaf me baithna chahe to jis jagah wo namaz padhti hai wahan eteqaf me baith sakti hai
📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 129
*MASLA* – Agar aurat ne ghar me namaz ke liye jagah muqarrar nahin ki hai to etikaaf me nahin baith sakti haan ye kar sakti hai ki jis jagah etikaaf me baithna chahe to usi jagah ko namaz ke liye khaas kar le
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 147
*MASLA* – Eteqaf ramzan ke liye roza rakhna shart hai to agar kisi ne eteqaf to kiya magar roza nahin rakha to ye eteqaf sunnat nahin balki nafl hoga
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 148
*MASLA* – Mannat ke etikaaf ke liye bhi roza rakhna shart hai agar che niyat karte waqt kaha bhi ho ki “sirf etikaaf 1 mahine ka etikaaf karunga roza nahin rakhunga” phir bhi roza rakhna waajib hai
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 148
*MASLA* – Aurat ne etikaaf ki mannat maani to shauhar rok sakta hai agar rokta hai to aurat ya to talaaq ke baad ya uski maut ke baad mannat poori kare yunhi shauhar ne ijazat de di phir nahin rok sakta haan ek mahine ki ijazat di aur aurat lagataar 1 mahina etikaaf karna chahti hai to bhi rok sakta hai ki thoda thoda karke ek mahina poora kare aur agar kisi khaas mahine ka naam lekar ijazat di to ab nahin rok sakta
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 149
*MASLA* – Agar motaqif masjid se baahar nikla to eteqaf toot jayega jiski qaza uspar waajib hogi
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 150
*MASLA* – Jis tarah bila uzre sharayi mard ka masjid se nikalna eteqaf tod dega usi tarah aurat ka bhi ghar se bila uzre sharayi nikalna eteqaf ko tod dega jiski qaza uspar wajib hogi agar che bhool se hi nikle ya sirf 1 minute ke liye hi baahar ho
📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 132
*MASLA* – Motaqif ke masjid se baahar nikalne ke liye 2 sharayi uzr hain
*1. Haajate sharayi* – Maslan jis masjid me ye eteqaf me baitha hai wahan jume ki namaz nahin hoti to juma padhne ke liye wo doosri masjid me ja sakta hai magar sirf namaz ke liye yunhi azaan dene ke liye meenare par jaana hai aur raasta baahar se hai to ja sakta hai
*2. Haajate tabayi* – Maslan peshab pakhana gusl wuzu agar in sabka intezam khaarije masjid me nahin hai to baahar ja sakta hai
📕 Bahare shariyat,hissa 5,safah 150
*MASLA* – Motaqif ko faaltu baaton se parhez zaruri hai haan agar logon ko dars dene ke liye mahfil karta hai to ijazat hai
📕 Durre mukhtar,jild 2,safah 135
*MASLA* – Masjid me khaana peena siwaye motaqif ke doosro ko najayaz hai to jo log masjid me aftaar wagairah karte hain unko chahiye ki eteqaf ki niyat karke baithen warna sakht gunahgar honge
📕 Almalfooz,hissa 2,safah 108
Month: May 2020
Hadeeth Ramzan 17

Hadeeth on Ramzan 13

21 Ramzan Youm e Shahdat e Mawla Ali Alaihissalam

यौम ए शहादत
मौला ए काएनात
अली इब्न अबू तालिब स.अ.व. की (दुनीयावी)
आले नबी औलादे अली ज़िगर गोसऐ
बीबी बतूल
जाने हसनैन करीमैन
सुल्तानुल अज़म अताए रसूल
ख़्वाजा सैयद मुईनुददीन हसन संजरी चिश्ती सुम्मा अज़मेरी र.अ. ने
पारा 21सूरा लुक़मान
आयत 27
वलौ अन्ना मा फ़िल अरज़े मिन सज़ारतिन अक़लामुन वल बहरो यमुददोहू मिन बादेही सबअतो अबहोरिन मा नफ़ेदत कलेमातो अल्लाह , इन्नल्लाहा अज़ीज़ुन हकीमुन०
तरज़ुमा:-अल्लाह तआला फरमाता है अगर पूरी ज़मीन मे जितने दरख़्त पेड़ हैं
सब कलम पेन हो जाऐं और जितने समुन्दर हैं सब सियाही हो जाऐं
और ऐसे पेड़ और समुन्दर और हो जाऐं तब भी अल्लाह के कलेमात
(यानि पंजतन पाक स.अ.व.)
की तारीफ पूरी नही लिखी जा सकती बेशक अल्लाह इज़्ज़त वाला हिकमत वाला है ।
अब कलेमात यानी कलमात को समझें
अल्लाह तआला ने
हर चीज़ के ज़ोड़े ख़ल्क किऐ हैं
मुज़क्कर (नर ,आदमी)
मोअन्नस (नारी,औरत)
इसी तरह अरबी के 28 हरूफों मे (शबदों) मे भी मोज़क्कर ,नर
मोअन्नस नारी बनाऐं
कलमात मे 5 हर्फ़ हैं
क -काफ -मुज़क्कर -मर्द
ल- लाम- मुज़क्कर-मर्द
म-मीम- मुज़क्कर-मर्द
अ-अलिफ़-मुज़क्कर मर्द
त-ता- मोअन्निस-औरत
अब पंजतन पाक मे
मोहम्मद स.अ.व.
मौला अली स.अ.व.
इमाम हसन स.अ.व.
इमाम हुसैन स.अ.व.
मरकज़े पंजतन
सैयदा बीबी फातमा स.अ.व.
यानी इनमे 4 मोज़क्कर
और एक मोअन्नस हैं
इस आयत का तरज़ुमा ख्वाजा गरीब नवाज़ चिश्ती अजमेरी र.अ. ने
अपने फारसी अश्आर मे मौला अली और पंजतन पाक के लिऐ यूँ फरमाया
औसाफ़े अली बा गुफ़तगू
मुमकिन नेस्त
गुनजाएशे बहरो दर सबू मुमकिन नेस्त
मन ज़ाते अली
राबा वाजबी के दानम
इल्ला दानम के मिस्ले ऊ मुमकिन नेस्त
यानि
मौला ए काएनात अली इब्न अबू तालिब स.अ.व. के औसाफ ब्यान करना मुमकिन नही हैं
तमाम जमीन के दरख़तो को अगर कलम और तमाम समुन्दरों को सियाही बनादी जाए
तब भी मजहरुल अजाइब मौला अली के औसाफ मरतबते मौज्ज़े नही लिखे जा सकते
सिर्फ जितने औसाफ अल्लाह और उसके रसूल स.अ.व. ने मौला अली स.अ.व.के लिए फरमाया और सबको अमल करके भी दिखाया
और ख़्वाजा मुईनुददीन र.अ. फरमाते हैं के काएनात मे मौला अली इब्न अबू तालिब के मिस्ल कोई नही है
( सूरह बकरह आयत 115
व लिल्लाहिल मशरिको वल मग़रिबो
तरज़ुमा ,;- और मशरिक व मग़रिब सब अल्लाह ही का है
फ ऐनमा तूवल्लू फसम्मा वज्हुल्लाह
तरजुमा ;- तुम जिधर अपना चहरा करो
उधर अल्लाह का चहरा है
और रसूल अल्लाह स.अ.व. ने फरमाया अली वज्जहुल्लाह है यानी अली का चहरा अल्लाह का चहरा है
अल नज़रो इला वज्हे अली यिन इबादतुन (हदीस मुस्तदरक) यानि अली का चहरा अल्लाह का चहरा है
और इसे देखना इबादत है
और मौला अली ज़िक्रअल्लाह हैं
अली का ज़िक्र करना अल्लाह का ज़िक्र करना है
और सूरह बकरह आयत 176
ज़ालेका बेअन्नल्लाहा नज़्ज़ल्ल किताबा बिल हक
तरजुमा:- अल्लाह ने किताब हक के साथ उतारी
रसूलअल्लाह स.अ.व. ने फरमाया अली हक के साथ है और हक अली के साथ
अली कुरआन के साथ है और कुरआन अली के साथ
ये एक दूसरे से कभी जुदा ना होगें और मैदान ए महशर मे आबे कौशर मे वारिद , मौजूद होगें
शैख अब्दुल हक मोहददिस दहलवी र.अ. लिखते है कि किताबी कुरआन सामित यानी खामोश कुरआन है और मौला अली रसूल अल्लाह स.अ.व.के फरमान के मुताबिक नातेके कुरआन यानि बोलता कुरआन हैं)
नोट:-कलमात यानि पंजतन पाक स.अ.व. की सनद पारा 1 सूरह बकरह आयत 37
फता लक़्क़ा आदमो मिन रब्बेही कलेमातिन फ़ताबा अलैहे ,
इन्नाहू हुवा तव्वाबुर्रहीम०
हमने आदम अ.स. की तौबा की दुआ रब के कलेमात के वास्ते से हुई यानी पंजतन पाक स.अ.व.के नामों के वास्ते वसीले से रब ने कुबूल फरमाई
बेशक वही तौबा कुबूल फरमाने वाला है
इमाम व मौला अली अ.स.
पारा 30 सुरह अलनबा आयत 29
व कुल्ला शैइन अहसैनाहु किताबन०
तरजुमा ;- और हमने हर चीज किताब मे लिख रखी है
पारा 22 सूरह यासीन आयत 12 ;- व कुल्ला शैइन अहसैनाहू फी इमामिन मुबीन०
तरजुमा :- और हमने हर शै इमामे मुबीन के अहाते मे रखा है
पारा 26 सूरह मोहम्मद आयत 11 ज़ालेका बेअन्नल्लाहा मौला अल्लज़ीन आमनू
तरजुमा ;- ईमान वालों का मौला अल्लाह है
व अन्नल काफेरीना ला मौला लहुम ०
तरजुमा ;- और काफ़ेरों का कोई मौला नही
रसूलअल्लाह स.अ.व. ने गदीर खुम के मैदान मे सवा लाख सहाबा के मजमे मे अल्लाह के हुक्म से ऐलान फरमाया
जिस जिस का मौला अल्लाह है उस उस का मै मौला हूँ
और जिस जिस का मै मौला हूँ उस उस के ये अली इब्न अबू तालिब मौला हैं
पारा 17 सूरह अल हज आयत 78
वाअतसेमू बेअल्लाह तरजुमा ;-अल्लाह की रस्सी (मौलाअली) को मजबूती से थाम लो
हुवा मौलाकुम
तरजुमा;- वो तुम्हारा मौला है
फा नेमल मौला व नेमल नसीर ०
तरजुमा;- क्या ही अच्छा मौला है और
क्या ही अच्छा मददगार है
पारा 2 सूरह बकरह आयत 189
वा लैसल बिर्रो बेअन तातू अलबूयूता मिन ज़ूहूरेहा वलाकिन्नल बिर्रा मनि तक़ा वातू अलबूयूता मिन अबवाबेहा वत्तकूअल्लाह लअल्लकुम तुफलेहूना ०
तरजुमा;- और ये कुछ भलाई अच्छाई नही है के घरों मकानो शहरों में पीछे से आओ
हाँ भलाई अच्छाई परहेजगारी ये है के घरों मे मकानो मे शहरों मे दरवाजे से आओ
और अल्लाह से डरते रहो
इस उम्मीद पर के (दुनीया व आखरत की) फलाह कामयाबी पाओ
और रसूल अल्लाह स.अ.व. ने मौला अली के लिए फरमाया
अना मदीनातुल व अली बाबोहा
मै इलमों का शहर हूँ और अली उसके दरवाजे
तो जो मुझ तक और मुझ से अल्लाह तक पहुँच ना चाहता हो वो पहले मौला अली की दिल से गुलामी मे आऐ और उसके दुश्मनो से बेज़ार रहे और उन्हे अपना दुश्मन समझे
और यह केवल हलाली के नसीब मे है
मौला ए काएनात की बारगाह मे नज़राने अकीदत
कासिमे खुल्द अली साकी ए कौशर हैं अली
हादीओ महदी अली
हैदरो सफ्दर हैं अली
मुर्तुज़ा शेरे खुदा
फ़ातेहे खैबर हैं अली
मज़हरे नूरे खुदा
अक्से प्यम्बर हैं अली
अर्श का दिल हैं अली
अर्शे मुअल्ला की कसम
नूरे खालिक हैं अली
नूरे मनअल्लाह की कसम
दोनों आलम मे दरिखशाँ
है विलायत उनकी
ता अबद जारी व सारी है हुकूमत उनकी
ला शुबह हक की इबादत है ज़ियारत उनकी
हाँ शहादत की शहादत है
शहादत उनकी
दस्ते कुदरत हैं अली
ज़ोरे यदुल्लाह की कसम
हुस्ने काबा हैं अली
हुर्मते काबा की कसम
मुस्तफा चाँद हैं तो चाँद का हाला हैं अली
सुब्हे इस्लाम के चहरे का
उजाला हैं अली
ज़ीनते फ़क़रो गेना
आला व बाला हैं अली
हुस्ने फितरत की किताबों का हवाला हैं अली
नूरे ईंमाँ हैं अली
जज़्बाऐ गैरत की कसम
शरहे क़ुरआँ हैं अली
एकएक आयत की कसम
मिस्ले हारून हैं अली
मिस्ले मसीहा की कसम
हामेले फ़तहे मुँबीं
फैज़ का दरिया हैं अली
इल्म के शहर का दर
हक की तजल्ला हैं अली
काबे मे पैदा हुऐ
आप भी काबा हैं अली
जाने अहमद हैं अली
जाने रिसालत की कसम
शाने अहमद हैं अली
शाने रिसालत की कसम
एक थे एक हैं
और एक रहेगें हैदर
एक हैं ज़हरा तो
दो कैसे बनेगें हैदर
हक उधर होगा
जिधर चहरा करेंगें हैदर
होगा कुरआन उधर
जिस सू चलेंगें हैदर
इज़्ज़ते दीं हैं अली
दीनकी इज़्ज़त की कसम
हुस्ने इरफ़ाँ है अली
हक़्क़े हकीकत की कसम
ग़ाज़ाए रूऐ वफा
इश्क का मस्दर हैं अली
मरक्ज़े नूरे अली
हुस्न का महवर हैं अली
फ़क़्र का घर हैं अली
हादीओ रहबर हैं अली
लौहे महफ़ूज का इक
नक़्शे मुनव्वर हैं अली
सिदक़ो सिददीक़ अली
सिदक़ो सदाक़तकी कसम
हैं अली ज़ौके नबी
ज़ौके नबूवत की कसम
काने ईंमाँ हैं अली
ईमान का मरकज़ भी
अली
बहरे इरफ़ाँ हैं अली
इरफानका मर्कज़भीअली
गंजे फ़ैजाँ हैं अली
फ़ैजानका मर्कज़ हैं अली
शरहे ईंकान हैं अली
ईंकानका मरकज़भीअली
मेरे महबूब अली
मुझको मुहब्बत की कसम
हक के मतलूब अली
हक़्क़े इमामत की कसम
शाहे मरदाँ हैं अली
कुव्वते यज़दाँ हैं अली
माहे ताबाँ है अली
महरे दरख़्शाँ है अली
इज़्ज़ते आले अबा
आने शहीदाँ हैं अली
शाहे शाहाने ज़माँ
ज़ोरे गरीबाँ हैं अली
मेरे हैं मौला अली
उनकी विलायत की कसम
उनका साइम हूँ गदा
उनकी सख़ावत की कसम
ये पैगाम लिखने की दौलत ख्वाजा सैयद मुईनुददीन हसन संजरी सुम्मा अजमेरी र.अ. के फ़ज़्ल से और पीरो मुर्शिद सैयद फखरू मियां चिश्ती साबरी के करम से व सैयद फरीद मियां सैयद कम्बर मियां
सैयद अली अहमद चिश्ती साबरी हुजरा नं.6 दरगाह अजमेर शरीफ वालों की निसबत से मिली है
अपने घर वालों के साथ ज़िक्रे शहादते मौला अली करें रब्बुल आलमी की बारगाह मे पंजतन पाक और उनकी आलपाक
ख्वाजा गरीब नवाज़ र.अ. के वसीले से दुआ मागें
फ़ज़ले रब्बे ज़ुल मनन ख्वाजा मुईनुददीन हसन
जाने पाके पंजतन
ख्वाजा मुईनुददीन हसन
नूरे हक नूरे नबी नूरे अली
नूरे हुसैन
नूरे ज़हरा ओ हसन
ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन
हम गरीबों पे भी हो जाए
बस एक नज़्रे करम
बा तुफैले पंजतन
ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन
हम फकीरों पे भी हो जाए
बस एक चश्मे करम
अज़ तुफैले पंजतन
ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन
मौला पंजतन पाक और उनकी आलपाक के सदके मे हमारी दीनी व दुनायावी दुआओं को
हमारी दीनी व दुनीयावी हाजतों को पूरा फरमाऐं
और हमें करोना व बड़ी बीमारियों से महफूज फरमा
सलतन आपकी और निजाम आपका है
आप मौला हमारे
हम गुलाम आपके
मौला
हम सबके रिज़्क मे बरकतें अता फरमा
और मुल्क व दुनीया मे अमन सुकून अता फरमा
जो बेरोजगार हैं
उन्हे रोजगार अता हो
और जिनके पास रोजगार हैं उनके नेक व जाइज रोजगार मे बरकतें अता फरमा
जो बे औलाद हैं उन्हे साहबे औलाद कर
जिनकी औलाद हैं उन्हे नेक और सालह कर
जो इल्म हासिल कर रहे हैं उन्हे दीनी व दुनायी इल्म की दौलत से माला माल करो और उन्हे तालीम हासिल करने मे सब तरह की मदद फरमा
जो बच्चियाँ शादी के लिए घर मे बैठीं हैं उनके जोड़े बना और उनके नसीबे अच्छे कर
जो कर्जदार हैं उनके कर्जे अदा करने की सबील बना
जो बे कसूर कैद खाने मे हैं उनकी रेहाई अता फरमा
मुल्कों के निजाम के लिए बागडोर अच्छे नेक ईमानदार हुकमरानों के हाथों देने की महरबानी कर
आमीन
या रब्बुल आलमीन
Ye wo jagah hai Kufa ke Jama Masjid ki jaha Allah ke Habib ke Habib par qatilaana hamla hua tha 19 Ramzan ko Fajr ki Namaz ke waqt…….
Unpe hamla hua Jinke Lehje me Rab ne Apne Habib se Kalaam kiya tha
Unpe hamla hua Jinko ko Allah ne Apne Habib ke Noor se banaya tha
Unpe hamla hua Jinko Allah ne Apne Habib ki Jaan kaha tha
Unpe hamla hua Jinke Gosh aur Khoon ko RasoolAllah ne Apna Gosh aur Khoon kaha
Unpe hamla hua Jinko RasoolAllah ne sirf Apna Bhai banaya
Unpe hamla hua jo Chalta hua Quran tha
Unpe hamla hua Jinki Quran Ta’arifen karta
Unpe hamla hua Jinjaisa Ilm kisiko ata nahi hua.
Unpe hamla hua jinko “Muhammad” (Jinki Bahot Zyada Ta’arif ki gayi, Hasti) ne “Ali” (Sabse Buland Martabe Wala) kaha.SallAllahu Alaihi wa Ala Ibne Ammihi wa Aalihi wa Sallam
Aaqa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya tha ke Ali Tujhe Shaheed karne wala makhlooq me sabse badtareen insan hai.
Jaise he Maula-e-Kainat pe waar hua Aapki Zubaan-e-Aqdas se nikla “Fuztu bee Rabbil Kaaba”
“Rabbe Kaaba ki Kasam Mai Kamiyaab hogaya”Allah Ta’ala ke Beshumar Durood-o-Salam Maula Ali Alaihissalam par aur beshumar lanaten ibne muljim lanati jahannami par.

21st Ramazan | The Day When Imam Ali Bin Abu Talib (rz) The Lion of Allah passed from this world due to stabbed on head which lead to His death.
Martyrdom of Lion of Allah & Commander of Faithful:
The commander of faithful, the father of eloquence, the caretaker of the orphans, the shelter of the needy and the perfect of all humans after Holy Prophet Muhammad (saw). Born in the House of Allah, Holy Kaaba, and martryed in the House of Allah, Masjid-e-Kufa. He died on the 21st day of Ramadan 40 A.H.
Imam Ali ibn Abi Talib (rz) had prophesied his departure from this world several days before hand, and on the day of his martyrdom he mysteriously desired his sons Imam Hasan and Imam Hussain (rz) to offer their morning prayers in the house and not to accompany him as they usually did to the mosque of Kufa. When Imam Ali (rz) was leaving his abode, the household birds began making a great noise and when one of Imam Ali’s servants attempted to quieted them, Imam Ali (rz) said, “Leave them alone, for their cries are only lamentations foreboding my death.”
On the 19th of the month of Holy Ramadan (Mah e Ramzan) of the year 40 A.H, Imam Ali (rz) came to the mosque in Kufa for his morning prayers. Imam Ali (rz) gave the call for prayer (Azaan) and became engaged in leading the congregation & was offering Nafilah prayer, during the second prostration. Abd-al-Rahman ibn Muljam pretending to pray, stood just behind Imam Ali (rz), and when Imam Ali (rz) was in a state of prostration, Abd-al-Rahman ibn Muljam dealt a heavy stroke with his three days poisoned sword, inflicting a deep wound on Imam Ali’s (rz) head.
This was the time when Imam Ali (rz) uttered his famous words : “Fuzto warab-il-Kaaba” – “By the Rab of Kaaba, I am successful”.
Holy Prophet Muhammad (pbuh) had prophesied the assassination of Imam Ali (rz) and his issues. Regarding Imam Ali (rz) Holy Prophet Muhammad (pbuh) had said, “O Ali! I see before my eyes thy beard dyed with the blood of thy forehead.”They assassinated Imam Ali (rz) at his finest time – the hour of standing before Allah, the Exalted, during a prayer of submission, in the best of days, while fasting during the month of Ramadan; during the most glorious Islamic duties, while preparing to wage jihad, and in the highest and most pure divine places, the Mosque of Kufa.
May joy be to Amir al-Muminin Imam Ali bin Abi Talib (rz) and a blessed afterlife!
The crime of assassinating Imam Ali (rz) remains one of the most cruel, brutal and hideous, because it was not committed against one man, but against the whole rational Islamic leadership. By assassinating Imam Ali (pbuh), they actually aimed at assassinating the message, the history, the culture and the nation of Muslims embodied in the person of Imam Ali bin Abi Talib (rz). In doing so, the Islamic nation lost its guide of progress, and at the most wondrous opportunity in its life after the Holy Prophet (rz).Imam Ali (rz) suffered from his wound for three days, and He (rz) passed away on 21st of the month of Ramadan at an age of 63 years.
Inna Lillahi wa Inna Ilaihi Raji’oon …



