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अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट 80



हुदैबिया समझौते के बाद की सैनिक गतिविधियां


ग़ज़वा ग़ाबा या ग़ज़वा जी क़िरद

यह ग़ज़वा वास्तव में बनू फ़ज़ारा की एक टुकड़ी का, जिसने अल्लाह के

रसूल सल्ल० के मवेशियों पर डाका डाला था, पीछा करने पर आधारित है । हुदैबिया के बाद और ख़ैबर से पहले यह पहला और अकेला ग़ज़वा है जो अल्लाह के रसूल सल्ल० को पेश आया। इमाम बुखारी ने इसका ‘बाब’ बांधते हुए बताया है कि यह ख़ैबर से सिर्फ़ तीन दिन पहले पेश आया था और यही बात इस ग़ज़वे के खास कर्त्ता-धर्ता हज़रत सलमा बिन अकवअ रज़ि० से भी रिवायत की गई है, उनकी रिवायत सही मुस्लिम में देखी जा सकती है। ग़ज़वा के आम माहिरों का कहना है कि यह घटना हुदैबिया समझौते से पहले की है, लेकिन जो बात सहीह में बयान की गई है, माहिरों के बयान के मुक़ाबले में वही ज़्यादा सही है। 1

इस ग़ज़वे के हीरो हज़रत सलमा बिन अकवअ रज़ि० से जो रिवायतें रिवायत की गई हैं, उनका सार यह है कि नबी सल्ल० ने अपनी सवारी के ऊंट अपने दास रिबाह के साथ चरने के लिए भेजे थे और मैं भी अबू तलहा के घोड़े समेत उनके साथ था कि अचानक बहुत सुबह अब्दुर्रहमान फ़ज़ारी ने ऊंटों पर छापा मारा और उन सबको हांक ले गया और चरवाहे को क़त्ल कर दिया।

मैंने कहा, रिबाह ! यह घोड़ा लो, इसे अबू तलहा तक पहुंचा दो और रसूलुल्लाह सल्ल० को ख़बर कर दो और खुद मैंने एक टीले पर खड़े होकर मदीना की तरफ रुख किया और तीन बार पुकार लगाई, या सबाहाह ! हाय सुबह का हमला। फिर मैं हमलावरों के पीछे चल निकला। उन पर तीर बरसाता जाता था और यह पद पढ़ता जाता था-

1. देखिए सहीह बुखारी, बाब ग़ज़वा जाते क़िरद 2/603, सहीह मुस्लिम, बाब ग़ज़वा ज़ीक़िरद वग़ैरह, 2/113, 114, 115, फ़हुल बारी 7/460, 461, 462, ज़ादुल मआद, 2/120, हुदैबिया से इस लड़ाई के पीछे चले जाने पर हज़रत अबू सईद खुदरी रज़ि० की एक और हदीस भी दलील के तौर पर सामने आती है। देखिए मुस्लिम, किताबुल हज्ज, बाबुत्तग़ब फ्री सुन-नल मदी-नति वस्सब्रि अलल अवानि, हदीस न० 475, (1374) 2/1001

‘मैं अकवअ का बेटा हूं और आज का दिन दूध पीने वाले का दिन है। (यानी आज पता लग जाएगा कि किसने अपनी मां का दूध पिया है ।)

सलमा बिन अकवअ कहते हैं कि ख़ुदा की क़सम ! मैं उन्हें बराबर तीरों से छलनी करता रहा। जब कोई सवार मेरी ओर पलटकर आता तो मैं किसी पेड़ की ओट में बैठ जाता। फिर उसे तीर मारकर घायल कर देता, यहां तक कि जब ये लोग पहाड़ के तंग रास्ते में दाखिल हुए तो मैं पहाड़ पर चढ़ गया और पत्थरों से उनकी ख़बर लेने लगा। इस तरह मैंने लगातार उनका पीछा किए रखा, यहां तक कि अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के जितने भी ऊंट थे, मैंने उन सबको अपने पीछे कर लिया और उन लोगों ने मेरे लिए उन ऊंटों को आज़ाद छोड़ दिया, लेकिन मैंने फिर भी उनका पीछा करना जारी रखा और उन पर तीर बरसाता रहा, यहां तक कि बोझ कम करने के लिए उन्होंने भी तीस से ज़्यादा चादरें और तीस से ज़्यादा नेजें फेंक दिए। वे लोग जो कुछ भी फेंकते थे, मैं उस पर (निशान के तौर पर) थोड़े से पत्थर डाल देता था, ताकि अल्लाह के रसूल सल्ल० और उनके साथी पहचान लें (कि यह दुश्मन से छीना हुआ माल है)

इसके बाद वे लोग एक घाटी के तंग मोड़ पर बैठकर दोपहर का खाना खाने लगे। मैं भी एक चोटी पर जा बैठा। यह देखकर उनके चार आदमी पहाड़ पर चढ़कर मेरी ओर आए। (जब इतने क़रीब आ गए कि बात सुन सकें तो) मैंने कहा, तुम लोग मुझे पहचानते हो। मैं सलमा बिन अकवअ हूं। तुममें से जिस किसी को दौड़ाऊंगा, बे-धड़क पा लूंगा और जो कोई मुझे दौड़ाएगा, हरगिज़ न पा सकेगा।

मेरी यह बात सुनकर चारों वापस चले गए और मैं अपनी जगह जमा रहा, यहां तक कि मैंने रसूलुल्लाह सल्ल० के सवारों को देखा कि पेड़ों के बीच से चले आ रहे हैं। सबसे आगे अखरम थे, उनके पीछे अबू क़तादा और उनके पीछे मिक़दाद बिन अस्वद । (मोर्चे पर पहुंचकर अब्दुर्रहमान और अखरम में टक्कर हुई। हज़रत अखरम ने अब्दुर्रहमान के घोड़े को घायल कर दिया, लेकिन अब्दुर्रहमान ने नेज़ा मारकर हज़रत अखरम को क़त्ल कर दिया और उनके घोड़े पर जा पलटा, मगर इतने में हज़रत अबू क़तादा अब्दुर्रहमान के सर पर जा पहुंचे और उसे नेज़ा मारकर घायल कर दिया। बाक़ी हमलावर पीठ फेरकर भागे और हमने उन्हें खदेड़ना शुरू कर दिया।

पहले मैं अपने पांवों पर उछलता हुआ दौड़ रहा था। सूरज डूबने से कुछ उन लोगों ने अपना रुख एक घाटी की ओर मोड़ा, जिसमें ज़ीक़िरद नाम का एक चश्मा था। ये लोग प्यासे थे और वहां पानी पीना चाहते थे, लेकिन मैंने उन्हें

चश्मे से परे ही रखा और वे एक बूंद भी न चख सके।

अल्लाह के रसूल सल्ल० और शहसवार सहाबा रजि० दिन डूबने के बाद मेरे पास पहुंचे। मैंने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल० ! ये सब प्यासे थे। अगर आप मुझे सौ आदमी दे दें तो मैं ज़ीन सहित उनके तमाम घोड़े छीन लूं और उनकी गरदनें पकड़ कर खिदमत में हाज़िर कर दूं ।

आपने फ़रमाया, अकवअ के बेटे ! तुम क़ाबू पा गए हो, तो अब ज़रा नम बरतो ।

फिर आपने फ़रमाया कि इस वक़्त बनू ग़तफ़ान में उनका सत्कार हो रहा है।

(इस ग़ज़वे पर) अल्लाह के रसूल सल्ल० ने समीक्षा करते हुए कहा, आज हमारे सबसे बेहतर शहसवार अबू क़तादा और सबसे बेहतर प्यादा सलमा हैं और आपने मुझे दो हिस्से दिए, एक प्यादा का हिस्सा और एक शहसवार का हिस्सा और मदीना वापस होते हुए मुझे (यह शरफ़ बख्शा कि) अपनी अज़बा नामी ऊंटनी पर अपने पीछे सवार कर लिया।

इस ग़ज़वे के दौरान अल्लाह के रसूल सल्ल० ने मदीने का प्रबन्ध हज़रत इब्ने उम्मे मक्तूम को सौंपा था और इस ग़ज़वे का झंडा हज़रत मिक़दाद बिन अम्र रज़ि० को अता फ़रमाया था। 1

1. पिछले स्रोत, जो आ चुके ।

जब रोम के बादशाह ने सहाबा को अल्लाह के रसूल (ﷺ) की तस्वीर दिखाई

**ईमान अफ़रोज़ वाक़िया: जब रोम के बादशाह ने सहाबा को अल्लाह के रसूल (ﷺ) की तस्वीर दिखाई!**
इरादे पक्के हों और ईमान सच्चा, तो रब्ब-उल-आलमीन दुनिया के बड़े-बड़े बादशाहों के सामने भी अपने महबूब (ﷺ) की अज़मत का परचम बुलंद कर देता है।
इस्लामी तारीख़ (*अल्-बिदाया वन-निहाया*) का एक बेहद ख़ास और रूहानी वाक़िया है, जो हर मुसलमान के दिल को ईमान की मिठास से भर देता है।
📜 **वाक़िए का पस-मंज़र (Background)
हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) के दौर-ए-ख़िलाफ़त में, सहाबी **हज़रत हिशाम बिन अल-आस (रज़ि.)** और उनके साथी को रोम (Byzantium) के बहुत बड़े बादशाह **‘हिरक़्ल’ (Heraclius)** के पास इस्लाम का पैग़ाम लेकर भेजा गया।
जब सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) रूम के शाही दरबार में पहुँचे और इस्लाम की दावत दी, तो बादशाह ने उनका बहुत एहतराम किया। बातचीत के बाद बादशाह उन्हें महल के एक ख़ास और बेहद महफ़ूज़ कमरे में ले गया।

###  **रेशम के कपड़े और सोने का सन्दूक**
बादशाह हिरक़्ल ने एक बड़ा, सोने का सन्दूक मँगवाया। उस सन्दूक के अंदर रेशम (Silk) के अलग-अलग रंगीन टुकड़े रखे हुए थे, और हर रेशम के कपड़े पर किसी न किसी नबी (अलैहिस्सलाम) की तस्वीर (शबीह) बनी हुई थी।
बादशाह ने एक-एक करके कपड़े निकालना शुरू किया:
* 🔹 सब-पहले **हज़रत आदम (अलैहि.)** की तस्वीर दिखाई।
* 🔹 फिर **हज़रत नूह (अलैहि.)**, **हज़रत इब्राहिम (अलैहि.)**, **हज़रत मूसा (अलैहि.)**, और **हज़रत ईसा (अलैहि.)** समेत कई अंबिया-ए-किराम की तस्वीरें दिखाईं।
हर तस्वीर को देखकर सहाबा-ए-किराम हैरान रह गए कि उनका हुस्न और रौब कितना बेमिसाल था!

**आका-ए-दो जहाँ (ﷺ) की मुक़द्दस तस्वीर**
आख़िर में बादशाह ने काले रेशम का एक टुकड़ा निकाला… जिस पर एक निहायत हसीन, नूरानी और रौबदार ज़ात की तस्वीर बनी हुई थी।
जैसे ही सहाबा-ए-किराम (रज़ि.) की नज़र उस मुक़द्दस चेहरे पर पड़ी, उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े! दिल तड़प उठा और उन्होंने बिला-झिझक पुकार उठाया:
> **”अल्लाह की क़सम! ये तो हमारे आका, हमारे हबीब, हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) हैं!”**
>
यह सुनकर बादशाह हिरक़्ल ताज़ीम में खड़ा हो गया और उसने भी तस्दीक़ की कि हाँ, यह आख़िरी नबी की ही तस्वीर है।
###  **ये तस्वीरें बादशाह के पास कहाँ से आयीं?**
जब सहाबा ने हैरत से पूछा कि यह सन्दूक आपके पास कहाँ से आया? तो हिरक़्ल ने बताया:
> *”जब हज़रत आदम (अलैहि.) को ज़मीन पर भेजा गया था, तो अल्लाह तआला ने उन्हें आने वाले तमाम अंबिया-ए-किराम के हुलिये दिखाए थे। हज़रत आदम (अलैहि.) ने उन्हें महफ़ूज़ किया, और यह सन्दूक नस्ल-दर-नस्ल चलते हुए हज़रत इब्राहिम (अलैहि.) से होता हुआ आज रोम के शाही ख़ज़ाने तक पहुँचा है।”*
>
## **सबक़ (Moral)
बादशाह हिरक़्ल को दिल से पूरा यक़ीन हो गया था कि मोहम्मद (ﷺ) ही अल्लाह के सच्चे और आख़िरी रसूल हैं, जिनकी बशारत उनकी आसमान किताबों (तौरात व इंजील) में मौजूद थी। लेकिन अपनी सल्तनत और तख़्त के डर से वह ज़ाहिरी तौर पर ईमान न ला सका।
अल्लाह तआला हमें अपने प्यारे नबी (ﷺ) से सच्ची मोहब्बत करने और उनके बताए हुए सीधे रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। (आमीन)