Month: July 2019
How to restore Muslim Brotherhood
Celebrating Milad un Nabi (صلى الله عليه و آله وسلم) is NOT BIDAH
Maula Ali Alaihissalam se ek din ki Mohabbat saal bhar ki Ibadat se Afzal hai!
Maula Ali Alaihissalam se ek din ki Mohabbat saal bhar ki Ibadat se Afzal hai!
Hazrat Abdullah ibne Mas’u RadiAllahu Anhuma Huzoor Nabi-e-Akram SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam se riwayat karte hain ke Aap SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ne farmaya:
“Hubbu Aali Muhammadin Youman, Khairum Min Ibadatin Sanatin wa Man Maata Alaihi Dakhalal Jannah.”
“Ahle Bayt-e-Mustafa SallAllahu Alaihi wa Aalihi wa Sallam ki ek din ki Muhabbat purey saal ki ibadat se behtar hai aur jo Isi Muhabbat par faut hua to wo Jannat me dakhil hogaya.”📚Daylami, Musnad al Firdaus, 2/142, Hadees #2821
Dr Tahir-ul-Qadri, An Najabat fee Manaqibis Sahabati wal Qarabat, page 439, Hadees #448💐Allahumma Salle Ala Sayyedina wa Maulana Muhammad wa Ala Sayyedina Aliyyuw wa Sayyedatina Fatimah wa Sayyedatina Zaynab wa Sayyedina Hasan wa Sayyedina Hussain wa Ala Aalihi wa Sahbihi wa Baarik wa Sallim.
अली ही आलिम है अली ही इल्म है
अली ही आलिम है अली ही इल्म है
🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸आलिम के मानी है इल्म वाला।
इसलिए वो शख्स तब तक आलिम नहीं बन सकता जब तक बाबे मदिनतुल इल्म से ना गुज़रे।
और इस दरवाज़े से वही गुज़रता है जो मौला अली अलैहिस्सलाम को अपना मौला और इमाम तस्लीम करता है और वही हक़ीक़ी आलिम है और उस के अलावा जो आलिम होने का दावा करे वो आलिम नहीं जाहिल अहमक है।
नुबूवत का सिलसिला खत्म हुआ इमामत का सिलसिला जारी हुआ जिस्का आगाज़ रसुलल्लाह अलैहीस्सलाम ने गदीर के मैदान मे सवा लाख सहाबा के मजमे मे इस एलान से किया
“मन कुंतो मौला फहाज़ा अलिय्युन मौला”
यानी
मैं जिसका मौला अली उसका मौलाइमामत का आगाज़ इमाम अली अलैहीस्सलाम से शुरु हुआ और इसका इख्तिताम (End) मौला इमाम महदी अलैहीस्सलाम पर होगा।
बादे रिसालत के इमामत वो दर्जा ए लासानी है जहाँ नुबूवत के अलावा हर जीन्स के सर ख़म होते है।
जिसको जो कुछ मिलेगा अली इब्न अबी तालिब अलैहिस्सलाम के घर से ही मिलेगा। इसके अलावा किसी और दर का तसव्वुर ही नहीं।क्युंकि रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का इरशादे पाक है
“मन कुंतो मौला फहाज़ा अलिय्युन मौला”
मैं जिसका मौला अली उसका मौला
ये हुक्मे रिसालत किस क़दर गहराई को समेटे हुए है ये राज़ अहले मारिफ़त ए अहलेबैत पर ही अफशां है।
इस को वही समझ सकता है जो आरिफ ए नूर ए मुहम्मदी हो। और ये नूरे मुहम्मदी जो नूरे इलाह है पांच तन मे जल्वानुमा है।
पन्जतन जिसमे मौला अली उनकी ज़ौजा माँ फातीमा और मौला हसन और मौला हुसैन का शुमार है (अलैहीमुस्सलाम)इसलिये जिस जिस ने मौला अली अलैहीस्सलाम पर और आपके वलीद जनाबे अबू तालिब पर और आपकी औलाद पर किसी भी मामले मे तन्क़ीद की है, वो किसी किस्म की भलाई को नही पा सकता!! दर्जा ए विलायत तो बहोत दूर की बात है।
ये वो घराना है जिन पर कोई बहस होनी ही नही चाहिये।
(मौला अली अलैहीस्सलाम के सैय्यद होने पर बहस आपके वलीद जनाबे अबू तालिब अलैहीस्सलाम के ईमान पर बहस, पन्जतन के नूरी होने पर बहस, उनके मासूम होने पर बहस उन्हे अलैहीस्सलाम कहने पर बहस ये तमाम बहस ईमान को बर्बाद करने वाली, हर खैर से महरूम करने वाली, आखिरत बर्बाद करने वाली है। चाहे वो लाख नमाज़े पढ़ ले।)
और ऐसे शख्स की पैरवी करना उसे पीर, उस्ताद मानना जो ईन बहसों मे मुब्तिला है महज़ गुमराही और हलाक़त है।
🇲🇷
मुनकिर को गुजरने की यहाँ ताब नहीं हैमाथे का निशान इतना भी नायाब नहीं है
है बुग्ज़े अली दिल में तो पढ़ लाख नमाज़ें
ये बुग्ज़ का धब्बा है मेहराब नहीं है



