हज़रत मौला अली एक महान वैज्ञानिक

यह बहुत कम लोग जानते है कि हज़रत मौला अली एक महान वैज्ञानिक

हज़रत अली के कई वैज्ञानिक पहलू

एक प्रश्नकर्ता ने उनसे सूर्य की पृथ्वी से दूरी पूछी तो जवाब में बताया कि एक अरबी घोड़ा पांच सौ सालों में जितनी दूरी तय करेगा वही सूर्य की पृथ्वी से दूरी है

उनके इस कथन के चौदह सौ साल बाद वैज्ञानिकों ने जब यह दूरी नापी तो 149600000 किलोमीटर पाई गई।

अगर अरबी घोडे की औसत चाल 35 किमी/घंटा ली जाए तो यही दूरी निकलती है।

इसी तरह एक बार अंडे देने वाले और बच्चे देने वाले जानवरों में फर्क इस तरह बताया कि जिनके कान बाहर की तरफ होते हैं वे बच्चे देते हैं और जिनके कान अन्दर की तरफ होते हैं वे अंडे देते हैं।

हज़रत अली ने इस्लामिक थियोलोजी (अध्यात्म) को तार्किक आधार दिया। कुरान को सबसे पहले क़लमबद्ध करने वाले भी हज़रत अली ही हैं।

हज़रत मौला अली की कुछ किताबें

(1) किताबे अली
(2) ज़फ़्रो जामा (Islamic Numerology पर आधारित) इसके बारे में कहा जाता है कि इसमें गणितीय फ़ार्मूलों के द्वारा क़ुरआन मजीद का असली मतलब बताया गया है।

तथा क़यामत तक की समस्त घटनाओं की भविष्यवाणी की गई है यह किताब अब अप्राप्य है।

3) किताब फ़ी अब्वाबुल शिफ़ा
4) किताब फी ज़कातुल्नाम

हज़रत मौला अली की सबसे मशहूर व उपलब्ध किताब नहजुल बलाग़ा है

जो उनके ख़ुत्बों (भाषणों) का संग्रह है। इसमें भी बहुत से वैज्ञानिक तथ्यों का वर्णन है।

माना जाता है कि जीवों में कोशिका(cells) की खोज 17 वीं शताब्दी में हुक ने की थी

लेकिन नहजुल बलाग़ा का निम्न कथन ज़ाहिर करता है कि हज़रत अली को कोशिका की जानकारी थी।

“जिस्म के हर हिस्से में बहुत से अंग होते हैं। जिनकी रचना उपयुक्त और उपयोगी है।

सभी को ज़रूरतें पूरी करने वाले शरीर दिए गए हैं।

सभी को काम सौंपे गए हैं और उनको एक छोटी सी उम्र दी गई है।

ये अंग पैदा होते हैं और अपनी उम्र पूरी करने के बाद मर जाते हैं।

(खुतबा-71) ” स्पष्ट है कि ‘अंग’ से हज़रत मौला अली का मतलब कोशिका ही था।

हज़रत मौला अली सितारों द्बारा भविष्य जानने के खिलाफ़ थे

लेकिन खगोलशास्त्र सीखने पर राज़ी थे,उनके शब्दों में “ज्योतिष सीखने से परहेज़ करो, हाँ इतना ज़रूर सीखो कि ज़मीन और समुन्द्र में रास्ते मालूम कर सको।

” (77 वाँ खुतबा – नहजुल बलाग़ा)

इसी किताब में दूसरी जगह पर यह कथन काफ़ी कुछ आइन्स्टीन के सापेक्षकता सिद्धांत से मेल खाता है, ‘उसने मख़लूक़ को बनाया और उन्हें उनके वक़्त के हवाले किया।’ (खुतबा – 1)

चिकित्सा का बुनियादी उसूल बताते हुए कहा, “बीमारी में जब तक हिम्मत साथ दे, चलते फिरते रहो।

” ज्ञान प्राप्त करने के लिए हज़रत मौला अली ने अत्यधिक ज़ोर दिया, उनके शब्दों में, “ज्ञान की तरफ़ बढो, इससे पहले कि उसका हरा भरा मैदान ख़ुश्क हो जाए।”

यह विडंबना ही है कि मौजूदा दौर में मुसलमान हज़रत मौला अली की इस नसीहत से दूर हो गया और अनेकों बुराइयां उसमें पनपने लगीं हैं।

अगर वह आज भी ज्ञान प्राप्ति की राह पर लग जाए तो उसकी हालत में सुधार हो सकता है।

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