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अर-रहीकुल मख़्तूम  पार्ट  1 पार्ट 77

हुदैबिया का समझौता (ज़ीक़ादा सन् 06 हि०)

हुदैबिया के उमरे की वजह

जब अरब प्रायद्वीप में हालात बड़ी हद तक मुसलमानों के पक्ष में हो गए, तो इस्लामी दावत की कामियाबी और महान विजय के चिह्न धीरे-धीरे प्रकट होने शुरू हुए और मस्जिदे हराम में जिसका दरवाज़ा मुश्किों ने मुसलमानों पर छः वर्ष से बन्द कर रखा था, मुसलमानों के लिए इबादत का हक़ मान लिए जाने की प्रस्तावना शुरू हो गई।

अल्लाह के रसूल सल्ल० को मदीना में यह सपना दिखाया गया कि आप और आपके सहाबा किराम मस्जिदे हराम में दाखिल हुए। आपने खाना काबा की चाबी ली और सहाबा किराम सहित बैतुल्लाह का तवाफ़ और उमरा किया। फिर कुछ लोगों ने सर के बाल मुंडाए और कुछ ने कटवाने को काफ़ी समझा ।

आपने सहाबा किराम रज़ि० को इस सपने की सूचना दी तो उन्हें बड़ी खुशी हुई और उन्होंने यह समझा कि इस साल मक्का में दाखिला मिलेगा। आपने सहाबा किराम को यह भी बतलाया कि आप उमरा अदा फ़रमाएंगे। इसलिए सहाबा किराम भी सफ़र के लिए तैयार हो गए।

मुसलमानों में रवानगी का एलान

आपने मदीना और आस-पास की आबादियों में यह एलान फ़रमा दिया कि लोग आपके साथ जाएं, लेकिन बहुत से लोगों ने देर की। इधर आपने अपने कपड़े धोए। मदीना पर इब्ने उम्मे मक्तूम या नुमैला लैसी को अपना जानशीं मुक़र्रर फ़रमाया और अपनी क़सवा नामी ऊंटनी पर सवार होकर पहली ज़ीक़ादा सन् 06 हि० को सोमवार को रवाना हो गए। आपके साथ उम्मुल मोमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रज़ि० भी थीं। चौदह सौ (और कहा जाता है कि पन्द्रह सौ लोग साथ थे।) आपने मुसाफ़िरों का हथियार यानी म्यान के अन्दर बन्द तलवारों के सिवा और किसी क़िस्म का हथियार नहीं लिया था।

मक्का की ओर मुसलमान चल पड़े

हुलैफ़ा पहुंचकर आप हृदयि’ 1. हृदयि वह जानवर जिसे हज व उपरा करने वाले मक्का या मिना में ज़िब्ह करते हैं,

आपका रुख मक्का की ओर था।

(कुरबानी के जानवर) के क़लादे पहनाए, कोहान चीर कर निशान बनाया और

उमरे का एहराम बांधा, ताकि लोगों को इत्मीनान रहे कि आप लड़ाई नहीं लड़ेंगे। आगे-आगे क़बीला खुज़ाआ का एक जासूस भेज दिया, ताकि वह कुरैश के इरादों की ख़बर लाए। अस्फ़ान के क़रीब पहुंचे तो उस जासूस ने आकर सूचना दी कि मैं काब बिन लुई को इस हालत में छोड़कर आ रहा हूं कि उन्होंने आपसे मुक़ाबला करने के लिए अहाबीश’ (मित्र क़बीलों) को जमा कर रखा है और भी जत्थ जुटा लिए हैं और वे आपसे लड़ने और आपको बैतुल्लाह से रोकने का संकल्प किए हुए हैं।

इस सूचना के मिलने के बाद नबी सल्ल० ने सहाबा किराम रज़ि० से मश्विरा किया और फ़रमाया, क्या आप लोगों की यह राय है कि ये लोग जो कुरैश की सहायता पर कमर कसे हुए हैं, हम उनके घरवालों पर टूट पड़ें और क़ब्ज़ा कर लें ? इसके बाद अगर वे खामोश बैठते हैं, तो इस हालत में खामोश बैठते हैं कि लड़ाई की मार और दुख और ग़म से दोचार हो चुके हैं और भागते हैं तो वह भी इस हालत में कि अल्लाह एक गरदन काट चुका होगा? या आप लोगों की यह राय है कि हम खाना काबा का रुख करें और जो राह में रोक बने, उससे लड़ाई करें ?.

इस पर हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रज़ि० ने अर्ज़ किया कि अल्लाह और उसके रसूल बेहतर जानते हैं, मगर हम उमरा करने आए हैं, किसी से लड़ने नहीं आए हैं। अलबत्ता जो हमारे और बैतुल्लाह के दर्मियान रोक बनेगा, उससे लड़ाई करेंगे ।

जाहिलियत के ज़माने में अरब में चलन था कि हदयि का जानवर अगर भेड़ या बकरी है, तो निशानी के तौर पर गले में कलादा डाल दिया जाता था और अगर ऊंट है, तो कोहान चीरकर खून पोत दिया जाता था। ऐसे जानवर से कोई व्यक्ति छेड़छाड़ न करता था। शरीअत ने इस चलन को बाक़ी रखा।

1. ये हब्शी लोग नहीं हैं, जबकि शब्द से इसका भास हो सकता है, जबकि बनू कनाना और दूसरे अरब क़बीलों की कुछ शाखाएं हैं। इनका ताल्लुक़ हुबशी पहाड़ से है जो वादी नोमान अराक से नीचे स्थित है। यहां से मक्का का फ़ासला छः मील है। इस पहाड़ के दामन में बनू हारिस बिन अब्दे मनार बिन कनाना, बनू मुस्तलिक़, हय्या बिन साद बिन उमर बनुल हौन बिन खुज़ैमा ने इकट्ठे होकर कुरैश को वचन दिया था और सबने मिलकर अल्लाह की क़सम खाई थी कि जब तक रात अंधेरी और दिन रोशन है और हुबशी पहाड़ अपनी जगह बरक़रार है, हम सब दूसरों के खिलाफ़ एक साथ होंगे। (मोजमुल बुलदान 2/214, अल मुनमिक़ 275)

नबी सल्ल० ने फ़रमाया, अच्छा तब चलो। चुनांचे लोगों ने सफ़र जारी रखा। बैतुल्लाह से मुसलमानों को रोकने की कोशिश

इधर कुरैश को अल्लाह के रसूल सल्ल्लाहु अलैहि व सल्लम की रवानगी का पता चला, तो उसने एक मज्लिसे शूरा (सलाहकार परिषद) बनाई और तै किया कि जैसे भी संभव हो, मुसलमानों को बैतुल्लाह से दूर रखा जाए। चुनांचे जब अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अहाबीश से कतरा कर अपना सफ़र जारी रखा, तो बनी काब के एक आदमी ने आकर आपको खबर दी कि कुरैश ने जी तुवा नामी जगह पर पड़ाव डाल रखा है और खालिद बिन वलीद दो सौ सवारों का दस्ता लेकर कुराउल ग़मीम में तैयार खड़े हैं। (कुराउल ग़मीम मक्का जाने वाली केन्द्रीय और कारवानी राजमार्ग पर स्थित है) ख़ालिद ने मुसलमानों को रोकने की भी कोशिश की। चुनांचे उन्होंने अपने सवारों को ऐसी जगह तैनात किया, जहां से दोनों फ़रीक़ एक दूसरे को देख रहे थे।

खालिद ने ज़ुहर की नमाज़ में यह भी देखा कि मुसलमान रुकूअ और सज्दे कर रहे हैं, तो कहने लगे कि ये लोग ग़ाफ़िल थे, हमने हमला कर दिया होता तो इन्हें मार लिया होता। इसके बाद तै किया कि अस्र की नमाज़ में मुसलमानों पर अचानक टूट पड़ेंगे लेकिन अल्लाह ने इसी बीच नमाज़े खौफ़ (लड़ाई की हालत की खास नमाज़) का हुक्म उतार दिया और खालिद के हाथ से मौक़ा जाता रहा।

ख़ूनी टकराव से बचने की कोशिश और रास्ते की तब्दीली

इधर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने कुराउल ग़मीम का केन्द्रीय मार्ग छोड़कर एक दूसरा पेचदार रास्ता अपनाया जो पहाड़ी घाटियों के बीच से होकर गुज़रता था, यानी आप अपने दाहिनी ओर कतरा कर हम्श के बीच से गुज़रते हुए एक ऐसे रास्ते पर चले, जो सनीयतुल मरार पर निकलता था । सनीयतुल मरार से हुदैबिया में उतरते हैं और हुदैबिया मक्का के निचले हिस्से में स्थित है ।

इस रास्ते को अपनाने का फ़ायदा यह हुआ कि कुराउल ग़मीम का वह केन्द्रयी मार्ग जो तनअम से गुज़रकर हरम तक जाता था और जिस पर खालिद बिन वलीद की टुकड़ी तैनात थी, वह बाईं ओर छूट गई। खालिद ने मुसलमानों धूल को देखकर जब यह महसूस किया कि उन्होंने रास्ता बदल दिया है, तो घोड़े को एड़ लगाई और कुरैश को इस नई स्थिति के खतरे से आगाह करने के लिए भागम भाग मक्का पहुंचे। के

इधर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने अपना सफ़र पहले की

तरह जारी रखा। जब सनीयतुल मरार पहुंचे, तो ऊंटनी बैठ गई। लोगों ने कहा, हल-हल, लेकिन वह बैठी ही रही। लोगों ने कहा, क़सवा अड़ गई है।

आपने फ़रमाया, क़सवा अड़ी नहीं है और न उसकी यह आदत है, लेकिन उसे उस हस्ती ने रोक रखा है, जिसने हाथी को रोक दिया था। फिर आपने फ़रमाया, उस ज़ात की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, ये लोग किसी भी ऐसे मामले की मांग नहीं करेंगे, जिसमें अल्लाह की हुरमतों का आदर कर रहे हों, लेकिन मैं उसे ज़रूर मान लूंगा। इसके बाद आपने ऊंटनी को डांटा तो वह उछल कर खड़ी हो गई। फिर आपने रास्ते में थोड़ी सी तब्दीली की और हुदैबिया के पास एक चश्मे पर उतरे, जिसमें थोड़ा-सा पानी था और उसे लोग ज़रा-ज़रा सा ले रहे थे। चुनांचे कुछ ही क्षणों में सारा पानी खत्म हो गया। अब लोगों ने अल्लाह के रसूल सल्ल० से प्यास की शिकायत की। आपने तिरकश से एक तीर निकाला और हुक्म दिया कि चश्मे में डाल दें। लोगों ने ऐसा ही किया। इसके बाद अल्लाह की क़सम ! उस चश्मे से बराबर पानी उबलता रहा, यहां तक कि तमाम लोग प्यास बुझा कर वापस हो गए।

बुदैल बिन वरक़ा की मध्यस्थता

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सन्तुष्ट हो चुके, तो बुदैल बिन वरका खुजाओ अपने क़बीला खुज़ाआ के कुछ लोगों के साथ हाज़िर हुआ । तिहामा के निवासियों में यही क़बीला (खुज़ाआ) रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का हितैषी था ।

बुदैल ने कहा, मैं काब बिन लुई को देखकर आ रहा हूं कि वे हुदैबिया के काफ़ी पानी पर पड़ाव डाले हुए हैं। उनके साथ औरतें और बच्चे भी हैं। वे आपसे लड़ने और आपको बैतुल्लाह से रोकने का तहैया किए हुए हैं।

अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया, हम किसी से लड़ने नहीं आए हैं। कुरैश को लड़ाइयों ने तोड़ डाला है और बहुत नुक्सान पहुंचाया है, इसलिए अगर वे चाहें, तो उनसे एक मुद्दत तै कर लूं और वे मेरे और लोगों के बीच से हट जाएं और अगर वे चाहें तो जिस चीज़ में लोग दाखिल हुए हैं, उसमें वे भी दाखिल हो जाएं, वरना उनको राहत तो हासिल ही रहेगी।

और अगर उन्हें लड़ाई के सिवा कुछ मंजूर नहीं, तो उस ज़ात की क़सम, जिसके हाथ में मेरी जान है, मैं अपने दीन के मामले में उनसे उस वक़्त तक लड़ता रहूंगा, जब तक कि मेरी गरदन अलग न हो जाए या जब तक अल्लाह

अपना फ़ैसला लागू न कर दे।

बुदैल ने कहा, आप जो कुछ कर रहे हैं, मैं उसे कुरैश तक पहुंचा दूंगा। इसके बाद वह कुरैश के पास पहुंचा और बोला, मैं उन साहब के पास से आ रहा हूं। मैंने उनसे एक बात सुनी है, अगर चाहो तो पेश कर दूं ।

इस पर मूर्खों ने कहा, हमें कोई ज़रूरत नहीं कि तुम हमसे उनकी कोई बातचीत करो, लेकिन जो लोग सूझ-बूझ रखते थे, उन्होंने कहा, लाओ सुनाओ, तुमने क्या सुना है ?

। अलैहि बुदैल ने कहा, मैंने उन्हें यह और यह बात कहते सुना है। इस पर कुरैश ने मिक्रज़ बिन हफ्स को भेजा, उसे देखकर अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु व सल्लम ने फ़रमाया, यह बद-अहद आदमी है।

चुनांचे जब उसने आपके पास आकर बातें कीं, तो आपने उससे वही बात कही जो बुदैल और उसके साथियों से कही थी। उसने वापस पलट कर कुरैश को पूरी बात बता दी ।

Itne Arsay Tak Ibadat Kare

🍀 *Rasool e Khuda (ع) Ne Hazrat ALI (ع) Se Irshad Farmaya:*

🌹*“ALI (ع) Agar Koi Shakhs Khuda Ki Itne Arsay Tak Ibadat Kare Jitna Ke Nooh (a.s) Apni Qaum Me Qiyam Pazeer Rahe Thay- (Yani Sadhe Nau Sau Saal Tak Ibadat Kare) Aur Uske Paas Ohad Pahaad Jitna Sona Ho Aur Wo Sab Sona Allah Ki Rah Me Kharch Karde Aur Usay Taweel Umar Mil Jaye Aur Wo Hazaar Baar Pa Paedah Hajj Kare Phir Safa Wa Marwah Ke Darmiyaan Mazloom Hokar Maara Jaye- Agar Wo Teri Wilayat Nahi Rakhta Toh Wo Jannat Ki Khushbu Bhi Nahi Sungh Sakega Aur Jannat Me Dakhil Na Hoga”.*

(Kitaab: Fazael e Ahlebait a.s Al Maroof Ghayat ul Maram Jild:1 Safa:105/106 H:3)

जिसकी वजह से इस्लाम में  73 फिरक्के बने

हज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने आखिरी वक्त में सहाबा इकराम से फरमाया एक कागज कलम लाओ कि मैं एक तहरीर लिख दूं जिसके बाद तुम कभी गुमराह ना होगे।

लेकिन हजरत उमर बिन खत्ताब ने कहा कि हमारे लिए अल्लाह का कुरान काफी है और इस वक्त हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बीमारी की हालत में बोल रहे हैं।

कुछ और सहाबा इकराम ने कहा कागज कलम देना चाहिए लेकिन हजरत उमर की बात को लोगों ने ज्यादा तवज्जो दी और वहां पर झगड़ा शुरू हो गया यह झगड़ा देख कर हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तमाम सहाबा से कहा यहां से चले जाओ।

अब तमाम मुसलमानों से सवाल है?
ऐसी कौन सी चीज जो हुजूर लिखवाना चाहते थे लेकिन सहाबा इकराम की नादानी की वजह से वह तहरीर नहीं लिखी जा सकी जिसकी वजह से इस्लाम में  73 फिरक्के बने

सही बुखारी हदीस नंबर 114

जब नबी करीम (सल्ल०) के मर्ज़ में शिद्दत हो गई तो आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि मेरे पास लिखने का सामान लाओ ताकि तुम्हारे लिये एक तहरीर लिख दूँ  ताकि बाद में तुम गुमराह न हो सको। इस पर उमर (रज़ि०) ने ( लोगों से) कहा कि उस वक़्त आप (सल्ल०) पर तकलीफ़ का ग़लबा है और हमारे पास अल्लाह की किताब क़ुरआन मौजूद है जो हमें (हिदायत के लिये) काफ़ी है। इस पर लोगों की राय मुख़्तलिफ़ हो गई और शोर-ग़ुल ज़्यादा होने लगा। आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, मेरे पास से उठ खड़े हो, मेरे पास झगड़ना ठीक नहीं। इस पर इब्ने-अब्बास (रज़ि०) ये कहते हुए निकल आए कि बेशक मुसीबत बड़ी सख़्त मुसीबत है (वो चीज़ जो) हमारे और रसूलुल्लाह (सल्ल०) के और आपकी तहरीर के बीच रुकावट हो गई।

मसला-ए-अफ़ज़लियत का तहक़ीक़ी जायज़ा.

بِسْمِ اللهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ

اَللّٰهُمَّ صَلِّ عَلٰی سَيِّدِنَا وَمَوْلَانَا مُحَمَّدٍ وَّعَلٰی اٰلِ سَيِّدِنَا وَمَوْلَانَا مُحَمَّدٍ وَّبَارِكْ وَسَلِّمْ

मसला-ए-अफ़ज़लियत का तहक़ीक़ी जायज़ा.👇

मसला-ए-अफ़ज़लियत पर ‘इज्मा’ (सर्वसम्मति) होने की बात बिल्कुल ग़लत है, क्योंकि इज्मा का मुनकिर (इनकार करने वाला) काफ़िर हो जाता है और मुसलमान नहीं रहता।

अगर इस पर वाकई इज्मा हुआ होता, तो बाज़ सहाबा हज़रत अली को अफ़ज़ल (सबसे श्रेष्ठ) न कहते।

अहले सुन्नत की मोतबर (प्रामाणिक) किताबों से यह बात साबित है कि अफ़ज़लियत के मामले में सहाबा और ताबेईन के दरमियान अलग-अलग राय थी:

●कोई हज़रत अली को अफ़ज़ल मानता था।
●कोई अज़वाज़-ए-रसूल (नबी की पत्नियों) को अफ़ज़ल मानता था।
●कोई अल्लाह के रसूल की बेटी हज़रत फ़ातिमा को अफ़ज़ल कहता था।

इसलिए, अफ़ज़लियत के मसले पर ऐसा इज्मा होना जिससे इनकार करने वाला इस्लाम से बाहर हो जाए, साबित नहीं होता।

1.इज्मा की हक़ीक़त और मुनकिर का हुक्म.👇

यह बात सही है कि अगर किसी अक़ीदे पर ‘इज्मा-ए-क़तई’ (जिसका इनकार कुफ़्र हो) हो जाए, तो उसका मुनकिर दायरे-ए-इस्लाम से बाहर हो जाता है। लेकिन अफ़ज़लियत के मसले पर जो इज्मा नक़्ल किया जाता है, वह अक्सर ‘इज्मा-ए-सुक़ूती’ या ‘अक्सरियत की राय’ के तौर पर देखा जाता है। यही वजह है कि हज़रत अली को अफ़ज़ल मानने वाले को अहले सुन्नत के उलेमा ‘काफ़िर’ नहीं कहते अगर ऐसा होता तो माज़अल्लाह उन सहाबा व ताबिएीन का क्या बनेगा जो मसला ए अफ़ज़लियत पर अलग अलग राय रखते थे.?

2.सहाबा और सलफ़ का इख़्तिलाफ़.👇

तारीख़ और हदीस की मोतबर किताबों (जैसे सियरु अलामिन्नुबला, अल-इस्तिआब) से यह साबित है कि बाज़ जलील-उल-क़द्र सहाबा और ताबिएीन हज़रत अली को अफ़ज़ल मानते थे।

हज़रत सलमान फ़ारसी, हज़रत अबू ज़र गिफ़ारी, और हज़रत मिक़दाद जैसे सहाबा से हज़रत अली की अफ़ज़लियत के क़ौल मिलते हैं।

इमाम मालिक के उस्ताद इमाम इब्ने शिहाब ज़ुहरी और कुछ कूफ़ी उलेमा भी हज़रत अली को अफ़ज़लियत देते थे।

3. हज़रत अली की अफ़ज़लियत पर दलीलें.👇

अगर हम हदीस की किताबों का मुताला करें, तो हज़रत अली की अफ़ज़लियत के हक़ में कई मज़बूत दलीलें मिलती हैं और आगे हम इस पर दलील ए सहीहा भी पेस करेंगे।

4.अफ़ज़लियत (हज़रत फ़ातिमा).👇

जैसा कि अफ़ज़लियत का एक रुख़ यह भी है कि हुज़ूर (ﷺ) के जिगर के टुकड़े यानी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा को तमाम औरतों, बल्कि बाज़ उलेमा के नज़दीक पूरी उम्मत से अफ़ज़ल माना गया है, क्योंकि वह ‘बदअतुल मुस्तफ़ा’ (नबी का हिस्सा) हैं।

हम अहले सुन्नत का यह अकीदा है कि अल्लाह के नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ जो इमामा शरीफ़ पहना करते थे, उस इमामा शरीफ़ से अफ़ज़ल कोई नहीं है और हुज़ूर ﷺ के बाल मुबारक से भी अफ़ज़ल कोई नहीं है। तो क़ुरआन-ए-करीम में अल्लाह तआला फ़रमा रहा है कि हज़रत अली, मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ की जान हैं, उनकी नफ़्स हैं; तो रसूलुल्लाह ﷺ की जान (नफ़्स) से भला कौन अफ़ज़ल हो सकता है?”

आये कुरआने करीम की उस आयत को देखे जिसमे हजरत अली को रसूलुल्लाह ﷺ की जान (नफ़्स) करार दीया है.👇

कुरआने करीम की सुरत नं: 3 : आल इमरान – سورة آل عمران – आयत नं: 61 पर अल्लाह ﷻ फरमाता है:
فَمَنْ حَاجَّكَ فِيهِ مِنْ بَعْدِ مَا جَاءَكَ مِنَ الْعِلْمِ فَقُلْ تَعَالَوْا نَدْعُ أَبْنَاءَنَا وَ أَبْنَاءَكُمْ وَ نِسَاءَنَا وَ نِسَاءَكُمْ وَ أَنْفُسَنَا وَ أَنْفُسَكُمْ ثُمَّ نَبْتَهِلْ فَنَجْعَلْ لَعْنَتَ اللهِ عَلَى الْكاذِبِينَ (٦١)
तरजूमा
फिर ऐ महबुब! जो तुमसे ईशा के बारे मे हुज्जत करे बाद इसके के तुम्हे इल्म आ चुका तो उनसे फरमा दो आओ हम बुलाए अपने बेटे और तुम्हारे बेटे और अपनी औरतें और तुम्हारी औरतें और अपनी जाने और तुम्हारी जाने, फिर मुबाहीला करें तो झूठो पर अल्लाह की लानत डालें

इस आयत जीम्न मे मुफ़स्सरीन ने लीखा है जो “अन,फुसना” यानि जान(नफ़्स) कहा गया है उससे मुराद हज़रत अली है

आये अब हम देखते है के इस आयत मुबाहीला के जिम्न मे मुफ़स्सरीन ने कीया लिखा है.👇

आयते मुबाहिला की शाने नुजूल के बारे में इमाम वाहिदी निशापुरी [वफात 468 हिजरी] ने ‘असबाब ए नुजूल ए कुरआन’ में सफा नं 97 पर लिखा है-
الشعبي كا قول ہے کہ ابناءنا سے مراد حسن اور حسین ہیں، ونساءنا سے مراد حضرت فاطمہ ہیں اور انفسنا سے مراد علی بن ابی طالب رضی اللہ عنہم ہیں۔
यानि ‘बेटों’ से मुराद हसन और हुसैन (रजि.) हैं, बेटियों से मुराद फातिमा (रजि.) हैं और नफ्स से मुराद अली बिन अबी तालिब (रजि.) हैं।

कुल कायनात मै बनू हाशिम सबसे अफजल है और बनू हाशिम मै रसूलल्लाह ﷺ अफज़ल.👇

कुरआन-ए-मजीद:
لَقَدْ جَاءَكُمْ رَسُولٌ مِّنْ أَنفُسِكُمْ – (अत-तौबा, 128)
तरजुमा: बेशक तशरीफ लाया है तुम्हारे पास एक रसूल ﷺ तुम्हीं में से।

(हज़रत अब्दुल्लाह इब्न अब्बास रज़ि० फरमाते हैं कि: इस आयत में “अन्फुसिकुम” का लफ़्ज़ आला और उम्दा नसब से मुराद है। यानी रसूल ﷺ बनी-हाशिम से हैं जो कि अरबों का आला नसब है। (तफ़सीर-दुर्रे-मन्सूर, सूरह तौबा, आयत 128-129)

क़ौम में अल्लाह तआला की नज़रों में सबसे अफ़ज़ल क़ौम बनी-हाशिम है। (तफ़सीर-कुर्तुबी, सूरह तौबा, आयत 128)

जाबिर इब्न अब्दुल्लाह रज़ि० से मवी है कि अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की औलाद में इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद को मख़सूस फ़रमाया। इस्माईल अलैहिस्सलाम की औलाद में बनू कनाना को, बनू कनाना में कुरैश को, कुरैश में बनू हाशिम को और बनू हाशिम में रसूलुल्लाह ﷺ को मख़सूस फ़रमाया। (सहीह मुस्लिम, किताबुल फ़ज़ाइल, हदीस नं. 2276)

हज़रत इब्न अब्बास रज़ि० फरमाते हैं कि: अल्लाह तआला ने रसूल ﷺ के लिये “अल-मुजम्मल”, “अल-मुज़म्मल”, “अल-मुतवक्किल”, “अल-मुतहम्मल”, “अल-मुजतबा” और “रऊफ़-रहीम” नाम रखे। (दुर्रे-मन्सूर, सूरह तौबा, आयत 128-129)

और एक और क़ुरआनी आयत का मज़मून ये है कि आप ﷺ सब से ज़्यादा अर्फ़ और अफ़ज़ल हैं। (सहीह बुख़ारी, किताबुत तफ़सीर, जिल्द 2, सफ़ा 311)

Note
“अल्लाह तआला ने तमाम जहाँ में बनू हाशिम को चुना और बनू हाशिम में मोहम्मद ﷺ को चुना यानी अल्लाह ने भी अफ़ज़लियत का मयार (Standard) ख़ानदान ही को बनाया, अब हम उसी ख़ानदान को अफ़ज़ल कहें तो हम शिया केसे?”

हम अल्लाह तअला के मयार को ही मानेंगे कीसी दुनियादार की बात नही मानेंगे

निचोड़.👇

अहले सुन्नत के बड़े इमाम, जैसे इमाम अब्दुल क़ाहिर बग़दादी और इमाम इब्ने असीर, ने तस्लीम किया है कि शुरुआती दौर में इस मसले पर इख़्तिलाफ़ था। अगरचे बाद में जम्हूर (Majority) ने हज़रत अबू बक्र की अफ़ज़लियत पर इत्तिफ़ाक़ कर लिया, लेकिन हज़रत अली को अफ़ज़ल मानना तो सहाबा के दौर में ‘कुफ़्र’ ना था और ना ही आज इसे ‘इज्मा’ का मुनकिर कहकर खारिज किया जा सकता है।

यह एक इल्मी और तहक़ीक़ी मसला है जिसमें दोनों तरफ़ दलीलें मौजूद हैं।

अफजलियत ए अली अहले-सुन्नत की किताबों से
पोस्ट बहोत लंबि होने के कारण
इस.👇 लिंक पर क्लिक करे सारे हवाले दिए गए हे
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