हिजरत का दूसरा साल part 1

सन्न २ हिजरी

सन्न १ हिजरी की तरह सन्न २ हिजरी में भी बहुत से अहम वाकिआत वकूअ पज़ीर हुए जिन में से चन्द बड़े बड़े वाकिआत ये

किब्ला की तब्दीली जब तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मक्का में रहे। ख़ानए कबा की तरफ़ मुँह करके नमाज़ पढ़ते रहे मगर हिजरत के बाद जब आप मदीना मुनव्वरा तशरीफ़ लाए तो खुदावंदे तआला का ये हुक्म हुआ कि आप अपनी नमाज़ों में बैतुल मुकद्दस को अपना किबला बनाएँ। चुनान्चे आप सोलह या सतरह महीने तक बैतुल मुकद्दस की जानिब रुख करके नमाज़ पढ़ते रहे। मगर आप के दिल की तमन्ना यही थी कि कबा ही को किल्ला बनाया जाए। चुनान्चे आप अकसर आस्मान की तरफ चेहरा उठा उठाकर इस के लिए वहीए इलाही का इन्तिज़ार फरमाते रहे। यहाँ तक कि एक दिन अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की कल्बी आरजू पूरी फ्रमाने की लिए कुरआन की ये आयत नाजिल फरमादी कि :

कद नरा तकल्लुबा वज-हिका फिस-समॉइ फ-ल-नुवल्लि-यन्नका

किब्-लतन तर-दाहा फवल्लि वजहका शत-रल मस्जिदिल हराम। (बकरा) तर्जमा :- हम देख रहे हैं बार बार आप का आस्मान की तरफ मुँह करना। तो हम जरूर आप को फेर देंगे उस किल्ला की तरफ जिस में आप की खुशी है। तो अभी आप फेर दीजिए अपना चेहरा मस्जिदे हराम की तरफ।

चुनान्चे हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम कबीलए बनी सल्मा की मस्जिद में नमाजे जुहर पढ़ा रहे थे कि हालते नमाज़ ही में वही नालि हुई और नमाज़ ही में आप ने बैतुल मुकद्दस से मुड़कर ख़ानए कबा की तरफ़ अपना चेहरा कर लिया। और तमाम मुकतदियों ने भी आप की पैरवी की। इस मस्जिद को जहाँ ये वाकिआ पेश आया “मस्जिदुलं किब-लतैन* कहते हैं। और आज भी ये तारीख़ी मस्जिद जियारतगाह ख्वास व अवाम है। जो शहरे मदीना से तकरीबन दो किलो मीटर

दूर जानिबे शुमाल मगरिब वाकेअ है।

इस किब्ला बदलने को “तहवीले किल्ला’ कहते हैं। तहवीले किब्ला से यहूदियों को बड़ी सख्त तकलीफ़ पहुँची। जब तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बैतुल मुकद्दस की तरफ़ रुख करके नमाज़ पढ़ते रहे। तो यहूदी बहुत खुश थे और फ़ख़ के साथ कहा करते थे कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) भी हमारे ही किब्ला की तरफ रुख करके इबादत करते हैं। मगर जब किल्ला बदल गया तो यहूदी इस कदर बरहम और नाराज़ हो गए कि वो तअना देने लगे कि मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) चूंकि हर बात में हम लोगों की मुखालफत करते हैं। इस लिए उन्होंने महज़ हमारी मुखालफत में किल्ला बदल दिया है। इसी तरह मुनाफिकीन का गिरोह भी तरह तरह की नुक्ता चीनी और किस्म किस्म के एअतराज़ात करने लगो। तो इन दोनों

गिरोहों की जबान बंदी और दहन दोजी के लिए खुदावंदे आलम ने ये आयतें नाजिल फरमाई कि स-य-कूलुस-सु-फ-हॉउ मिनन-नासि मा वल्लाहुम अन किल्लति हुमुल्लती कानू अलैहा। कुल-लिल्लाहिल मशरिकु वल मगरिब। यहदी मंय्यशाउ इला सिरातिम-मुस-तक़ीम। वमा ज-अल-नल किल्लतल-लती कुन्ता! whatianities अलैहा इल्ला लिनथ्-लमा मय्यत- rasaili तबिउर-रसूला मिम-मंय्यन्-कलिबु अला अकीबैहि। व-इन कानत ल-क

अलल-लज़ीना हदल्लाह। (बकरा)

बी-रतन इल्ला

तर्जमा :- अब कहेंगे बे-वकूफ लोगों में से, किस ने फेर दिया मुसलमानों को उन के क़िब्ला से जिस पर वो थे। आप कह दीजिए कि पूरब पच्छिम सब अल्लाह का है। वो जिसे चाहे. सीधी राह चलाता है। और (ऐ महबूब!) आप पहले जिस किबला पर थे हम ने वो इसी लिए मुकर्रर किया था कि देखें कौन रसूल की पैरवी करता है? और कौन उल्टे पावँ फिर जाता है और बिला शुब्हा बड़ी भारी बात थी। मगर जिन को अल्लाह तआला ने हिदायत दे दी है। (उन के लिए कोई बड़ी बात नहीं है)

पहली आयत में यहूदियों के एअतराज का जवाब दिया गया कि खुदा की इबादत में किब्ला की कोई खास जिहत ज़रूरी नहीं है। उस की इबादत के लिए पूरब, पच्छिम, उत्तर, दक्खिन सब जिहतें बराबर हैं, अल्लाह तआला जिस को चाहे अपने बन्दों के लिए किबला मुकर्रर फरमा दे। लिहाजा इस पर किसी को

एअतराज़ का कोई हक नहीं है। दूसरी आयत में मुनाफिकीन की जबान बंदी की गई है जो तहवीले किब्ला के बाद हर तरफ ये प्रोपागन्डा करने लगे थे कि पैगम्बरे इस्लाम तो अपने दीन के बारे

मुतरद्दुद हैं। कभी बैतुल मुकद्दस को किल्ला मानते हैं। कभी कहते हैं कि कबा किल्ला है। आयत में तहवीले किल्ला की हिकमत बता दी गई कि मुनाफिकीन जो महज़ नूमाइशी मुसलमान बनकर नमाजें पढ़ा करते थे। वो किब्ला के बदलते ही बदल गए। और इस्लाम से मुनहरिफ हो गए। इस तरह ज़ाहिर हो गया कि कौन सादिकुल ईमान है? और कौन मुनाफ़िक? और कौन रसूलल्लाह सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की पैरवी करने वाला है? और कौन दीन से फिर जाने वाला? (आम कुतुब तफ़सीर व सीरत)

लड़ाइयों का सिलसिला

अब तक हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को खुदा की तरफ़ से सिर्फ ये हुक्म था कि दलाएल और मौइज़ए हस्ना के जरीओ लोगों को इस्लाम की दवत देते रहें। और मुसलमानों को कुफ्फार की ईज़ाओं पर सब्र का हुक्म था। इसी लिए काफ़िरों ने मुसलमानों पर बड़े बड़े जुल्म-7 सितम के पहाड़ तोड़े। मगर मुसलमानों ने इन्तिकाम के लिए कभी हथियार नहीं उठाया। बल्कि हमेशा सब्र व तहम्मुल के साथ कुफ्फार की ईज़ाओं और तकलीफ़ों को बर्दाश्त करते रहे लेकिन हिजरत के बाद जब सारा अरब और यहूदी उन मुट्ठी भर मुसलमान के जानी दुश्मन हो गए और उन मुसलमानों को फ़ना के घाट उतार देने का अज़्म कर लिया। तो खुदावंदे कुडूस ने मुसलमानों को ये इजाज़त दी कि जो लोग तुम से जंग की इब्तिदा करें उन से तुम भी लड़ सकते हो।

चुनान्चे १२ सफर सन्न २ हिजरी तवारीखे इस्लाम में वो यादगार दिन है जिस में खुदावंदे किरदिगार ने मुसलमानों को कुफ्फार के मुकाबले में तलवार उठाने की इजाजत दी। और ये

आयत नाज़िल फरमाई कि :

उजिना लिल्लजीना युका-तलूना बि-अन्नहुम जुलिमु व-इन्नल्लाहा अला नसरिहिम ल-क-दीर।

तर्जमा :- जिन से लड़ाई की जाती है (मुसलमान) उन को भी अब लड़ने की इजाजत दी जाती है क्योंकि वो (मुसलमान) मजलूम

हैं और खुदा उन की मदद पर यकीनन कादिर है।

हजरते इमाम मुहम्मद बिन शहाब जोहरी अलैहिर्रहमा का कौल है कि जिहाद की इजाजत के बारे में यही वो आयत है जो सब से पहले नाज़िल हुई। मग तफ़सीर इब्ने जरीर में है कि ‘जिहाद के बारे में सब से पहले जो आयत उतरी वो ये है।

व लजीना युकातिलू-नकुम।

तर्जमा :लड़ते हैं।

ख़ुदा की राह में उन लोगों से लडो तो

तुम

लोगों से

बहर हाल सन्न २ हिजरी में मुसलमानों को खुदावंद तआला ने कुफ्फार से लड़ने की इजाजत दे दी। मगर इब्तिदा में ये इजाज़त मशरूत थी। यानी उन्हीं काफिरों से जंग करने की इजाज़त थी जो मुसलमानों पर हमला करें। मुसलमानों को अभी तक इस की इजाजत नहीं मिली थी कि वो जंग में अपनी तरफ से पहल करें लेकिन वाजेहं हो जाने के बाद चूँकि तब्लीगे हक और अहकामे इलाही की नश्र व इशाअत हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम पर फर्ज थी इस लिए तमाम उन कुफ्फार से जो इनाद के तौर पर हक को कबूल करने से इन्कार करते थे जिहाद का हुक्म नाजिल हो गया। ख़्वाह वो मुसलमानों से लड़ने में पहल करें या न करें। क्योंकि हक के जाहिर हो जाने के बाद हक को

कबूल करने के लिए मजबूर करना और बातिल को जबरन कराना ये औने हिकमत, और बनी नू इन्सान की सलाह व कला के लिए इन्तिहाई जरूरी था बहर हाल इस में कोई शक नहीं कि हिजरत के बाद जितनी लडाइयाँ भी हुईं अगर पूरे माहौल को गहरी निगाह से बगौर देखा जाए तो यही जाहिर होता है कि सब लडाइयाँ कुफ्फार की तरफ से मुसलमानों के सर २ मुसल्लत की गईं और गरीब मुसलमान ब-दरजए मजबूरी तलवार उठाने पर मजबूर हुए। मसलन मुन्दर्जा जेल चन्द वाकिआत पर जरा तनकीदी निगाह से नज़र डालिए। (१) हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और आपके असहाय अपना सब कुछ मक्का में छोड़कर इन्तिहाई बे कसी के आलम में मदीना चले आए थे। चाहिए तो ये था कि कुफ्फारे मक्का अब इत्मिनान से बैठ रहते कि उन के दुश्मन यानी रहमते आलम सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और मुसलमान उन के शहर से निकल गए। मगर हुआ ये कि उन काफिरों के गैज- गजब का पारा इतना चढ़ गया कि अब ये लोग अले मदीना के भी दुश्मनें जान बन गए। चुनान्चे हिजरत के चनद रोज बाद कुफ्फारे मक्का ने रईसे अन्सार “अब्दुल्लाह बिन उबय्यी के पास धमकियों से भरा हुआ एक खत भेजा। “अब्दुल्लाह बिन उबय्यी वो शख्स है कि वाकिअए हिजरत से पहले तमाम मदीना वालों ने उस को अपना बादशाह मानकर उस की ताजपोशी की तय्यारी कर ली थी। मगर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम के मदीना तशरीफ लाने के बाद ये स्कीम ख़तम हो गई चुनान्चे इसी गम व गुस्से में अब्दुल्लाह बिन उबय्यी उम्र भर मुनाफ़िकों का सरदार बनकर इस्लाम की बीख कनी करता रहा। और इस्लाम व मुसलमानों के | खिलाफ तरह तरह की साजिशों में मसरूफ रहा।

(बुखारी बाबुत तस्लीम फी मजलिस फीहे इख्लात जि.२ स.९२४) बहर कैफ कुफ्फारे मक्का ने इस दुश्मने इस्लाम के नाम जो

खत लिखा उस का मजमून ये है कि :

“तुम ने हमारे आदमी मुहम्मद (सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को अपने यहाँ पनाह दे रखी है हम खुदा की कसम खाकर कहते हैं कि या तो तुम लोग उन को कत्ल कर दो। या मदीना से निकाल दो। वरना हम सब लोग तुम पर हमला कर देंगे। और तुम्हारे लड़ने वाले जवानों को कत्ल करके तुम्हारी औरतों पर तसर्रुफ करेंगे। (अबू दाऊद जि.२ स.६७ बाब फी खबरुन नफीर)

जब हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को कुफ्फारे मक्का के इस तहदीद आमेज़ और खौफनाक खत की ख़बर मालूम हुई तो आप ने अब्दुल्लाह बिन उबय्यी से मुलाकात फ़माई। और इर्शाद फरमाया कि “क्या तुम अपने भाईयों और बेटों को कत्ल करोगे।” चूंकि अकसर अन्सार दामने इस्लाम में आ चुके थे। इस लिए अब्दुल्लाह बिन उबय्यी ने इस नुक्ते को समझ लिया। और कुफ्फारे मक्का के हुक्म पर अमल नहीं कर सका। (२) ठीक इसी ज़माने में हज़रते सर्द बिन मुआज़ रदियल्लाहु अन्हु जो क़बीला अवस के सरदार थे। उमरा अदा करने के लिए मदीना से मक्का गए। और पुराने तअल्लुकात की बिना पर ‘उमय्या बिन खलफ के मकान पर कियाम किया। जब उमय्या ठीक दोपहर के वक्त उनको साथ ले कर तवाफ़े कबा के लिए गया। तो इत्तफ़ाक़ से अबू जहल सामने आ गया। और डाँटकर कहा कि एके उमय्या! ये तुम्हारे साथ कौन है? उमय्या ने कहा कि ये मदीना के रहने वाले “सअद बिन मुआज़ हैं। ये सुनकर अबू जहल ने तड़प कर कहा कि तुम लोगों ने बे धर्मों (मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम) को अपने यहाँ पनाह दी है। खुदा की कसम अगर तुम उमय्या के साथ न होते तो बच कर वापस नहीं जा सकते थे हज़रते सअद बिन मुआज रदियल्लाहु अन्हु ने भी इन्तिहाई जुर्रत और दिलेरी के साथ जवाब दिया कि अगर तुम लोगों ने हम को कबा की ज़ियारत से रोका तो हम

तुम्हारी शाम की तिजारत का रास्ता रोक देंगे।

(बुखारी किताबुल मगाजी जि.२ सका। कुफ्फारे मक्का ने सिर्फ इन्हीं धमकियों पर बस नहीं किया बल्कि वो मदीना पर हमला की तय्यारियाँ करने लगे। और हुल। सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम और मुसलमानों के कत्ले आम का मनसूबा बनाने लगे। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैति वसल्लम रोतों को जाग जाग कर बसर करते थे। और सहाया किराम आप का पहरा दिया करते थे। कुफ्फारे मक्का ने सारे अरब पर अपने असर- रुसूख़ की वजह से तमाम कबाएल में आग भड़का दी थी कि मदीना पर हमला करके मुसलमानों को दुनिया से नीस्तो नाबूद कर देना ज़रूरी है।

मजकूरा बाला तीनों वुजूहात की मौजूदगी में हर आकिल की ये कहना ही पड़ेगा कि इन हालात में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम को हिफाज़ते खुद इख्तियारी के लिए कुछ न कुछ तदबीर करनी ज़रूरी ही थी। ताकि अन्सार व मुहाजिरीन और खुद अपनी ज़िन्दगी की बक़ा और सलामती का सामान हो जाए।

चुनान्चे कुफ्फारे मक्का के ख़तरनाक इरादों का इल्म हं जाने के बाद हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी और सहाबा की हिफाज़ते खुद इख्तियारी के लिए दो तदबीरों पर अमल दर आमद का फैसला फ़रमाया।

अव्वल : ये कुफ्फारे मक्का की शामी तिजारत जिस पर उन की ज़िन्दगी का दार- मदार है। इस में रुकावट डाल दी जाए। ताकि वो मदीना पर हमले का ख़याल छोड़ दें और सुलह पर

। दुव्वम: ये कि मदीना के अतराफ़ में जो कबाएल आबाद है । उन से अमन- आमान का मुआहदा हो जाए ताकि कुफ्फार मदीना पर हमला की निय्यत न कर सकें। चुनान्चे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इन्हीं दो तदबीरों के पेशे नज़र सहाबए किराम के छोटे छोटें लश्करों को मदीना के अतराफ में भेजना

मजबूर हो जाएँ।

शुरू कर दिया। और बअज बज लश्करों के साथ खुद भी तशरीफ ले गए। सहाबए किराम के ये छोटे छोटे लश्कर भी कुफ्फारे मक्का की नक्ल- हरकत का पता लगाने के लिए जाते थे और कहीं बअज कबाएल से मुआहदए अमन- अमान करने के लिए रवाना होते थे। कहीं इस मकसद से भी जाते थे कि कुफ्फारे मक्का की शामी तिजारत का रास्ता बंद हो जाए। इसी सिलसिला में कुफ्फारे मक्का और उन के हलीफों (मददगारों) से मुसलमानों का ठकराव शुरू हुआ। और छोटी बड़ी लड़ाईयों का सिलसिला शुरू हो गया। इनही लड़ाइयों को तारीखे इस्लाम में “गज़वात व सराया” के उनवान से बयान किया गया है।

ग़ज़वा और सरीय्या का फ़र्क

यहाँ मुसन्निफीने सीरत की ये इस्लाह याद रखनी ज़रूरी है कि वो जंगी लश्कर जिसके साथ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम भी तशरीफ ले गए उस को “गज़वा” कहते हैं। और वो लश्करों की टोलियाँ जिनमें हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शामिल नहीं हुए उन को “सरीय्या कहते हैं।

(मदारिजुन नुबूब्बत जि.२ स.७६ वगैरा) “गज़वात” यानी जिन जिन लश्करों में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम शरीक हुए उन की तदाद में मुअरिंखीन का इख़्तिलाफ़ है। मवाहिबे लदुन्निया में है कि “गजवात’ की तअदाद “सत्ताइस’ है और रोजतुल अहबाब में ये लिखा है कि गजवात’ की तअदाद एक कौल की बिना पर इक्कीस और बअज़ के नजदीक “चौबीस है और बअज ने कहा कि “पच्चीस’ और बअज ने लिखा कि “छब्बीस है।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३८८) मगर हज़रते इमाम बुखारी रहमतुल्लाह अलैह ने हजरते जैद बिन अरकम सहाबी रदियल्लाहु अन्हु से जो रिवायत तहरीर की

को छोड़ दें तो यकीनन “सीरते रसूल” का मजमून बिल्कुल ही नाकिस और ना मुकम्मल रह जाएगा। इस लिए मुख्तसर तौर पर चन्द मशहूर गजवात व सराया का यहाँ जिक्र कर देना निहायत जरूरी है। ताकि सीरते मुकद्दसा का ये अहम बाब भी नाजिरीन के लिए नजर अफरोज हो जाए।

सरीय्य-ए-हम्जा

हुजूरे अकदस सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हिजरत के बाद जब जिहाद की आयत नाजिन हो गई। तो सब से पहले जो एक छोटा सा लश्कर कुफ्फार के मुकाबले के लिए रवाना फरमाया। इस का नाम “सरीय्यए हम्ज़ा” है। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने अपने चचा हज़रते हम्ज़ा बिन अब्दुल मुत्तलिब रिदयल्लाहु अन्हु को एक सफेद झण्डा अता फ़रमाया। और इस झण्डे के नीचे सिर्फ ३० मुहाजिरीन को एक लश्करे कुफ्फार के मुकाबले के लिए भेजा। जो तीन सौ की तअदाद में थे और अबू जहल उनका सिपह सालार था। हज़रते हमज़ा रदियल्लाहु अन्हु “सैफुल बहर तक पहुंचे और दोनों तरफ से जंग के लिए सफ बंदी भी हो गई। लेकिन एक शख्स मुजदी बिन अमर जुहनी जो दोनों फ़ीक़ का हलीफ़ था। बीच में पड़कर लड़ाई मौकूफ करादी। (मदारिज जि.२ सं.७८ व ज़रकानी जि.१ स. ३६०)

सरीय्यए उबैदा बिनुल हारिस

इसी साल साठ या अस्सी मुहाजिरीन के साथ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते उबैदा बिनुल हारिस को सफेद झण्डे के साथ अमीर बनाकर “राबग” की तरफ रवाना फरमाया। इस सरीय्या के अलम बरदार हज़रते मिसतह बिन उसासा रदियल्लाहु अनहु थे। जब ये लश्कर “सनीय्यए मर्रा के मकाम पर पहुँचा। तो अबू सुफयान और अबू जहल के लड़के इकरमा की

कमान में दो सौ कुफ्फारे कुरैश जमअ. थे। दोनों लश्करों का सामना हुआ। हज़रते सअद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु

ने कुफ्फार पर तीर फेंका ये सब से पहला तीर था तो मुसलमानों की तरफ़ से कुफ्फारे मक्का पर चलाया गया। हज़रते सअद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु ने कुल आठ तीर फेंके। और हर तीर निशाने पर ठीक बैठा। कुफ्फार इन तीरों की मार से घबरा कर फरार हो गए इस लिए कोई जंग नहीं हुई। (ज़रकानी जि.१ स.३९२)

सरीय्यए सद बिन अबी वक्कास

इसी साल माह जुल कदा में हज़रते सअद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु को बीस सवारों के साथ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने इस मकसद से भेजा ताकि ये लोग कुफ्फारे कुरैश के एक लश्कर का रास्ता रोकें। इस सरीय्या का झण्डा भी सफेद रंग का था। और हज़रते मिकदाद बिन असवद रदियल्लाहु अन्हु इस लश्कर के अलम बरदार थे। ये लश्कर रातों रात सफ़र करते हुए जब पाँचवें दिन मकामे “ख़र्रार’ पर पहुँचा तो पता चला कि मक्का के कुफ्फ़ार एक दिन पहले ही फरार हो चुके हैं इस लिए किसी तसादुम की नौबत ही नहीं आई।

(ज़रकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३९२)

ग़ज़वए अबवा

इस गज़वा को “गजवए वद्दान’ भी कहते हैं। ये सब से पहला गजवा है। यानी पहली मर्तबा हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिहाद के इरादे से माहे सफर सन्न २ हिजरी में साठ मुहाजिरीन को अपने साथ ले कर मदीना से बाहर निकले। हज़रते सअद बिन उबादा रदियल्लाहु अन्हु को मदीने में अपना ख़लीफ़ा बनाया। और हज़रते हम्ज़ा रदियल्लाहु अन्हु को झण्डा दिया। और मकामे “अबवा’ तक कुफ्फार का पीछा करते हुए तशरीफ़ ले

गए। मगर ‘कुफ्फारे मक्का फरार हो चुके थे। इस लिए कोई जंग नहीं हुई “अबवा” मदीने से अरसी मील दूर एक गाँव है। जहाँ हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की वालिदा माजिदा हजरते बीबी आमिना रदियल्लाहु अन्हा का मजार है। यहाँ चन्द दिन ठहरकर कबीलए बनू जमरा के सरदार “मख्शी बिन अमर जमरी” से इन्दादे बाहमी का एक तहरीरी मुआहदा किया। और मदीना वापस तशरीफ लाए। इस गजवां में पन्द्रह दिन आप मदीने से बाहर रहे।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३९३)

ग़ज़वए बवात

हिजरत के तेरहवें महीने सन्न २ हिजरी में मदीना पर हज़रते सद बिन मुआज रदियल्लाहु अन्हु को हाकिम बनाकर दो सौ मुहाजिरीन को साथ ले कर हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जिहाद की निय्यत से रवाना हुए। इस गजवा का झण्डा भी सफेद था। और अलमबरदार हज़रते सअद बिन अबी वक्कास रदियल्लाहु अन्हु थे। इस गजवे का मकसद कुफ्फारे मक्का के एक तिजारती काफिले का रास्ता रोकना था। इस काफिले का सालार “उमय्या बिन खलफ जुमही” था। और इस काफ़िले में एक सौ कुरैशी कुफ्फार, और ढाई हज़ार ऊँट थे हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस काफिले की तलाश में मकामे “बवात” तक तशरीफ ले गए। मगर कुफ्फारे कुरैश का कहीं सामना नहीं हुआ इस लिए हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम बिगैर किसी जंग के मदीना वापस तशरीफ लाए।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३९३)

ग़ज़वए सफ़वान

इसी साल “कुर्ज बिन जाबिर फुहरी” ने मदीने की चरागाह में डाका डाला और कुछ ऊँटों को हाँक कर ले गया। हुजूर

सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हजरते जैद बिन हारिसा रदियल्लाहु अन्हु को मदीना में अपना ख़लीफ़ा बनाकर और हजरते अली रदियल्लाहु अन्हु को अलमबरदार बनाकर सहाबा की एक जमाअत के साथ वादिए सफ़वान तक उस डाकू का तआकुब किया। मगर वो इस कदर तेजी के साथ भाग कि हाथ नहीं आया। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम मदीना वापस तशरीफ लाए। वादिए सफवान “बदर के करीब है। इसी साल बअज मुअरिंखीन ने इस गज़वे का नाम “गजवए बदर ऊला रखा है। इस लिए ये याद रखना चाहिए कि गज़वए सफ़वान और गजवए बदर ऊला दोनों एक ही गज़वे के दो नाम हैं। (मदारिज जि.२ स.७९)

ग़ज़वए ज़िल उशैरा

इसी साल सन्न २ हिजरी में कुफ्फारे कुरैश का एक काफ़िला माले तिजारत ले कर मक्का से शाम जा रहा था। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम डेढ सौ या दो सौ मुहाजिरीन सहाबा को साथ ले कर इस काफिले का रास्ता रोकने के लिए मकामे “ज़िल उशैरा’ तक तशरीफ़ ले गए। जो “यंबुअ की बंदरगाह के करीब है। मगर यहाँ पहुँचकर मालूम हुआ कि काफ़िला बहुत आगे बढ़ गया है। इस लिए टकराव नहीं हुआ। मगर यही काफिला जब शाम से वापस लौटा और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम इस की मज़ाहमत के लिए निकले तो जंगे बदर क मरिका पेश आ गया। जिस का मुफ़स्सल ज़िक्र आगे आता है।

(जरकानी जि.१ स.३९५)

सरीय्यए अब्दुल्लाह बिन जहश

इसी साल माह रजब सन्न २ हिजरी में हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन जहश रदियल्लाहु अन्हु

को अमीरे लश्कर बनाकर उन की मा तंहती में आठ या बारह

मुहाजिरीन का एक जथ रवाना फरमाया । दो-दो आदमी एक-एक ऊँट पर सवार थे। हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रते अब्दुल्लाह बिन जहश रयिल्लाहु अन्हु को लिफाफ़ा में एक मुहर बंद खत दिया। और फरमाया कि दो दिन सफर करने के बाद इस लिफाफे को खोलना और पढ़ना और इस में जो हिदायत लिखी हुई हैं उन पर अमल करना। जब खत खोलकर पढ़ा तो इस में ये दर्ज था कि तुम ताइफ और मक्का के दर्मियान मकामे “नख्ला” में ठहरकर कुरैश के काफिलों पर नज़र रखो। और सूरते हाल की हमें बराबर ख़बर देते रहो। ये बड़ा ही खतरनाक काम था। क्योंकि दुश्मनों के जैन मरकज़ में कियाम करके जासूसी करना गोया मौत के मुँह में जाना था। मगर ये सब जाँ निसार बे धड़क मकामे “नख्ला” पहुँच गए। अजीब इत्तफ़ाक कि रजब की आखिरी तारीख को ये लोग नख्ला पहुँचे। और उसी दिन कुफ्फारे कुरैश का एक तिजारती काफला आया जिस में अमर बिनुल हज़रमी और अब्दुल्लाह बिन मुगैरा के दो लड़के उस्मान व नौफ़ल और हकम बिन कैसान वगैरा थे। और ऊँटों पर खजूर और दूसरा माले तिजारत लदा हुआ था। अमीरे सरिया हज़रते अब्दुल्लाह बिन जहश रदियल्लाहु अन्हु पे अपने साथियों से फ़रमाया कि अगर हम इन काफले वालरों को छोड़ दें तो ये लोग मक्का पहुँचकर हम लोगों की यहाँ मौजूदगी से मक्का वालों को बा खबर कर देंगे। और हम लोगों को कत्ल या गिरफ्तार करा देंगे। और अगर हम इन लोगों से जंग करें तो आज रजब की आखिरी तारीख़ है। लिहाज़ा शहरे हराम में जंग करने का गुनाह हम पर लाज़िम होगा। आख़िर यही राय करार पाई कि इन लोगों से जंग करके अपनी जान के खतरे को दफ़अ करना चाहिए चुनान्चे हज़रते वाकिद बिन अब्दुल्लाह तमीमी रदियल्लाहु अन्हु ने एक तीर ऐसा ताक कर मारा कि वो अमर बिनुल हजरमी को लगा और वो इसी तीर से कत्ल हो गया। और उस्मान व हकम को इन लोगों ने गिरफ्तार कर लिया। नवफल भाग निकला। हजरते

अब्दुल्लाह बिन जहश रदियल्लाहु अन्हु ऊँटों और उन पर लदे माल व असबाब को माले गनीमत बनाकर मदीना लौट आए। और हुजूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम की ख़िदमत में इस माले गनीमत का पाँचवाँ हिस्सा पेश किया।

(जरकानी अलल मवाहिब जि.१ स.३९८) जो लोग कत्ल या गिरफ्तार हुए वो बहुत ही. मुअज्जज ख़ानदान के लोग थे। अमर बिनुल हज़रमी जो कत्ल हुआ अब्दुल्लाह बिन हज़रमी का बेटा था। अमर बिनुल हज़रमी पहला काफ़िर था जो मुसलमानों के हाथ से मारा गया। जो लोग गिरफ्तार हुए यानी उस्मान और हकम। इन में से उस्मान मुगैरा का पोता था। जो कुरैश का एक बहुत बड़ा रईस शुमार किया जाता था। और हकम बिन केसान अमर मजूमी का आज़ाद कर्दा गुलाम था। इस बिना पर इस वाकिआ ने तमाम कुरैश को गैज़ने गज़ब में आग बगूला बना दिया। और खून का बदला खून लेने का नश्रा मक्का के हर कूचे व बाज़ार में गूंजने लगा। और दर हकीकत जंगे बदर का मअरिका इसी वाकिआ का रद्दे अमल है। चुनान्चे उरवा बिन जुबैर रदियल्लाहु अन्हु का बयान है कि जंगे बदर और तमाम लड़ाईयाँ जो कुफ्फारे कुरैश से हुईं इन सब का बुनियादी सबब अमर बिनुल हजरमी का कत्ल है। जिस को वाकिद बिन अब्दुल्लाह तमीमी रदियल्लाहु अन्हु ने तीर मारकर क़त्ल कर दिया।

(तारीख तबरी स. १२८४)