Hadeeth अली का चेहरा देखना इबादत है

“उम्मुल मोमिनीन (उम्मत की माँ) हज़रत अम्मा आईशा सिद्दीक़ा (स.अ.) बयान
करती हैं, जब हज़रत मौला अली (र.ज.) हमारे घर आते तो मेरे बाबा जान ख़लीफा-ए-बरहक, अमीर-उल-मोमिनीन हज़रत अबु-बकर सिद्दीक (र.ज.) सारे काम छोड़ के
हज़रत मौला अली (क.व.क.) का चेहरा देखते तो मैं कहती थी, ‘बाबा जान आप मेरे घर
आते हो और चेहरा हज़रत मौला अली (अलेहिसलाम.) का देखते रहते हैं, इसकी क्या वजह है ?
तो हज़रत अबु-बकर सिद्दीक़ (र.ज.) ने फरमाया – ‘बेटी, गलती न कर मैंने
अपने कानों से नबी-ए-करीम ‘सल्लाहो अलैहे-वा-आलिही-वसल्लम’ से सुना है –
“अली का चेहरा देखना इबादत है”
(किताब रियाजुनन ज़रह-फी-अश्शरह-मुबश्शरह, जिल्द-2, सफा-445)

ईद किस के लिये है ?

*🕌 ईद किस के लिये है ? 🕌*

सरकार ﷺ की महब्बत से सरशार दीवानो सच्ची बात तो येही है कि ईद उन खुशबख्त मुसल्मानों का हिस्सा है जिन्हों ने माहे मोहतरम, रमज़ानुल मुअज़्ज़म को रोजों , नमाज़ों और दीगर इबादतों में गुज़ारा तो येह ईद उन के लिये अल्लाह की तरफ़ से मज्दूरी मिलने का दिन है। हमें तो अल्लाह से डरते रहना चाहिये कि आह ! मोहतरम माह का हम हक अदा ही न कर सके।

*औलियाए किराम रहमतुल्लाह तआला अलैह भी तो ईद मनाते रहे हैं :* प्यारे प्यारे इस्लामी भाइयो आजकल गोया लोग सिर्फ नए नए कपड़े पहनने और उम्दा खाने तनावुल करने को ही ईद समझ बैठे हैं ज़रा गौर तो कीजिये ! हमारे बुजुर्गाने दीन भी तो आख़िर ईद मनाते रहे हैं। मगर इन के ईद मनाने का अन्दाज़ ही निराला रहा है। वोह दुन्या की लज्जतों से कोसों दूर भागते रहे हैं और हर हाल में अपने नफ्स की मुखा – लफत करते रहे हैं..

अल्लाह की उन पर रहमत हो और उन के सदके हमारी मग़्फ़िरत हो