*क़ौल ए मौला अ़ली अ़लेहिस्सलाम*
“दुनिया मुर्दार है,और मुरदार पर कुत्ते ही झ़पटते हैं,जो शख्स दुनिया हासिल करना चाहता है उसे अपने आप को कुत्तों में शुमार करना चाहिये.”
Month: June 2020
ओरहान गाज़ी
Orhan was Born in Söğüt around 1281, Orhan was the first son of Osman I. Orhan’s grandfather, Ertuğrul Gazi, named his grandson after Orhan Alp The early childhood and adulthood of Orhan are unknown, but he grew very close to his father. Some historical articles claim that when Orhan was 20 years old, his father sent him to the small Ottoman province of Nakihir, but Orhan returned to the Ottoman capital, Sogut, in 1309.
Sultan Osman Gazi died in either 1323 or 1324 and Orhan succeeded him. According to Ottoman tradition, when Orhan succeeded his father, he proposed to his brother, Alaeddin, that they should share the emerging empire. The latter refused on the grounds that their father had designated Orhan as sole successor, and that the empire should not be divided. He only accepted as his share the revenues of a single village near Bursa.
Orhan then told him, “Since, my brother, thou will not take the flocks and the herds that I offer thee, be thou the shepherd of my people; be my Vizier.” The word vizier, vezir in the Ottoman language, from Arabic wazīr, meant the bearer of a burden. Alaeddin, in accepting the office, accepted his brother’s burden of power, according to oriental historians. Alaeddin, like many of his successors in that office, did not often command the armies in person, but he occupied himself with the foundation and management of the civil and military institutions of the state
Orhan Gazi was born in 1281. His father was Osman Gazi and his mother was Mal Sultana, the daughter of Omer, who was a respected person in the Kayi Clan. Orhan Gazi was tall, had a blonde beard and blue eyes. He was a benign, forgiving, religious and fair ruler. He admired the theologians. He had strong and patient character. He spent most of his time with his people or by visiting them. He had won the admire of his people in a short time.
Orhan Gazi became the leader of Kayi Clan after the death of Osman Gazi, in 1326. He had married to Teodora, the daughter of the Byzantine Emperor Yoannis Kontakuzinas XI, in 1346. His second wife was Holofira the daughter of the Byzantine Prince of Yarhisar. Holofira eloped with Orhan by leaving her marriage ceremony with the Prince of Bilecik. After she was married to Orhan Gazi she was converted to Islam and her name was changed as Nilufer Hatun. She gave birth to Murad, who had been the third sultan of the Ottomans. . He defeated Byzantine Emperor Andronicus III and conquered large parts of Asia Minor, including Nicaea and Izmit. In 1345 the Ottomans first crossed into Europe to aid Byzantine Emperor (John Cantacuzene). Orkhan married John’s daughter Theodora. Orkhan crossed the Dardanelles two more times, assisting John against Stephen Duan of Serbia and gaining for the Ottomans a foothold in Europe.
His Wifes : Nilufer Hatun , Asporca Hatun , Theodora Hatun , Eftandise Hatun
His Sons : SuleymanPasha, Murad, Ibrahim, Halil, Kasim.
His Daughters : Fatma Hatun*🗡️ओरहान गाज़ी🗡️*
*दौरे हुकुमत* मार्च1362-
15 जून1389*पूर्वज वालिद* सुल्तान ओरहान गाज़ी
*वालिदा।* नीलोफर खातून
*उत्तराधिकारी।* बायजीद बे
*पैदाइस* 29जून1326
शहर बरसा
, वर्तमान तुर्की में*विसाल।* 15 जून 1389
(62 वर्ष की उम्र)*दफन मकबरा* में दफनाया
अंगों सुल्तान मुराद के
मकबरे , कोसोवो*धर्म मजहब* इस्लाम सुन्नी हनफ़ी
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*⚔️सुल्तान ओरहान गाज़ी⚔️*
*एक एक करके उस्मानियो ने सारे किले फतेह कर के शहर से रोमियो को पूरी तरह खत्म कर दिया*
*(इस जंग के बाद रूमी लस्कर का सबसे बड़ा जनरल (john v kantakouzenos) केटागो जीनस उस्मानि फ़ौज़ की बहादुरी से बड़ा मुतासिर हुवा ,उसने इनसे लड़ने की बजाए , दोस्ती करने का फैसला किया, , वो इस लिए की वो रूमी शहनशाह बनना चाहता था , ओर इस बगावत के लिए बाहर से उस्मानी सेना जैसी बहादुर सेना की मदद की जरूरत थी,*
*जनरैल (john v kantakouzenos) ने खुफिया तरीके से ओरहान गाज़ी से बात की ओर उनको मदद की दरखुवास्त की ओर इस मदद के बदले में बोहोत से पुरकसिस फायदे देने का वादा भी किया , जिनमे से एक ये भी था कि अगर सुल्तान उसकी मदद करने का वादा करे ,तो वो अपनी बेटी की शादी सुल्तान से कर देगा*
*ओरहान गाजी तय्यार हो गए,, ओर ऐसे पूरी कहानी ही उलट हो गई उस्मानी सल्तनत के सबसे बड़े दुश्मन रूमी का सबसे बड़ा जनरैल उनके साथ मिल चुका था_ जो उस्मान गाजी रूमीओ से चारो तरफ से घिरे हुवे थे वो अब रूमियों को चारों तरफ से घेरे हुवे थे,,*
_सुल्तान ओरहान ने ये पेशकस कुबूल की ओर इस गड़जोड का इम्तिहान शूरु हो गया_
*हुवा यू की 1341 में जब रोमी शहनशाह की मौत हुई और उसकी जगह उसका 9 साला बेटा (john v palaiologos) तख्त पर बैठाया गया तो इसी जनरैल केटागो-जीनस (john v kantakouzenos) ने बगावत करदी, उसने मुतालबा किया कि उसे भी शरिक शहनशाह बनाया जाए, वरना वो अपनी रियासत से जंग करेगा _ इधर 9 साला शहनशाह को रो कुछ समझ नही थी लेकिन उसकी माँ जो उसकी सरपरस्ती कर रही थी वो समझ गई के (john v kantakouzenos) किसके बल बुते पे ये बगावत कर रहा हे, तो उसने भी तुर्को ही के एक दूसरे इंतिहाई ताकतवर धड़े केराशी सल्तनत से मदद मांगी, ये अलग बात हे के केरासी से उन्हें जादा मदद नही मिली,*
*अब रोमी सल्तनत में खाना-जंगी सुरु होगई*
*जिसमे एक तरफ तुर्क ओर रूमी जनरैल (kantakouzenos) एक साथ थे ,*
*जबकि दूसरी तरफ*
_रोमी शहनशाह , सर्बिया , (serbia) ओर बुल्गारिया,(Bulgaria) वगैराह साथ थे और केराशी ,(karasi) तुर्क सल्तनत भी_
*6 साल तक जारी रहने वाली खाना जंगी के बाद (john v kantakouzenos) को कुस्तुन्तुनिया का शरिक शहनशाह बना लिया गया यानी वो जंग जीत गया*
_लेकिन इस खाना जंगी ने ब्रेजेंटाइन सल्तनत के टुकड़े कर दिए , सर्बिया , आज़ाद हो गया ,बुल्गारिया, ने कई हिस्सों पे कब्ज़ा कर लिया और बाद में ब्रेजेंटाइन सल्तनत सिर्फ कुस्तुन्तुनिया में महदूद होकर रह गई_
*इस जंग से उस्मानियो का असर ओर रसुक अपनी सबसे बड़ी दुश्मन सल्तनत में अंदर तक हो गया, बल्के उस्मानि सुल्तान का ससुर ,रुमिओ का शरिक शहनशाह बन गया , उस्मानियो के लिए ये बड़ी कामयाबी थी इसपर मजीद ये की वो अब मगरिब मे केरासी तुर्को पर भी हावी हो गए थे , जो उनके बड़े दुश्मन थे*
*केरासी सल्तनत धीरे धीरे खत्म हो गई*
*केरासी सल्तनत पर कब्ज़े की वजह से उस्मानी तुर्क समुंदर के उस हिस्से दरया ए दानियाल के करीब आगए थे , जहा से वो योरोप में दाखिल हो सकते थे, क्यों के अनातोलिया से योरोप के दोही रास्ते थे एक कुस्तुन्तुनिया ,दूसरा यही दरिया ए दानियाल का था, योरोप में दाखिल होना उसको फतेह करना तुर्को के लिए एक खुवाब था, ये खुवाब उनके बानी गाज़ी उस्मान बे ने देखा था, ओर अब वो इसके किनारे पे थे, लेकिन दरमियान में एक समुंदर था , ओर दूसरी तरफ यूरोप की ताकतवर फ़ौज़ थी*
*बरोसा में उस्मान गाज़ी के बेटे ओरहान गाज़ी तख्त-नसीन हो गए थे_1400 सदी में आना अनातोलिया में सूरते हाल कुछ ऐसी थी कि जितनी भी छोटी रियासत थी उनके पास दो ही रास्ते थे एक या तो वो छोटी छोटी रियासतों पे कब्जा करले दसरा ये की वो खुद बड़ी रियासत के कब्जे में आके खत्म हो जाए*
*यही मुश्किल ओरहान गाजी के भी सामने थी और वो दो जगह थी एक मशरिक में अपने हम मज़हब ,मुसलमान तुर्को की दो रियासते , (1)केराशी, (2) कर्मानिया , वजूद में आचुकी थी ओर इन रियासतों को खास तौर पर कर्मानिया को मुसलमानो की उस वक़्त की सबसे बड़ी हुकुमत ममलोक सल्तनत की हिमायत असील थी,*
*ममलोक सल्तनत आज के इस्राइल , फलस्तीन , सऊदी अरब और मिस्र तक फैली थीं, ओरहान गाज़ी के सामने एक चेलेंज ,मुस्लिम रियासते जो मशरिक , जुनुब में थी, दूसरी तरफ रोमियो की ब्रेजेंटाइन एम्पियार जो मगरिब में थी ,ओर बोहोत ताक़तवर रियासत थी पूरा यूरोप ओर ईसाई इसके साथ खड़े होते थे*
*इन दोनो रियासतों से सुल्तान ओरहान हालत ए जंग में भी थे*
*उस्मानी रियासत दोनो तरफ से घिरी हुई थी उसके बावजूद उसने कैसे रूमियों को घेरा ,*
_आनातोनिया से ब्रेजीनटाईन एम्पियर का इक़तीतार तो खत्म हो चुका था लेकिन अनातोलिया के सुमाली इलाके में अब भी छोटे छोटे सहर ओर किले उनके कब्जे में थे,_
*ओर ओरहान गाज़ी
वो कब्ज़े छुड़ाना चाहते थे*ते थे*.
*⚔️सुल्तान ओरहान गाज़ी⚔️*
*(kantakouzenos)ने अपने बेटे को अपनी जगह बादशाह बनाने की कोशिश की तो उसके खिलाफ भी बगावत हो गई ,केटाको जीनस फिर एक बार सुल्तान ओरहान गाज़ी से मदद ली लेकिन इस बार सुल्तान ओरहान गाज़ी ने एक नई सरत रखी कि वो दरिया ए दानियाल के पार यूरोप के केलीपुलि में मिलेट्री बेस कायम करने दी जाए*
*केटाक को ओरहान गाज़ी की फौजी मदद चाहिए थी ओर योरोप में ही चाहिए थी वो मान गया ,यू उस्मानी फ़ौज़ बगैर एक कतरा खून बहाए योरोप में दाखिल हो गए,*
*सुल्तान ओरहान गाज़ी ने अपने बेटे उस्मान को एक बड़ी फ़ौज़ के साथ केलिपोली भेज दिया,*
*उस्मानी फ़ौज़ के मदद के लिए आजाने से केटगो को मजबूती मिल गई ,लेकिन साथ ही उसके लिए एक बड़ा मसला भी खड़ा होगया, और वो के उस्मानी सल्तनत की एक रिवायत थी कि वो गाज़ा करते थे ईसाई इलाको को अपनी सल्तनत का हिस्सा बनाने के लिए जिहाद करते थे ,जिसे वो गाज़ा कहते थे और गाज़ा करने वालो को गाज़ी कहा जाता था , इसी वजह से तुर्को को गाज़ी लिखा जाता हे*।
*ओरहान गाज़ी के बेटे जिनका नाम अपने दादा के नाम पे ही , उस्मान गाज़ी था उन्होंने योरोप में सिर्फ मिलेट्री बेस ही तक सीमित रहना पसंद नही किया बल्कि योरोप के कुस्तुन्तनिया के मगरिब के इलाके थ्रेस पे कब्जा करना शूरु कर दिया , ये कब्ज़ा शूरु हुवा तो रोमियो के दिलो दिमाग मे खतरे की घंटिया बजने लगी ताकतवर तुर्क जो मशरिक में तो थे ही अब मगरिब में भी फेल रहे हे ओर ये सब रोमी शहनशाह (john v kantakouzenos) की वजह से हो रहा था*
_योरोपियन सल्तनतों ने केटगोजीनस को तनक़ीद का निशाना बनाया ,जिसकी वजह से उसने फ़ौरन सुल्तान ओरहान गज़ी को खत लिख कर समझाया कि वो योरोपीय इलाको पे कब्ज़ा ना करे , अपनी मिल्ट्री बेस तक महदूद रहे ,वरना वापस चले जाएं ,_
*लेकिन उसको जवाब मिला की कुफ्फार के जो इलाके मुसलमानी रियासतों के हिस्से बन चुके हे वापिस नही होंगे ,चुनांचे, कॅरिपोली, ओर, थ्रेस , सल्तनत ए उस्मानिया में शामिल हो गया और आज तक भी तुर्की के हिस्सा हे*
_बेहरहाल केटाको (john v kantakouzenos) की वजह से ये हाल हुवा था तो रोमियो ने कुस्तुन्तुनिया में उसका तख्ता पलट कर दिया ओर उसकी बादशाहत से उसे हटा दिया गया_
*रूमी सल्तनत को नया शहनशाह मिल गया जो ,, सुल्तान ओरहान गाज़ी का साथी नही , दुश्मन था, जैसा माजी में होता आया था,*
*1362 में सुल्तान ओरहान गाज़ी का इन्तिक़ाल हो गया लेकिन अपने इन्तिक़ाल तक अपने वालिद से मिली रियासत को एक सल्तनत बना चुके थे, जो पहले से दुगनी हो चुकी थी , ओर अनातोलिया से निकल कर योरोप तक फैल गई थी*
*सुल्तान ओरहान गाज़ी के तीन बेटे थे*
*1️⃣सुलेमान गाज़ी*
*2️⃣मुराद गाज़ी*
*3️⃣खलीलगाज़ी**सुल्तान मुराद गाज़ी बने मुराद गाज़ी ने तख्त पे बैठते ही तुर्को की गाज़ा रिवायत को आगे बढ़ाया*
*ओर उन्होंने फ़ौज़ में एक नया इज़ाफ़ा किया, ये नया इज़ाफ़ा था गुलामो की एक फ़ौज़ का ये गुलामो की फ़ौज़ किया थी और तारीख में इतनी मसहूर क्यू हे*
___________
उस्मान गाज़ी के अदल इंसाफ
*इसी तरह एक ओर जमाअत जो मुक़य्यर हज़रात की थी बड़ी मसहूर है जिसका नाम अल अफयान था वो मुसलमानो की माली मदद करती थी, ,जंग में जरूरत के समान मुहैय्या कराती थी और लश्करों का साथ देती थी*
*इस जमाअत में शामिल लोग बड़े बड़े ताजिर थे ओर वो इनकी मदद करते थे तमीरी काम जैसे खानकाहों मसाजिद , वगेरा इस जमाअत में मुमताज़ उलमा भी शामिल थे ,जो इस्लामी तहज़ीब की खिदमत का फ़रीज़ा सर अंजाम देते थे और लोगो के दिलो में इस्लाम के लिए जस्बा पैदा करते थे*
*एक जमाअत ओर थी जो हाजियो पे मुस्तमिल थी*
_जिसका नाम हाजियाते रूम यानी हुज्जाजे अर्ज़े रूम इस जमात का काम इस्लामी सउर की बेदारी इस्लामि उलूम की तरबीजो इसयात ओर इस्लामी तसरियतो क़वानीन में गहरी बसिरत पैदा करना था_
*इनके अलावा कई दूसरी जमाअते भी जिनका हदफ़ मुसलमानो की बिल उमुम मदद करना था*
*एक वाकिया बोहोत मसहूर हे ,,उस्मान गाज़ी के अदल इंसाफ का जिसकी वजह से एक परिवार मुसलमान हुवा*
_उस्मान गाज़ी के पास एक मुसलमान और ईसाई आया और इंसाफ की दरखुवास्त की उस्मान गाज़ी ने फैसला हक़ करते हुवे ईसाई के हक़ में किया ,,जिससे ब्रेजेंटाइन परिवार मुसलमान हो गया_
*उस्मान गाज़ी हमेसा उलमा से मशवरा करते थे , ओर अपनी रियाया के साथ अदल से काम लेते ,जो मुसलमान नही उन्हें इस्लाम की दावत जरूर देते और कई आपके इंसाफ की वजह से मुसलमान हुवे*
*उस्मान गाज़ी की अपने बेटे को नसीहत आज भी तारीख में पढ़ी जा सकती हे*
_जिसका हम मुताला कर सकते है जिसमे तहज़ीबी ओर सराई तरीके-कार जिसपे बाद में उस्मानी सल्तनत कायम रही_
*गाज़ी उस्मान जब बिस्तरे मर्ज पे थे, तो इन्होंने अपने बेटे को वसीयत करते हुवे कहा था*
_आए बेटे किसी ऐसे काम मे मसरूफ ना होना जिसके करने का परवर दिगार ए आलम ने हुक्म ना दिया हो,,_
*जब भी सल्तनत में कोई मुश्किल पेस आये तो उलमा ए इकराम से मशवरा लेना और उनसे इमदाद तलब करना*
*ए बेटे फरमा-बरदार लोगो को एज़ाज़ से नवाजना , फौजो पर इनामों इकराम करना ,कही सीपा ओर दौलत की वजह से शैतान तुम्हे धोखे में ना डाल दे, अहले सरियत से दूर होने से ऐतराज़ करना,*
*बेटा आप जानते हे हमारा मकसद रब्बुल-आलमीन की रज़ा हे और ये के हम जिहाद के जरीए तमाम आफाक में अपने दीन के नूर को आम करदे*
*लिहाज़ा वही बात करना जिसमे अल्लाह करीम की खुशनूदी हो ,बेटा हम वो लोग नही जो लोगो को गुलाम बनाने के लिए जंग करते हे, हमे जिंदा रहना हे तो इस्लाम की खातिर ,मरना है तो इस्लाम की खातिर ,*
*ओर ये है वो चीज़ मेरे बेटे जिसका तू एहल हे**ये वसीयत एक जाब्ता थी जिसपे बाद में उस्मानि अमल पहरा रहे*
Syed ul Shuhada Syedna Ameer Hamza(رضئ اللہ تعالی عنہ)
SERMON 112
ومن خطبة له (عليه السلام)
[في ذم الدنيا]وَأُحَذّرُكُمُ الدُّنْيَا، فَإِنَّهَا مَنْزِلُ قُلْعَة ، وَلَيْسَتْ بِدَارِ نُجْعَة ، قَدْ تَزَيَّنَتْ بَغُرُورِهَا، وَغَرَّتْ بِزِينَتِهَا، دَارُهَا هَانَتْ عَلَى رَبِّهَا، فَخَلَطَ حَلاَلَهَا بِحَرَامِهَا، وَخَيْرَهَا بِشَرِّهَا، وَحَيَاتَهَا بِمَوتِهَا، وَحُلْوَهَا بِمُرِّهَا، لَمْ يُصْفِهَا اللهُ لاَِوْلِيَائِهِ، وَلَمْ يَضِنَّ بِهَا عَلَى أَعْدَائِهِ، خَيْرُهَا زَهِيدٌ، وَشَرُّهَا عَتِيدٌ ، وَجَمْعُهَا يَنْفَدُ، وَمُلْكُهَا يُسْلَبُ، وَعَامِرُهَا يَخْرَبُ. فَمَا خَيْرُ دَار تُنْقَضُ نَقْضَ الْبِنَاءَ، وَعُمُر يَفْنَى فَنَاءَ الزَّادِ، وَمُدَّة تَنْقَطِعُ انْقِطَاعَ السَّيْرِ!
فاجْعَلُوا مَا افْتَرَضَ اللهُ عَلَيْكُمْ مِنْ طَلِبَتِكُمْ، وَاسْأَلُوهُ مِنْ أَدَاءِ حَقِّهِ مَا
سَأَلَكُمْ، وَأَسْمِعُوا دَعْوَةَ الْمَوْتِ آذَانَكُمْ قَبْلَ أَنْ يُدْعَى بِكُمْ.
إِنَّ الزَّاهِدِينَ في الدُّنْيَا تَبْكِي قُلُوبُهُمْ وَإِنْ ضَحِكُوا، وَيَشْتَدُّ حُزْنُهُمْ وَإِنْ فَرِحُوا، وَيَكْثُرُ مَقْتُهُمْ أَنْفُسَهُمْ وَإِنِ اغْتُبِطُوا بِمَا رُزِقُوا.
قَدْ غَابَ عَنْ قُلُوبِكُمْ ذِكْرُ الاْجَالِ، وَحَضَرَتْكُمْ كَوَاذِبُ الاْمَالِ، فَصَارَتِ الدُّنْيَا أَمْلَكَ بِكُمْ مِنَ الاْخِرَةِ، وَالْعَاجِلَةُ أَذْهَبَ بِكُمْ مِنَ الاْجِلَةِ، وَاِِنَّمَا أَنْتُم إِخْوَانٌ عَلَى دِينِ اللهِ، مَا فَرَّقَ بَيْنَكُمْ إِلاَّ خُبْثُ السَّرَائِرَ، وَسُوءُ الضَّمائِرِ، فَلاَ تَوَازَرُونَ، وَلاَ تَنَاصَحُونَ، وَلاَ تَبَاذَلُونَ، وَلاَ تَوَادُّونَ.
مَا بَالُكُمْ تَفْرَحُونَ بِالْيَسِيرَ مِنَ الدُّنْيَا تُدْرِكُونَهُ، وَلاَ يَحْزُنُكُمُ الْكَثِيرُ مِنَ الاخِرَةِ تُحْرَمُونَهُ! وَيُقْلِقُكُمُ الْيَسِيرُ مِنَ الدُّنْيَا يَفُوتُكُمْ، حَتَّى يَتَبَيَّنَ ذلِكَ فِي وُجُوهِكُمْ، وَقَلَّةِ صَبْرِكُمْ عَمَّا زُوِيَ مِنْهَا عَنْكُمْ! كَأَنَّهَا دَارُ مُقَامِكُمْ، وَكَأَنَّ مَتَاعَهَا بَاق عَلَيْكُمْ.
وَمَا يَمْنَعُ أَحَدَكُمْ أَنْ يَسْتَقْبِلَ أَخَاهُ بِمَا يَخَافُ مِنْ عَيْبِهِ، إِلاَّ مَخَافَةُ أَنْ يَسْتَقْبِلَهُ بِمِثْلِهِ، قَدْ تَصَافَيْتُمْ عَلَى رَفْضِ الاْجِلِ وَحُبِّ الْعَاجِلِ، وَصَارَ دِينُ أَحَدِكُمْ لُعْقَةً عَلَى لِسَانِهِ، صَنِيعَ مَنْ قَدْ فَرَغَ مِنْ عَمَلِهِ، وَأَحْرَزَ رِضَى سَيِّدِهِ.
SERMON 112
About this world and its people
I warn you of the world for it is the abode of the unsteady. It is not a house for foraging. It has decorated itself with deception and deceives with its decoration. It is a house which is low before Allah. So He has mixed its lawful with its unlawful, its good with its evil, its life with its death, and its sweetness with its bitterness.
Allah has not kept it clear for His lovers, nor has He been niggardly with it towards His foes. Its good is sparing. Its evil is ready at hand. Its collection would dwindle away.
Its authority would be snatched away. Its habitation would face desolation. What is the good in a house which falls down like fallen construction or in an age which expires as the provision exhausts, or in time which passes like walking?
Include whatever Allah has made obligatory on you in your demands. Ask from Him fulfilment of what He has asked you to do. Make your ears hear the call of death before you are called by death.
Surely the hearts of the abstemious weep in this world even though they may (apparently) laugh, and their grief increases even though they may appear happy. Their hatred for themselves is much even though they may be envied for the subsistence they are allowed. Remembrance of death has disappeared from your hearts while false hopes are present in you.
So this world has mastered you more than the next world, and the immediate end (of this world) has removed you away from the remote one (of the next life). You are brethren in the religion of Allah. Dirty natures and bad conscience have separated you. Consequently you do not bear burdens of each other nor advise each other, nor spend on each other, nor love each other.
What is your condition? You feel satisfied with what little you have secured from this world while much of the next world of which you have been deprived does not grieve you. The little of this world which you lose pains you so much so that it becomes apparent in your faces, and in the lack of your endurance over whatever is taken away from you; as though this world is your permanent abode, and as though its wealth would stay with you for good.
Nothing prevents anyone among you to disclose to his comrade the shortcomings he is afraid of, except the fear that the comrade would also disclose to him similar defects. You have decided together on leaving the next world and loving this world. Your religion has become just licking with the tongue. It is like the work of one who has finished his job and secured satisfaction of his master

