खरज़ियत व नासिबियत

आज जो 18 जिल्हिज़ा ग़दीर के मक़ाम में ऐलान हुआ
जिंसमे आक़ा करीम ने ऐलान किया (जिसका में मौला उसका अली मौला) सही रिवायतों व हदीस ए सही से साबित है
जो हदीस त्वातुर तक पहुँचती है जिसके 27 रावी हैं बाज़ तहक़ीक़ के 31 रावी हैं

और 18 जिल्हिज़ा को यौम शहादत हज़रत उस्मान ए गनी भी बताया जाता है जबकि तारीखों में इख़्तेलाफ है कसरत से 12 तारीख के हवाले ज्यादा मिलते हैं कहीं 17 कुछ जगह 18 मगर जोर अठारहवीं तारीख पर ही क्यों है
हुआ उसके पीछे बहुत बड़ी नासिबियत छिपी है

क्योकि हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की आड़ में मक़ामें ग़दीर के मौके पर हुए ऐलान को याद करने से रोक जा सकते

जबकि हम हर निस्बत का यौम याद रखते अकीदत रखते हैं चाहे सहाबा हो अहलेबैत हो यहाँ तक बुजुर्गों के यौम तक

आज जो लोग ये कह रहे हैं खुश न होना मौला अली की निस्बत पर इस यौम में क्योकि आज हज़रत उस्मान की शहादत यौम भी है बेशक़ हमारे लिए आपकी शहादत अहमियत रखती है आपकी शहादत व अज़मत पर करोड़ो मर्तबा सलाम

मगर 22 दिन बात आशूरा 10 मुहर्रम का दिन होगा जिस दिन मुहम्मद का घराना कर्बला में लूटा गया काटा गया उनकी लाशों पर घोड़े दौड़ाए गए

उस दिन यही लोग कह रहे होंगे आज खुशी का दिन है नये कपड़े पहनो दस्तरख्वान बसी करो

तब शहादत भूल चुके होंगे और शहादत से कोई फ़र्क़ भी नही पड़ेगा इन्हें वज़ह क्या इस दोगलेपन की

खरज़ियत व नासिबियत इसी को कहते हैं

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