हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम -: के मनाकिब

हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम -: के मनाकिब :-

हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की ज़ाते अदस से ख़िलाफ़ते बातिनी और विलायत का सरचश्मा फूटा जो अहले बैत अतहार को अता हुआ जो बाद में वियालत व इमामत के नाम से मौसूम हुआ हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने अपना नायबे विलायत हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) को मुर्कार किया और हज़रत इमाम हसन व हज़रत इमाम हुसैन (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) बिलायते अली की नूरानी शमां के दो मुख्तलिफ चेहरे और हज़रत मौला अली के नायबे बिलायत हैं हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम से ही कुतबियत मुजद्दियत गौसियत, अब्दालियत के चश्मे फूटे जिससे उम्मत के मोमिनीन व औलिया व सालिहीन फैज़याब हुये और बिलायत का ये सिलसिला हज़रत मेंहदी (अलैहस्सलाम) पर ख़त्म होगा।

हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) की फ़ज़ीलत में जितनी अहादीस मुबारका वारिद हैं किसी दीगर सहाबा की फ़ज़ीलत में इतनी अहादीस वारिद नहीं हैं आप के ज़ाते पाक को वो मकामो मन्ज़िलत और ऐज़ाज़ हासिल हुआ जो दीगर सहाबा को हासिल न था आप आला मरतबत व पाकीज़ा सीरतो किरदार के हामिल थे आप की फ़ज़ीलत में बेशुमार अहादीस मन्कूल हैं जिनमें से बाज़ का तज़किरा दर्जे जैल है मुलाहिज़ा फ़रमायें ।

हज़रत ज़ैद बिन अरकम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैहवसल्लम ने ग़दीरे खुम पर क्याम किया और हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) का हाथ पकड़कर फ़रमाया जिसका मैं मौला हूँ उसका अली मौला है। (तिर्मिज़ी-2/710) (मिश्कात-3/243) (ग़दीरे खुम मक्का मुकर्रमा और मदीना मुनव्वरा के दरमियान एक जगह का नाम है)

हज़रत अबू हुरैरा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि ग़दीरे खुम का दिन था जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) का हाथ पकड़कर फ़रमाया- जिसका मैं मौला हूँ उसका अली मौला है।
इस मौके पर अल्लाह तआला ने ये आयत नाज़िल फरमाई-कि आज मैंने तुम्हारे लिये तुम्हारे दीन को मुकम्मल कर दिया और तुम पर अपनी नेअमतें पूरी कर दीं और तुम्हारे लिये (बतौर) दीन इस्लाम पसन्द कर लिया । (सू०-मायदा-5/3) (इमाम जलालुद्दीन सयूती-दुर्रे मन्सूर-2/708) (इब्ने कसीर-अल विदाया वन निहाया-5/464) (इब्ने असाकर-तारीख दमिश्क-45/176) (मुअजम औसत-तबरानी-3/324)

हज़रत अबू सईद खुदरी (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है ये आयते मुबारका-कि ऐ रसूल (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) जो कुछ आपकी तरफ आपके रब के जानिब से नाज़िल किया गया (वो सारा लोगों को) पहुँचा दीजिये (सू०-मायदा-5/67) हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) की फज़ीलत में नाज़िल हुई इस आयत का शाने नुजूल
बयान करते हुये फ़रमाते हैं कि ये आयते मुबारका जब नाज़िल हुई तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली का हाथ पकड़ा और फरमाया कि जिसका मैं मौला हूँ उसका अली मौला है ऐ अल्लाह तू उसे दोस्त रख जो अली को दोस्त रखे और उससे अदावत रख जो अली से अदावत रखे ।
(दुर्रे मन्सूर-2/817) (तफसीर कबीर-12/49,50)
(तफ्सीर मज़हरी-3/152)

हज़रत ज़ैद बिन अरकम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने ग़दीरे खुम के मकाम पर ख़िताब किया और फ़रमाया- जिसका मैं मौला हूँ उसका अली मौला है ऐ अल्लाह जो अली को दोस्त रखे तू उसे दोस्त रख जो अली से अदावत रखे तू उससे अदावत रख और जो अली की नुसरत (मदद ) करे तू उसकी नुसरत फरमां और जो अली की इआनत करे तू उसकी इआनत फ़रमां। (कंजुल उम्माल-11/609) (मुअजम कबीर-तबरानी-5/192 (अलविदाया निहाया-4/170) (मजमउज़्ज़वाइद-9/104)

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) का हाथ पकड़ा और फ़रमाया अली हर उस शख़्स का दोस्त है जो मुझे दोस्त रखता है नीज़ फ़रमाया- ऐ अल्लाह तू उसको दोस्त रख जो अली को दोस्त रखता है। (इब्ने माजा-1/72)

रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया-अली मुझसे है और मैं अली से हूँ और मेरे बाद अली हर मोमिन का वली है। (तिर्मिज़ी-2/710)

मज़कूरा हदीस पाक इस बात पर दलालत करती है कि कोई हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (अलैहस्सलाम) को हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से जुदा गुमान न करे हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम का अदबो एहतराम व ताज़ीमो तकरीम गोया ताज़ीमे मुस्तफा है और हज़रत मौला अली शेरे खुदा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) की तनकीस गोया तनकीसे मुस्तफ़ा है और हज़रत मौला अली मुर्तज़ा का ज़िक्र ज़िक्रे मुस्तफा है और ज़िक्रे मुस्तफा दरअस्ल ज़िक्रे खुदा है और हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) से मुहब्बत गोया हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से मुहब्बत की अलामत है और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से मुहब्बत अल्लाह तआला से मुहब्बत की अलामत है और मौला अली शेरे खुदा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) का मुहिब मेहबूबे मुस्तफा है और मेहबूबे मुस्तफा मेहबूबे खुदा है और हज़रत अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) का दुश्मन दरअस्ल दुश्मने रसूल है और दुश्मने रसूल दरअस्ल दुश्मने खुदा है और तमाम दुश्मने रसूल काबिले लानत और जहन्नुम के अहल और अज़ाबे नार के मुस्तहिक हैं।

हज़रत अम्मार बिन यासिर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरकारे दो आलम (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) ने फरमाया- जो मुझ पर ईमान लाया और मेरी तसदीक की मैं उसे विलायते अली की वसीअत करता हूँ जिसने अली को वलीजाना उसने मुझे वली जाना और जिसने मुझे वली जाना उसने अल्लाह को वली जाना और जिसने अली से मुहब्बत की उसने मुझसे मुहब्बत की और जिसने मुझसे मुहब्बत की उसने अल्लाह से मुहब्बत की और जिसने अली से बुग्ज़ रखा उसने मुझसे बुग्ज़ रखा और जिसने मुझसे बुग्ज़ रखा उसने अल्लाह से बुग्ज़
रखा। (कंजुल उम्माल-11/611)
(मजमउज़्ज़वाइद-9/108,109)
(मुस्नद अल फिरदौस-1/429)
(तारीख दमिश्क-40 / 181,182)

विलायते अली के फैज़ के बगैर न कोई ग़ौस हो सका न कोई कुतुब और न कोई अब्दाल हो सका विलायत, गौसियत, इमामत, कुतबियत, अब्दालियत सब विलायते अली (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) के फैज़ से हैं और आपकी सीरते पाक तमाम मुसलमानों के लिये बेहतरीन राहे हिदायत का नमूना है

एक मर्तबा चार असहाब हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की बारगाहे अक्दस में हाज़िर हुये उनमें से एक ने हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) की शिकायत करते हुये अर्ज किया या रसूलुल्लाह क्या आपने नहीं देखा कि हज़रत अली ने ऐसा किया आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने उससे मुँह फेर लिया फिर दूसरा उठा उसने भी हज़रत मौला अली की शिकायत में यही कहा आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने उससे भी मुँह फेर लिया फिर इसी तरह तीसरे और चौथे शख़्स ने भी उठकर हज़रत मौला अली की शिकायत में वो ही बात दोहराई फिर हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम उनकी तरफ मुतवज्जै हुये और आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के चेहरे मुबारक से गुस्सा ज़ाहिर हो रहा था आप ने फरमाया कि तुम अली से क्या चाहते हो (ये तीन मर्तबा फ़रमाया) फिर इरशाद फ़रमाया- अली मुझसे है और मैं अली से हूँ और वो मेरे बाद हर मोमिन का वली है। (तिर्मिज़ी-2/710)

वज़ाहतः- मजकूरा हदीस पाक में हज़रत मौला अली
करमल्लाहु वजहुल करीम की शिकायत पर हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का चेहरा मुबारक मुताग़इयर हो जाना और उस पर गुस्से का ज़ाहिर होना और आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का उन शिकायत करने वाले असहाब से मुँह फेरना और आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का ये इरशाद फरमाना कि अली मुझसे है और मैं अली से हूँ इस बात की तरफ इशारा करता है कि तुम जो हज़रत अली की शिकायत करते हो तो गोया तुम मेरी (हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) की शिकायत करते हो क्योंकि जब हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमां दिया कि अली मुझसे है और मैं अली से हूँ तो हज़रत मौला अली की शिकायत करना गोया हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की शिकायत करना है और आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का मजकूरा अहादीस में दूसरा फरमान कि मेरे बाद अली हर मोमिन का वली है यानी जो हज़रत मौला अली की विलायत का मुन्किर है वो मोमिन ही नहीं बल्कि मुनाफिक है हज़रत मौला अली (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) के बेशुमार फ्ज़ाइल व मरातिब हैं जिनका शुमार और मुवाज़िना करना ना मुमकिन है।

हज़रत उम्मे सलमा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा) फ़रमाती हैं नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम फ़रमाया करते थे कि किसी मुनाफिक की हज़रत अली से मुहब्बत नहीं हो सकती और कोई मोमिन हज़रत अली से बुग्ज़ नहीं रख सकता। (तिर्मिज़ी-2/712)

हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने मुझसे अहद फ़रमाया कि तुझसे मोमिन ही मुहब्बत करेगा और तुझसे बुग्ज़ रखने वाला मुनाफिक ही होगा। (इब्ने माजा-1/72)
(तिर्मिज़ी-2/718)

उस ज़माने में सहाबाकिराम (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) मुनाफ़िकों और मोमिनों की पहचान इस तरह किया करते थे कि जिसके चेहरे पर हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) के नाम से मरोड़ व सिकुड़न आ जाये तो वो मुनाफिक है और जिसका चेहरा हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) के नाम से खुशी और मशर्रत से खिल उठे वो मोमिन है।

सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया- हज़रत अली का मेरे साथ तआल्लुक इस तरह से है जिस तरह हारून (अलैहस्सलाम) का मूसा (अलैहस्सलाम) के साथ तआल्लुक है अलबत्ता मेरे बाद नबूवत नहीं। (सही बुखारी-1 /526)

हज़रत साद बिन अबी वक़्क़ास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है जब आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ग़ज़बये तबूक को तशरीफ ले जा रहे थे तो हज़रत मौला अली मुर्तज़ा करमल्लाहु वजहुल करीम को मदीना मुनव्वरा का खलीफा मुर्कार किया तो हज़रत मौला अली ने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से अर्ज किया या रसूलुल्लाह आप मुझे औरतों और बच्चों में छोड़े जाते हैं आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया क्या तुम इस बात पर राज़ी और खुश नहीं कि तुम्हारा दर्जा मेरे नज़दीक ऐसा है जैसे हारून अलैहस्सलाम का दर्जा मूसा अलैहस्सलाम के नज़दीक था पर मेरे बाद कोई नबी नहीं। (सही मुस्लिम-6/90)

वज़ाहतः-हज़रत हारून अलैहस्सलाम मूसा अलैहस्सलाम
के चचा ज़ाद भाई थे और हज़रत मौला अली हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के चचा ज़ाद भाई थे जब आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ग़ज़वये तबूक पर जाने के लिये तैयार थे उस वक़्त आपने ये इरशाद फरमाया कि ऐ अली क्या तुम इस बात पर राज़ी और खुश नहीं कि तुम्हारा दर्जा मेरे नज़दीक ऐसा है जैसे हारून अलैहस्सलाम का मूसा अलैहस्सलाम के नज़दीक था इस इरशादे मुबारक से हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) को वो शरफ (मर्तबा) मिला जो बनी ईसराईल में हारून अलैहससलाम को मिला था मगर फर्क इतना था कि हारून अलैहस्सलाम नबी हैं और हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ख़ातिमुल अम्बिया हैं आपके बाद कोई पैग़म्बर दुनियाँ में नहीं आना था।

जब आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ग़ज़वये तबूक पर जाने लगे तो हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) को मदीना मुनव्वरा का खलीफा मुर्कार किया तो हज़रत मौला अली ने अर्ज किया कि आप (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) मुझे अपने साथ ग़ज़वये
तबूक पर नहीं ले जा रहे बल्कि औरतों और बच्चों की देखभाल व हिफाज़त के लिये मदीने में छोड़े जा रहे हैं तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया कि क्या तुम इस बात पर राज़ी और खुश नहीं कि तुम्हारा मेरे साथ तआल्लुक इस तरह है जिस तरह हारून अलैहस्सलाम का मूसा अलैहस्सलाम के साथ तआल्लुक था जब हज़रत मूसा अलैहस्सलाम कोहे तूर पर गये तो हज़रत हारून अलैहस्सलाम को अपना खलीफा बना गये थे लेकिन इस हदीस ये मुराद नहीं कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के विसाल के बाद भी आप खलीफा होंगे बल्कि हज़रत मौला अली को आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने वक़्ती तौर पर खलीफा मुर्कार किया था गरज़ ये कि जो क्राबत हारून अलैहस्सलाम को मूसा अलैहस्सलाम से थी उससे कई गुना ज़्यादा क़ाबत हज़रत मौला अली मुर्तज़ा को हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से थी।

साद बिन अबी वक़्क़ास (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि मुआविया बिन अबू सुफियान ने साद बिन अबी वक़्क़ास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) को हुक्म दिया और पूछा कि तुम अबू तुराब (हज़रत अली मुर्तज़ा) को बुरा क्यों नहीं कहते हज़रत साद रज़िअल्लाहु तआला अन्हु ने कहा कि मैं तीन बातों की वजह से हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) को बुरा नहीं कहूँगा जो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाई थीं मैंने सुना है हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली से ग़ज़बये तबूक पर जाते वक़्त मुखातिब होकर फ़रमाया ऐ अली क्या तुम इस बात पर राज़ी नहीं कि तुम्हारा दर्जा मेरे नज़दीक ऐसा है जैसे हारून अलैहस्सलाम का मूसा अलैहस्सलाम के नज़दीक था पर मेरे बाद कोई नबी नहीं और मैंने सुना है खैबर के दिन आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया कल मैं ऐसे शख़्स को झण्डा दूँगा जो मुहब्बत रखता है अल्लाह और उसके रसूल से और अल्लाह और उसका रसूल भी उससे मुहब्बत रखते हैं और उसके हाथों पर अल्लाह तआला फतह देगा ये सुनकर हम इंतिज़ार करते रहे फिर आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया अली को बुलाओ फिर हज़रत अली आये तो उनकी आँखें दुख्ती थीं हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत अली की आँखों पर अपना लुआबे दहन मुबारक लगाया (पस उनकी आँखों की तमाम तकलीफे ख़त्म हो गईं) फिर हज़रत मौला अली को झण्डा दिया गया और अल्लाह तआला ने हज़रत अली के हाथ पर फतह दी और मैंने सुना है जब ये आयत नाज़िल हुई कि बुलायें हम अपने बेटों को और बुलाओ तुम अपने बेटों को.. . (आयते मुहाबला) तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत अली, सइयदा फातिमा और हसन व हुसैन (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) को बुलाया और फ़रमाया ऐ अल्लाह ये मेरे अहले बैत है।
(सही मुस्लिम-6/91) (तिर्मिज़ी-2/714)
(अबू तुराब हज़रत मौला अली की कुन्नियत है)

तसरीहः- मजकूरा हदीस मुबारका से कई बातें वाज़ेह हुईं हैं एक ये कि अल्लाह व रसूल और हज़रत अली की बाहमी मुहब्बत व क्राबत इस बात पर दलालत करती है कि हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम मरतबत के आला मकामो मन्ज़िलत पर फाइज़ थे और दूसरी बात रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के इल्मे गैब को साबित करती है कि आप


सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का ये फ्रमाना कि कल मैं उस शख़्स को झण्डा अता करूँगा जिसके हाथों पर अल्लाह तआला फतह देगा ये आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के इल्मे गैब पर दलालत करता है।
तीसरी बात ये कि जब आयते मुहाबला नाज़िल हुई तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने अब्नाअना में हसन व हुसैन (रजिअल्लाहु तआला अन्हुम) को और निसाअना में सिर्फ सइयदा फातिमा ज़हरा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) को और अन्फुसाना में हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने अपने साथ हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) को शामिल किया और फ़रमाया ये मेरे अहले बैत हैं आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के इस फ़रमाने मुबारक ने लोगों के अहले बैत के मुताअल्लिक मुग़ालते की नफी कर दी कि कोई शख़्स अली, फातिमा, हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) को मेरे अहले बैत से जुदा गुमान न करे बल्कि मेरे अहले बैत में हज़रत मौला अली सइयदा फातिमा और हसन व हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) आला दरजात के मन्सब पर फाइज़ है।

हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- ऐ अली तू दुनियाँ व आख़िरत में सरदार है तेरा महबूब मेरा महबूब है और मेरा महबूब अल्लाह का महबूब है और तेरा दुश्मन मेरा दुश्मन है और मेरा दुश्मन अल्लाह का दुश्मन है और उसके लिये हलाकत (बर्बादी) है जो मेरे बाद तुम्हारे साथ बुग्ज़ रखे (मुस्तदरक हाकिम-3/138)



हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत उम्मे सलमा (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) से फरमाया ये अली बिन अबू तालिब हैं इनका गोस्त मेरा गोस्त है और इनका खून मेरा
खून है। (मुअजम कबीर-तबरानी-11/93)
(मजमउज़्ज़वाइद-9/102)

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया अल्लाह तआला अली पर रहम फ़रमाये नीज़ फ़रमाया ऐ अल्लाह अली जिधर को रुख करें हक का रूख भी उधर को हो जाये। (तिर्मिज़ी-2/712)

हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम हक व हिदायत के कामिल व बेहतरीन नमूना थे आप ने कभी हक व हिदायत का और हक व हिदायत ने कभी आपका साथ न छोड़ा जिस तरह रूह और जिस्म का मज़बूत बाहमी तआल्लुक होता है उसी तरह हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) का हक व हिदायत से मज़बूत बाहमी तआल्लुक था और ये सारा फैज़ दुआये मुस्तफा के असर व निस्बते मुस्तफा से था।

हज़रत अब्दुल्ला बिन उमर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने सहाबा किराम के दरमियान भाई चारा कायम कराया तो हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) इस हालत में हाज़िर हुये कि आपकी आँखों से आँसू जारी थे आकर अर्ज किया या रसूलुल्लाह आपने सहाबा के दरमियान भाई चारा
कायम फ़रमाया लेकिन मुझे किसी का भाई नहीं बनाया आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया ऐ अली तुम दुनियाँ व आख़िरत में मेरे भाई हो।
(तिर्मिज़ी-2/713)

रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (अलैहस्सलाम) को अपना भाई करार दिया और दुनियाँ व आख़िरत में आप इस अज़ीम मरतबत से बहरेयाब हुये ।

हज़रत अनस बिन मालिक (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम के पास एक पका हुआ परिन्दा रखा था आपने दुआ माँगी ऐ अल्लाह मख़लूक में से अपने महबूब तरीन शख़्स को मेरे पास भेज ताकि वो मेरे साथ ये परिन्दा खाये इतने में हज़रत मौला अली हाज़िर हुये फिर हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) के साथ परिन्दा खाया। (तिर्मिज़ी-2/713)

हज़रत अब्दुल्ला (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है मौला अली मुर्तज़ा करमल्लाहु वजहुल करीम ने फरमाया- जब मैं कुछ माँगता हूँ तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम मुझे अता फरमाते हैं और अगर मैं खामोश रहता हूँ तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम मुझसे इब्तिदा फ़रमाते हैं (यानी आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम हज़रत अली से खुद पूछते और बगैर सवाल के अता फरमाते) (तिर्मिज़ी-2/713)

हज़रत जाबिर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने तॉयफ् के दिन हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) को बुलाया और उनसे सरगोशी (कानाफूसी) की तो लोगों ने कहा हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की अपने चचाज़ाद भाई के साथ सरगोशी तवील हो गई तो हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया मैंने अली से सरगोशी नहीं की बल्कि अल्लाह तआला ने अली से सरगोशी फरमाई है (यानी अल्लाह तआला के हुक्म से मैने सरगोशी की है) (तिर्मिज़ी-2/715)

हज़रत उम्मे अतीया (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) से रिवायत है सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने एक लश्कर भेजा जिसमें हज़रत अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) भी थे मैने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को हाथ उठाये दुआ माँगते हुये सुना था ऐ अल्लाह उस वक़्त तक मेरा विसाल न हो जब तक तू मुझे अली को न दिखा दे।
(तिर्मिज़ी-2/719)

हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) की जुदाई में हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम का ये दुआ फ़रमाना इंतिहाई मुहब्बत की अलामत है कि हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को हज़रत मौला अली से बेहद मुहब्बत थी और हज़रत मौला अली को भी हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम से बेइंतिहा मुहब्बत थी हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम अल्लाह व रसूल के मुहिब भी थे और मेहबूब भी थे।


हज़रत इब्ने अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) के दरवाज़े के सिवा तमाम दरवाज़े बन्द करने का हुक्म दिया। (जो मस्जिदे नबवी में खुलते थे) (तिर्मिज़ी-2/717)

हज़रत इमाम हसन बिन अली (अलैहिमुस्सलाम) ने खुत्बा दिया और फ़रमाया- गुज़िश्ता कल तुमसे वो हस्ती जुदा हो गई जिनसे न तो गुज़िश्ता लोग इल्म में सबक्त ले सके और न ही बाद में आने वाले उनके इल्मी मर्तबे को पा सकेंगे हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम उनको अपना झण्डा देकर भेजते थे और जिबराईल आपकी दाँयी तरफ होते थे और मीकाईल आपकी बाँयी तरफ होते थे और आपकी फतह होने तक वो आपके साथ रहते थे। (मुस्नद अहमद-1/199) (मुअजम औसत – तबरानी-2/336)

हज़रत जाबिर (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) बयान करते हैं कि ग़जबये खैबर के दिन हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) ने किला खैबर का दरवाज़ा उठा लिया यहाँ तक कि मुसलमान किले पर चढ़ गये और उसे फतह कर लिया हालाँकि उस दरवाज़े को चालीस आदमी मिलकर उठाते थे। (इमाम अशक्लानी-फतहुल बारी-7/478) (इमाम इब्ने अली शैबा- अल मुसन्निफ़-6/347)

हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरवरे कायनात सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- मैं इल्म का शहर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है लिहाजा जो इस शहर में दाखिल होना चाहता है वो बाबे अली से आये। (मुस्तदरक हाकिम-3/126,127) (मजमउज़्ज़वाइद-9/114) (अल 14) (अल फिरदौस-1/44) (मुअजम कबीर- तबरानी-11/55)

हज़रत मौला अली मुर्तज़ा (करमल्लाहु वजहुल करीम) से रिवायत है नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- मै हिकमत का घर हूँ और अली उसका दरवाज़ा है। (तिर्मिज़ी-2/714)

जो शख़्स हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम की बारगाहे अदस से इल्मो माअरफत से फैज़याब होने का तालिब हो तो उसे बाबे अली से गुज़रना होगा बाबे अली से गुज़रे बगैर बारगाहे मुस्तफा से कोई फैज़याब नहीं हो सकता और बाबे अली अहले बैत अतहार की सच्ची मुहब्बत व अकीदत से खुलता है और अल्लाह तआला की कुर्बत व रसाई और फ़ज़्लो करम का हुसूल नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम और अहले बैत अतहार की मुहब्बत से है।

हज़रत अब्दुल्ला बिन मसऊद (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है सरकारे दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया कि हज़रत अली के चेहरे को देखना भी इबादत है। (मुस्तदरक हाकिम-3/102-0-4737) (अल फिरदौस 4/294)

उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) फरमाती हैं कि मैने अपने वालिद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) को देखा कि वो कसरत से हज़रत अली केचेहरे को देखा करते थे तो मैने आपसे पूछा कि ऐ अब्बाजान क्या वजह है कि आप कसरत से हज़रत अली के चेहरे की तरफ देखते रहते हैं हज़रत अबू बक्र सिद्दीक (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) ने जवाब दिया कि ऐ मेरी बेटी मैने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को फ़रमाते हुये सुना है कि हज़रत अली के चेहरे को देखना भी इबादत है ।
(इब्ने असाकर-तारीख दमिश्क-42/355)

हज़रत तलीक बिन मुहम्मद बयान करते है कि मैने हज़रत इमरान बिन हसीन को देखा कि वो हज़रत अली को टकटकी बाँधे देख रहे थे किसी ने उनसे पूछा कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि मैने हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को फ़रमाते हुये सुना कि हज़रत अली की तरफ देखना भी इबादत है । (मजमउज़्ज़वाइद-9/109)
(मुअजम कबीर-तबरानी-18/109)

उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) से रिवायत है रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया कि अली का ज़िक्र भी इबादत है। (अल फिरदौस-2/244)
(कंजुल उम्माल-11/601)

हज़रत उम्मे सलमा (रज़िअल्लाहु तआला अन्हा) फमाती हैं कि मैने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को फरमाते हुये सुना है कि अली और कुरान का चोली दामन का साथ है ये दोनों कभी भी जुदा न होंगे यहाँ तक कि मेरे पास हौज़े कौसर पर (भी
इकट्ठे) आयेंगे। (मुस्तदरक हाकिम-3/134)
(मजमउज़्ज़वाइद-9/134)

हज़रत अब्दुल्ला बिन अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) फ़रमाते हैं कि ये आयात- बेशक जो लोग ईमान लाये और नेक अमल किये तो रहमान उनके लिये (लोगों के) दिलों में मुहब्बत पैदा फरमां देगा-(सू०-मरयम-19/96) ये आयते करीमा हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) की शान में उतरी और इससे मुराद मोमिनीन के दिलों में हज़रत अली की मुहब्बत डालना है। (तफ़्सीर कुरतबी-6/153) (मजमउज़्ज़वाइद-9/125)

हज़रत इब्ने अब्बास रज़िअल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि ये आयत हज़रत मौला अली करमल्लाहु वजहुल करीम के हक में नाज़िल हुई यानी मोमिनीन के दिलों में हज़रत मौला अली की मुहब्बत डाल दी। (दुर्रे मन्सूर-4/747) (तफ़्सीर मज़हरी-6/161)

इमाम अब्दुल रज़्ज़ाक ने हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत किया है कि इस आयत से मुराद दुनियाँ में मोमिनीन के दिलों में हज़रत मौला अली की मुहब्बत पैदा करना है। (तफ़्सीर अब्दुल रज्जाक-2/367)
(दुर्रे मन्सूर-4/748)

हज़रत मौला अली मुर्तज़ा की शान बा जुबाने कुरान-वो जो अपने माल खैरात करते हैं रात में और दिन में छुपे हुये और ज़ाहिर (सू०-बक्राह-274)

हज़रत इब्ने अब्बास (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) से रिवायत है कि ये आयत हज़रत मौला अली (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) के हक मे नाज़िल हुई आपके पास चार दिरहम थे आपने एक दिरहम रात
को एक दिरहम दिन को और एक दिरहम खुफिया और एक दिरहम ऐलानियाँ ख़र्च किया।
(दुर्रे मन्सूर-1/936) (तफ्सीर इब्ने अब्बास-1 / 165) (तफ्सीर इब्ने कसीर-1/384) (तफ्सीर मज़हरी-1 /539)
(तफ़्सीर कुरतबी-2/419)

कुरान मजीद की सूरह तहरीम में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) को सालिहुल मोमिनीन फरमाया-
तो बेशक अल्लाह ही उनका दोस्त व मददगार है और जिबरईल और सालिहुल मोमिनीन (नेक ईमान वाले) और फरिश्ते उनके मददगार हैं। (सू०-तहरीम-4)

मुफस्सिरीनेकिराम इस आयत की तफ्सीर में फ़रमाते हैं कि सालिहुल मोमिनीन से मुराद हज़रत मौला अली (करमल्लाहु वजहुल करीम) हैं।
(तफ़्सीर इब्ने कसीर- 28/566)

हज़रत अस्मा बिन्ते उमैस (रजिअल्लाहु तआला अन्हा) से रिवायत है कि मैनें नबी करीम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम को फ़रमाते हुये सुना है कि सालिहुल मोमिनीन हज़रत मौला अली (अलैहस्सलाम) हैं।
(दुर्रे मन्सूर-6/643) (तफ्सीर कुरतबी-9/504)

इमाम इब्ने असाकर (रहमतुल्लाह अलैह) ने इब्ने अब्बास रज़िअल्लाहु तआला अन्हु से बयान किया है कि सालिहुल मोमिनीन से मुराद हज़रत मौला अली (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) हैं।
(तारीख़ इब्ने असाकर-42/361) (दुर्रे मन्सूर-6/643)

AYAT-E-SALAAM

AYAT-E-SALAAM

In Surah As Saffaat, verse 130, the Holy Qur’an states:

سَلَمُ عَلَى إِلْ يَاسِينَ )
“Peace be upon Elyas.”

Hadrat Sayyiduna Abdullah bin Abbas Radi Allahu ‘Anhuma states that, “This is actually Salaamunala Il Yaseen and the Ale Yaseen is the family of the Holy Prophet Sallal Laahu ‘Alayhi Wasallam.” (Durre Mansur).

Some of the eminent Saints have recited this as “Ale Yaseen” because one of the names of the Holy Prophet Sallal Laahu ‘Alayhi Wasallam is also “Yaseen”.

Allama ibn Hajr Makki Radi Allahu Anhu explains, “Many of the eminent Mufassireen have recorded the words of Hadrat Sayyiduna ibn Abbas Radi Allahu ‘Anhuma and have stated that by Ale Yaseen is meant the children of the Holy Prophet Sallal Laahu ‘Alayhi Wasallam.”

Khutbah 1 — Doosra hissa: Kainat ki takhleeq (The Creation of the Universe)

Khutbah 1 — Doosra hissa: Kainat ki takhleeq

Arabic matn:

أَنْشَأَ الْخَلْقَ إِنْشَاءً، وَابْتَدَأَهُ ابْتِدَاءً، بِلَا رَوِيَّةٍ أَجَالَهَا، وَلَا تَجْرِبَةٍ اسْتَفَادَهَا، وَلَا حَرَكَةٍ أَحْدَثَهَا، وَلَا هَمَامَةِ نَفْسٍ اضْطَرَبَ بِهَا.

أَحَالَ الْأَشْيَاءَ لِأَوْقَاتِهَا، وَلَأَمَ بَيْنَ مُخْتَلِفَاتِهَا، وَغَرَزَ غَرَائِزَهَا، وَأَلْزَمَهَا أَشْبَاحَهَا، عَالِمًا بِهَا قَبْلَ ابْتِدَائِهَا، مُحِيطًا بِحُدُودِهَا وَانْتِهَائِهَا، عَارِفًا بِقَرَائِنِهَا وَأَحْنَائِهَا.

Roman Urdu talafuz:

Ansha’al-khalqa inshaa’an, wabtada’ahu ibtidaa’an, bila rawiyyatin ajaalahaa, wa la tajribatin istafaadahaa, wa la harakatin ahdathahaa, wa la hamaamati nafsin idtaraba bihaa.

Ahaala al-ashyaa’a li-awqaatihaa, wa la’ama baina mukhtalifatihaa, wa gharaza gharaa’izahaa, wa alzamahaa ashbaahaa, ‘aaliman bihaa qabla ibtidaa’ihaa, muheetan bi-hudoodihaa wa intihaa’ihaa, ‘aarifan bi-qaraa’inihaa wa ahnaa’ihaa.

Roman Urdu tarjuma

Allah ne makhlooq ko paida kiya aur uski ibtida farmayi, baghair kisi pehle se soch-vichar ki zaroorat ke, baghair kisi tajrube se faida uthane ke, baghair kisi harkat ke jo usne pehle khud paida ki ho, aur baghair kisi zehni pareshani ya andarooni bechaini ke.

Usne har cheez ko uske muqarrar waqt ke mutabiq rakha, mukhtalif cheezon ke darmiyan munasibat paida ki, unki fitri khasusiyat muqarrar ki aur unhein unki munasib shaklein ata ki.

Woh in sab cheezon ko unki paidaish se pehle hi jaanta tha; unki hudood, unki inteha aur unke tamam pehluon ka ilm rakhta tha.

Tashreeh

1. Allah ko kisi planning ya tajrube ki zaroorat nahin

Insan koi kaam karne se pehle sochta hai, tajruba karta hai, ghalti karta hai aur phir apne tareeqe ko behtar banata hai. Allah ki zaat aisi nahin. Uska ilm aur qudrat kamil hai. Kainat ki takhleeq ke liye use kisi tajrube ya mashq ki zaroorat nahin.

2. Kainat mein nizam aur taqdeer

Imam Ali ؑ batate hain ke Allah ne har cheez ko ek muqarrar nizam ke tehat paida kiya. Kainat mein cheezon ka ek doosre se talluq aur unki fitri khasusiyat Allah ke ilm aur hikmat ke mutabiq hain.

3. Allah ka ilm takhleeq se pehle bhi tha

Allah kisi cheez ko paida karne ke baad uske bare mein ilm hasil nahin karta. Woh har cheez ko uske wajood mein aane se pehle bhi jaanta hai. Yeh Allah ke sifat-e-ilm aur kamil qudrat ka bayan hai.

Matn ke hawalay: Nahjul Balagha, Khutbah 1; Arabic aur tarjuma ke muqable ke liye Nahjul Balagha Reader aur Al-Islam.org ke matn dekhein. Nahj al-Balagha+2

Is hisse se hasil hone wale sabaq

  1. Allah ki hamd aur shukr insan ki bunyadi zimmedari hai.
  2. Allah ki zaat aur sifaat ko makhlooq ke paimane se nahin naapna chahiye.
  3. Kainat ka nizam Allah ke ilm, qudrat aur hikmat ka mazhar hai.
  4. Allah ka ilm azali hai; use kisi tajrube ya tajdeed-e-ilm ki zaroorat nahin.
  5. Insani aqal Allah ki makhlooq hai, is liye woh Khaliq ki zaat ka mukammal ihata nahin kar sakti.

The Creation of the Universe

خلق العالم

He initiated creation most initially and commenced it originally, without undergoing reflection, without making use of any experiment, without innovating any movement, and without experiencing any aspiration of mind. He allotted all things their times, put together their variations gave them their properties, and determined their features knowing them before creating them, realising fully their limits and confines and appreciating their propensities and intricacies.

أَنْشَأَ الخَلْقَ إنْشَاءً، وَابْتَدَأَهُ ابْتِدَاءً، بِلاَ رَوِيَّة أَجَالَهَا، وَلاَ تَجْرِبَة اسْتَفَادَهَا، وَلاَ حَرَكَة أَحْدَثَهَا، وَلاَ هَمَامَةِ نَفْس اضطَرَبَ فِيهَا. أَحَالَ الاْشياءَ لاِوْقَاتِهَا، وَلاَمَ بَيْنَ مُخْتَلِفَاتِهَا، وَغَرَّزَ غَرائِزَهَا، وَأَلزَمَهَا أشْبَاحَهَا، عَالِماً بِهَا قَبْلَ ابْتِدَائِهَا، مُحِيطاً بِحُدُودِها وَانْتِهَائِهَا، عَارفاً بِقَرَائِنِها وَأَحْنَائِهَا.

When Almighty created the openings of atmosphere, expanse of firmament and strata of winds, He flowed into it water whose waves were stormy and whose surges leapt one over the other. He loaded it on dashing wind and breaking typhoons, ordered them to shed it back (as rain), gave the wind control over the vigour of the rain, and acquainted it with its limitations. The wind blew under it while water flowed furiously over it.

ثُمَّ أَنْشَأَ ـ سُبْحَانَهُ ـ فَتْقَ الاْجْوَاءِ، وَشَقَّ الاْرْجَاءِ، وَسَكَائِكَ الَهوَاءِ، فأَجازَ فِيهَا مَاءً مُتَلاطِماً تَيَّارُهُ، مُتَراكِماً زَخَّارُهُ، حَمَلَهُ عَلَى مَتْنِ . الرِّيحِ الْعَاصِفَةِ، وَالزَّعْزَعِ الْقَاصِفَةِ، فَأَمَرَها بِرَدِّهِ، وَسَلَّطَهَا عَلَى شَدِّهِ، وَقَرنَهَا إِلَى حَدِّهِ، الهَوَاءُ مِنْ تَحْتِها فَتِيقٌ، وَالمَاءُ مِنْ فَوْقِهَا دَفِيقٌ.

Then Almighty created forth wind and made its movement sterile, perpetuated its position, intensified its motion and spread it far and wide. Then He ordered the wind to raise up deep waters and to intensify the waves of the oceans. So the wind churned it like the churning of curd and pushed it fiercely into the firmament throwing its front position on the rear and the stationary on the flowing till its level was raised and the surface was full of foam.

Then Almighty raised the foam on to the open wind and vast firmament and made there-from the seven skies and made the lower one as a stationary surge and the upper one as protective ceiling and a high edifice without any pole to support it or nail to hold it together.

Then He decorated them with stars and the light of meteors and hung in it the shining sun and effulgent moon under the revolving sky, moving ceiling and rotating firmament.

ثُمَّ أَنْشَأَ سُبْحَانَهُ رِيحاً اعْتَقَمَ مَهَبَّهَا، وَأَدَامَ مُرَبَّهَا، وَأَعْصَفَ مَجْرَاها، وَأَبْعَدَ مَنْشَاهَا، فَأَمَرَها بِتَصْفِيقِ المَاءِ الزَّخَّارِ، وَإِثَارَةِ مَوْجِ البِحَارِ، فَمَخَضَتْهُ مَخْضَ السِّقَاءِ، وَعَصَفَتْ بهِ عَصْفَهَا بِالفَضَاءِ، تَرُدُّ أَوَّلَهُ عَلَى آخِرِهِ، وَسَاجِيَهُ عَلَى مَائِرِهِ، حَتَّى عَبَّ عُبَابُهُ، وَرَمَى بِالزَّبَدِ رُكَامُهُ، فَرَفَعَهُ فِي هَوَاء مُنْفَتِق، وَجَوٍّ مُنْفَهِق، فَسَوَّى مِنْهُ سَبْعَ سَموَات، جَعَلَ سُفْلاَهُنَّ مَوْجاً مَكْفُوفاً، وَعُلْيَاهُنَّ سَقْفاً مَحْفُوظاً، وَسَمْكاً مَرْفُوعاً، بِغَيْر عَمَد يَدْعَمُهَا، وَلا دِسَار يَنْظِمُها.

ثُمَّ زَيَّنَهَا بِزينَةِ الكَوَاكِبِ، وَضِياءِ الثَّوَاقِبِ، وَأَجْرَى فِيها سِرَاجاً مُسْتَطِيراً، وَقَمَراً مُنِيراً: في فَلَك دَائِر، وَسَقْف سَائِر، وَرَقِيم مَائِر.

Khutbah 1 — Pehla hissa: Allah ki hamd aur uski ma‘rifat

Khutbah 1 — Pehla hissa: Allah ki hamd aur uski ma‘rifat

Arabic matn — Khutbah 1 ka ibtidai hissa

Arabic:

الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَا يَبْلُغُ مِدْحَتَهُ الْقَائِلُونَ، وَلَا يُحْصِي نَعْمَاءَهُ الْعَادُّونَ، وَلَا يُؤَدِّي حَقَّهُ الْمُجْتَهِدُونَ، الَّذِي لَا يُدْرِكُهُ بُعْدُ الْهِمَمِ، وَلَا يَنَالُهُ غَوْصُ الْفِطَنِ، الَّذِي لَيْسَ لِصِفَتِهِ حَدٌّ مَحْدُودٌ، وَلَا نَعْتٌ مَوْجُودٌ، وَلَا وَقْتٌ مَعْدُودٌ، وَلَا أَجَلٌ مَمْدُودٌ.

فَطَرَ الْخَلَائِقَ بِقُدْرَتِهِ، وَنَشَرَ الرِّيَاحَ بِرَحْمَتِهِ، وَوَتَّدَ بِالصُّخُورِ مَيَدَانَ أَرْضِهِ.

Roman Urdu talafuz:

Al-hamdu lillahil-lazi la yablughu mid-hatahul-qaa’iloon, wa la yuhsee na‘maa’ahul-‘aaddoon, wa la yu’addi haqqahul-mujtahidoon.

Allazi la yudrikuhu bu‘dul-himam, wa la yanaaluhu ghawsul-fitan. Allazi laisa li-sifatihi haddum mahdood, wa la na‘tum mawjood, wa la waqtum ma‘dood, wa la ajalum mamdood.

Fataral-khalaa’iqa bi-qudratihi, wa nasharar-riyaaha bi-rahmatihi, wa wattada bis-sukhoori mayadaana ardihi.

Roman Urdu tarjuma

Tamam tareef Allah hi ke liye hai, jis ki hamd-o-sana tak bolne walon ki zaban nahin pahunch sakti; jis ki ne‘maton ko ginne wale gin nahin sakte; aur jo koshish karne wale hain, woh bhi us ka poora haq ada nahin kar sakte.

Woh aisa hai ke buland se buland irade bhi uski haqeeqat tak nahin pahunch sakte aur gehri se gehri aqal-o-fahm bhi uski kunh ko nahin paa sakti.

Uski sifaat ke liye koi muqarrar had nahin, koi aisi ta‘reef nahin jo uska poora ihata kar sake; uske liye koi gina hua waqt nahin aur na hi koi aisi muddat hai jo uski hasti ko khatam kar sake.

Usne apni qudrat se makhlooq ko paida kiya, apni rehmat se hawaon ko chalaya aur mazboot paharon ke zariye zameen ke iztirab ko sambhala.

Tashreeh

1. Allah ki hamd ka ihata insani zaban nahin kar sakti

Imam Ali ؑ sab se pehle Allah ki hamd ke zariye khutbah ka aaghaz karte hain. Insan Allah ki jitni tareef kare, woh uski azmat ka mukammal ihata nahin kar sakta.

Iska matlab yeh nahin ke Allah ki tareef karna be-ma‘ni hai, balkeh iska matlab hai ke Allah ki azmat insani alfaaz aur ilm se kahin zyada wasee‘ hai.

2. Allah ki ne‘maton ka shumar mumkin nahin

Insan apni zindagi mein Allah ki di hui ne‘maton ka ek chhota sa hissa bhi poori tarah nahin gin sakta. Saans, zindagi, ilm, aqal, rizq aur kainat ka nizam — sab Allah ki ne‘matein hain.

Qur’an mein bhi farmaya gaya:

Surah Ibrahim 14:34

وَإِن تَعُدُّوا نِعْمَتَ اللَّهِ لَا تُحْصُوهَا

Roman Urdu: Wa in ta‘uddoo ni‘matallahi la tuhsooha.

Tarjuma: “Aur agar tum Allah ki ne‘maton ko ginne lago to unka poora shumar nahin kar sakoge.”

3. Allah ki zaat makhlooq ki hudood se bala-tar hai

Imam Ali ؑ ke alfaaz “laisa li-sifatihi haddum mahdood” ka mafhoom yeh hai ke Allah ki zaat ko makhlooq ki tarah kisi jism, jagah, waqt ya mehdood paimane mein nahin samjha ja sakta.

Yeh tauheed ka bunyadi aqeeda hai: Allah Khaliq hai aur baqi sab makhlooq.

4. Allah ki qudrat aur rehmat

Khutbah ke aakhri jumle mein Imam Ali ؑ kainat ke nizam ki taraf tawajjuh dilate hain: makhlooq Allah ki qudrat se paida hui, hawaon ka chalna uske nizam ke tehat hai aur paharon ka zameen ke nizam mein apna kirdar hai.

Sermon 1: Praise is due to Allah whose worth cannot be described

In this sermon he recalls the creation of Earth and Sky and the creation of Adam and in it he mentions the Hajj

ومن خطبة له (عليه السلام) يذكر فيها ابتداءَ خلق السماءِ والاَرض، وخلق آدم عليه الصلاة والسلام

(فيها ذكر الحج)

(وتحتوي على حمد الله، وخلق العالم، وخلق الملائكة، واختيار الانبياء، ومبعث النبي، والقرآن، والاحكام الشرعية)

Praise is due to Allah whose worth cannot be described by speakers, whose bounties cannot be counted by calculators and whose claim (to obedience) cannot be satisfied by those who attempt to do so, whom the height of intellectual courage cannot appreciate, and the divings of understanding cannot reach; He for whose description no limit has been laid down, no eulogy exists, no time is ordained and no duration is fixed. He brought forth creation through His Omnipotence, dispersed winds through His Compassion, and made firm the shaking earth with rocks.

الحَمْدُ للهِ الَّذَي لاَ يَبْلُغُ مِدْحَتَهُ القَائِلُونَ، وَلاِ يُحْصِي نَعْمَاءَهُ العَادُّونَ، ولاَ يُؤَدِّي حَقَّهُ الُمجْتَهِدُونَ، الَّذِي لاَ يُدْركُهُ بُعْدُ الهِمَمِ، وَلاَ يَنَالُهُ غَوْصُ الفِطَنِ، الَّذِي لَيْسَ لِصِفَتِهِ حَدٌّ مَحْدُودٌ، وَلاَ نَعْتٌ مَوْجُودٌ، وَلا وَقْتٌ مَعْدُودٌ، وَلا أَجَلٌ مَمْدُودٌ. فَطَرَ الخَلائِقَ بِقُدْرَتِهَ، وَنَشَرَ الرِّيَاحَ بِرَحْمَتِهِ، وَوَتَّدَ بِالصُّخُورِ مَيَدَانَ أَرْضِهِ.

The foremost in religion is the acknowledgement of Him, the perfection of acknowledging Him is to testify Him, the perfection of testifying Him is to believe in His Oneness, the perfection of believing in His Oneness is to regard Him Pure, and the perfection of His purity is to deny Him attributes, because every attribute is a proof that it is different from that to which it is attributed and everything to which something is attributed is different from the attribute.

Thus whoever attaches attributes to Allah recognises His like, and whoever recognises His like regards Him two; and whoever regards Him as two recognises parts for Him; and whoever recognises parts for Him mistook Him; and whoever mistook Him pointed at Him; and whoever pointed at Him admitted limitations for Him; and whoever admitted limitations for Him numbered Him. Whoever said: ‘In what is He?’, held that He is contained; and whoever said: ‘On what is He?’, held He is not on something else.

أَوَّلُ الدِّينِ مَعْرِفَتُهُ، وَكَمَالُ مَعْرِفَتِهِ التَّصْديقُ بِهِ، وَكَمَالُ التَّصْدِيقِ بِهِ تَوْحِيدُهُ، وَكَمَالُ تَوْحِيدِهِ الاخْلاصُ لَهُ، وَكَمَالُ الاخْلاصِ لَهُ نَفْيُ الصِّفَاتِ عَنْهُ، لِشَهَادَةِ كُلِّ صِفَة أَنَّها غَيْرُ المَوْصُوفِ، وَشَهَادَةِ كُلِّ مَوْصُوف أَنَّهُ غَيْرُ الصِّفَةِ، فَمَنْ وَصَفَ اللهَ سُبْحَانَهُ فَقَدْ قَرَنَهُ، وَمَنْ قَرَنَهُ فَقَدْ ثَنَّاهُ،وَمَنْ ثَنَّاهُ فَقَد جَزَّأَهُ، وَمَنْ جَزَّأَهُ فَقَدْ جَهِلَهُ، وَمَنْ جَهِلَهُ فَقَدْ أشَارَ إِلَيْهِ، وَمَنْ أشَارَ إِلَيْهِ فَقَدْ حَدَّهُ، وَمَنْ حَدَّهُ فَقَدْ عَدَّهُ، وَمَنْ قَالَ: «فِيمَ» فَقَدْ ضَمَّنَهُ، وَمَنْ قَالَ: «عَلاَمَ؟» فَقَدْ أَخْلَى مِنُهُ.

He is a Being, but not through phenomenon of coming into being. He exists but not from non-existence. He is with everything but not in physical nearness. He is different from everything but not in physical separation. He acts but without connotation of movements and instruments. He sees even when there is none to be looked at from among His creation. He is only One, such that there is none with whom He may keep company or whom He may miss in his absence.

كائِنٌ لاَ عَنْ حَدَث، مَوْجُودٌ لاَ عَنْ عَدَم، مَعَ كُلِّ شَيْء لاَ بِمُقَارَنَة، وَغَيْرُ كُلِّ شيء لا بِمُزَايَلَة، فَاعِلٌ لا بِمَعْنَى الْحَرَكَاتِ وَالاْلةِ، بَصِيرٌ إذْ لاَ مَنْظُورَ إلَيْهِ مِنْ خَلْقِهِ، مُتَوَحِّدٌ إذْ لاَ سَكَنَ يَسْتَأْنِسُ بهِ وَلاَ يَسْتوْحِشُ لِفَقْدِهِ.