Author: aal-e-qutub
Imam Jaffar Sadiq AlaihisSalam and Henri Poncare
Waldain Aur Bhai Behnon Ka Mukhlis Rishta.
Ep. 1 | Virtues of Maula e Kaynat Hazrat Ali bin Abi Talib (AS)

चौदह सितारे हज़रत इमाम अली रज़ा(अ.स) पार्ट- 4

इमाम अली रज़ा (अ.स.) का हज और हारून रशीद अब्बासी
ज़माना ए हारून रशीद में हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) हज के लिये मक्के मुअज़्ज़मा तशरीफ़ ले गये। उसी साल हारून रशीद भी हज के लिये आया हुआ था। ख़ाना ए काबा में दाखि़ले के बाद इमाम अली रज़ा (अ.स.) एक दरवाज़े से और हारून रशीद दूसरे दरवाज़े से निकले । इमाम (अ.स.) ने फ़रमाया कि यह दूसरे दरवाज़े से निकलने वाला जो हम से दूर जा रहा है , अनक़रीब तूस में दोनों एक जगह होंगे। एक रिवायत में है कि यहया बिने ख़ालिद बर मक्की को इमाम (अ.स.) ने मक्के में देखा कि वह रूमाल से गर्द की वजह से मुहं बन्द किये हुए जा रहा है। आप ने फ़रमाया कि उसे पता भी नहीं कि उसके साथ इमसाल क्या होने वाला है। यह अनक़रीब तबाही की मन्ज़िल में पहुँचा दिया जायेगा। चुनान्चे ऐसा ही हुआ।
रावी मुसाफ़िर का बयान है कि हज के मौक़े पर इमाम (अ.स.) ने हारून रशीद को देख कर अपने दोनों हाथों की अंगुलियां मिलाते हुए फ़रमाया कि मैं और यह इसी तरह एक हो जायेंगे। वह कहता है कि मैंने इस इरशाद का मतलब उस वक़्त समझा जब आपकी शहादत वाक़े हुई और दोनों एक मक़बरे में दफ़्न हुए। मूसा बिने इमरान का कहना है कि इसी साल हारून रशीद मदीने मुनव्वरा पहुँचा और इमाम (अ.स.) ने उसे खुत्बा देते हुए देख कर फ़रमाया कि अनक़रीब मैं और हारून एक ही मक़बरे में दफ़्न किये जायेंगे।( नूरूल अबसार पृष्ठ 144)
हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) का मुजद्दिदे मज़हबे इमामिया होना
अहादीस में हर सौ साल के बाद एक मुजद्दे इस्लाम के नुमूदो शुहूद का निशान मिलता है। यह ज़ाहिर है कि जो इस्लाम का मुजद्द होगा उसके तमाम मानने वाले उसी के मसलक पर गामज़न और उसी के उसूलो फ़ुरू के सराहने वाले होंगे और मुजद्द को जो बुनियादी मज़हब होगा उसके मानने वालों का भी वही मज़हब होगा। हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) जो क़तई तौर पर फ़रज़न्दे रसूले इस्लाम (स.अ.) थे वह उसी मसलक पर गामज़न थे। जिस मसलक की बुनियाद पैग़म्बरे इस्लाम और अली (अ.स.) ख़ैरूल अनाम का वुजूद ज़ी जूद था। यह मुसल्लेमात से है कि आले मोहम्मद (अ.स.) पैग़म्बर (अ.स.) के नक़्शे क़दम पर चलते थे और उन्हीं के ख़ुदाई मन्शा और बुनियादी मक़सद की तबलीग़ फ़रमाया करते थे यानी आले मोहम्मद (अ.स.) का मसलक वही था जो मोहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.) का मसलक था। अल्लामा इब्ने असीर जज़री अपनी किताब जामिउल उसूल में लिखते हैं कि हज़रत इमाम रज़ा (अ.स.) तीसरी सदी हिजरी में और सुक़्क़तुल इस्लाम अल्लामा क़ुलैनी चैथी सदी हिजरी में मज़हबे इमामिया के मुजद्दे थे। अल्लामा क़ौनवी और मुल्ला मुबीन ने उसी को दूसरी सदी के हवाले से तहरीर फ़रमाया है।( वसीलतुन निजात पृष्ठ 376 व शरह जामे सग़ीर )
मुहद्दिस देहलवी शाह अब्दुल अज़ीज़ इब्ने असीर का कौल नक़ल करते हुए लिखते हैं कि इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल के हज़रत इमामे अली बिने मूसा रिज़ा (अ.स.) मुजद्दे मज़हबे इमामिया दरक़रन सालिस गुफ़्ता अस्त। इब्ने असीर जज़री साहबे जामिउल उसूल ने हज़रत इमामे रज़ा (अ.स.) को तीसरी सदी में मज़हबे इमामिया का मुजद्द होना ज़ाहिरो वाज़िह फ़रमाया है। (तोहफ़ा ए असना अशरया कीद 85 पृष्ठ 83) बाज़ उलेमाए अहले सुन्नत ने आप को दूसरी सदी का और बाज़ ने तीसरी सदी का मुजद्द बतलाया है। मेरे नज़दीक दोनों दुरूस्त हैं क्यों कि दूसरी सदी में इमामे रज़ा (अ.स.) की विलादत और तीसरी सदी के आग़ाज़ में आपकी शहादत हुई है।
हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) के अख़्लाक़ व आदात और शमाएल व ख़साएल
आपके इख़्लाक़ो आदात और शमाएल ओ ख़साएल का लिखना इस लिये दुश्वार है कि वह बेशुमार हैं। ‘‘ मुश्ते नमूना अज़ ख़ुरदारे ’’ यह है बहवाले अल्लामा शिबलिन्जी इब्राहीम बिने अब्बास तहरीर फ़रमाते हैं कि हज़रत इमामे अली रज़ा (अ.स.) ने कभी किसी शख़्स के साथ गुफ़्तुगू करने में सख़्ती नहीं की और किसी बात को क़ता नहीं फ़रमाया। आपके मकारिमो आदात से था कि जब बात करने वाला अपनी बात ख़त्म कर लेता तब अपनी तरफ़ से आग़ाज़े कलाम फ़रमाते। किसी की हाजत रवाई और काम निकालने में हत्तल मक़दूर दरेग़ न फ़रमाते। कभी अपने हमनशीं के सामने पांव फ़ैला कर न बैठते और न अहले महफ़िल के रू ब रू तकिया लगा कर बैठते थे। कभी अपने ग़ुलामों को गाली न दी और चीज़ों का क्या ज़िक्र। मैंने कभी आपको थूकते और नाक साफ़ करते नहीं देखा। आप क़ह क़हा लगा कर हरगिज़ नहीं हंसते थे। ख़न्दा ज़नी के मौक़े पर आप तबस्सुम फ़रमाया करते थे। मुहासिने इख़्लाक़ और तवाज़ो व इन्केसारी की यह हालत थी कि दस्तरख़्वान पर साइस और दरबान तक को अपने साथ बिठा लेते । रातों को बहुत कम सोते और अक्सर रातों को शाम से सुबह तक शब्बेदारी करते थे और अक्सर औक़ात रोज़े से होते थे मगर तो आपसे कभी क़ज़ा नहीं हुए। इरशाद फ़रमाते थे कि हर माह में कम अज़ कम तीन रोज़े रख लेना ऐसा है जैसे कोई हमेशा रोज़े से रहे। आप कसरत से ख़ैरात किया करते थे और अकसर रात के तारीक परदे में इस इसतिहबाब को अदा फ़रमाया करते थे। मौसमे गर्मा में आपका फ़र्श जिस पर आप बैठ कर फ़तवा देते या मसाएल बयान किया करते बोरिया होता था और सरमा में कम्बल आपका यही तर्ज़े उस वक्त़ भी रहा जब आप वली अहदी हुकूमत थे। आपका लिबास घर में मोटा और ख़शन होता था और रफ़ए तान के लिये बाहर आप अच्छा लिबास पहनते थे। एक मरतबा किसी ने आप से कहा हुज़ूर इतना उम्दा लिबास क्यों इस्तेमाल फ़रमाते हैं ? आपने अन्दर का पैराहन दिखा कर फ़रमाया अच्छा लिबास दुनिया वालों के लिये और कम्बल का पैराहन ख़ुदा के लिये है। अल्लामा मौसूफ़ तहरीर फ़रमाते हैं कि एक मरतबा आप हम्माम में तशरीफ़ रखते थे कि एक शख़्स जुन्दी नामी आ गया और उसने भी नहाना शुरू किया। दौराने ग़ुस्ल में उसने इमामे रज़ा (अ.स.) से कहा कि मेरे जिस्म पर पानी डालिये आपने पानी डालना शुरू किया। इतने में एक शख़्स ने कहा ऐ जुन्दी ! फ़रज़न्दे रसूल (स.अ.) से खि़दमत ले रहा है , अरे यह इमामे रज़ा (अ.स.) हैं। यह सुनना था कि वह पैरों पर गिर पड़ा और माफ़ी मांगने लगा।( नूरूल अबसार पृष्ठ 38 व पृष्ठ 39)
एक मर्दे बलख़ी नाक़िल है कि मैं हज़रत के साथ एक सफ़र में था एक मक़ाम पर दस्तरख़्वान बिछा तो आपने तमाम ग़ुलामों को जिनमे हब्शी भी शामील थे , बुला कर बिठा लिया मैंने अर्ज़ किया मौला इन्हें अलाहिदा बिठाये तो क्या हर्ज़ है आपने फ़रमाया कि सब का रब एक है और मां बाप आदम ओ हव्वा भी एक हैं और जज़ा और सज़ा आमाल पर मौसूफ़ है , तो फिर तफ़रीक़ क्या। आपके एक ख़ादिम यासिर का कहना है कि आपका यह ताकीदी हुक्म था कि मेरे आने पर कोई ख़ादिम खाना खाने की हालत में मेरी ताज़ीम को न उठे। मुअम्मर बिने ख़लाद का बयान है कि जब भी दस्रख़्वान बिछता आप हर खाने में से एक एक लुक़मा निकाल लेते थे और उसे मिसकीनों और यतीमों को भेज दिया करते थे। शेख़ सुदूक़ तहरीर फ़रमाते हैं कि आपने एक सवाल का जवाब देते हुए फ़रमाया कि बुज़ुर्गी तक़वा से है जो मुसझे ज़्यादा मुत्तक़ी है वह मुझ से बेहतर है। एक शख़्स ने आपसे दरख़्वास्त की कि आप मुझे अपनी हैसियत के मुताबिक़ कुछ माल दुनियां से दीजिए। आपने फ़रमाया यह मुश्किल है। फिर उसने अर्ज़ की अच्छा मेरी हैसियत के मुताबिक़ इनायत कीजिये , फ़रमाया यह मुम्किन है। चुनान्चे आप ने उसे दो सौ अशरफ़ी इनायत फ़रमा दी। एक मरतबा नवीं ज़िलहिज्जा यौमे अर्फ़ा आपने राहे खु़दा में सारा घर लुटा दिया। यह देख कर फ़ज़्ल बिने सुहैल वज़ीरे मामून ने कहा , हज़रत यह तो ग़रामत यानी अपने आप को नुक़सान पहुँचाना है। आपने फ़रमाया यह ग़रामत नहीं ग़नीमत है मैं इसके इवज़ में खु़दा से नेकी और हसना लूंगा। आपके ख़ादिम यासिर का बयान है कि हम एक दिन मेवा खा रहे थे और खाने में ऐसा करते थे कि एक फल से कुछ खाते और कुछ फेंक देते थे हमारे इस अमल को आपने देख लिया और फ़रमाया नेमते ख़ुदा को ज़ाया न करो , ठीक से खाओ और जो बच जाए उसे किसी मोहताज को दे दो। आप फ़रमाया करते थे कि मज़दूर की मज़दूरी पहले तै करना चाहिये क्यों कि चुकाई हुई उजरत से ज़्यादा जो कुछ दिया जायेगा पाने वाला उसको इनाम समझेगा।
सूली का बयान है कि आप अक्सर ऊदे हिन्दी का बुख़ूर करते और मुश्क व गुलाब का पानी इस्तेमाल करते थे। इत्रयात का आपको बड़ा शौक़ था। नमाज़े सुबह अव्वल वक़्त पढ़ते उसके बाद सजदे में चले जाते थे और निहायत तूल देते थे फिर लोगों को नसीहत फ़रमाते।
सुलेमान बिन जाफ़र का कहना है कि आप अपने आबाओ अजदाद की तरह ख़ुरमें को बहुत पसन्द फ़रमाते थे। आप शबो रोज़ में एक हज़ार रकत नमाज़ पढ़ते थे। जब भी आप बिस्तर पर लेटते थे तो जब तक सो न जाते क़ुरआने मजीद के सूरे पढ़ा करते थे।
मूसा बिन सयार का बयान है कि आप अकसर अपने शियों की मय्यत में शिरकत फ़रमाते थे और कहा करते थे कि हर रोज़ शाम के वक़्त इमामे वक़्त के सामने आमाल पेश होते हैं , अगर कोई शिया गुनाहगार होता है तो इमाम उसके लिये असतग़फ़ार करते हैं।
अल्लामा तबरसी लिखते हैं कि आपके सामने जब भी कोई आता था आप पहचान लेते थे कि मोमिन है या मुनाफ़िक़। ( आलामुल वुरा तोफ़ाए रिज़विया , कशफ़ुल ग़म्मा पृष्ठ 122)
अल्लामा मोहम्मद रज़ा लिखते हैं कि आप हर सवाल का जवाब क़ुराने मजीद से देते थे और रोज़आना एक क़ुरआन ख़त्म करते थे।( जन्नातुल ख़ुलूद पृष्ठ 31)

