
Ghaus Azam Syed Nahi The? | Shan-e-Ghaus Azam Mein Asal Haqeeqat Kya Hai?



मुआशरती सोच और अहमियते नसब पर क़ुरआन की गवाही
कुरआन मजीद ने क़ौम, क़बीले और ख़ानदानों की तक़्सीम का बुनियादी मक़सद मुआशरती ज़िन्दगी में इंसान की पहचान क़रार दिया है। हर शख़्स अपने बाप-दादा व अजदाद के नाम से पहचाना जाता है इसलिए ख़ुद को दूसरे के बाप-दादा व अजदाद की तरफ ना मन्सूब करे, चुके हमारे यहाँ आज-कल लोग हर मुआमले में अदम-ओ-एतेदाल का शिकार हो जाते हैं लेहाज़ा मुआशरती बुराइयों में एक बद-नज़्मी यह भी मौजूद है के कुछ लोग अपने आबाई और ख़ानदानी फरव्र का इज़हार कुछ इस अन्दाज़ से करते हैं के जैसे वोह कोई आसमानी मख़्लूक़ हैं हालाँके उनका ज़ाती किरदार इंतेहाई ना-शाइस्ता और क़ाबिले नफ़रत होता है। जो एक मुसलमान तो क्या किसी भी इंसान को जैब नहीं देता। दौलत, ताक़त, बिरादरी, रंग-ढंग, सियासी असर व रसूख की बिना’ (के सबब) पर किसी को कमतर जानना या अल्लाह की दी हुई नेअमतों पर तकब्बुर करना इस्लामी और कुरआनी ता’लिमात के सरासर मनाफ़ी है। सरवरे आलम हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ने दौरे जाहिलियत में मुआशरे की एसी तमाम बुराइयों और बद-नज़्मियों को इस्लामी ता’लिमात की रोशनी से ख़त्म कर दिया था और कमज़ोर व पसमान्दा अफ़राद को इज़्ज़त व मर्तबत से नवाज़ा और तक़्वा, परहेज़गारी और ख़ुशकिरदारी को इंसान की अज़मत का ज़ेवर क़रार दिया है।
وي्तबाल ने क्या खुब कहा है के,
एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद व अयाज़, ना कोई बन्दा रहा ना बन्दा नवाज़
बाअज़ लोग ज़ाती कमालात ही को बाएसे फ़ज़ीलत समझते हैं उनके नज़दीक नसबी इज़्ज़त व शरफ़ की कोई हैसियत नहीं है। लेकिन एसे हज़रात शदीद ग़लती का शिकार हैं अगर चे वोह अपने इस मौक़िफ़ (नज़रिये) की ताइद के लिये मज़कूरा आयते मुक़द्दसा को ही अकसर मवाक्रेअ पर पेश करते हैं। दरअसल एसे अफ़राद बद-अक़ीदगी का शिकार हो चुके हैं वोह इस आयते मुक़द्दसा के सही मफ़हूम तक रसाई हासिल करने से क़ासिर हैं। आइये इस आयते मुबारका के अल्फ़ाज़ पर गौर फरमाएं, इसमें वाज़ेहतरीन अल्फ़ाज़ यह हैं,
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَى وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَثْقَاكُمْ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
(सुरह अल होजोरात, आयतः 13)
तर्जुमाः ऐ लोगों ! हमने तुम्हें मर्द और औरत से पैदा फरमाया और हमने तुम्हें (बड़ी-बड़ी) क़ौमों और क़बीलों में (तक़्सीम) किया ताके तुम एक दूसरे को पहचान सको । बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें ज़्यादा बा-इज़्ज़त वोह है जो तुममें ज़्यादा परहेज़गार हो, बेशक अल्लाह खुब जानने वाला खुब ख़बर रखने वाला है।
इस आयते मुबारका में वाज़ेह हुक्म दिया गया है के इंसान सिर्फ एक दूसरे के नसब का लिहाज़ रखे और पहचान करे और अपने बाप-दादा के सिवा दूसरे किसी की तरफ अपनी निस्बत ना करे, और ना यह के अपने नसब पर फख्र करे और दूसरों को जलील यानी कमतर ना जाने। हमारे यहाँ आम तौर पर कहा जाता है के फलाँ आदमी हसब व नसब वाला है। हसब का लफ़्ज़ इंसानी किरदार के लिए बोला जाता है मसलन उसका इल्म, तक़्वा और ख़ुशकिरदारी वगैरह और नसब का
ता’ल्लुक़ खुनी निस्बत यानी ख़ानदानी इन्तेसाब से है। कुर’ आने-हकीम ने इंसानी मुआशरे को क़ौमों और क़बीलों में तक़्सीम करने की हिकमत जो बयान की है उसमें यह दोनों चीजें वाज़ेह हैं।
अरबाबे फ़िक्र व दानिश से गुज़ारिश है के ख्वारिजों से पुछें इसमें वोह कौनसा जुम्ला है जो नसबे रसूल की अहमियत के मनाफ़ी है? यहाँ तो हर एक फ़र्द का क़बीला और कुंबा इसलिए बनाया गया के उसे मा’लूम हो सके के वोह किसकी औलाद है? उसका बाप कौन था, उनका किरदार क्या था? जब तमाम लोगों की पहचान के लिए क़बाएल व शऊब (शौअबे) बने हैं तो सवाल पैदा होता है के क्या ख़ानदाने रसूल की कोई पहचान नहीं है? और उनके लिए यह मफ़हूम कहाँ से निकल आया के नसब की अहमियत कोई नहीं। आप तमाम लोग मजकूरा बाला आयते मुबारका के उस हिस्से पर ग़ौर कीजिये जहाँ इरशादे ख़ुदावन्द करीम है के,
إِنْ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ
तर्जुमा: बेशक अल्लाह के नज़दीक तुममें ज़्यादा बाइज़्ज़त वोह है जो तुममें ज़्यादा परहेज़गार हो,
अब बताइये, आले रसूल के मौरिसे आ’ला सैय्यदुल-कोनैन ख़ातेमुल-अंबिया’, मौला ए काएनात करम अल्लाहो वजहु, हसनैन करीमैन अलैहिमुस्सलाम, मरकज़े अनवार ज़ाते ताहेरा से बढ़कर किसका किरदार ऊजला और पुरनूर होगा? बेशक हुजूर अकरम ईमान की रूह व जान हैं और उनसे और उनकी आल से मोहब्बत ही ईमान का एक अहम जुज़्व है। उलमा’ ए कराम इस बारे में फरमाते हैं, (नूरूल-अब्सार, सफ़हा: 117)
ومن حلوي الشَّرفَاء عَلَيْنَا وَإِنْ بَعْدُوا فِي النَّسب أَنْ تُؤْثِرِ رَضِاهُمْ عَلَى أَهْوَائِنَا وَشَهَوَاتِنَا وَلَعَظمَهُمْ وَتُوَكِّرُهُمْ وَلَا تَهْلِسُ فَوْقَ سَرِبُرٍ وَهُمْ عَلَى الْأَرْضِ
तर्जुमाः सादात का यह हक़ (अगर चे वोह नसब में बईद भी हों उसके बावजूद) हम पर लाज़िम है के हम अपनी आरज़ूओं और ख़्वाहिशात पर उनकी रज़ा को मुक़द्दम समझें और उनकी ता’ज़िम व तौक़ीर बजा लाएं और जब वोह ज़मीन पर बैठे हों तो हम चारपाइयों पर ना बैठें।
मज़कूरा बाला आयत की तफ़्सीर फरमाते हुए हुजूर अकरम ने इरशाद फरमाया, जिसे तबरानी और बैहक़ी में बरिवायत हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास से नक़ल फरमाया है। रिवायत है के हुजूर अकरम ने इरशाद फरमाया,
فانا اللى وَلدِ آدَمَ وَاكْرَمَهُمْ عَلَى اللهِ وَذَلِكَ قَوْلُهُ تَعَالَى فَجَعَلْنَكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
तर्जुमाः और मैं ही सबसे ज़्यादा मुत्तक़ी हूँ और औलादे आदम (अलैहिस्सलाम) में सबसे ज़्यादा अकरम (नसबन) हूँ और इसीलिए अल्लाह तआला का इरशाद है के हमने तुम्हारी शाखें और क़बीले बनाए ताके तुम आपस में पहचान रखो।

लड़ाई की तैयारी और छिपाने की कोशिश
दे तबरानी की रिवायत से मालूम होता है कि रसूलुल्लाह सल्ल० ने अद शिकनी की ख़बर आने से तीन दिन पहले ही हज़रत आइशा रजि० को हुक्म दिया था कि आपका साज व सामान तैयार कर दें. लेकिन किसी को पता न चले। इसके बाद हज़रत आइशा रज़ि० के पास हज़रत अबूबक्र रज़ि० तश्रीफ़ लाए, तो पूछा, बेटी ! यह कैसी तैयारी है ?
उन्होंने कहा, ख़ुदा की क़सम ! मुझे नहीं मालूम।
हज़रत अबूबक्र रज़ि० ने कहा, यह बनू असफ़र यानी रूमियों से लड़ने का वक़्त नहीं। फिर रसूलुल्लाह सल्ल० का इरादा किधर का है ?
हज़रत आइशा रज़ि० ने कहा, अल्लाह की क़सम ! मुझे नहीं मालूम।
तीसरे दिन बहुत सवेरे अम्र बिन सालिम खुजाई चालीस सवारों को लेकर पहुंच गया और ऊपर वाले पद ‘या रब इन्नी नाशिदन मुहम्मदन… ( आखिर तक ) कहा, तो लोगों को मालूम हुआ कि अहद शिकनी की गई है।
इसके बाद बुदैल आया, फिर अबू सुप्रियसान आया और लोगों को हालात का ठीक-ठीक पता लग गया। इसके बाद रसूलुल्लाह सल्ल० ने तैयारी का हुक्म देते हुए बताया कि मक्का चलना है और साथ ही यह दुआ फ़रमाई कि ऐ अल्लाह ! जासूसों और ख़बरों को कुरैश तक पहुंचने से रोक और पकड़ ले, ताकि हम उनके इलाक़े में उनके सर पर एकदम जा पहुंचें।
फिर पूरे खुफ़िया अन्दाज़ में और राज़दारी की ग़रज़ से रसूलुल्लाह सल्ल० ने शुरू माह रमज़ान में सन् 08 हि० में हज़रत अबू क़तादा बिन रुबई के नेतृत्व में आठ आदमियों का एक सरीया बल अज़म की ओर रवाना फ़रमाया। यह जगह ज़ीखशब और ज़िल मर्वा के बीच मदीना से 36 अरबी मील की दूरी पर वाक़े है। मक्सद यह था कि समझने वाला समझे कि आप उसी इलाक़े का रुख करेंगे और यही ख़बरें इधर-उधर फैलें, लेकिन जब यह सरीया अपनी तैशुदा जगह पहुंच गया, तो उसे मालूम हुआ कि रसूलुल्लाह सल्ल० मक्का के लिए रवाना हो चुके हैं। चुनांचे यह भी आपसे जा मिला। 1
1. यही सरीया है कि जिसकी मुलाक़ात आमिर बिन अज़बत से हुई, तो आमिर ने इस्लामी तरीक़े से सलाम किया लेकिन महलम बिन जसामा ने किसी पिछली रंजिश की वजह से उसे क़त्ल कर दिया, और उसके ऊंट और सामान पर क़ब्ज़ा कर लिया। , इस पर यह आयत उतरी, ‘जो तुमसे सलाम करे उसे यह न कहो कि तू ईमान वाला
इधर हज़रत हातिब बिन अबी बलतआ ने कुरैश को एक चिट्ठी लिखकर यह ख़बर भेजी कि अल्लाह के रसूल सल्ल० हमला करने वाले हैं। उन्होंने यह चिट्ठी एक औरत को दी थी और उससे कुरैश तक पहुंचाने का मुआवज़ा तै कर रखा था। औरत सर की चोटी में चिट्ठी छिपाकर रवाना हुई। लेकिन अल्लाह के रसूल सल्ल० को आसमान से हातिव की इस हरकत की ख़बर दे दी गई। चुनांचे आपने हज़रत अली, हज़रत मिक़दाद, हज़रत ज़ुबैर और हज़रत अबू मरसद ग़नवी को यह कहकर भेजा कि जाओ रौजा खान पहुंचो, वहां एक हौदज पर बैठी औरत मिलेगी, जिसके पास कुरैश के नाम एक चिट्ठी होगी, ये लोग घोड़ों पर सवार तेज़ी से रवाना हुए। वहां पहुंचे तो औरत मौजूद थी। उससे कहा कि वह नीचे उतरे और पूछा कि क्या तुम्हारे पास कोई पत्र है ?
उसने कहा, मेरे पास कोई पत्र नहीं। उन्होंने उसके कजावे की तलाशी ली, लेकिन कुछ न मिला। इस पर हज़रत अली रजि० ने उससे कहा, मैं खुदा की क़सम खाकर कहता हूं कि न रसूलुल्लाह सल्ल० ने झूठ कहा है, न हम झूठ कह रहे हैं। तुम या तो पत्र निकालो या हम तुम्हें नंगा कर देंगे। जब उसने यह इरादा देखा तो बोली अच्छा मुंह फेरो। उन्होंने मुंह फेरा तो उसने चोटी खोलकर पत्र निकाला और उनके हवाले कर दिया।
ये लोग चिट्ठी लेकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास पहुंचे, देखा तो उसमें लिखा हुआ था, (हातिब बिन अबी बलतआ की ओर से कुरैश की तरफ़ फिर कुरैश को रसूलुल्लाह सल्ल० के रवाना होने की खबर दी थी।1
नहीं।’ इसके बाद सहाबा किराम महलम को रसूलुल्लाह सल्ल० के पास ले आए कि आप इसके लिए मफ़िरत की दुआ करें, लेकिन जब महलम आपके सामने हाज़िर हुआ, तो आपने तीन बार फ़रमाया, ऐ अल्लाह ! महलम को न बख्श! इसके बाद महलम अपने कपड़े के दामन से अपने आंसू पोंछता हुआ उठा। इब्ने इस्हाक़ का बयान है कि उसकी क़ौम के लोग कहते हैं कि बाद में उसके लिए रसूलुल्लाह सल्ल० ने मफ़िरत की दुआ कर दी थी।
देखिए जादुल मआद 2/150, इब्ने हिशाम 2/625, 627, 628 1. सुहैली ने कुछ लेखकों के हवाले से चिट्ठी में यह लिखा बयान किया है, ऐ कुरैश की जमाअत । अल्लाह के रसूल सल्ल० तुम्हारे पास रात जैसी बढ़ती बाढ़ की शक्ल में भारी फ़ौज लेकर आ रहे हैं और ख़ुदा की कसम, अगर वह अकेले भी तुम्हारे पास आ जाएं, तो अल्लाह उनकी मदद करेगा और उनसे अपना वायदा पूरा करेगा, इसलिए तुम लोग अपने बारे में सोच लो। वस्सलाम वाक़दी ने अपनी एक मुर्सल सनद से रिवायत किया है कि हज़रत हातिब ने सुहैल
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत हातिब को बुलाकर पूछा कि हातिब ! यह क्या है ?
उन्होंने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मेरे खिलाफ़ जल्दी न फ़रमाएं। ख़ुदा की क़सम ! अल्लाह और उसके रसूल पर मेरा ईमान है। मैं न तो इस्लाम से विमुख हुआ हूं और न मुझमें तब्दीली आई है। बात सिर्फ इतनी है कि मैं खुद कुरैश का आदमी नहीं, अलबत्ता उनमें चिपका हुआ था और मेरे बाल-बच्चे वहीं हैं, लेकिन कुरैश से मेरी कोई रिश्तेदारी नहीं कि वे मेरे बाल-बच्चों की हिफ़ाज़त करें। इसके खिलाफ़ दूसरे लोग जो आपके साथ हैं, वहां उनके रिश्तेदार हैं जो उनकी हिफ़ाज़त करेंगे, इसलिए जब मुझे यह चीज़ हासिल न थी, तो मैंने चाहा कि उन पर एक एहसान कर दूं जिसके बदले में वे मेरे रिश्तेदारों की हिफ़ाज़त करें। इस पर हज़रत उमर बिन खत्ताब ने कहा,
! ‘ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मुझे छोड़िए, मैं इसकी गरदन मार दूं, क्योंकि इसने अल्लाह और उसके रसूल के साथ खियानत की है और यह मुनाफ़िक़ हो गया है।’
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, देखो, यह बद्र की लड़ाई में शरीक हो चुका है और उमर ! तुम्हें क्या पता? हो सकता है अल्लाह ने बद्र वालों पर नमूदार होकर कहा है कि तुम लोग जो चाहो, करो, मैं तुम्हें बख्श दिया। यह सुनकर हज़रत उमर रज़ि० की आंखें भीग गईं और उन्होंने कहा, अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं।’
इस तरह अल्लह ने जासूसों को पकड़ लिया और मुसलमानों की जंगी तैयारियों की कोई ख़बर कुरैश तक न पहुंच सकी।
इस्लामी फ़ौज मक्का के रास्ते में
10 रमज़ान 08 हि० को अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने मदीना छोड़कर मक्का का रुख किया। आपके साथ दस हज़ार सहाबा किराम थे। मदीना पर अबूज़र गिफ़ारी रज़ि० की नियुक्ति हुई ।
बिन अम्र, सफ़वान बिन उमैया और इक्रिमा के पास यह लिखा था कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने लोगों में ग़ज़वे का एलान कर दिया है और मैं नहीं समझता कि आपका इरादा तुम लोगों के सिवा किसी और का है और मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों पर मेरा एक एहसान रहे। (फ़त्हुल बारी 7/521) 1. सहीह बुखारी 1/422, 2/612, हज़रत जुबैर और हज़रत अबू मरसद के नामों में वृद्धि सहीह बुखारी की कुछ दूसरी रिवायतों में है।
जोहफ़ा में या इससे कुछ ऊपर आपके चचा अब्बास बिन अब्दुल मुत्तलिब मिले। वह मुसलमान होकर अपने बाल-बच्चों समेत हिजरत करते हुए तशरीफ़ ला रहे थे, फिर अबवा में आपके चचेरे भाई अबू सुफियान बिन हारिस और फुफेरे भाई अब्दुल्लाह बिन उमैया मिले। आपने इन दोनों को देखकर मुंह फेर लिया, क्योंकि ये दोनों आपको बहुत कष्ट पहुंचाया करते और आपकी बुराई किया करते थे। ऐसी स्थिति देखकर हज़रत उम्मे सलमा रजि० ने अर्ज़ किया कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि आपके चचेरे और फुफेरे भाई ही आपके यहां सबसे ज्यादा भाग्यहीन हों।
इधर हज़रत अली रज़ि० ने अबू सुफ़ियान बिन हारिस को सिखाया कि तुम अल्लाह के रसूल सल्ल० के सामने जाओ और वही कहो जो हज़रत यूसुफ़ अलै० के भाइयों ने उनसे कहा था, कि ‘खुदा की क़सम ! अल्लाह ने आपको हम पर बरतरी दी और यक़ीनन हम ही ख़ताकार थे। (12 : 91) क्योंकि आप यह पसन्द नहीं करेंगे कि किसी और का जवाब आपसे अच्छा रहा हो।
चुनांचे अबू सुफ़ियान ने यही कहा और जवाब में तुरन्त अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, ‘आज तुम्हें कोई फटकार नहीं। अल्लाह तुम्हें बख्श दे और वह तमाम रहम करने वालों में सबसे ज़्यादा रहम करने वाला है।’ इस पर अबू सुफ़ियान ने कुछ पद सुनाए, जिनमें से कुछ ये थे-
‘तेरी उम्र की क़सम ! जिस वक़्त मैंने इसलिए झंडा उठाया था कि लात के योद्धा मुहम्मद के योद्धाओं पर ग़ालिब आ जाएं, तो मेरी स्थित रात के उस मुसाफ़िर जैसी थी जो अंधेरी घुप रात में हैरान हो, लेकिन अब वक़्त आ गया है कि मुझे हिदायत दी जाए और मैं हिदायत पाऊं। मुझे मेरे नफ़्स की बजाए एक हादी ने हिदायत दी, और अल्लाह का रास्ता उसी व्यक्ति ने बताया जिसे मैंने हर मौके पर धुत्कार दिया था।’
यह सुनकर अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनके सीने पर मारकर फ़रमाया, तुमने मुझे हर मौक़े पर धुत्कारा था।’
1. बाद में अबू सुफियान के इस्लाम में बड़ी खूबी आ गई। कहा जाता है, जबसे उन्होंने इस्लाम कुबूल किया, शर्म की वजह से अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की ओर सर उठाकर न देखा, अल्लाह के रसूल सल्ल० भी उनसे मुहब्बत करते थे और उनके लिए जन्नत की खुशखबरी देते थे, और फ़रमाते थे, मुझे उम्मीद है कि यह हमज़ा का बदल साबित होंगे। जब उनकी मौत का वक़्त आया तो कहने लगे, मुझ पर न रोना, क्योंकि इस्लाम लाने के बाद मैंने कभी कोई गुनाह की बात नहीं कही। जादुल मआद 2/162, 163
मर्रज़्ज़हरान में इस्लामी फ़ौज का पड़ाव
अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना सफ़र जारी रखा। आप और सहाबा रोज़े से थे लेकिन अस्फ़ान और कुदैद के बीच कदीद नामी चश्मे पर पहुंचकर आपने रोज़ा तोड़ दिया। और आपके साथ सहाबा किराम रजि० ने भी रोज़ा तोड़ दिया। इसके बाद फिर आपने सफ़र जारी रखा, यहां तक कि रात के के वक़्तों में मज़हरान की वादी फ़ातमा में पहुंचकर पड़ाव डाला। वहां शुरू आपके हुक्म से लोगों ने अलग-अलग आग जलाई। इस तरह दस हज़ार (चूल्हों में) आग जलाई गई। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने हज़रत उमर बिन खत्ताब रज़ि० को पहरे पर मुक़र्रर फ़रमाया।
अबू सुफ़ियान नबी सल्ल० के दरबार में
मरज़्ज़हरान में पड़ाव डालने के बाद हज़रत अब्बास रज़ि० अल्लाह के रसूल सल्ल० के सफ़ेद खच्चर पर सवार होकर निकले। उनका मक्सद यह था कि कोई लकड़हारा या कोई भी आदमी मिल जाए तो उससे कुरैश के पास खबर भेज दें ताकि वे मक्के में रसूलुल्लाह सल्ल० के दाखिल होने से पहले आपके पास हाज़िर होकर अमान तलब करें।
इधर अल्लाह ने कुरैश पर सारी ख़बरों का पहुंचना रोक दिया था, इसलिए उन्हें हालात का कुछ पता न था, अलबत्ता वे भय और आशंका के शिकार थे और अबू सुफ़ियान बाहर जा-जाकर ख़बरों का पता लगाता रहता था। चुनांचे उस वक़्त भी वह और हकीम बिन हिज़ाम और बुदैल बिन वरक़ा ख़बरों का पता लगाने की ग़रज़ से निकले हुए थे ।
हज़रत अब्बास रजि० का बयान है कि खुदा की क़सम ! मैं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के खच्चर पर सवार जा रहा था कि मुझे अबू सुफियान और बुदैल बिन वरक़ा की आपसी बातें सुनाई दीं। वे आपस ही में कह सुन रहे थे। अबू सुफ़ियान कह रहा था कि ख़ुदा की क़सम ! मैंने आज रात जैसी आग और ऐसी फ़ौज तो कभी देखी ही नहीं और जवाब में बुदैल कह रहा था, ये ख़ुदा की क़सम ! बनू खुजाआ हैं। लड़ाई ने इन्हें नोच कर रख दिया है और इस पर अबू सुफ़ियान कह रहा था, खुजाआ इससे कहीं कमतर और ज़लील हैं कि यह उनकी आग और उनकी फ़ौज हो ।
1. सहीह बुखारी 2/613
हज़रत अब्बास कहते हैं कि मैंने उसकी आवाज़ पहचान ली और कहा, ‘अबू हंज़ला ?”
उसने भी मेरी आवाज़ पहचान ली और बोला, ‘अबुल फ़ज़्ल ?’ मैंने कहा, हां।
उसने कहा, क्या बात है ? मेरे मां-बाप तुझ पर कुर्बान ?
मैंने कहा, यह रसूलुल्लाह (सल्ल०) हैं लोगों सहित, हाय कुरैश की तबाही ! अल्लाह की क़सम !
उसने कहा, अब क्या होला है ? मेरे मां-बाप तुम पर कुर्बान !
मैंने कहा, अल्लाह की क़सम ! अगर वे तुम्हें पा गए, तो तुम्हारी गरदन मार देंगे, इसलिए इस खच्चर पर पीछे बैठ जाओ। मैं तुम्हें रसूलुल्लाह सल्ल० के पसा ले चलता हूं और तुम्हारे लिए अमान तलब किए देता हूं।
इसके बाद अबू सुफ़ियान मेरे पीछे बैठ गया और उसके दोनों साथी वापस चले गए।
हज़रत अब्बास रज़ि० कहते हैं कि मैं अबू सुफ़ियान को लेकर चला। जब किसी अलाव के पास से गुज़रता, तो लोग कहते कौन हैं? मगर जब देखते रसूलुल्लाह सल्ल० का खच्चर है और मैं उस पर सवार हूं तो कहते कि रसूलुल्लाह सल्ल० के चचा हैं और आपके खच्चर पर हैं, यहां तक कि मैं उमर बिन खत्ताब रज़ि० के अलाव के पास से गुज़रा। उन्होंने कहा कौन है ? और उठकर मेरी ओर आए। जब नीचे अबू सुफ़ियान को देखा, तो कहने लगे, अबू सुफ़ियान ! अल्लाह का दुश्मन ? अल्लाह का शुक्र है कि उसने बिना अद व पैमान के तुझे (हमारे) क़ाबू में कर दिया।
इसके बाद वह निकलकर अल्लाह के रसूल सल्ल० की ओर दौड़े और मैंने भी खच्चर को एड़ लगाई। मैं आगे बढ़ गया और खच्चर से कूदकर अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास जा घुसा। इतने में उमर बिन खत्ताब भी घुस आए और बोले कि ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! यह अबू सुफ़ियान है। मुझे इजाज़त दीजिए, मैं इसकी गरदन मार दूं।
मैंने कहा, अल्लाह के रसूल सल्ल० ! मैंने इसे पनाह दे दी है। फिर मैंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास बैठकर आपका सर पकड़ लिया और कहा, ख़ुदा की क़सम ! आज रात मेरे सिवा कोई और आपसे सरगोशी (कानाफूसी) न करेगा ।
जब अबू सुफ़ियान के बारे में हज़रत उमर रज़ि० ने बार-बार कहा, तो मैंने
कहा, उमर ! ठहर जाओ खुदा की क़सम ! अगर यह बनी अदी बिन काब का नाम होता तो तुम ऐसी बात न कहते।
उमर रज़ि० ने कहा, अब्बास ! ठहर जाओ, ख़ुदा की क़सम ! तुम्हारा इस्लाम लाना मेरे नज़दीक खत्ताब के ईमान लाने से—अगर वह इस्लाम लाते—ज़्यादा पंसदीदा है और इसकी वजह मेरे लिए सिर्फ़ यह है कि रसूलुल्लाह सल्ल० के नज़दीक तुम्हारा इस्लाम लाना खत्ताब के इस्लाम से ज़्यादा पसन्दीदा है।
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, अब्बास ! इसे (यानी अबू सुफ़ियान को) अपने डेरे में ले जाओ, सुबह मेरे पास ले आना। इस हुक्म के मुताबिक़ मैं उसे डेरे में ले गया और सुबह नबी सल्ल० की खिदमत में हाज़िर किया। आपने उसे देखकर फ़रमाया, अबू सुफ़ियान ! तुम पर अफ़सोस ! क्या अब भी तुम्हारे लिए वक़्त नहीं आया कि तुम यह जान सको कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, मेरे मां-बाप आप पर फ़िदा, आप कितने बुर्दबार, कितने करीम और कितने रिश्तेदारों का ख्याल रखने वाले हैं? मैं अच्छी तरह समझ चुका हूं कि अगर अल्लाह के साथ कोई और भी माबूद होता, तो अब तक मेरे कुछ काम आया होता।
आपने फ़रमाया अबू सुफ़ियान ! तुम पर अफ़सोस ! क्या तुम्हारे लिए अब भी वक़्त नहीं आया कि तुम यह जान सको कि मैं अल्लाह का रसूल हूं ?
अबू सुफ़ियान ने कहा, मेरे मां-बाप आप पर फ़िदा, आप कितने जानकार, कितने मेहरबान, कितने जोड़ने वाले हैं, इस बात के बारे में तो अब भी दिल में कुछ न कुछ खटक है।
इस पर हज़रत अब्बास ने कहा, अरे, गरदन मारे जाने से पहले की नौबत आने से पहले इस्लाम कुबूल कर लो और यह गवाही और इक़रार कर लो कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। इस पर अबू सुफ़ियान ने इस्लाम कुबूल कर लिया और हक़ की गवाही दी।
हज़रत अब्बास रज़ि० ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! अबू सुफ़ियान एज़ाज़ पसन्द (पद लोलुप) है, इसलिए इसे कोई एज़ाज़ दीजिए।
आपने फ़रमाया, जो अबू सुफ़ियान के घर में घुस जाए उसे अमान है और जो अपना दरवाज़ा अन्दर से बन्द कर ले उसे अमान है और जो मस्जिदे हराम में दाखिल हो जाए, उसे अमान है।

*Khuda ki Marefat (Pehchan)*
Imam Ali (a.s) : Insaan ki aqalmandi aur sharafat ki buniyad uski marefat hai isliye marefat hi fazilat ki daleel hai – eemaan dil ki marefat (pehchan) hi ka naam hai.
Rasule Khuda (s.a.w.s) : Afzal wahi hai jo marefat me sabse aagey hai – Jo marefat ke lihaz se afzal hai wahi eemaan ke lihaz se afzal hai ( kiyun ke eemaan ka daro’ madaar marefat par hai).
Imam Sadiq (a.s) : Koi amal marefat ke baghair qubool nahi hota – aur marefat amal (yani ilm hasil karne se) hasil hoti hai. Jab marefat hasil hojati hai tho wo or ziyada nek amal ki taraf rehnumai karti hai – jiske pass marefat nahi iska nek amal dusut nahi kiyun ke Allah marefat hi ke bina par amal qubool karta hai. Jo amal (muraad koshish) nahi karta isko marefat hasil nahi hoti. Marefat ke liye ilm aur amal dono zaruri hai.
Imam Kazim (a.s) : Jo shaks Khuda ke baaton ko yaad nahi rakhta iske dil me marefat nahi rehsakti – aur wo apne dil me marefat mehsoos bhi nahi karta.
Imam Ali (a.s) : Kuch galat malumat gumrahi tak lejati hai.
Imam Ali (a.s) : Aankhon ka dekhna haqiqi dekhna nahi hota kiyun ke aankhen galti bhi karti hai mager aql kabhi isko dhoka nahi deti jo is se nasihat chahe.
Imam Sadiq (a.s) : Sirf hawaas se marefat hasil nahi hoti – Dil (aql) ke siwa kisi cheez se Khuda ki pehchaan hasil nahi ki jasakti kiyun ke Aql hi hawaas ko tamaam cheezon ki pehchaan karati hai – Isliye sirf hawaas se tamaam cheezon ko nahi jaana jasakta.
Imam Ali (a.s) : Aankh tho charbi se bani hai – asal dekhna rooh (aql) ka kaam hai.
Imam Ali (a.s) : Hawaas aankh haath paa’on se Khuda ko mehsoos nahi karsakte kiyun ke haath tho Khuda ko chu nahi saktey – balke aqlen bhi khuda ke zaat ka tasawwar nahi karsakti.
Imam Ali (a.s) :Aqal’on se hum Khuda ke wajood badai azmat hikmat aur iske kalaam ko samajh sakten hain. Har cheez apni zidd se pehchani jati hai Tamaam tareef us Allah ke liye hai jisne apni takhliqaat se apne wajood ka pata bataya aur makhloqaat ke fana hone se apne azli abdi hone ka pata bataya aur makhloqaat ke ek dusre se mushaba hone se apne be misaal wa be nazeer hone ka pata diya.
Refrence:Meezan ul Hikmat V-1

मनाक़िबे अहले बैत -: कुरान की रोशनी में :-अहले बैत की मुहब्बत हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है क्योंकि मुहब्बते अहले बैत ईमान की जान और शर्ते ईमान है। उनकी मुहब्बत के बग़ैर किसी शख़्स के दिल में ईमान दाख़िल नहीं हो सकता। हदीस पाक में वारिद है रहमते दो आलम सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया इस्लाम की बुनियाद मेरी और मेरे अहले बैत की मुहब्बत है और हम तमाम मुसलमानों के लिये हुक्मे ख़ुदावन्दी है कि अहले बैत से मुहब्बत करो अहले बैत की मुहब्बत मुहब्बते रसूल है और मुहब्बते रसूल मुहब्बते ख़ुदा है।अहले बैत अतहार की शानो अज़मत व क़दरो मन्ज़िलत व कमालातो किरदार इन्तिहाई बुलन्द व बाला हैं। अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने इन्हें मख़सूस सिफ़ात और पाकीज़गी का आला तरीन नमूना बनाया और अज़ीम मरातिब से नवाज़ा। अहले बैत अतहार की फ़ज़ीलत में बेशुमार अहादीस मन्क़ूल हैं और इनकी शानो अज़मत में आयाते कुरआनी नाज़िल हुई हैं जिनमें बाज़ का तज़किरा हस्बे ज़ैल है।कुरान मजीद में इरशादे बारी तआला है–ऐ महबूब (सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) आप मुसलमानों से फ़रमा दीजिये कि मैं तबलीग़ पर तुमसे कोई बदला या सिला नहीं मांगता अलबत्ता मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे क़राबतदारों से मुहब्बत करो। (सू०–शूरा–23)
वज़ाहतः- मजकूरा आयात में हुक्मे खुदावन्दी है कि ऐ
महबूब आप मुसलमानों से फरमां दीजिये कि ऐ लोगों मैने जो तुम पर मेहनत की ग़ारे हिरा में सज्दा रेज़ होकर आँसू बहाये और निहायत सख़्त मसाइबो आलाम बर्दास्त किये ओर तुम्हें तारीकियों से निकाल कर रोशन मकाम अता किया और तुम्हें गुमराहियों के अंधेरों से निजात देकर सिराते मुस्तकीम की राह दिखाई और मैने शिकम (मुबारक) पर पत्थर बाँधकर ख़न्दकें खोदीं मैदाने उहद और तॉयफ में अपने जिस्म (अतहर) पर ज़ख़्म खाये और तुम्हें जहन्नुम से बचाकर राहे जन्नत पर डाल दिया और तुम्हें जहालत व ज़िल्लत से बचाकर इज़्ज़त व इन्सानियत से हम किनार किया और तुम्हें दावते हक देकर तुम्हारी रहनुमाई की और ईमान से बहरेयाब किया।
इन तमाम एहसानात का मैं तुमसे कोई बदला या सिला नहीं माँगता मेरा अज्र तो मेरे रब के पास है और मुझे मेरा अज्र मेरा रब अता करेगा मैं तुमसे किसी अज्र का तालिब नहीं हूँ बल्कि मुझे तो तुम्हारे अज्र की फिक्र है जो तुम्हें मेरे क़ाबत दारों से मुहब्बत के बाइस मिलेगा मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे अहले बैत से मुहब्बत करो इसी में तुम्हारी भलाई और बेहतरी है और दुनियाँ व आख़िरत में अज्रे अज़ीम का बाइस है अल्लाह तआला और उसके रसूल (हुजूर सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम) की कुर्बत और ईमान में पुख़्तगी मेरे अहले बैत की मुहब्बत से हासिल होगी इसलिये मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे अहले बैत से मुहब्बत करो।
तफासीर व अहादीस में है कि जब ये आयतनाज़िल हुई तो सहाबाकिराम (रज़िअल्लाहु तआला अन्हु) ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह आपके क्राबत दार कौन हैं तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फ़रमाया हज़रत मौला अली, सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) ये मेरे क़ाबत
दार हैं इनसे मुहब्बत करो। (इमाम सना उल्ला पानी पती-तफसीर मज़हरी-8/420)
(इमाम जलालुद्दीन सयूती-दुर्रे मन्सूर-5/701)
(इमाम कुरतबी- तफ्सीर कुरतबी-8/415)
(इमाम फखरूद्दीन राज़ी- तफसीर कबीर-27/166)
(मजमउज़्ज़वाइद-7/103, 9/168)
इमाम तबरानी ने हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास से रिवायत नकल की है कि जब ये आयते मुबारका “ऐ महबूब आप फ़रमां दें कि मैं तुमसे इस (तबलीगे हक) का कुछ सिला नहीं चाहता सिवाय अहले क्राबत की मुहब्बत के” नाज़िल हुई तो सहाबाकिराम (रजिअल्लाहु तआला अन्हु) ने अर्ज किया या रसूलुल्लाह आपके क़ाबत दार कौन हैं जिनकी मुहब्बत हम पर वाजिब है तो आप सल्लल्लाहु अलैह वसल्लम ने फरमाया- हज़रत मौला अली, खातूने जन्नत सइयदा फातिमा ज़हरा और इमाम हसन व इमाम हुसैन (अलैहिमुस्सलाम) हैं। (मुअजम कबीर तबरानी-3/47,48)