
ख़ैबर की लड़ाई में दोनों फ़रीक़ के मारे गए लोग
ख़ैबर की अलग-अलग लड़ाइयों में कुल मुसलमान जो शहीद हुए, उनकी तायदाद सोलह है। चार कुरैश से एक क़बीला अशजअ से, एक क़बीला अस्लम से, एक ख़ैबर वालों में से और बाक़ी अंसार से-
एक कथन यह भी है कि इन लड़ाइयों में कुल 18 मुसलमान शहीद हुए। अल्लामा मंसूरपुरी ने 19 लिखा है, फिर वह लिखते हैं,
‘सीरत लिखने वालों ने ख़ैबर के शहीदों की तायदाद पन्द्रह लिखी है। मुझे खोजते हुए 23 नाम मिले। ज़नीफ़ बिन वाइला का नाम सिर्फ़ वाक़दी ने और ज़नीफ़ बिन हबीब का नाम सिर्फ़ तबरी ने लिया है। बिन बिन बरा बिन मारूर का इंतिक़ाल लड़ाई के ख़त्म होने के बाद विषैला मांस खाने से हुआ जो नबी सल्ल० के लिए ज़ैनब यहूदिया ने भेजा था। बिन बिन अब्दुल मुंजिर के बारे में दो रिवायतें हैं, 1, बद्र में शहीद हुए, 2. ख़ैबर की लड़ाई में शहीद हुए। मेरे नज़दीक पहली रिवायत मज़बूत है । 2
दूसरे फ़रीक़ यानी यहूदियों में क़त्ल होने वालों की तायदाद 93 है।
फ़िदक
अल्लाह के रसूल सल्ल० ने ख़ैबर पहुंचकर मुहैयसा बिन मस्अद रज़ि० को इस्लाम की दावत देने के लिए फिंदक के यहूदियों के पास भेज दिया था, लेकिन फ़िदक वालों ने इस्लाम अपनाने में देर की, पर जब अल्लाह ने ख़ैबर पर जीत
1. देखिए, ज़ादुल मआद 2/139, 140, फत्हुल बारी 7/497, सहीह बुखारी 1/449 2/610,860, इब्ने हिशाम 2/337, 338 2. रहमतुल लिल आलमीन 2/268, 269, 270
दिला दी, तो उनके दिलों में रौब पड़ गया और उन्होंने अल्लाह के रसूल सल्ल० के पास आदमी भेजकर ख़ैबर वालों के मामले के मुताबिक़ फ़िदक की आधी पैदावार देने की शर्तों पर समझौते की पेशकश की। आपने पेशकश कुबूल कर ली और इस तरह फ़िदक की धरती ख़ालिस अल्लाह के रसूल सल्ल० के लिए हुई, क्योंकि मुसलमानों ने उस पर घोड़े और ऊंट नहीं दौड़ाए थे। (यानी उसे तलवार से नहीं जीता था) फ़िदक का वर्तमान नाम हाइत है जो हाइल डिवीज़न में स्थित है और मदीना से कम व बेश ढाई किलोमीटर दूर है।
वादिल कुरा
अल्लाह के रसूल सल्ल० ख़ैबर से फ़ारिग़ हुए तो वादिल कुरा तशरीफ़ ले गए। वहां भी यहूदियों की एक जमाअत थी और उनके साथ अरब की एक जमाअत भी शामिल हो गई थी।
जब मुसलमान वहां उतरे, तो यहूदियों ने तीरों से स्वागत किया। वे पहले से पूरी तरह तैयार बैठे थे। अल्लाह के रसूल सल्ल० का एक गुलाम मारा गया। लोगों ने कहा, उसके लिए जन्नत मुबारक हो।
नबी सल्ल० ने कहा, हरगिज़ नहीं। उस ज़ात की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, उसने ख़ैबर की लड़ाई में ग़नीमत के माल के बंटने से पहले उसमें से जो चादर चुराई थी, वह आग बनकर उस पर भड़क रही है।
लोगों ने नबी सल्ल० का यह इर्शाद सुना तो एक आदमी एक तस्मा या दो तस्मा लेकर आपकी खिदमत में हाज़िर हुआ। नबी सल्ल० ने फ़रमाया, यह एक तस्मा या दो तस्मा आग का है। 2
इसके बाद नबी सल्ल० ने लड़ाई के लिए सहाबा किराम की ततींब और संफ बंदी की। पूरी फ़ौज का झंडा हज़रत साद बिन उबादा के हवाले किया। एक झंडा हुबाब बिन मंज़िर को दिया और तीसरा झंडा उबादा बिन बिल को दिया। इसके बाद आपने यहूदियों को इस्लाम की दावत दी। उन्होंने कुबूल न किया और उनका एक आदमी लड़ाई के मैदान में उतर आया।
इधर से हज़रत ज़ुबैर बिन अव्वाम रज़ि० ज़ाहिर हुए और उसका काम तमाम कर दिया। फिर दूसरा आदमी निकला। हज़रत जुबैर रज़ि० ने उसे भी क़त्ल कर दिया। इसके बाद एक और आदमी मैदान में आया। उसके मुक़ाबले के लिए
1. इब्ने हिशाम 2/337, 353 2. सहीह बुखारी 2/608
हज़रत अली रजि० निकले और उसे क़त्ल कर दिया। इस तरह धीरे-धीरे उनके ग्यारह आदमी मारे गए। जब एक आदमी मारा जाता तो नबी सल्ल० बाक़ी यहूदियों को इस्लाम की दावत देते ।
दिन में जब नमाज़ का वक़्त होता तो आप सहाबा किराम को नमाज़ पढ़ाते और फिर पलटकर यहूदियों के मुक़ाबले में चले जाते और उन्हें इस्लाम और अल्लाह और उसके रसूल की दावत देते। इस तरह लड़ते-लड़ते शाम हो गई ।
दूसरे दिन सुबह आप फिर तशरीफ़ ले गए, लेकिन अभी सूरज नेजा बराबर भी ऊंचा न हुआ था कि उनके हाथ में जो कुछ था, उसे आपके हवाले कर दिया यानी आपने ताक़त के ज़ोर से जीत पाई और अल्लाह ने उनके माल आपको ग़नीमत में दिए। सहाबा किराम को बहुत सारा साज़ व सामान हाथ आया।
अल्लाह के रसूल सल्ल० वादिल कुरा में चार दिन ठहरे रहे। ग़नीमत का जो माल हाथ आया था, उसे सहाबा किराम रज़ि० में बांट दिया, अलबत्ता ज़मीन और खजूर के बाग़ों को यहूदियों के हाथ में रहने दिया और उसके बारे में उनसे भी (ख़ैबर वालों जैसा) मामला तै कर लिया । 1
तैमा
तैमा के यहूदियों को जब ख़ैबर, फ़िदक और वादिल कुरा के रहने वालों के हथियार डालने की ख़बर मिली, तो उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ़ किसी क़िस्म की मोर्चाबन्दी का प्रदर्शन करने के बजाए खुद से आदमी भेजकर सुलह की पेशकश की। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने उनकी पेशकश कुबूल कर ली और यहूदी अपने मालों के साथ ठहरे रहे। 2 इसके बारे में एक काग़ज़ लिख दिया, जो इस तरह था-
है ‘यह लेख है मुहम्मद रसूलुल्लाह की ओर से बनू आदया के लिए। उनके लिए ज़िम्मा है और उन पर जिज़या है, उन पर ज़्यादती न होगी, न उन्हें देश निकाला दिया जाएगा, रात मददगार होगी और दिन पक्का करने वाला (यानी यह समझौता हमेशा का होगा) और यह लेख खालिद बिन सईद ने लिखा ।
मदीना को वापसी
इसके बाद अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मदीना वापसी का रास्ता लिया।
1. ज़ादुल मआद 2/146, 147
2. ज़ादुल मआद 2/147
3. इब्ने साद 1/279
वापसी के दौरान लोग एक घाटी के क़रीब पहुंचे, तो ऊंची आवाज़ से अल्लाहु अक्बर, अल्लाहु अक्बर, ला इला-ह इल्लल्लाहु’ कहने लगे। अल्लाह के रसूल सल्ल० ने फ़रमाया, अपने नफ़्सों के साथ आसानी मिलने पर तो तुम लोग किसी बहरे और ग़ायब को नहीं पुकार रहे हो, बल्कि उस हस्ती को पुकार रहे हो जो सुनने वाली और क़रीब है। 1
साथ ही बीच रास्ते में एक बार रात भर सफ़र जारी रखने के बाद आपने आखिर रात में रास्ते में किसी जगह पड़ाव डाला और हज़रत बिलाल को यह ताकीद कर सो रहे कि हमारे लिए रात पर नज़र रखना (यानी सुबह होते ही नमाज़ के लिए जगा देना) लेकिन हज़रत बिलाल रजि० की भी आंख लग गई। वह (पूरब की ओर मुंह करके) अपनी सवारी पर टेक लगाए बैठे थे कि सो गए, फिर कोई भी न जागा, यहां तक कि लोगों पर धूप आ गई।
इसके बाद सबसे पहले अल्लाह के रसूल सल्ल० जागे, फिर (लोगों को जगाया गया) और आप इस घाटी से निकलकर कुछ आगे तशरीफ़ ले गए, फिर लोगों को फज्र की नमाज़ पढ़ाई। कहा जाता है कि यह घटना किसी दूसरे सफ़र में घटी थी। 2
ख़ैबर की लड़ाइयों पर विस्तार में विचार करने पर मालूम होता है कि नबी सल्ल० की वापसी या तो (सन् 07 हि० के) सफ़र के आखिर में हुई थी या फिर रबीउल अव्वल के महीने में।
सरीया अबान बिन सईद
नबी सल्ल० सारे सेनापतियों से ज़्यादा अच्छी तरह यह बात जानते थे कि हराम महीनों के खात्मे के बाद मदीना को पूरे तौर पर खाली छोड़ देना सूझ-बूझ के बिल्कुल खिलाफ़ है, जबकि मदीना के आस-पास ऐसे बहू मौजूद हैं जो लूट-मार और डाकाज़नी के लिए मुसलमानों की ग़फ़लत का इन्तिज़र करते रहते हैं। इसके लिए जिन दिनों में आप ख़ैबर गए, उन्हीं दिनों में आपने बहुओं को डराने-धमकाने के लिए अबान बिन सईद की कमान में नज्द की ओर एक सरीया भेज दिया था। अबान बिन सईद अपना फ़र्ज़ अदा करके वापस लौटे, तो नबी सल्ल० से ख़ैबर में मुलाक़ात हुई, उस वक़्त आप ख़ैबर जीत चुके थे।
1. सहीह बुखारी 2/605
2. इब्ने हिशाम 2/340, यह घटना बहुत ज़्यादा मशहूर और हदीस की आम किताबों में लिखा हुई है। साथ ही देखिए जादुल मआद 2/147
ज़्यादा गुमान यही है कि यह सरीया सफ़र 07 हि० में भेजा गया था। इसका उल्लेख सहीह बुखारी में आया है।’
हाफ़िज़ इब्ने हजर लिखते हैं कि मुझे इस सरीया का हाल न मालूम हो सका 12
देखिए सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा खैबर 2/608, 609 फत्हुल बारी 7/491

