कर्बला के 42वें शहीद हज़रते अब्दुर्र रहमान इब्ने अब्दुलमजनी
आप निहायत शरीफ और आले मोहम्मद के चाहने वाले थे यौंमे आशूरा इमाम हुसैन अलै० से इज़्ने जंग हासिल करके मैदाने जंग में बरामद हुए। आप ने रजज़ पढ़ा और दुश्मनों पर जबरदस्त हमला किया वहुत से दुश्मनों को कत्ल करके खुद भी शहीद हो गये।
कर्बला के 43वें शहीद हज़रते नाफेअ इने हिलाल-अल-जमली
आप का पूरा नाम नाऊ इब्ने हिलाल इले नाअ इब्ने हमल इब्ने सअद अल-अशीरा इब्ने मदहज अल-जमली था। आप बुजुर्गे कौम और शरीफुफ्स थे। मिल्लत की सरदारी और रियासत आप की खानदानी विरासत थी। आप बहादुर, कारी-ऐ-कुरआन, रावी-ऐ-हदीस और मुंशी-ए-कामिल थे आप को हज़रत अली अलै० के असहाब में भी होने का शरफ हासिल था आप ने जंगे जमल, सिफ़्फ़ीन और नहरवान में शिरकत की थी। कूड़े में जनाबे मुस्लिम इब्ने अकील की शहादत से ब्ल ही आप इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में पहुँच गये थे। लश्करे हुर्र से मुलाकात के बाद सय्यदुश शोहदा ने जिस खुतबे में ये फमाया था कि तुम लोग चले जाओ यह लोग सिर्फ मेरा खून बहाना चाहते है। इस का जवाब असहाब में जुहैर ने सबसे पहले दिया था उन के बाद नाफेअ इब्ने हिलाल ने ही एक तवील तक़रीर में जॉनिसारी का यकीन दिलाया था।
करबला में पानी बन्द हो जाने के बाद हुसूले आब में आपने भी काफी जद्दो-जेहद की थी। एक दो बार हज़रते अब्बास अलै० के साथ भी सई-ए-आब में गये थे। आपने अपने तमाम तीर ज़हर में बुझाऐ हुये थे बारहाँ दुश्मनों को तीर से मार कर तलवार से हमला करने लगे और बेशुमार दुश्मनों को ज़ख़्मी कर दिया बिल आख़िर शिम्र ने आप को शहीद कर दिया।
कर्बला के 44वें शहीद हज़रते उमर इब्ने क़रज़ा अल-अन्सारी
आप का पूरा नाम और नसब ये है :- ‘उमर इब्ने करज़ा इब्ने कअब इब्ने उमर इब्ने आएज़ ज़ैद इब्ने मनात इब्ने सलबा इब्ने कअब इब्ने अल-ख़ज़रज अल अनसारी अल कूफी अल ख़जरजी कूफ़ी था।
आप के वालिदे माजिद जनाब करज़ा अनसारी रसूल स० के सहाबी थे आप से ऑ हज़रत की बहुत सी हदीसे हैं। ऑ हज़रत के बाद आपको हज़रत अली अ० के सहाबी होने का शरफ हासिल हुआ। आप मदीने मुनव्वर से कूफ़े आकर मुकीम हुऐ और जंगे जमल-ओ-सिफ्फीन और नहरवान में आप ने हज़रत की बैअत में जंग की आपको अमीरूल मोमिनीन ने फारस का हाकिम बना दिया था। सन 51 हिजरी में आपकी वफात हुई कूफ़े में सबसे पहले हज़रत अली अ० के बाद आप का नौहा पढा गया। करज़ा ने कई औलादे छोड़ीं जिस में सब से ज़्यादा मशहूर उमर इब्ने करज़ा थे।
जनाबे उमर इब्ने करज़ा ने रास्तों की बन्दिश से पहले इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में ब-मकाम करबला अपने को पहुँचा दिया था। आप करबला में उमरे सअद के पास पैग़ामात पहुँचाया करते थे।
आप इमाम हुसैन अलै० से इजाज़त लेकर यौमे आशूरा मैदाने जंग में आये और आप ने रजज़ पढ़ कर ज़बरदस्त हमला किया और काफी ज़ख़्मी होकर इमाम हुसैन अलै० की ख़िदमत में हाज़िर हुऐ जब इमाम हुसैन अलै० पर दुश्मनों ने हमला कर दिया तो आप तीरो को सीने पर लेने लगे यहाँ तक कि शहीद हो गये। (ज़िक्र-अल-अब्बास सफहा न०२२३)
कर्बला के 45वें शहीद हज़रते जौन बिन हवी गुलामे ग़फ़्फ़ारी
जनाबे जौन अबूज़र गफ्फारी के गुलाम थे। आप को आले मोहम्मद से वही खुसुसियत हासिल थी जो अबूज़र को थी। जौन पहले इमामे हसन अलै० की ख़िदमत में रहे फिर इमामे हुसैन अलै० की ख़िदमत गुज़ारी के शरफ से बहरावर हुये। आप इमामे हुसैन अलै० के हमराह मदीने से मक्का और वहाँ से करबला आये।
आशूरा के दिन आपने इज़्ने जेहाद तलब की यौगे तो आप ने फ्रमाया “जौन ! मुझे पसन्द नहीं कि मैं पर तुम्हें कत्ल होतें देखूँ”। जौन ने कदमों पर सर रखते हुये अर्ज़ की “मौला आप के कदमों में शहीद हो जा जाना मेरी ज़िन्दगी का मक्सद है।”
मौला ! मेरा पसीना बूदार है हसब ख़राब है और रंग काला सही, लेकिन जज़्बा-ए-शहादत में ख़ामी नहीं है मौला इजाज़त दीजिये कि सुर्ख़रू हो जाऊँ।
इमामे हुसैन अलै० ने इजाज़त दी और जौन मैदाने जंग में आये। आप ने जबरदस्त जंग की और दरजा-ए-शहादत पर फाऐज़ हुये। इमामे हुसैन अलै० लाशे जौन पर पहुँचे आपने दुआ देते हुऐ कहा ‘खुदाया ! इनके पसीने को मुश्कज़ार और के रंग को सफेद कर दे और हसब को आले मोहम्मद (स०) के इन्तेसाव से मुमताज कर दे।
इमामे मोहम्मद बाक़िर अलै० का इरशाद है कि शहादत के बाद आप का चेहरा रौशन हो गया था। और बदन से मुश्क की खुशबू आ रही थी।
कर्बला के 46वें शहीद हज़रते उमर इब्ने खालिद-अल-सीदादी
आपका पूरा नाम उमर इब्ने खालिद अल-असदी था और आप की कुन्नियत अबू खालिद थी। आप मकाम सहरा के रहने वाले थे और कूफ़े के शुरफा में से थे। आप को मोहब्बते अहलेबैत में कमाल हासिल था। हज़रते मुस्लिम इब्नै अकील की पूरी हिमायत की थी और शहादते हज़रते मुस्लिम के बाद आपने मजबूरन रू-पोशी इख़्तेयार की थी। आप को जब मालूम हुआ कि इमामे हुसैन अलै० मक्का से कूफा पहुँच रहे हैं तो आप गैर मारूफ रास्तो से रवाना होकर मंजिले अजीब ‘हजानात” में हाज़िरे ख़िदमत हो गये और कवला पहुँच कर यौमे आशूरा उरूसे शहादत से हम किनार हो गये। अबद मुक़फ़ का ब्यान है कि ये इब्ने ख़ालिद जंग करते-करते सख़्त घेरे में आ गये तो इमामे हुसैन अलै० ने हज़रते अब्बास को उनकी मद्द के लिये भेजा था आप ने पूरी मद्द की आख़िर में आप शहीद हो गये। (ज़िक्र-अल-अब्बास सफा न० 223)