Ehsaan_e_IMAAM_HUSAIN_ALAIHIS_SALAM

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About Taziyadari

क़िस्त 1

✔ ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !!

✔ ***** बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम *****

✔ अल्लाहुम्मा सल्ले अला सय्यदीना मुहम्मदिन जद्दिल हसने वल हुसैन व आलेही व सल्लम

✔ सवाल : 👇
1- ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत क्या है ?

✔ अल-जवाब : 👇

इस बाबत सबसे पहले हम अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त की नाज़िल करदा आख़री किताब “क़ुरआन ए मजीद” की
बारगाह में साईल होते हैं जो रहती दुनिया तक के लिए हिदायत का सर-चश्मा है, हमने क़ुरआन ए करीम से अर्ज़ किया के ऐ रब्बे अलीमो ख़बीर के पाकीज़ा कलाम इस बाबत हमारी रहनुमाई फ़रमा के जो चीजें अल्लाह वालों से मनसूब हो जाती हैं उनका मक़ाम दीन ए हक़ में क्या है ?

✔ क़ुरआन ने इरशाद फ़रमाया : ” इन्नस सफ़ा वल मरवता मिन शाइरिल्लाह ” (अल-बक़राह)
“बेशक सफ़ा और मरवा अल्लाह की निशानियों में से हैं”

✔ इस आयत में अल्लाह ने सफ़ा और मरवा दो पहाड़ियों को जो शहरे मक्का में हैं उन्हें अपनी निशानियां क़रार दिया ! फ़क़्त इसलिए के इन दोनों पहाड़ियों को अल्लाह की एक महबूब बन्दी और वलियाह हज़रत ए बीबी हाजिराह (रदिअल्लाहो अन्हा ) के क़दमों से निस्बत हो गयी. सालेहीन से जो चीज़ मनसूब हो जाएं वो अज़मत वाली हो जाती हैं,और ख़ुदा उसे अपनी निशानी क़रार देता है
दीन का ये उसूल है हर अज़्मतो निस्बत वाली शै का एहतेराम बजा लाना ऐन मरगूब ओ मंदूब अमल क़रार पाया है !

✔ जबहि इस अमल ए ताज़ीम की तारीफ़ और तौसीफ़ में क़ुरआन ने गवाही दी…”वा मन युअज़्ज़िम शाएरिल्लाह फ़ा इन्नहा मिन तक़्वल क़ुलूब”
यानि..जो अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करते हैं तो बेशक इसमें दिलों का तक़वा है….” यानि जो ताज़ीम बजा लाते हैं उनके दिलों में अल्लाह ने तक़वा नख़्श फ़रमा दिया है के वो उसकी ख़शिय्यत से मुतास्सिर हो कर उस शै की ताज़ीम ओ तकरीम करते हैं यही लोग अहले-तक़वा हैं !

✔ अदब वही करता है जिसके दिल में ख़ौफ़े ख़ुदा होता है
अदब ऐन ईमान है, शिर्क नही!
इबादत ए ज़ाहिरी जिस्म का तक़वा है जैसे नमाज़ रोज़ा हज वग़ैरा और अल्लाह और अल्लाह वालों से मनसूब निस्बातों की ताज़ीम दिल का तक़वा है !

✔ जिस पत्थर या जानवर को अल्लाह वालों से निस्बत हो जाये उसे क़ुरआन ए पाक “शाएरिल्लाह” कहता है
जैसे सफ़ा ओ मरवा, मक़ाम ए इब्राहीम है
हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की ऊँटनी को क़ुरआन “नाक़ातुल्लाह” (अल्लाह की ऊँटनी) कहता है !
इसी तरह हज़रात ए अम्बिया ओ आइम्मा ओ औलिया के मज़ारात ए मुक़द्दस भी “शाएरिल्लाह” हैं इसी तरह वो इन्सान जिनको अज़मत वालों से निस्बत हो जाए वो भी इसी ज़िमन में आते हैं

✔ जैसे “बनी फ़ातिमा (सय्यदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैहा की औलाद ए पाक) को निस्बत अल्लाह के हबीब ए मुकर्रम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) से है के उनके ख़ून ओ ख़मीर अस्ले नुबूवत के शर्फ़ से मुतास्सिल है लेहाज़ा सादात ए किराम भी “शाएरिल्लाह” हुए !

✔ अब देखें “हजरे अस्वद” को जो ख़ाना ए काबा में नसब एक स्याह (काला) पत्थर है उसे तमाम ज़ायरीन ए हरम ओ हुज्जाज़ चूमते हैं क्यों ? क्योकि उस काले पत्थर को रसूले पाक के लबे पाक से निस्बत है..तो सारी उम्मत ए मुस्लिमा का क़यामत तक ये पत्थर बोसा गाह बन गया!
इसी ज़िमन में ये भी याद रखे के हज के दौरान जहाँ लाखों इन्सानों का सैलाब हाज़िरी ए हरम ओ तवाफ़ ए काबा करता है तो हर कोई यकबारगी इस हजरे अस्वद का बोसा नही ले सकते तो लकड़ी से या किसी और शै से हजरे अस्वद को छुलाया जाता है और फिर उस लकड़ी को चूम लिया जाता है जिसे शरीयत की ज़बान में “इस्तेलाम” कहते है !
और अगर हुजूम के बाइस लकड़ी ओ असा वहां तक ना पहुचे तो हजरे अस्वद की तरफ़ अपना चेहरा करके हाथ उसकी तरफ़ फैलाया और अपना हाथ चुम लिया ये फ़रीज़ा अदा हो गया

✔ ग़ौर तलब बात ये है के निस्बत के लिए ये ज़रूरी नही के जिससे निस्बत दी जा रही है वो शै बराहे-रास्त उससे टच करती हो या जुड़ी हुई हो…पता चला निस्बत तो निस्बत होती है बराहे-रास्त हो या दूर से हो…!

✔ ताज़िया शरीफ़ को भी इमाम ए आली मक़ाम जिगर गोशा ए रसूल सय्यदुश्शोहदा हज़रत हुसैन इब्ने अली ओ फ़ातिमा बिन्त ए मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम से निस्बत है

✔ ये भी ज़रूरी नही के ताज़िया शरीफ़ ऐन रौज़ा ए इमाम की शक्ल में हो..बल्कि लोग अपने अपने अंदाज़ और ज़ौक़ और शऊर के मुताबिक़ ताज़िया बनाते हैं…
अस्लन ताज़िया शरीफ़ का मक़स्द तशहीर ए पैग़ाम ओ वाक़्यात ए कर्बला है…के साडी दुनिया में इस अज़ीम वाक़ये का चर्चा हो और अहले-ईमान के अंदर जज़्बा ए ईसार ओ क़ुरबानी और हिमायत ए दीन पैदा हो !

✔ लेकिन ये अमल यज़ीदियों को एक आँख नही भाता…..!!

✔ तशहीर का काम कहाँ नही ?? जिस समाज में तुम रहते हो वहां सुब्हो शाम रातो दिन ये काम जारी है…किसी की शादी हो..सारा घर सजा है गेट बने हैं झालर लगी है गलियां सजी हैं..क्यों ??? ताकि मालूम हो..के शादी का घर है !
जलसा हो इज्तेमा हो..पोस्टर चिपके हैं बैनर लगे हैं …जलसा गाह झंडियां और क़ुम-क़ुमों से सजी है..क्यों ?? ताकि सबको पता चले के यहाँ दीनी प्रोग्राम हो रहा है..तो अब चाहे दुनिया दार हो या मोलवी हो..सब इस तशहीर से अपने अपने मक़ासिद हासिल करते हैं..
अब इसी तशहीर को जब ‘”हुसैनीं दीवाने”‘ अहलेबैत के खुद्दाम ग़ुलामे सरकारने ए पंजतन..पैग़मे हुसैनी के फ़रोग़ के लिए ब-शक्ले ” ताज़िया ” मुश-तहर करते हैं..तो दुनिया का चेहरा क्यों बदल जाता है मोलवियों के पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है..दुनिया भर में जलसे ओ जुलुस और दीगर महफ़िल पर क्या कुछ नही किया जाता..सब पे अयां ओ रोशन है..जिन महफ़िलों की ज़ीनत मोलवी साहेबान बनते हैं…वहां ना फ़िज़ूल ख़र्ची का कोई रोना रोता है..ना कोई हवालों का राग अलापता है..ना कोई ये पूछता है के इसकी इब्तेदा किसने की ?? कौनसी आयते क़ुरआनी से साबित है…सियाह सित्ता की किस किताब में है ?? हदीस नम्बर क्या है? ज़ईफ़ है के क़वी है?

✔ अफ़सोस इन इस्लाम के ठेकेदार मोलवियों से पूछो के अपनी तशहीर का तुम सामान करो तो सब जायज़ और वही तशहीर हम अगर नबी ए पाक के मज़लूम शहज़ादे दीं पनाह इमाम ए हुसैन अलैहिस्सलाम के लिए करें तो ना-जायज़ ?? खुराफ़ात ?? फ़िज़ूल ख़र्ची ??..

✔ ये भी ऐतराज़ किया गया अक्सर..ताज़िया शरीफ़ के आगे हाथ ना बांधो….फ़ातेहा ओ नियाज़ उसके सामने रख के मत करो..के लोग क्या समझेंगे के मुसलमान क्या कर रहा है???

✔ ताज़िया शरीफ़ के सामने अगर शिरीनी रख कर फ़ातेहा नियाज़ ओ नज़र करना ना-जायज़ है तो फिर मज़ारात ए औलिया के सामने भी शिरीनी रख कर नज़रो नियाज़ करना भी ना-जायज़ ही होगा ..इसे रोको वर्ना लोग क्या कहेंगे…के साहिबे मज़ार की फ़ातिहा हो रही है या सीधे क़ब्र की पूजा हो रही है! और यही सोच क़वी हो जाये तो फिर कहोगे रौज़ा ए अक़दस सरकारे दो आलम (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम) पर भी हाज़िर हो कर हाथ बांध कर सलातो सलाम अर्ज़ ना करो के लोग समझेंगे…की पूजा हो रही है माज़अल्लाह ऐसी अंधी सोच और अक़ीदे पर लानत बेशुमार लानत

क़िस्त 2

✔ ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !!

तुम्हारे घर का कोई मर जाये तो नहला धुला कर कफ़न पहना कर मैदान में रख आए और सब के सब हाथ बांध कर खड़े हो गए…तो अगर कोई ये समझे के मुसलमान मरते ही ख़ुदा हो जाता है और सारी क़ौम उसकी पूजा पाठ में लग जाती है (माज़अल्लाह)…तो ऐसे ख्यालों की वजह से तुम नमाज़े जनाज़ा छोड़ दोगे ????..लोग पता नही क्या सोचेंगे ?? ये अंग्रेजों यहूदियों का फार्मूला तुम्हे तबाहो बर्बाद कर देगा दीनो दुनिया कहीं का नही रखेगा!!!

एक ऐतराज़ ये भी होता है के उश्शाक़ ए हुसैनी ने फ़र्ज़ी कर्बलाएं बना रखी हैं जहाँ ताजियों को दफ़न कर देते हैं या पानी में ग़र्क़ कर देते हैं…ये सब ख़ुराफ़ात है..दीन से इसका कोई ताल्लुक़ नही…!…इसका फ़ौरी जवाब ये है कि हाँ यज़ीदी दीन से इसका कोई ताल्लुक़ नही है…मगर दीन ए मोहम्मदी से इसका गहरा ताल्लुक़ है…

जब क़ुरआन ए पाक बोसीदा हो जाता है तो क्या करते हो ?… दीनी किताबें ख़स्ता हाल हो जाएं तो क्या करते हो??..चूल्हे में जला देते हो क्या…यज़ीदी ज़रूर जलाते होंगे क्योकि यज़ीद ने गिलाफ़ ए काबा शरीफ़ जलाया था!…मगर हम हुसैनीं हैं हम क़ुरआन को “शएरिल्लाह” मानते हैं इसकी ताज़ीम करते हैं…हमारे पेशवा ने हमें तालीम दी है जब क़ुरआन ए पाक बोसीदा हो जाए तो उसको दफ़न कर दो या पानी में ठंडा कर दो के औराक़ ए क़ुरआन की बे-हुरमती ना होने पाए इसलिए के इन कागज़ी सफ़हात को अल्लाह के पाकीज़ा कलाम से निस्बत है ! लेहाज़ा इसे दफ़नाया जाए या पानी में ठंडा कर दिया जाए… ये इस्लाम ने हमे तालीम दी है !

तो बाद अज़ अय्याम ताज़िया शरीफ़ का क्या किया जाये???….इसके दो तरीख़े हैं या तो इसे महफूज़ मकान..मिस्ल इमामबाड़ा..या मस्जिद या ख़ानक़ाह या मदरसे…जहाँ इसकी ताज़ीम मल्हूज़ रखी जा सके…वहां इसे मुन्तक़िल कर दिया जाये…या फिर इसे दफ़ना दिया जाए या पानी में ठंडा कर दिया जाए ताकि इसकी बे-हुर्मती ना होने पाए !

मकान में रखने का इस्तेदलाल ये है के…जब मस्जिदों और मदरसों में मीलाद उन नबी के बैनर्स और बोर्ड हिफ़ाज़त के लिए इन तक़रीब के बाद रख दिए जाते हैं ताकि अगले साल काम आएं…तो जो नबी के शहज़ादों का सामान ए तशहीर (ताज़िया शरीफ़) है वो क्यों नही रखा जा सकता ???

लम्हे फ़िक्र है मुसलमानों…दीनी जलसे और मीलाद शरीफ़ की महफ़िलें किस शहर में नही होती…जिनमे चांदनियाँ चादरें तख़्त वग़ैरा या तो घर के होते हैं या बाजार से किराय पे मंगवाए जाते हैं…और ये किराय के सामान इस दीनी महफ़िल और जलसों से क़ब्ल भी दूसरी जगहों पे इस्तेमाल किया जाता है…मिस्ल शादियों में थियेटर में डांस पार्टी में सर्कस में और ये लाइट ये झालरें ये सजावट के सामान इससे पहले कहाँ कहाँ इस्तेमाल किये जाते हैं…बताने की ज़रूरत नही..और इस दीनी महफ़िल के बाद भी इन चीजों को कहाँ कहाँ लगना है..ये भी सब पे रोशन है..मगर वक़्ती तौर पे इन सारी चीज़ों को …महफ़िल ए रसूल, बज़्मे रसूल और मिम्बरे रसूल जैसे मुअज़्ज़ज़ अलक़ाब दिए जाते हैं…और इसकी ताज़ीम की जाती है… ख़तीब यही कहता है ये बज़्मे रसूल है, तक़रीर करते हुए उल्मा यही कहते हैं ये मिम्बर ए रसूल है…और किसी को ऐतराज़ नही होता..कोई ग़ैर इस्लामी लिबास पहन कर इस पर बैठ जाए तो मोलवी साहब जलालो ग़ज़ब के आलम में आ कर उसको उतार देते हैं के ये मिम्बरे रसूल है, ये बज़्मे रसूल है..इसके आदाब के ख़िलाफ़ है…चन्द घन्टो के लियें सामानों का इस्तेमाल महफ़िले रसूल में हुआ तो अब इसके आदाब बदल गए,,,तौर बदल गए,,..हो सकता है के ये सारे का सारा सामान यहाँ से उखड़ने या यहाँ से जाने के बाद किसी भजन कीर्तन के प्रोग्राम में जाए, किसी नाच गाने के प्रोग्राम में काम आये..! लेकिन बज़्मे ज़िक्रे रसूल (अलैहिस्सलातो वस्सलाम) से निस्बत हो गयी तो अब इस महफ़िल में कोई बेअदबी नही कर सकता..ये वक़्ती निस्बत की जलवा-गिरी है..के घर और मैदान और उस में लगी चीज़ों की ताज़ीम की जा रही है..और सब अदब बजा ला रहे हैं…!

मैं सवाल करता हूँ..वक़्ती निस्बत का तुम्हे इतना पास और लेहाज़ है..तो ताज़िया शरीफ़ तो बना ही उनके नाम पर है..इस में किराय की कोई चीज़ इस्तेमाल नही हुई..ना ही पहले ये किसी ऐसी वैसी जगह पर इसके अज्ज़ा इस्तेमाल हुए ना ही बाद में होने का इमकान है ! तो इस हुसैनीं ताज़िया की ताज़ीम बा-दर्जा औला वाजिब हुई ! और इसकी ताज़ीम बिला शुबहा रूहे ईमान है..और वही इसकी तकरीम बजा लायेगा जिसका दिल खशियते इलाही से पुर होगा !

अहले ईमान के दो तबक़े हैं अवाम और ख़्वास… दोनों तबक़ो में ज़माने क़दीम से ताज़िया-दारी राइज है और दोनों तबक़े इसका एहतेमामो इंतेज़ाम और इकरामो एहतेराम करते चले आ रहे हैं.

ताज़िया शरीफ़ का वजूद कोई नया नही..ये इतना ही पुराना है जितना मीलाद उन नबी की महफ़िलो मजलिस का वजूद है जो क़ायम ओ तआम के साथ अरबो अजम में जारी था और अब भी है.

ख़ुसूसन बर्रे सग़ीर पाक ओ हिन्द में आमद ए इस्लाम के साथ साथ ताज़िया-दारी राइज हो गयी थी.

………

क़िस्त 3

✔ ताज़िया शरीफ़ की शरई हैसियत, इसका जवाज़, और हमारे बुज़ुर्गों का अक़ीदा और अमल !!

ख़्वाजा ए ख़्वाज-गां सुल्तानुल हिन्द औलादे हसनैन कारीमैन सैय्यदना ग़रीब नवाज़ मोइनुद्दीन हसन चिश्ती संजरी सुम्मा अजमेरी रहमतो रिज़वान का ममनून ए करम है ये अर्ज़े विलायते हिन्द जहाँ आपकी आमद ए पाक के सदक़े ईमानो इस्लाम का उजाला दारुल कुफ़्र को विलायत ए मुर्तज़वी और दीने मुहम्मदी की किरनों से मुनव्वर कर गया..और लोग ज़ौक़ दर ज़ौक़ हल्क़ा ब-गोशे इस्लाम हुए…और तबलीग़ ए दीन का तन्हा वो काम अंजाम दिया के आज की नाम निहाद जमातें मिल कर भी उसके अशरे-अशीर तक नही पहुच सकतीं…आपके दस्ते हक़ परस्त पे 90 लाख लोग दाख़िल ए ईमान हुए…आप चूंके औलादे हुसैनो हसन(अलैहिस्सलाम) हैं..लेहाज़ा कर्बला वालों का ग़म फ़ितरतन ओ विरासतन आपको मुंतकिल हुआ…और आप अपनी हयाते ज़ाहिरा में भी ग़मे हुसैन में मुब्तिला रहा करते थे…जिसका सुबूत ये है के आज भी दरगाहे सरकारे अजमेर में आपका मख़सूस “ताज़िया-शरीफ़” जो चांदी का बना हुआ है मौजूद है…

5 मोहर्रम शरीफ़ को जब हज़रत बाबा फरीदुद्दीन गंजे शकर रहमतुल्लाह अलैह का हुजरा और चिल्ला-गाह अजमेर शरीफ़ में खुलता है तो उस में मौजूद ग़रीब नवाज़ के उस ताज़िया शरीफ़ की ज़ियारत ज़ायरीन करते हैं…लेहाज़ा हम अहले-हिन्द ओ पाक बड़े फ़ख़्र से कहते हैं के जिस दर से हमे इस्लामो इरफ़ान की तालीम मिली…जिस दर से औलिया ए ज़माना अपनी निस्बातों पे फ़ख़्र करते हैं…जिस दर के ख़ुशा-चीन बड़े बड़े अहले इल्म ओ इरफ़ान, साहिबाने हालो विजदान ख़ासाने ख़ुदा हैं…उसी दर ए पाक से हमको ताज़िया-दारी अय्याम ए ग़मे हुसैन के आमाल मिले हैं जो सरासर ग़ुलामी ए अहलेबैत ओ मोहब्बते आले पाक के जज़्बे से ममलू है !

बिलाद ए हिन्द में सिलसिला ए आलिया कादरिया के जलील उल क़द्र बुज़ुर्ग हज़रत मख़्दूमिना वा सैय्यदना ख़्वाजा सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ बंसवी रहमतुल्लाह अलैह का यही अमल और अक़ीदा था जो सरकारे चिश्तियां ग़रीब नवाज़ का अक़ीदा ओ मामूल था ! चुनांचे शहज़ादे ग़ौसुल वरा ख़्वाजा ए क़ादरिया हज़रत क़िब्ला शाह सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ बंसवी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं
“ताज़िया शरीफ़ को कोई ये ना समझे के महेज़ कागज़ पन्नी का बना हुआ ढांचा बल्कि अरवाहे मुक़द्दस हज़रते शोहदा ए किराम (अलैहमुस्सलाम) की इस पे ख़ुसूसी तवज्जोह होती है ”

हवाला 📚📚📚 करामात ए रज़्ज़ाक़ियाह

उलेमा ए फिरंगी महल तमाम के तमाम आप ही की बारगाह की ग़ुलामी पे नाज़ करते हैं लेहाज़ा ये अक़ीदा ताज़िया-शरीफ़ के मुताल्लिक़ उलेमा ए फिरंगी महल के शैख़ुल शुयूख़ क़ुत्बुल अक़्ताब हज़रत मीर सैय्यद अब्दुर्रज़्ज़ाक़ साहिब क़िब्ला का है…और तमाम उलेमा ए फिरंगी महल जिनकी इल्मी अज़्मतो और ख़िदमते दीनो फ़िक़ह ओ उलूमे दीन का एक ज़माना मोतारिफ़ है..उनका भी अक़ीदा अपने मलजा ओ मावा हादी ओ रहनुमा का रहा.

देहली शुरू से अहले-इस्लाम का मर्कज़ रहा जहाँ उमूरे सल्तनते इस्लामी के अलावा उलेमा ओ सूफ़िया औलिया ओ साहिबाने इल्मो दानिश का गहवारा रहा है…इस देहली की ज़र-खेज़ सरज़मीन से अकाबेरीन की ऐसी जमात वाबस्ता है के सारी दुनिया को आज जिनपे नाज़ है…हिन्दोस्तान में इल्मे हदीस के लाने वाले हज़रत शाह वाली-उल्लाह मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह का घराना है…जिसके ख़ुश-चीन तमाम उलेमा रहे.

हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्लाह अलैह अपने फ़तावा (अल-मारूफ़ फ़तावा अज़ीज़या, जिल्द 1 सफ़ह 66) पर ताज़िया-दारी के मुताल्लिक़ फ़रमाते हैं…”इस फ़क़ीर के मकान पे साल में दो मौक़ों पर इज्तेमा ए अज़ीम होता है..एक रबीउल अव्वल शरीफ़ में और दूसरा मोहर्रम शरीफ़ में यौमे आशूरा के दिन…के इस दिन रूहे मुबारक पैग़म्बरे ख़ातिम सरवरे अम्बिया (सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम)की निहायत ग़मगीन होती है…और ये फ़क़ीर ख़ुद वाक़ेयात ए शहादत बयान करता है…और इत्तेफ़ाक़ से अगर मरसिया मशरूह पढ़ने का मौक़ा होता है तो अहले महफ़िल के साथ साथ इस फ़क़ीर को भी गिरया ओ बुका लाहिक़ होती है,फिर फ़ातेहा हज़रात इमामैन अलैहमुस्सलाम की होती है और सबीलो लंगर तक़्सीम होता है…लेहाज़ा अगर ये सब कुछ जिसका ज़िक्र किया गया है…फ़क़ीर के नज़दीक जायज़ ना होता तो ये फ़क़ीर हर्गिज़ इसका इक़दाम ना करता”

ये अक़ीदा ओ अमल महेज़ एक आलिम का नही बल्कि इमामुल हिन्द मारजा उल उल्मा मुहद्दिसे जलील हज़रत अल्लामा शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी (अलैहिर्रहमा) का है जिनकी ज़ाते सुतूदा सिफ़ात से बर्रे सग़ीर के इल्मी मीनारे आज भी चमक रहे हैं !

हज़रत मौलाना सलामत अली साहब मुहद्दिस (अलैहिर्रहमा) फ़रमाते हैं…आप हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ साहब के तिलमिज़े रशीद हैं…अपने फ़तावा में फ़रमाते हैं के “अल्हम्दुलिल्लाह ताज़िया-दारी आसारे इस्लाम में से है और एक आलम इसके फैज़ान से बहरावर होता है और इसके बहुत से दीनी फ़ायदे हैं”

हवाला : 📚📚 तब्सीरातुल ईमान

हज़रत क़िब्ला ए आलम शाह नियाज़ अहमद साहब बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह जो ज़बर्दस्त आलिमे दीन सूफ़ी ए साफ़ी ओ वली ए कामिल वली-गर हैं के एक ज़माना जिनकी बुज़ुर्गी ओ अज़मत का क़ाइल है…ताज़िया-दारी से जो शगफ़ आपको था ज़माना इसका शाहिद ओ गवाह है !

शबे आशूरा आप 2 बजे ताजियों की ज़ियारत को तशरीफ़ ले जाते और 5 या 7 ताजियों की ज़ियारत फ़रमा कर वापस ख़ानक़ाह शरीफ़ में रौनक़ अफ़रोज़ होते…आख़ीर उमर में जब चलने की ताब ओ ताक़त ना रही तो आप मुस्तग़रग़ बैठे थे..”के सूरते नूरानी मख़्दूमा ए कौनैन जनाब बीबी सय्यदा फ़ातिमा सलामुल्लाह अलैह” की जलवा-गिरी हुई…बिन्ते मुस्तफ़ा उम्मुल हसनैन (अलैहमुस्सलाम) ने फ़रमाया….”के मियाँ आज हमारे बच्चों की ज़ियारत को ना उठोगे???”

इस इरशाद ए बिन्ते मुस्तफ़ा को सुन ना था के आपको गिरया ओ बुका तारी हुआ…खुद्दाम को हुक्म हुआ के…हमको ले चलो …ख़ादिमों ने अर्ज़ किया के हुज़ूर चारपाई पे ले चलें…आपने फ़रते अदब से फ़रमाया नही…बल्कि पैदल ही ले चलो…लेहाज़ा दोनों जानिब ख़ुद्दाम ने पकड़ा और आप पैदल ज़ियारत ए ताज़िया-शरीफ़ को तशरीफ़ ले गए.

इसी ज़िमन में हज़रत का एक वाक़ेआ और है..जो अहले निस्बत हज़रात के लिए जान-फ़िज़ा है के ये ताज़िया-दारी अगर अदब,एहतेराम,अक़ीदत से की जाए तो यक़ीनन हसनैन ए पाक (अलैहमुस्सलाम) का करम शामिले हाल होता है…और ये हज़रात अपने चाहने वालों को मुलाहिज़ा फ़रमाते हैं !

एक बार सूरत के रहने वाले एक आलिम ए दीन जो हज़रत शाह नियाज़ अहमद अल्वी रहमतुल्लाह अलैह के मुरिद थे…आपके साथ थे…आप ताज़िया शरीफ़ की ज़ियारत को चले…जब ज़ियारत से फ़ारिग़ हुए तो आपने उस तख़्त को बोसा दिया जिसपे ताज़िया शरीफ़ रखा था…इस पर मोलवी साहब के दिल में वस्वसा हुआ के हज़रत ने ये क्या ग़ज़ब किया ????….आप उसके दिल के ख़तरे पर मुत्तला हुए और उनसे फ़रमाया…के ताज़िया शरीफ़ की जानिब देखो…जूं ही मोलवी साहब ने ताज़िया शरीफ़ की तरफ़ निगाह की चीख़ मार कर बेहोश हो गए…जब होश आया तो फ़रमाया…”मोलवी साहब …आपने क्या देखा ??…मोलवी साहब की आँखों से आंसू जारी हो गए…उन्होंने अपना मुशाहिदा बयान करते हुए कहा कि मैंने देखा….ताज़िया शरीफ़ की एक जानिब शहज़ादा ए सब्ज़ क़बा जनाब ए इमामे हसन मुज्तबा अलैहिस्सलाम हैं और दूसरी जानिब शहज़ादा ए सुर्ख़ क़बा इमामे हुसैन शहीदे कर्बला अलैहिस्सलाम जलवागर है!

हवाला 📚📚 मख़्ज़ानुल ख़ाज़ैन, करामत ए निजामिया