
1857 की क्रांति में एक ऐसी भी कलम थी, जो बंदूकों से ज्यादा भारी साबित हुई थी। वह कलम थी दिल्ली “उर्दू” अख़बार के एडिटर और मालिक क्रांतिकारी मौलवी मोहम्मद बाक़र की।
सन् 1828 में मौलवी मोहम्मद बाक़र ने दिल्ली कॉलेज में एक शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी और करीब 6 साल तक वहां अपनी सेवाएं दी थीं।
सन् 1843 में उन्होंने दिल्ली में कश्मीरी गेट के पास ‘आज़ाद मंजील’ नाम से एक इमामबाड़ा बनवाया था। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसमें सभी धर्मों और समुदायों के लोग शामिल होते थे। यहाँ तक कि उस दौर के मशहूर शायर इब्राहिम ज़ौक़ और मोमिन खान मोमिन भी यहाँ मरसियाख्वानी (शोकगीत पाठ) में हिस्सा लेते थे।
जब 1857 का विद्रोह शुरू हुआ और मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को क्रांतिकारियों ने नेता चुना, तो मौलवी बाक़र ने 12 जुलाई 1857 को अपने अखबार ‘दिल्ली उर्दू अख़बार’ का नाम बदलकर ‘अख़बार उज़्ज़फर’ रख दिया था, ताकि वे खुलकर क्रांति और सम्राट का समर्थन कर सकें।
4 जून 1857 को छपे उनके लेख आज भी इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं, जिसमें उन्होंने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के खिलाफ देशवासियों को आगाह करते हुए दोनों समुदायों से एकजुट होने की जोरदार अपील की थी।
14 सितंबर 1857 को अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बिना किसी लंबी अदालती कार्रवाई के, 16 सितंबर 1857 को उन्हें ब्रिटिश मेजर विलियम हडसन के आदेश पर तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया गया। इतिहास में उन्हें भारतीय पत्रकारिता का पहला शहीद माना जाता है।
आज जब हम एक स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि आज़ादी सिर्फ खैरात में नहीं मिली, बल्कि इसके लिए हुतात्मयों ने अपने हंसते-हंसते प्राण न्यौछावर किए थे। आज के समय में जहाँ इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा जाता है और नफरत फैलाने की कोशिशें होती हैं, वहाँ मौलवी मोहम्मद बाक़र जैसे नायकों की शहादत हमें यही सिखाती है कि देश, इंसानियत और सच हमेशा सबसे ऊपर होने चाहिए। आज़ादी की इस कीमत को पहचानिए और समाज को तोड़ने वाली ताकतों से बचकर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाइए।

